तिवारी : तब आपने वह सेवा १४ माह के बाद ही क्यों छोड दी ?
डा. शर्मा : श्री सुरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी बी एस सी और एम एस सी में मेरे वनस्पति विज्ञान के शिक्षक थे और बहुत प्रेम से पढाया करते थे, अपने विद्यार्थियों के समुचित विकास का खयाल रखते थे। तिवारी जी देखिये, इतने वर्षों के बाद उनका एक पत्र मेरे पास पन्तनगर में आया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में संपादक के पद के लिये विज्ञापन निकला है और मैं अवश्य ही उस के लिये आवेदन पत्र भेजूं। मैं तो पन्त नगर में बहुत प्रसन्न था, मैने यह विज्ञापन ही नहीं देखा था। क्या आश्चर्य कि अन्य विद्वानों ने उन्हें 'शिष्य वत्सल' की उपाधि दी थी। मैने आवेदन पत्र भेजा और मेरा अनुसंधान परिषद में चुनाव के लिये बुलावा आया। मुझे पता लगा कि उस पद के लिये क्Rषि मन्त्री जगजीवन राम द्वारा अनुशंसित व्यक्ति का ही चुनाव तय है। मैं निराश तो हुआ, किन्तु मैं डा. स्वामीनाथन जी, जो उस समय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में वनस्स्पति विभाग के अध्यक्ष थे, मिलने चला गया। वे अपने कार्य के लिये इतने समर्पित थे कि तत्सम्बन्धी सभी जानकारियों से अवगत रहते थे। वे मेरे कार्य से परिचित थे। वे विदेश से आलू पर मौलिक अनुसंधान करके आए थे और कार्यों के प्रति बहुत ही निष्ठावान थे। उन्होंने वहां जंगली आलू की एक जाति से नई किस्म के आलू का आविष्कार किया था जो कडी ठंड और पाले की मार सह सकती थी। उन्हें अपने उत्कृष्ट अनुसंधानों के लिये ग्रेगोर मैंडल की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक अनोखे 'स्वर्ण पदक' से सम्मानित भी किया गया था। ग्रेगोर मैंडल एक चर्च में पादरी थे और उन्होंने मटर पर प्रयोगों द्वारा १८६६ में आनुवंशिकी के नियम खोजकर प्रकाशित किये थे, जो कि एक क्रान्तिकारी कार्य था। मैं यह सब डा. स्वामीनाथन के वैज्ञानिक उपलब्धियों की ऊंचाई बतलाने के लिये कह रहा हूं। तभी मैने उनके पास जाने का साहस किया था। मैने उन्हें बतलाया कि मैं जिस उद्देश्य से आया हूं वह नहीं हो सकता क्योंकि बीच में राजनैतिक व्यवधान आ गया है। उन्होंने तुरंत ही परिषद के प्रबन्ध सचिव, आई ए. एस., श्री के पी ए मेनन को दूरभाष पर बतलाया कि उनकी जानकारी में डा. रमेश दत्त शर्मा संपादक पद के लिये सर्वश्रेष्ठ कैन्डीडेट हैं।
चूंकि यह पत्रिकाएं अधिकांशतया हिन्दी में ही प्रकाशित होती थीं, अतएव रामधारी सिंह दिनकर चुनाव समिति के अध्यक्ष थे। मैं तो प्रसन्न था कि मेरा साहित्य प्रेम यहां भी मदद करेगा। किन्तु श्री मेनन ने दिनकर जी को मंत्री जी की अनुशंसा बतला ही दी थी। चुनाव समिति में परिषद के प्रधान संपादक डा. रामगोपाल चतुर्वेदी जी थे जो मेरे कार्य से अच्छी तरह परिचित थे और मेरे प्रशंसक भी थे। इसके पहले वे ही संपादक थे और उनकी प्रधान संपादक के पद पर पदोन्नति होने के नाते यह संपादक का चुनाव हो रहा था। वे मंत्री जी के 'कैन्डीडेट' को जानते भी थे और वे उसे नहीं चाहते थे। यही समझ चुनाव समिति के एक और सदस्य परिषद के ही उप महा निदेशक डा. आंबिका सिंह की भी थी।
जब साक्षात्कार हो गया तब दिनकर और मेनन को छोडकर सभी ने मेरे साक्षात्कार के उत्कृष्ट होने के अतिरिक्त मेरे पन्त नगर में किये गए कार्य की प्रशन्सा भी की तब दिनकर जी ने कहा कि भाई एक व्यक्ति को जो इतना अच्छा कार्य कर रहा है उसे वहां से क्यों हटाया जाए? अतएव अच्छा कार्य को बढाने के लिये उन्हे वहीं रहने दिया जाए। तब चतुर्वेदी जी ने कहा कि वहां रहकर तो शर्मा जी एक ही संस्था का भला कर रहे हैं, यहां आकर वे वैसी ही आठ संस्थाओं का भला करेंगे, (क्योंकि उस समय भारत में केवल आठ ही कृषि विश्व विद्यालय थे। तब श्री मेनन ने एक योग्य अधिकारी के समान सुझाव दिया कि यदि समिति सहमत हो तब हम एक और संपादक का चुनाव कर सकते हैं क्योंकि उसकी भी आवश्यकता है। समिति ने मेनन जी के इस सुझाव को तुरंत मान लिया।
तिवारी : यह सुनकर अब मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूं। क्या आपने वैज्ञानिकों में भी राजनीति का खेल देखा है? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है क्योंकि विज्ञान तथ्यात्मक है, सत्य की खोज कर रहा है, और साथ ही खंडनीय भी है अर्थात विज्ञान और इसलिये वैज्ञानिक तथा विज्ञान संचारक अपनी आलोचना के लिये सदा ही सहर्ष तैयार रहते हैं। अत: विज्ञान के विकास के लिये खुला मस्तिष्क और सहयोग मूलरूप से अनिवार्य हैं। क्या आपके अनुभव में भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में और विज्ञान संचार के क्षेत्र में यह गुण आधिकांशतया देखने में आए हैं? क्या आपने हमारे वैज्ञानिकों या विज्ञान संचारकों को दलबन्दी के दलदल में फ़ंसते भी देखा है?
डा. शर्मा : जी हां, बहुत देखा है। विशेषकर स्वतंत्रता के बाद। अब अनेक वैज्ञानिक अपनी पदोन्नति को लिये राजनैतिक प्रश्रय लेने लगे हैं। वैसे तो एक राजनीति व्यक्तिगत न होकर प्रान्तीय या जातीय होती है, जैसे उत्तर – दक्षिण या बांग्ला - गैर बांग्ला या दलित – गैर दलित आदि। और दूसरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण होती है। डा. जयंत विष्णु नार्लीकर ने अपने उपन्यास 'वाइरस' में इसका अच्छा विवेचन किया है। एमएस स्वामीनाथन ने भी इस राजनीति से बहुत कष्ट पाया है। स्वामीनाथन जी ने विदेश से आयातित लाल गेहूं की गामा विकिरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा उत्परिवर्तन कर गेहूं की एक सफ़ल नई जाति - शरबती सोनोरा - उत्पन्न की थी। मैने अपने एक लेख 'गेहूं रंग बदलेगा' में इसका वर्णन किया है। उसका प्रारम्भ मैने चन्द्रकिरण सौनरिक्क्षा की कहानी को उद्धरित करते हुए किया था - एक रिक्शे वाले की पत्नी अपने पति से कहती है कि उसे नहीं चाहिये यह बुझे बुझे से लाल रंग वाला गेहूं जिसकी रोटी भी ढंग से नहीं बनती।"
तिवारी : हां डाक्साब आपकी यह साहित्य और विज्ञान को मिलानेवाली लेखन शैली आकर्षक, रुचिकर और प्रभावी होती है। यह साहित्य और विज्ञान के बीच एक पुल भी बनाती है, जो पुल न केवल भारत के लिये वरन विश्व के लिये बहुत आवश्यक है।
डा. शर्मा : तिवारी जी आप की शैली भी ऐसी ही पुल बनाने वाली है और आपका फ़लक भी बहुत व्यापक है। आपने तो आथर्स गिल्ड के शुद्ध साहित्यिक मंच पर भारतीय इतिहास में पहली बार विज्ञान कथा की एक संगोष्ठी करवा दी।
तिवारी : मैं अपनी बात करने के लिये आपके पास नहीं आया हूं. आप बतलाएं कि लाल गेहूं का इतना अच्छा रंग बदलने के बाद इसमें राजनीति कहां से आ गई।
ड. शर्मा : स्वामी नाथन के गेहूं शरबती सोनोरा की परिषद की ही प्रयोगशाला में रासायनिक गुणों की जांच हुई थी। और उस वैज्ञानिक ने स्वतंत्र रूप से कहा कि शरबती सोनोरा में प्रोटीन १६% है, जब कि विश्व के सामान्य गेहूं में १२ % होता है। स्वाभाविक ही स्वामीनाथन इस परिणाम से बहुत प्रसन्न हुए और इसकी उन्होंने अनेक स्थानों पर इसकी चर्चा की। किन्तु जब विदेश की प्रयोगशालाओं में इस गेहूं शरबती सोनोरा का विश्लेषण किया गया तब प्रोटीन की मात्रा वही १२ % निकली। उस भारतीय वैज्ञानिक ने अपनी गलती स्वीकार की और स्वामीनाथन ने भी खेद प्रकट किया। तब भी एक मराठी महानिदेशक के मित्र वैज्ञानिकों ने स्वामीनाथन पर धोखे के आरोप लगाए। अन्तत: इस घटना की जांच करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के सेवाप्राप्त न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर के नेत्ट्व में एक जांच आयोग बैठा। उस आयोग ने स्वामीनाथन को निर्दोष पाया। और साथ ही उस आयोग ने कृषि अनुसंधान परिषद की कार्य प्रणाली में अनेक सुधार सुझाए जिन्होंने परिषद की काया पलट ही कर दी। उदाहरणार्थ, कृषि परिषद को स्वतन्त्र सत्ता दी, कृषि आनुसंधान सेवा (ए आर एस नाम से कृषि सेवा आई ए एस की तरह ही) प्रारम्भ की, पदोन्नति के लिये नए नियम बनाए कि समय आने पर वैज्ञानिकों की पदोन्नति की जाएगी चाहे उस विभाग में स्थान हो या न हो, और वह वैज्ञानिक अपने ही क्षेत्र में कार्य करता रहेगा (अन्यथा आलू वाले की पदोन्नति गेहूं के लिये हो जाती थी)। इस जांच के दो वर्षों का समय उनके लिये बहुत ही कष्टदायक था।
इसके बाद् उन्हें कृषि मंत्रालय में सचिव का पद दिया गया। उस समय मंत्री थे राव वीरेन्द्र सिंह जी थे जो अपने सचिव के साथ भी भद्रता का व्यवहार नहीं करते थे। अन्तत: उन्होंने मुक्ति मांगी। श्रीमती गांधी उनका सम्मान करती थीं अत: उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। उन्होने वहां भी बडे कार्य किये, यथा राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का निर्माण किया क्योंकि उन्होने जनता में वैज्ञानिक समझ का मह्त्व समझा था। योजना आयोग में भी उन्हें शान्ति से कार्य करने नहीं दिया गया और अन्तत: उन्होंने मनीला जाकर 'अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान परिषद' का महानिदेशक का पद सम्हाला। मैने अपनी पुस्तक 'धान कथा' में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है जिससे धान की उत्पत्ति से लेकर आज तक के विकास की कहानी का रोचक वर्णन है।
तिवारी : चावल की मूल उत्पत्ति का स्थान कौन सा है?
डा. शर्मा : असम में एक स्थान है 'जैपोर' जिसे चावल के मूल स्थान का श्रेय दिया जाता है।
तिवारी : क्या भारत में विज्ञान संचार के क्षेत्र में भी राजनैतिक दलदल है ?
डा. शर्मा : यहां भी दलदल हैं और ये सब मिलकर कार्य करने के साथ, एक दूसरे का विरोध ज्यादा करते हैं। ऐसी संस्थाओं के कार्यकर्ता अक्सर विज्ञान के प्रसार का कार्य करने के स्थान पर अपना स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं, और विज्ञान संचार का कार्य आगे नहीं बढ पाता।
तिवारी : विज्ञान संचार में विज्ञान कथा का क्या मह्त्व है ?
इस बीच श्रीमती शर्मा की आवाज आई कि आप लोग बातें करते करते थक गए होंगे। अब भोजन कर लें फ़िर आगे की बात करें। सचमुच हमें बातें करते करते तीन घन्टे से अधिक हो गए थे। अब आगे की बातचीत अगले अंक में प्रस्तुत की जाएगी।