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डाक्टर रमेशदत्त शर्मा से कल्किआन सम्पादक की बातचीत

डाक्टर रमेशदत्त शर्मा न केवल स्वदेश में विख्यात हैं वरन उनके कार्यों तथा विज्ञान लेखन से विदेशी वैज्ञानिक भी परिचित तथा प्रभावित हैं। वे भारतीय कृषि अनुसंधान के प्रकाशन विभाग से निदेशक के पद से सेवा निवृत्त हुए हैं, किन्तु विज्ञान सेवा से नहीं। वे दूरदर्शन, रेडियो तथा मुद्रण माध्यमों के द्वारा विज्ञान संचार का कार्य उसी उत्साह से कर रहे हैं जिसे देखकर युवावर्ग भी प्रेरणा लेते हैं। उनकी बढती उम्र की बाधा भी उनके इस पुण्य कार्य में असफ़ल ही रहती है। उन्हें विज्ञान संचार क्षेत्र के सभी प्रमुख सम्मानों से अलंकृत किया गया है, जिनका विवरण हम दूसरे भाग में देंगे। उनके पास भारत में हो रहे विज्ञान संचार के अनुभवों का खजाना है जिसे वे मुक्त हस्त लुटाने में आनंदित होते हैं। उनसे मैं जब भी बातें करता हूं मुझे खजाने की दो चार मुहरें मिल जाती हैं। यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि मैं आज उनसे 'हिन्दी.कैल्किओन.काम' के पाठकों के लिये चर्चा कर रहा हूं। -- विश्व मोहन तिवारी।

यह चर्चा करने के लिये मैं अपने नोएडा, उ.प्र. स्थित निवास से यही कोई २५, ३० कि.मी. दूर ओलम्पियाड गांव, दिल्ली स्थित निवास पर मिलने गया। मैने देखा है कि गरीब लोग नोएडा में रहते हैं और धनी लोग दिल्ली में (जो शायद आज उतना सच नहीं है)। वैसे डा. शर्मा जी का यह अमीरीपन उनकी पत्नी की कृपा से है; वे एक शासकीय विद्यालय में अध्यापन करती हैं, इसलिये उन्हें यह स्वर्ग-सा सुन्दर गांव का फ़्लैट अवास हेतु मिला है। पहुंचते ही विनम्रतापूर्वक पूछा गया कि मुझे चाय चीनी वाली चाहिये या बिना चीनी वाली। मैने बडे गर्व से उत्तर दिया कि चीनी वाली ही चाहिये! शर्मा जी स्नान कर आए, विश्वास सुद्ढ हुआ कि हम हमेशा की तरह शुद्ध वातावरण में चर्चा करेंगे। और चाय भी आ गई। कुशल क्षेम पश्चात चर्चा प्रारम्भ हुई।

डाक्टर शर्मा जी मैं सबसे पहले एक अनपेक्षित प्रश्न कर रहा हूं : “हमें याद है कि आप एक समय 'रमेशिस्तान बनाने की मांग कर रहे थे। क्या आप उस में सफ़ल हुए?”
डा. शर्मा : अरे उस समय मास्टर तारा सिंग खालिस्तान की मांग कर रहे थे, तो मैने उनकी सोच पर व्यंग्य किया था। मैने उस समय रमेश नाम के जितने साहित्यकार थे उन्हे खोज कर निकाला और उनके गुणों को लेकर इन खालिस्तानियों पर व्यंग्य किया था। वह् बहुत ही लोकप्रिय हुआ था।

तिवारी : डाक्टर शर्मा जी क्या आपने पीएचडी करते समय ही तय कर लिया था कि आप विज्ञान संचार के कुरुक्षेत्र में 'मार्च' करेंगे, या पाठकों के सौभाग्य से कुछ संयोग हो गए थे ?
डा. शर्मा : पीएचडी की कहानी लम्बी है। मैं तो एम एस सी में थर्ड क्लास था तो एम एस सी के बाद मैने सीधी नौकरी तलाशी।

तिवारी : आप का लेखन तो फ़र्स्ट क्लास ही नहीं है, वरन गोल्ड मैडल के योग्य है तब यह थर्ड क्लास समझ में नहीं आ रहा।
डा. शर्मा : उसकी भी एक कहानी है। वैसे तो मेरे स्थान पर कोई हिम्मत वाला होता तो अपनी पत्नी को दोष दे सकता था। किन्तु मैं उसके लिये पत्नी की दादी सास को जिम्मेदार मानता हूं। मेरी दादी बहुत बूढी हो चुकी थीं और उन्होंने कहा कि वे मरने से पहले पौत्र-बहू देखना चाहती हैं। और पिताजी ने मेरा विवाह एम एस सी‌ पढते समय ही कर दिया जिससे, जाहिर है कि मेरी पढाई को धक्का तो पहुंचा ही होगा। वैसे इस थर्ड क्लास का एक कारण और भी था। वह था मेरा कालेज की साहित्यिक, वाद विवाद तथा अन्य गतिविधियों में भाग लेना। मैं विद्यार्थी संघ का अध्यक्ष भी चुना गया था, कविताएं कहानियां भी लिखता था और स्थानीय अखबारों में प्रकाशित भी हो रहा था। मैने इंटरमीडिएट तो चन्दौसी से हिन्दी माध्यम से किया था, उस वर्ष हमलोगों का प्रथम बैच था जब हिन्दी माध्यम प्रारम्भ हुआ था। उस वर्ष किसी वी आई पी के बच्चे की कृपा से सभी को अंग्रेजी मैं ५ % अनुग्रह अंक दिये गए और इस तरह मैं भी उत्तीर्ण हो गया और मैं आगरा में बी एस सी करने जा सका। एक बात वहां अच्छी यह हुई कि लैक्चरर तो विज्ञान हिन्दी में भी समझाते थे, शायद इसी कारण से मेरी मूल अवधारणाएं बहुत सुद्Rढ बनी। इन सब गतिविधियों के बावजूद १९५९ में मैने एम एस सी कर लिया, चाहे थर्ड क्लास में ही किया हो।

तिवारी : आपका जन्म तो १९३९ का है और आपने १९५९ में एम एस सी कर लिया, यह सुखद आश्चर्य कैसे सम्भव हुआ?
डा. शर्मा : लगता है कि मेरे पिताजी को मेरी मेधा पर बचपन से ही‌ बहुत विश्वास था. प्राथमिक शाला की चार कक्षाएं मैने दुहरी परीक्षाएं उत्तीर्ण देकर दो वर्ष में ही कर लीं। खैर मजे की बात यह कि मेरे इस साहित्य प्रेम ने मुझे एम एस सी में चाहे उत्तम श्रेणी न दिलवाई हो किन्तु उसने उत्तम नौकरी अवश्य दिलवाई। उन दिनों १९५९ में शिक्षा मंत्रालय के 'हिन्दी विभाग' में 'शब्दावली - अनुसंधान सहायक' के लिये एक विज्ञापन निकला था। चुनाव समिति में जैनेन्द्र जी तथा बच्चन जी थे। मैने पूछने पर उन्हें उत्तर दिया कि मैने उनका 'सुनीता' पढा है और बच्चन जी की मधुशाला याद है। इससे मेरा चुनाव का रास्ता साफ़ हो गया। और उस चुनाव में बहुत मदद उसी विभाग द्वारा प्रकाशित 'शब्दावली पुस्तिका' ने की थी, जो मुझे डा. आर एल पालीवाल ने दी थी जिसके पढने से मैने शब्दावली सम्बन्धित सभी प्रश्नों के उत्तर सही दिये थे। मेरा चुनाव हो गया। और हम लोगों का कार्यालय सचिवालय के निकट एम ब्लाक में था जो पहले अंग्रेज अफ़सरों की घुडसाल थी, अब तो वहां भव्य इमारते हैं !

तिवारी : मेरी समझ में तो हम अभी भी घुडसालों में‌ ही रहते हैं। खैर, आपकी रुचि साहित्य में किस तरह विकसित हुई ?
डा. शर्मा : मेरे पिताजी ने गुरुकुल से 'संस्कृत शास्त्री ' की‌ उपाधि ली थी। सन्स्क्Rत शास्त्री को तीन विषय तो पढाये ही जाते हैं: हिन्दू दर्शन, आयुर्विज्ञान तथा साहित्य। घर में जब तब दर्शन पर चर्चाएं हुआ करती थीं। वे शहर के प्रसिद्ध् वैद्य थे, और वे 'सचित्र आयुर्वेद' पत्रिका बुलवाते थे। साथ ही उन्हें साहित्य से प्रेम था। अत: घर में साहित्यिक पत्रिकाएं भी आती थीं और मैं उन्हें रुचि से पढता था क्योंकि घर का वातावरण भी 'सोच विचार ' वाला था।

तिवारी : तभी‌ आप साहित्य और विज्ञान लेखन दोनों में रचनाएं करते हैं। अब मेरी यह जिज्ञासा बढ रही है कि एम एस सी में थर्ड क्लास होते हुए भी, पी एच डी आपने कैसे की ?
डा. शर्मा : दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के अध्यक्ष डा. महेश्वरी जी का एक लेख  'भारतीय वनस्पति विज्ञान का इतिहास' आंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था। वह लेख प्रामाणिक शोध पर आधारित था और बहुत प्रभावी था, इसलिये मुझे बहुत अच्छा लगा और मैने उसका अनुवाद हिन्दी में किया। वह अनुवाद उन्हें भी अच्छा लगा। कलकत्ते की एक पत्रिका में वह लेख प्रकाशित हुआ और वह सुन्दर बन पडा था क्योंकि उसके लिये सारे चित्रों के प्लेट डा. महेश्वरी जी‌ के प्रभाव से मूल प्रकाशन से मिल गए थे। उसके बाद् डा. महेश्वरी जी ने मुझे एक पुस्तक 'प्लान्ट्स इन बाइबिल' पढने दी और पूछा कि इसमें कितने पौधों के नाम हैं। मैने उन्हें बतलाया कि ५० से कम। तब उन्होंने पूछा कि वाल्मीकि रामायण में कितने पौधों का चर्चा है? मैने उत्तर दिया कि मैं पढकर बतलाऊंगा। उन्होंने कहा कि तुम यह अनुसंधान करो और एक लेख लिखो। मैने वह लेख लिखा जो उन्हें अच्छा लगा, और् वह लेख उनकी वनस्पती विषयक निजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यह कोई १९६६ की बात होगी कि तब उन्होंने कहा कि मैं उनके प्रिय शिष्य डा. कपिल के नीचे ' कालिदास के ग्रन्थों में वनस्पति विज्ञान ' पर पी एच डी के लिये शोध करूं। और मेरा कार्य प्रारम्भ हो गया था। किन्तु थोडे ही समय बाद डा. महेश्वरी जी का देहान्त हो गया और मेरा शोध का कार्य ढीला पड गया। किन्तु विज्ञान अध्ययन तथा लेखन चलता रहा। १९८५ में डा. महेश्वरी के अन्य शिष्य डा. गणेश शंकर पालीवाल ने मुझसे कहा कि मैं 'भारतीय शास्त्रों में वनस्पति विज्ञान' पर पी एच डी करूं। नौकरी करते हुए १९९० में मेरी पी एच डी पूरी हुई थी।

तिवारी : डा. शर्मा जी मैने देखा है कि आप खुलकर सभी की मदद करते हैं। इस गुण के संस्कार आपको घर में तो मिले ही‌ होंगे, और आपके कार्य में भी मिले होगे। आज के समय में कार्यालयों में प्रतियोगिता अधिक है और सहयोग कम। आपके कार्य में किस किस ने आपकी विशेष मदद की ? शर्मा जी को सोचने में देर नहीं लगी।
डा. शर्मा : मदद तो अनेकों‌ ने की किन्तु विशेष मदद के लिये मैं चार नाम लेता हूं : डा. सुरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी, डा. आर् एल पालीवाल, पन्त नगर के कुलपति डा. ध्यानपाल सिंह् तथा डा. एम एस स्वामीनाथन। (इनके विषय में जानकारी आपको आगे मिलेगी)

तिवारी : क्या आप को नहीं लगता कि शब्दावली आयोग ने अपना कार्य बहुत धीरे धीरे किया?
डा. शर्मा : कार्य तो हम लोग पूरी लगन से कर रहे थे और शायद तेजी ही से कर रहे थे। शायद यह १९६७ की बात है। रमाप्रसन्न नायक हमारे विभाग के सचिव होकर आए थे । वे अपनी कार्य कुशलता के लिये विख्यात थे। कार्य में प्रगति तो उन्होंने करवाई, साथ ही जब उन्होंने देखा कि विभाग ने कार्य तो बहुत कर लिया है किन्तु प्रकाशित नहीं किया है, उन्होंने उसे फ़टाफ़ट प्रकाशित करवाया। यह कार्य देखकर तात्कालीन मंत्री महोदय ने लिखित आदेश भिजवाया 'GO SLOW'।

तिवारी : यह हमारा कैसा जनतंत्र है, जो जनता की भाषा में कार्य नहीं करना चाहता। इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें, जनतंत्र को तो दोष नहीं दो सकते। अस्तु फ़िर आपने क्या किया?
डा शर्मा : मैने देखा कि कार्य की प्रगति धीमी हो गई थी। संयोग से उसी समय पन्त नगर विश्व विद्यालय का एक विज्ञापन आया कि उन्हें एक वरिष्ठ अनुवादक की लैक्चरर की श्रेणी में आवश्यकता थी। और उसी समय मेरी अपने विभाग में, जिसका नाम तब केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय हो गया था, पदोन्नति हो गई – लैक्चरर की श्रेणी में। मेरा पन्त नगर में उस कार्य के लिये चुनाव हो गया। उस चुनाव समिति में डा. आर एल पालीवाल भी थे और उस के अध्यक्ष थे डा. ध्यान पाल सिंह। मैने उनसे अनुरोध किया कि मैं तो अपने पुराने विभाग में लैक्चरर की श्रेणी में कार्य कर ही रहा हूं। यदि मुझे यहां पदोन्नति मिले तब मुझे यहां आने में आकर्षण होगा। यह उनकी उदारता ही थी कि उन्होंने बिना यह कहे कि पदोन्नति के लिये विज्ञापन देना होगा तब कहीं यह सम्भव होगा, उसी समय निर्णय दे दिया कि मेरी नियुक्ति एसोशिएट प्रोफ़ैसर के पद पर होगी।

तिवारी : इस घटना से यह तो दिखता ही‌ है कि जहां तक मानव प्रबन्धन की‌ बात है, वे बहुत ही‌ कुशल, दूरदर्शी तथा साहसी कुलपति थे। किन्तु क्या वे वैज्ञानिक कार्य में भी उतने ही गुणवान थे ?
डा. शर्मा : मैने वहां केवल १४ माह सेवा की। कार्य की गति बढाने के लिये उन्होने मेरे पहुंचते ही सात अनुसंधान सहायकों की नियुक्ति की, और उन्होंने अपनी कार्य कुशलता के ही बल पर अनेक अवरोधों के बावजूद हम लोगों से १४ पुस्तकें प्रकाशित करवा लीं। उन्होंने 'किसान भारती' पत्रिका प्रारम्भ की। उनके समय वहां बहुत कार्य हुए। मेरी समझ में वह काल पन्त नगर का स्वर्ण काल था।

तिवारी : तब आपने वह सेवा १४ माह के बाद ही क्यों छोड दी ?
डा. शर्मा : श्री सुरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी बी एस सी और एम एस सी में मेरे वनस्पति विज्ञान के शिक्षक थे और बहुत प्रेम से पढाया करते थे, अपने विद्यार्थियों के समुचित विकास का खयाल रखते थे। तिवारी जी देखिये, इतने वर्षों के बाद उनका एक पत्र मेरे पास पन्तनगर में आया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में संपादक के पद के लिये विज्ञापन निकला है और मैं अवश्य ही‌ उस के लिये आवेदन पत्र भेजूं। मैं तो पन्त नगर में बहुत प्रसन्न था, मैने यह विज्ञापन ही‌ नहीं देखा था। क्या आश्चर्य कि अन्य विद्वानों ने उन्हें 'शिष्य वत्सल' की उपाधि दी थी। मैने आवेदन पत्र भेजा और मेरा अनुसंधान परिषद में चुनाव के लिये बुलावा आया। मुझे पता लगा कि उस पद के लिये क्Rषि मन्त्री जगजीवन राम द्वारा अनुशंसित व्यक्ति का ही चुनाव तय है। मैं निराश तो हुआ, किन्तु मैं डा. स्वामीनाथन जी, जो उस समय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में वनस्स्पति विभाग के अध्यक्ष थे, मिलने चला गया। वे अपने कार्य के लिये इतने समर्पित थे कि तत्सम्बन्धी सभी जानकारियों से अवगत रहते थे। वे मेरे कार्य से परिचित थे। वे विदेश से आलू पर मौलिक अनुसंधान करके आए थे और कार्यों के प्रति बहुत ही निष्ठावान थे। उन्होंने वहां जंगली आलू की एक जाति से नई किस्म के आलू का आविष्कार किया था जो कडी ठंड और पाले की मार सह सकती थी। उन्हें अपने उत्कृष्ट अनुसंधानों के लिये ग्रेगोर मैंडल की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक अनोखे 'स्वर्ण पदक' से सम्मानित भी किया गया था। ग्रेगोर मैंडल एक चर्च में पादरी थे और उन्होंने मटर पर प्रयोगों द्वारा १८६६ में आनुवंशिकी के नियम खोजकर प्रकाशित किये थे, जो कि एक क्रान्तिकारी कार्य था। मैं यह सब डा. स्वामीनाथन के वैज्ञानिक उपलब्धियों की ऊंचाई बतलाने के लिये कह रहा हूं। तभी मैने उनके पास जाने का साहस किया था। मैने उन्हें बतलाया कि मैं जिस उद्देश्य से आया हूं वह नहीं हो सकता क्योंकि बीच में राजनैतिक व्यवधान आ गया है। उन्होंने तुरंत ही परिषद के प्रबन्ध सचिव, आई ए. एस., श्री के पी ए मेनन को दूरभाष पर बतलाया कि उनकी जानकारी में डा. रमेश दत्त शर्मा संपादक पद के लिये सर्वश्रेष्ठ कैन्डीडेट हैं।

चूंकि यह पत्रिकाएं अधिकांशतया हिन्दी में ही‌ प्रकाशित होती थीं, अतएव रामधारी सिंह दिनकर चुनाव समिति के अध्यक्ष थे। मैं तो प्रसन्न था कि मेरा साहित्य प्रेम यहां भी‌ मदद करेगा। किन्तु श्री मेनन ने दिनकर जी को मंत्री जी की अनुशंसा बतला ही दी थी। चुनाव समिति में परिषद के प्रधान संपादक डा. रामगोपाल चतुर्वेदी जी थे जो मेरे कार्य से अच्छी तरह परिचित थे और मेरे प्रशंसक भी थे। इसके पहले वे ही संपादक थे और उनकी प्रधान संपादक के पद पर पदोन्नति होने के नाते यह संपादक का चुनाव हो रहा था। वे मंत्री जी के 'कैन्डीडेट' को जानते भी थे और वे उसे नहीं चाहते थे। यही समझ चुनाव समिति के एक और सदस्य परिषद के ही उप महा निदेशक डा. आंबिका सिंह की भी थी।

जब साक्षात्कार हो गया तब दिनकर और मेनन को छोडकर सभी ने मेरे साक्षात्कार के उत्कृष्ट होने के अतिरिक्त मेरे पन्त नगर में किये गए कार्य की प्रशन्सा भी की तब दिनकर जी ने कहा कि भाई एक व्यक्ति को जो इतना अच्छा कार्य कर रहा है उसे वहां से क्यों हटाया जाए? अतएव अच्छा कार्य को बढाने के लिये उन्हे वहीं रहने दिया जाए। तब चतुर्वेदी जी ने कहा कि वहां रहकर तो शर्मा जी एक ही संस्था का भला कर रहे हैं, यहां आकर वे वैसी ही आठ संस्थाओं का भला करेंगे, (क्योंकि उस समय भारत में केवल आठ ही कृषि विश्व विद्यालय थे। तब श्री मेनन ने एक योग्य अधिकारी के समान सुझाव दिया कि यदि समिति सहमत हो तब हम एक और संपादक का चुनाव कर सकते हैं क्योंकि उसकी भी आवश्यकता है। समिति ने मेनन जी के इस सुझाव को तुरंत मान लिया।

तिवारी : यह सुनकर अब मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूं। क्या आपने वैज्ञानिकों में भी‌ राजनीति का खेल देखा है? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है क्योंकि विज्ञान तथ्यात्मक है, सत्य की खोज कर रहा है, और साथ ही खंडनीय भी है अर्थात विज्ञान और इसलिये वैज्ञानिक तथा विज्ञान संचारक अपनी आलोचना के लिये सदा ही सहर्ष तैयार रहते हैं। अत: विज्ञान के विकास के लिये खुला मस्तिष्क और सहयोग मूलरूप से अनिवार्य हैं। क्या आपके अनुभव में भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में और विज्ञान संचार के क्षेत्र में यह गुण आधिकांशतया देखने में आए हैं? क्या आपने हमारे वैज्ञानिकों या विज्ञान संचारकों को दलबन्दी के दलदल में फ़ंसते भी देखा है?
डा. शर्मा : जी हां, बहुत देखा है। विशेषकर स्वतंत्रता के बाद। अब अनेक वैज्ञानिक अपनी पदोन्नति को लिये राजनैतिक प्रश्रय लेने लगे हैं। वैसे तो एक राजनीति व्यक्तिगत न होकर प्रान्तीय या जातीय होती है, जैसे उत्तर – दक्षिण या बांग्ला - गैर बांग्ला या दलित – गैर दलित आदि। और दूसरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण होती है। डा. जयंत विष्णु नार्लीकर ने अपने उपन्यास 'वाइरस' में इसका अच्छा विवेचन किया है। एमएस स्वामीनाथन ने भी इस राजनीति से बहुत कष्ट पाया है। स्वामीनाथन जी ने विदेश से आयातित लाल गेहूं की गामा विकिरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा उत्परिवर्तन कर गेहूं की एक सफ़ल नई जाति - शरबती सोनोरा - उत्पन्न की थी। मैने अपने एक लेख 'गेहूं रंग बदलेगा' में इसका वर्णन किया है। उसका प्रारम्भ मैने चन्द्रकिरण सौनरिक्क्षा की कहानी को उद्धरित करते हुए किया था - एक रिक्शे वाले की पत्नी अपने पति से कहती है कि उसे नहीं चाहिये यह बुझे बुझे से लाल रंग वाला गेहूं जिसकी रोटी भी ढंग से नहीं‌ बनती।"

तिवारी : हां डाक्साब आपकी यह साहित्य और विज्ञान को मिलानेवाली लेखन शैली आकर्षक, रुचिकर और प्रभावी होती है। यह साहित्य और विज्ञान के बीच एक पुल भी बनाती है, जो पुल न केवल भारत के लिये वरन विश्व के लिये बहुत आवश्यक है।
डा. शर्मा : तिवारी जी आप की शैली भी ऐसी ही पुल बनाने वाली है और आपका फ़लक भी बहुत व्यापक है। आपने तो आथर्स गिल्ड के शुद्ध साहित्यिक मंच पर भारतीय इतिहास में पहली बार विज्ञान कथा की एक संगोष्ठी करवा दी।

तिवारी : मैं अपनी बात करने के लिये आपके पास नहीं आया हूं. आप बतलाएं कि लाल गेहूं का इतना अच्छा रंग बदलने के बाद इसमें राजनीति कहां से आ गई।
ड. शर्मा : स्वामी नाथन के गेहूं शरबती सोनोरा की परिषद की ही प्रयोगशाला में रासायनिक गुणों की जांच हुई थी। और उस वैज्ञानिक ने स्वतंत्र रूप से कहा कि शरबती सोनोरा में प्रोटीन १६% है, जब कि विश्व के सामान्य गेहूं में १२ % होता है। स्वाभाविक ही स्वामीनाथन इस परिणाम से बहुत प्रसन्न हुए और इसकी उन्होंने अनेक स्थानों पर इसकी चर्चा की। किन्तु जब विदेश की प्रयोगशालाओं में इस गेहूं शरबती सोनोरा का विश्लेषण किया गया तब प्रोटीन की‌ मात्रा वही १२ % निकली। उस भारतीय वैज्ञानिक ने अपनी गलती स्वीकार की और स्वामीनाथन ने भी‌ खेद प्रकट किया। तब भी एक मराठी महानिदेशक के मित्र वैज्ञानिकों ने स्वामीनाथन पर धोखे के आरोप लगाए। अन्तत: इस घटना की जांच करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के सेवाप्राप्त न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर के नेत्ट्व में‌ एक जांच आयोग बैठा। उस आयोग ने स्वामीनाथन को निर्दोष पाया। और साथ ही उस आयोग ने कृषि अनुसंधान परिषद की कार्य प्रणाली में अनेक सुधार सुझाए जिन्होंने परिषद की काया पलट ही कर दी। उदाहरणार्थ, कृषि परिषद को स्वतन्त्र सत्ता दी, कृषि आनुसंधान सेवा (ए आर एस नाम से कृषि सेवा आई ए एस की तरह ही) प्रारम्भ की, पदोन्नति के लिये नए नियम बनाए कि समय आने पर वैज्ञानिकों की पदोन्नति की जाएगी चाहे उस विभाग में स्थान हो या न हो, और वह वैज्ञानिक अपने ही क्षेत्र में कार्य करता रहेगा (अन्यथा आलू वाले की पदोन्नति गेहूं के लिये हो जाती थी)। इस जांच के दो वर्षों का समय उनके लिये बहुत ही कष्टदायक था।

इसके बाद् उन्हें कृषि मंत्रालय में सचिव का पद दिया गया। उस समय मंत्री थे राव वीरेन्द्र सिंह जी थे जो अपने सचिव के साथ भी भद्रता का व्यवहार नहीं करते थे। अन्तत: उन्होंने मुक्ति मांगी। श्रीमती गांधी उनका सम्मान करती थीं अत: उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। उन्होने वहां भी बडे कार्य किये, यथा राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का निर्माण किया क्योंकि उन्होने जनता में वैज्ञानिक समझ का मह्त्व समझा था। योजना आयोग में भी उन्हें शान्ति से कार्य करने नहीं दिया गया और अन्तत: उन्होंने मनीला जाकर 'अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान परिषद' का महानिदेशक का पद सम्हाला। मैने अपनी पुस्तक 'धान कथा' में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है जिससे धान की उत्पत्ति से लेकर आज तक के विकास की कहानी का रोचक वर्णन है।

तिवारी : चावल की मूल उत्पत्ति का स्थान कौन सा है?
डा. शर्मा : असम में एक स्थान है 'जैपोर' जिसे चावल के मूल स्थान का श्रेय दिया जाता है।

तिवारी : क्या भारत में विज्ञान संचार के क्षेत्र में भी राजनैतिक दलदल है ?
डा. शर्मा : यहां भी दलदल हैं और ये सब मिलकर कार्य करने के साथ, एक दूसरे का विरोध ज्यादा करते हैं। ऐसी संस्थाओं के कार्यकर्ता अक्सर विज्ञान के प्रसार का कार्य करने के स्थान पर अपना स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं, और विज्ञान संचार का कार्य आगे नहीं बढ पाता।

तिवारी : विज्ञान संचार में विज्ञान कथा का क्या मह्त्व है ?
इस बीच श्रीमती शर्मा की आवाज आई कि आप लोग बातें करते करते थक गए होंगे। अब भोजन कर लें फ़िर आगे की बात करें। सचमुच हमें बातें करते करते तीन घन्टे से अधिक हो गए थे। अब आगे की बातचीत अगले अंक में प्रस्तुत की जाएगी।



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by Dr. Radut.