डाक्टर रमेशदत्त शर्मा न केवल स्वदेश में विख्यात हैं वरन उनके कार्यों तथा विज्ञान लेखन से विदेशी वैज्ञानिक भी परिचित तथा प्रभावित हैं। वे भारतीय कृषि अनुसंधान के प्रकाशन विभाग से निदेशक के पद से सेवा निवृत्त हुए हैं, किन्तु विज्ञान सेवा से नहीं। वे दूरदर्शन, रेडियो तथा मुद्रण माध्यमों के द्वारा विज्ञान संचार का कार्य उसी उत्साह से कर रहे हैं जिसे देखकर युवावर्ग भी प्रेरणा लेते हैं। उनकी बढती उम्र की बाधा भी उनके इस पुण्य कार्य में असफ़ल ही रहती है। उन्हें विज्ञान संचार क्षेत्र के सभी प्रमुख सम्मानों से अलंकृत किया गया है, जिनका विवरण हम दूसरे भाग में देंगे। उनके पास भारत में हो रहे विज्ञान संचार के अनुभवों का खजाना है जिसे वे मुक्त हस्त लुटाने में आनंदित होते हैं। उनसे मैं जब भी बातें करता हूं मुझे खजाने की दो चार मुहरें मिल जाती हैं। यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि मैं आज उनसे 'हिन्दी.कैल्किओन.काम' के पाठकों के लिये चर्चा कर रहा हूं। -- विश्व मोहन तिवारी।
यह चर्चा करने के लिये मैं अपने नोएडा, उ.प्र. स्थित निवास से यही कोई २५, ३० कि.मी. दूर ओलम्पियाड गांव, दिल्ली स्थित निवास पर मिलने गया। मैने देखा है कि गरीब लोग नोएडा में रहते हैं और धनी लोग दिल्ली में (जो शायद आज उतना सच नहीं है)। वैसे डा. शर्मा जी का यह अमीरीपन उनकी पत्नी की कृपा से है; वे एक शासकीय विद्यालय में अध्यापन करती हैं, इसलिये उन्हें यह स्वर्ग-सा सुन्दर गांव का फ़्लैट अवास हेतु मिला है। पहुंचते ही विनम्रतापूर्वक पूछा गया कि मुझे चाय चीनी वाली चाहिये या बिना चीनी वाली। मैने बडे गर्व से उत्तर दिया कि चीनी वाली ही चाहिये! शर्मा जी स्नान कर आए, विश्वास सुद्ढ हुआ कि हम हमेशा की तरह शुद्ध वातावरण में चर्चा करेंगे। और चाय भी आ गई। कुशल क्षेम पश्चात चर्चा प्रारम्भ हुई।
डाक्टर शर्मा जी मैं सबसे पहले एक अनपेक्षित प्रश्न कर रहा हूं : “हमें याद है कि आप एक समय 'रमेशिस्तान बनाने की मांग कर रहे थे। क्या आप उस में सफ़ल हुए?”
डा. शर्मा : अरे उस समय मास्टर तारा सिंग खालिस्तान की मांग कर रहे थे, तो मैने उनकी सोच पर व्यंग्य किया था। मैने उस समय रमेश नाम के जितने साहित्यकार थे उन्हे खोज कर निकाला और उनके गुणों को लेकर इन खालिस्तानियों पर व्यंग्य किया था। वह् बहुत ही लोकप्रिय हुआ था।
तिवारी : डाक्टर शर्मा जी क्या आपने पीएचडी करते समय ही तय कर लिया था कि आप विज्ञान संचार के कुरुक्षेत्र में 'मार्च' करेंगे, या पाठकों के सौभाग्य से कुछ संयोग हो गए थे ?
डा. शर्मा : पीएचडी की कहानी लम्बी है। मैं तो एम एस सी में थर्ड क्लास था तो एम एस सी के बाद मैने सीधी नौकरी तलाशी।
तिवारी : आप का लेखन तो फ़र्स्ट क्लास ही नहीं है, वरन गोल्ड मैडल के योग्य है तब यह थर्ड क्लास समझ में नहीं आ रहा।
डा. शर्मा : उसकी भी एक कहानी है। वैसे तो मेरे स्थान पर कोई हिम्मत वाला होता तो अपनी पत्नी को दोष दे सकता था। किन्तु मैं उसके लिये पत्नी की दादी सास को जिम्मेदार मानता हूं। मेरी दादी बहुत बूढी हो चुकी थीं और उन्होंने कहा कि वे मरने से पहले पौत्र-बहू देखना चाहती हैं। और पिताजी ने मेरा विवाह एम एस सी पढते समय ही कर दिया जिससे, जाहिर है कि मेरी पढाई को धक्का तो पहुंचा ही होगा। वैसे इस थर्ड क्लास का एक कारण और भी था। वह था मेरा कालेज की साहित्यिक, वाद विवाद तथा अन्य गतिविधियों में भाग लेना। मैं विद्यार्थी संघ का अध्यक्ष भी चुना गया था, कविताएं कहानियां भी लिखता था और स्थानीय अखबारों में प्रकाशित भी हो रहा था। मैने इंटरमीडिएट तो चन्दौसी से हिन्दी माध्यम से किया था, उस वर्ष हमलोगों का प्रथम बैच था जब हिन्दी माध्यम प्रारम्भ हुआ था। उस वर्ष किसी वी आई पी के बच्चे की कृपा से सभी को अंग्रेजी मैं ५ % अनुग्रह अंक दिये गए और इस तरह मैं भी उत्तीर्ण हो गया और मैं आगरा में बी एस सी करने जा सका। एक बात वहां अच्छी यह हुई कि लैक्चरर तो विज्ञान हिन्दी में भी समझाते थे, शायद इसी कारण से मेरी मूल अवधारणाएं बहुत सुद्Rढ बनी। इन सब गतिविधियों के बावजूद १९५९ में मैने एम एस सी कर लिया, चाहे थर्ड क्लास में ही किया हो।
तिवारी : आपका जन्म तो १९३९ का है और आपने १९५९ में एम एस सी कर लिया, यह सुखद आश्चर्य कैसे सम्भव हुआ?
डा. शर्मा : लगता है कि मेरे पिताजी को मेरी मेधा पर बचपन से ही बहुत विश्वास था. प्राथमिक शाला की चार कक्षाएं मैने दुहरी परीक्षाएं उत्तीर्ण देकर दो वर्ष में ही कर लीं। खैर मजे की बात यह कि मेरे इस साहित्य प्रेम ने मुझे एम एस सी में चाहे उत्तम श्रेणी न दिलवाई हो किन्तु उसने उत्तम नौकरी अवश्य दिलवाई। उन दिनों १९५९ में शिक्षा मंत्रालय के 'हिन्दी विभाग' में 'शब्दावली - अनुसंधान सहायक' के लिये एक विज्ञापन निकला था। चुनाव समिति में जैनेन्द्र जी तथा बच्चन जी थे। मैने पूछने पर उन्हें उत्तर दिया कि मैने उनका 'सुनीता' पढा है और बच्चन जी की मधुशाला याद है। इससे मेरा चुनाव का रास्ता साफ़ हो गया। और उस चुनाव में बहुत मदद उसी विभाग द्वारा प्रकाशित 'शब्दावली पुस्तिका' ने की थी, जो मुझे डा. आर एल पालीवाल ने दी थी जिसके पढने से मैने शब्दावली सम्बन्धित सभी प्रश्नों के उत्तर सही दिये थे। मेरा चुनाव हो गया। और हम लोगों का कार्यालय सचिवालय के निकट एम ब्लाक में था जो पहले अंग्रेज अफ़सरों की घुडसाल थी, अब तो वहां भव्य इमारते हैं !
तिवारी : मेरी समझ में तो हम अभी भी घुडसालों में ही रहते हैं। खैर, आपकी रुचि साहित्य में किस तरह विकसित हुई ?
डा. शर्मा : मेरे पिताजी ने गुरुकुल से 'संस्कृत शास्त्री ' की उपाधि ली थी। सन्स्क्Rत शास्त्री को तीन विषय तो पढाये ही जाते हैं: हिन्दू दर्शन, आयुर्विज्ञान तथा साहित्य। घर में जब तब दर्शन पर चर्चाएं हुआ करती थीं। वे शहर के प्रसिद्ध् वैद्य थे, और वे 'सचित्र आयुर्वेद' पत्रिका बुलवाते थे। साथ ही उन्हें साहित्य से प्रेम था। अत: घर में साहित्यिक पत्रिकाएं भी आती थीं और मैं उन्हें रुचि से पढता था क्योंकि घर का वातावरण भी 'सोच विचार ' वाला था।
तिवारी : तभी आप साहित्य और विज्ञान लेखन दोनों में रचनाएं करते हैं। अब मेरी यह जिज्ञासा बढ रही है कि एम एस सी में थर्ड क्लास होते हुए भी, पी एच डी आपने कैसे की ?
डा. शर्मा : दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के अध्यक्ष डा. महेश्वरी जी का एक लेख 'भारतीय वनस्पति विज्ञान का इतिहास' आंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था। वह लेख प्रामाणिक शोध पर आधारित था और बहुत प्रभावी था, इसलिये मुझे बहुत अच्छा लगा और मैने उसका अनुवाद हिन्दी में किया। वह अनुवाद उन्हें भी अच्छा लगा। कलकत्ते की एक पत्रिका में वह लेख प्रकाशित हुआ और वह सुन्दर बन पडा था क्योंकि उसके लिये सारे चित्रों के प्लेट डा. महेश्वरी जी के प्रभाव से मूल प्रकाशन से मिल गए थे। उसके बाद् डा. महेश्वरी जी ने मुझे एक पुस्तक 'प्लान्ट्स इन बाइबिल' पढने दी और पूछा कि इसमें कितने पौधों के नाम हैं। मैने उन्हें बतलाया कि ५० से कम। तब उन्होंने पूछा कि वाल्मीकि रामायण में कितने पौधों का चर्चा है? मैने उत्तर दिया कि मैं पढकर बतलाऊंगा। उन्होंने कहा कि तुम यह अनुसंधान करो और एक लेख लिखो। मैने वह लेख लिखा जो उन्हें अच्छा लगा, और् वह लेख उनकी वनस्पती विषयक निजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यह कोई १९६६ की बात होगी कि तब उन्होंने कहा कि मैं उनके प्रिय शिष्य डा. कपिल के नीचे ' कालिदास के ग्रन्थों में वनस्पति विज्ञान ' पर पी एच डी के लिये शोध करूं। और मेरा कार्य प्रारम्भ हो गया था। किन्तु थोडे ही समय बाद डा. महेश्वरी जी का देहान्त हो गया और मेरा शोध का कार्य ढीला पड गया। किन्तु विज्ञान अध्ययन तथा लेखन चलता रहा। १९८५ में डा. महेश्वरी के अन्य शिष्य डा. गणेश शंकर पालीवाल ने मुझसे कहा कि मैं 'भारतीय शास्त्रों में वनस्पति विज्ञान' पर पी एच डी करूं। नौकरी करते हुए १९९० में मेरी पी एच डी पूरी हुई थी।
तिवारी : डा. शर्मा जी मैने देखा है कि आप खुलकर सभी की मदद करते हैं। इस गुण के संस्कार आपको घर में तो मिले ही होंगे, और आपके कार्य में भी मिले होगे। आज के समय में कार्यालयों में प्रतियोगिता अधिक है और सहयोग कम। आपके कार्य में किस किस ने आपकी विशेष मदद की ? शर्मा जी को सोचने में देर नहीं लगी।
डा. शर्मा : मदद तो अनेकों ने की किन्तु विशेष मदद के लिये मैं चार नाम लेता हूं : डा. सुरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी, डा. आर् एल पालीवाल, पन्त नगर के कुलपति डा. ध्यानपाल सिंह् तथा डा. एम एस स्वामीनाथन। (इनके विषय में जानकारी आपको आगे मिलेगी)
तिवारी : क्या आप को नहीं लगता कि शब्दावली आयोग ने अपना कार्य बहुत धीरे धीरे किया?
डा. शर्मा : कार्य तो हम लोग पूरी लगन से कर रहे थे और शायद तेजी ही से कर रहे थे। शायद यह १९६७ की बात है। रमाप्रसन्न नायक हमारे विभाग के सचिव होकर आए थे । वे अपनी कार्य कुशलता के लिये विख्यात थे। कार्य में प्रगति तो उन्होंने करवाई, साथ ही जब उन्होंने देखा कि विभाग ने कार्य तो बहुत कर लिया है किन्तु प्रकाशित नहीं किया है, उन्होंने उसे फ़टाफ़ट प्रकाशित करवाया। यह कार्य देखकर तात्कालीन मंत्री महोदय ने लिखित आदेश भिजवाया 'GO SLOW'।
तिवारी : यह हमारा कैसा जनतंत्र है, जो जनता की भाषा में कार्य नहीं करना चाहता। इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें, जनतंत्र को तो दोष नहीं दो सकते। अस्तु फ़िर आपने क्या किया?
डा शर्मा : मैने देखा कि कार्य की प्रगति धीमी हो गई थी। संयोग से उसी समय पन्त नगर विश्व विद्यालय का एक विज्ञापन आया कि उन्हें एक वरिष्ठ अनुवादक की लैक्चरर की श्रेणी में आवश्यकता थी। और उसी समय मेरी अपने विभाग में, जिसका नाम तब केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय हो गया था, पदोन्नति हो गई – लैक्चरर की श्रेणी में। मेरा पन्त नगर में उस कार्य के लिये चुनाव हो गया। उस चुनाव समिति में डा. आर एल पालीवाल भी थे और उस के अध्यक्ष थे डा. ध्यान पाल सिंह। मैने उनसे अनुरोध किया कि मैं तो अपने पुराने विभाग में लैक्चरर की श्रेणी में कार्य कर ही रहा हूं। यदि मुझे यहां पदोन्नति मिले तब मुझे यहां आने में आकर्षण होगा। यह उनकी उदारता ही थी कि उन्होंने बिना यह कहे कि पदोन्नति के लिये विज्ञापन देना होगा तब कहीं यह सम्भव होगा, उसी समय निर्णय दे दिया कि मेरी नियुक्ति एसोशिएट प्रोफ़ैसर के पद पर होगी।
तिवारी : इस घटना से यह तो दिखता ही है कि जहां तक मानव प्रबन्धन की बात है, वे बहुत ही कुशल, दूरदर्शी तथा साहसी कुलपति थे। किन्तु क्या वे वैज्ञानिक कार्य में भी उतने ही गुणवान थे ?
डा. शर्मा : मैने वहां केवल १४ माह सेवा की। कार्य की गति बढाने के लिये उन्होने मेरे पहुंचते ही सात अनुसंधान सहायकों की नियुक्ति की, और उन्होंने अपनी कार्य कुशलता के ही बल पर अनेक अवरोधों के बावजूद हम लोगों से १४ पुस्तकें प्रकाशित करवा लीं। उन्होंने 'किसान भारती' पत्रिका प्रारम्भ की। उनके समय वहां बहुत कार्य हुए। मेरी समझ में वह काल पन्त नगर का स्वर्ण काल था।