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डा.नौटियाल: विज्ञान कथा में से यदि विज्ञान हटा लें तो कथा बिखर जाएगी

डा चन्द्र मोहन नौटियाल उन कुछ गिने-चुने वैज्ञानिकों मे से हैं‌ जिन्होने विज्ञान और साहित्य के मध्य एक पुल स्थापित किया है और उसे पूरी शक्ति के साथ स्थापित किये हुए हैं। एक् लम्बे समय से वे विज्ञान साहित्य के निर्माण के मूलभूत तत्वों‌ की‌ चर्चा विभिन्न मंचों‌ पर करते रहे हैं। मुझे लगा यही सही समय है जब उन 'महत्वपूर्ण' विचारों‌ को एक साथ गूंथने की आवश्यक्ता है। इससे न केवल नये लेखकों को आवश्यक मार्गदर्शन मिलेगा, बल्कि कुछ मूलभूत नियम समझने, स्थापित करने के लिये एक सृजनशील वातावरण भी निर्मित होगा। तो आइये बात करते हैं डा. चन्द्र मोहन नौटियाल से. . .

स्वप्निल भारतीय: आपके अनुसार विज्ञान कथा की परिभाषा क्या है?
डा. नौटियाल:
विज्ञान कथा वह कथा है जो कथा तो हो ही पर उसमे विज्ञान एक अनिवार्य तत्त्व हो। इसमें विज्ञान एक ऐसा धागा होगा जो पूरी कथा को जोड़ता है; जिसके बिना कहानी अपूर्ण होगी। कितना विज्ञान हो, कितनी रोचक कथा, इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता। यह लेखक पर भी निर्भर करेगा और लक्षित पाठक समूह पर भी।

स्वप्निल भारतीय: आपके अनुसार विज्ञान कथा और मुख्यधारा की कथा मे मूल अंतर क्या है?
डा. नौटियाल:
'मुख्य धारा' की रचना (जिसको सभी वर्ग, पृष्ठभूमि के पाठक चाहें) तथा विज्ञान कथा में मूल अंतर यही है कि सामान्य कथा में विज्ञान आ भी जाए तो सांयोगिक होगा, उससे कहानी के चलन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। विज्ञान कथा में से यदि विज्ञान हटा लें तो कथा बिखर जाएगी। विज्ञान कथा भविष्य का विज्ञान भी है। यह संभावनाओं का विज्ञान भी है जिसमें हम पूछते हैं और उत्तर देते हैं कि ऐसा होगा तो कैसा होगा, जैसा क्रिस्टोफर ईवान्स ने कहा था। वैसे एच जी वेल्स की 'वार आफ द वर्ल्ड्स' के परिचय में स्काट ने लिखा है कि विज्ञान कथा दर असल वर्तमान ही दर्शाती है क्योंकि लेखक वर्त्तमान सन्दर्भों से अछूता रह ही नहीं पाता. इसमे भी सच है क्योंकि समाज के विद्रूप ही कुछ अलग दिखने वाले रूप में कथा में आ जाते हैं, वैसे ही जैसे 'मुख्य धारा' की कथा में। विज्ञान कथा की तुलना में फंतासी कल्पना की अधिक मुक्त उड़ान है। इसमें विज्ञान के नियम के विरुद्ध जाने के लिए या अनूठी वैज्ञानिक क्षमता विकसित करने के लिए कोई कारण दिए जाने की ज़रुरत नहीं है। पर अच्छी विज्ञान कथा में सभी नियमों से स्वतंत्रता नहीं ली जा सकती। जैसे की गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जाना है तो बताना होगा की ऊर्जा का स्त्रोत क्या ढूंढा -- जैसे यान सौर ऊर्जा से शक्ति प्राप्त करता था और उस से बल प्राप्त करके ही यात्रा करना संभव होगा। फंतासी में इतना काफी हो सकता है की पात्र को एक ऐसा यान मिल गया जो धरती पर, जल में या आसमान में उड़ सकता था।
स्वप्निल भारतीय: विज्ञान कथा किसे लिखनी चाहिए? एक वैज्ञानिक को या एक कुशल लेखक को जिसकी प्रष्ठभूमि (बैकग्राउण्ड) कला है? क्या विज्ञान कथा लेखक होने के लिये विग़्यान का पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक है? कितना ज्ञान पर्याप्त है?
डा. नौटियाल:
विज्ञान कथा लिख तो वैज्ञानिक भी सकता है और मुख्य धारा का लेखक भी। विज्ञान कितने सहज रूप से समझाया गया है, इस पर निर्भर करते हुए वैज्ञानिक की कथा भी दोनों धाराओं में आ सकती है। कभी- कभी कहानी बिना सम्बंधित वैज्ञानिक मुद्दे को समझे नहीं समझी जा सकती और पाठक सीमित हो जाते हैं। पर यदि वैज्ञानिक उस सिद्धांत को सहज, सरल और रोचक तरीके से समझा दे तो यह बाधा नहीं रहती। बहुत से विज्ञान के अतिरिक्त विषयों के व्यक्ति भी आरंभिक विज्ञान शिक्षा अथवा सामान्य अध्ययन एवं अपनी वैज्ञानिक सोच / विश्लेषण क्षमता के कारण सीधी सादी गुत्थी को विषय लेकर भी अच्छा सृजन कर देते हैं। वैज्ञानिक बहुत डीटेल्स जानता है और सूक्ष्म स्तर पर भी शुद्धता चाहता है इस लिए वह कभी कभी इतने पेंच डालता है की कहानी बोझिल हो जाती है। इस लिए संतुलन आवश्यक है। अच्छी लेखन प्रतिभा (जो जन्मजात / आरंभिक परिस्थितियों का परिणाम भी हो सकती है, या संभवत: प्रायः होती ही है) वाला वाला विज्ञान का जानकार (अनिवार्यत: वैज्ञानिक नहीं) शायद सबसे अच्छा विज्ञान कथा लेखक हो पर ऐसे संयोग बहुत नहीं होते।

स्वप्निल भारतीय: कई बार हिन्दी विज्ञान कथाओं मे मूल विज्ञान/सूचना का भी बाजा बजा दिया जाता है। वहीं‌ दूसरी तरफ़ एक् वैज्ञानिक, कथा मे विग़्यान से तो 'कम्प्रोमाइज'नही करता लेकिन कथा की बुनावट मे कमजोर पड जाता है, जिससे कहानीपन नही आ पाता, जैसा कि आपने कहा। फ़िर भी अन्य कथाकार उसकी तारीफ़ करते है -- चोर चोर मौसेरे भाई। इससे भी विज्ञान साहित्य का स्तर गिरा है। हिन्दी विग़्यान साहित्य मे 'ईमान्दार' समालोचना के बारे मे आपका क्या विचार है?
डा. नौटियाल:
यह विज्ञान कथा के उद्देश्य पर भी निर्भर करेगा। विज्ञान को लोकप्रिय करना भी एक उद्देश्य माना जाता है तो विज्ञान का 'बाजा बजाना' उतना आहत नहीं करना चाहिए। आम तौर पर वैज्ञानिक की कथा में कहानी दुर्बल होने की संभावना रहती है और साहित्य के व्यक्ति की रचना में विज्ञान कमज़ोर हो जाता है। एक विख्यात साहित्यकार ने आँखों के आपेरशन (कार्निया ट्रान्स्प्लान्ट ) के बाद आखों का रंग भी बदल जाने पर कहानी लिखी थी जिसको चिकित्सकों ने इंगित किया पर आम पाठक ने उस गलती की उपेक्षा कर दी।

आम पाठक विज्ञान का व्यक्ति नहीं होता। इस लिए वैज्ञानिक की कहानी आम पाठक को उतना अपील हो सकता है न करे लेकिन उसी कहानी में विज्ञान के व्यक्ति को बोझिलपन महसूस नहीं हो और मज़ा आए। पर इसका कोई सूत्र तो है नहीं की सही अनुपात निश्चित हो। सब अनुपातों की कथा होंगी तो विविधता बढेगी- रचनाओं की भी और पाठकों की भी। लेखन प्रतिभा से संपन्न, कल्पनाशील तथा विज्ञान जानने वाले लेखक की रचना निश्चित रूप से अधिक अच्छी होंगी। वे बारीकी से समझ कर उन सूक्ष्म झिर्रियों को ढूंढ पाएंगे जहां वे विज्ञान के नियम से स्वतंत्रता ले सकते हैं, नयी व्याख्या कर सकते हैं। पर ऐसे कितने लोग हैं और जो हैं भी उनमें से कितने इतना समय निकालेंगे? आदर्श स्थिति होती की दोनों मिल कर लिखते पर लोगों ने सृजनशील लोगों के अकेले काम करने की बात को ज़्यादा गंभीरता से ले लिया लगता है। वैज्ञानिक को विज्ञान वाली कथा अधिक अच्छी लगेगी। यह जेनुइनली हो सकता है। मगर आम तौर पर देखें तो प्रशंसा केवल उत्कृष्टता के आधार पर होती तो अलग- अलग पुरस्कार कार्यक्रमों के परिणाम इतने भिन्न नहीं होते। इतना अवश्य है कि विज्ञान कथा समालोचना में फिल्मों की तुलना में अधिक पारदर्शता और ईमानदारी अपेक्षित रहती है क्योंकि इसमे सुशिक्षित तथा आम तौर पर ग्लैमर और अर्थ- बिन्दुओं से दूर रहने वाले लोग हैं और अधिकाशत: रचनाएं स्वान्त: सुखाय की श्रेणी में आती हैं। ईमानदार समालोचना तो वांछित है ही।

स्वप्निल भारतीय: एक और समस्या है, यहाँ यदि आप समालोचना करें‌ भी तो विषय से हट कर लोग व्यक्तिगत आक्रमण शुरू कर देते हैं, यह इमेच्योरिटी की निशानी है, इसके बारे मे आपका क्या विचार है?
डा. नौटियाल:
समालोचना है या आलोचना है, यह थोडा सबजेक्टिव भी हो जाता है। लेखक और समालोचक, दोनों के अपने - अपने पूर्वाग्रह और संवेदनशील मुद्दे होते हैं। वैसे तो कोई भी १००% मित्र या शत्रु नहीं होता; 'मित्रों' के भी काम्प्लेक्स होते हैं। थोडा भिन्न सन्दर्भ में देखें तो अगर मित्र अप्रिय बात कहे तो भी दो संभावनाएं हो सकती हैं। पर मिलर ने कहा था; मित्रों को आलोचना करनी चाहिए, अगर मित्र नहीं करेगा तो कौन करेगा। पर अगर आपको उसमें मज़ा आने लगे, तो समझिए अब रुक जाना श्रेयस्कर है! खैर, कथा की आलोचना में इससे कौन असहमत होगा की व्यक्तिगत आक्रमण गलत है? यह अपरिपक्वता तो है ही। आलोचना विषय- बिंदु पर की जाए, सकारात्मक सोच के साथ की जाए, व्यक्तिगत विद्वेषों से ऊपर उठ कर की जाए अपेक्षित तो है पर बातें या मुद्दे केवल स्याह या सफ़ेद नहीं होते और सब अपने- अपने कोण से सोचते हैं। परिणामत: अपनी तरफ से पूरे ईमानदार हों तो भी दो व्यक्ति अलग- अलग मत के हो सकते हैं।

स्वप्निल भारतीय: हिन्दी विज्ञान साहित्य मे राजनीति और गुट्ट् बाजी भी पैठ बनाने लगी है, इसके बारे मे आपका क्या विचार है?
डा. नौटियाल:
काश ऐसा होता की हिन्दी विज्ञान इतना प्रभावशाली होता, इतनी संख्या में लोगों को जोड़ सकता की राजनीतिज्ञों को आकर्षित करता! खैर, गंभीरता से सोचें तो ये सामान्य मानवीय दुर्बलताएं हैं जो रचनाधर्मी लोगों में कहीं भी और कभी भी दिखने वाले मतान्तर हैं। जिस दिन वित्त भी जुड़ जाएगा (अभी तो लोकप्रियता भी नहीं जुडी है), उस दिन और सतर्क रहने की ज़रुरत होंगी।

स्वप्निल भारतीय: हिन्दी के बहुत से विज्ञान कथा-कार नवीनतम खोजों‌ से अनभिज्ञ रहते हैं, क्योंकि उनकी भाषा मे विश्वसनीय सूचना का अभाव रहता है -- कल्किआन को क्या कदम उठाने चाहिये जिससे विग़्यान लेखक समाज को 'अप-डेटेड' रखा जा सके?
डा. नौटियाल:
यह आपने बहुत गंभीर और महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। कई साल पहले मैंने एन सी एस टी नेटवर्क के नेटलेटर में ऐसी बात उठाई थी। सच तो यह है कि विज्ञान के एक क्षेत्र का व्यक्ति भी दूसरे क्षेत्र से जुडी विज्ञान कथा लिखेगा तो परेशानी होंगी। जैसे भौतिकी का आदमी यदि क्लोनिंग पर आधारित कथा लिखे या कोई डाक्टर अन्तरिक्ष में जाने वाले लोगों के बारे में। एक ही कहानी में अनेक विषयों की गुत्थियां हो सकती है। मेरी समझ में विज्ञान कथा लेखकों को लिख लेने के बाद भी अधिकारी विद्वानों से सुझाव माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए। सच तो यह है कि एक नए व्यक्ति के विषय प्रवेश के समय उसके मन में अधिक अच्छे विषय आने की संभावनाएं है इस लिए विग्यानेतर विषय के व्यक्ति को विज्ञान कथा के ज़्यादा मौलिक 'आईडियाज़' आ सकते हैं। इस लिए आधुनिक विज्ञान के विषयों पर अधिकारी पर संप्रेषण- दक्ष वैज्ञानिकों के व्याख्यान तथा लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कल्किआं निश्चित रूप से ऐसे लेख प्रकाशित कर सकता है, चर्चा आयोजित कर सकता है जिससे कांसेप्ट स्पष्ट हों।

स्वप्निल भारतीय: भारतीय (हिन्दी) विज्ञान, फ़न्तासी, साहित्य की आज क्या स्थिति है?
डा. नौटियाल:
पिछले कुछ वर्षों में, ख़ास तौर पर नेट के आविर्भाव के बाद, स्थिति में आशातीत सुधार हुआ है, विशेषत: मात्रा में। जब अधिक कथायें सामने आएंगी तो अच्छी कथाओं की संख्या भी बढ़ने की संभावना है। इस विषय पर अब अनेक राष्ट्रीय सम्मलेन हो चुके हैं, हाल में वाराणसी में हुआ था, हिन्दी में फैजाबाद से 'विज्ञान कथा' प्रकाशित होने लगी है, अनेक कथा संग्रह आ चुके हैं। कई वर्षों से इंडियन साई-फाई फोरम सक्रिय है और कल्किआंन तेज़ी से उभर रहा है, बल्कि उभर चुका है।

लखनऊ, वाराणसी, फैजाबाद, नोयडा-दिल्ली, शाहजहांपुर, राजस्थान के शहरों और अनेक स्थानों से रचनाए लगातार आ रही हैं। आप विज्ञान प्रगति या विज्ञान कथा देख लीजिए, हिन्दी में विज्ञान लेखन में उत्साह दिखेगा। हाँ, स्तर की बात करें तो एसीमोव, क्लार्क या रे ब्रेडबरी की टक्कर की रचना शायद ही दिखे।

सबसे बड़ी बात है कि डा नारलीकर, श्री लोधे आदि कुछ को छोड़ दें तो मूल सिद्धांत की व्याख्या/ पुनर्व्याख्या पर आधारित करके लिखी कथाएँ दुर्लभ ही हैं। अब काफी विज्ञान साहित्य तो रचा जा रहा है पर यदि हम विश्व स्तर पर हिन्दी के विज्ञान लेखन को स्थापित करना चाहें तो हमें वैसा साहित्य लिखना होगा। हमारे हिन्दी विज्ञान साहित्य में असली विज्ञान कथा कम और विज्ञान फंतासी अधिक है। यह विवशता पाठकों की सीमाओं को दृष्टि में रखने के कारण भी हो सकती है। पर सामर्थ्य के बारे में मुझे संदेह नहीं है। डा उपाध्याय, देवेन्द्र मेवाडी जी, डा अरविन्द मिश्र, डा अरविंद दुबे, हरीश जी (दोनों), ज़ाकिर जी, जीशान जी जैसे लोग हिन्दी में काफी लिख रहे हैं, अच्छा लिख रहे हैं।

आप (स्वप्निल) अंग्रेजी में लिख रहे हैं पर मुझे लगता है आपको हिन्दी में भी लिखना चाहिए। बहुत अच्छी विज्ञान की समझ और भाषा पर असाधारण अधिकार वाले विश्वमोहन तिवारी जी जैसे व्यक्ति भी अब इसे समृद्ध कर रहे हैं। तो काफी गतिविधि है, जहाज़ तो चलेगा, अच्छे से। और यह सूची पूर्ण नहीं है। अनेक नाम इसमें सम्मिलित नहीं हैं; उनकी दूसरी पहचान अधिक बड़ी हैं।

स्वप्निल भारतीय: भारतीय समाज मे फ़िल्मो का बेहद प्रचलन है, फ़िर विग़्यान कथा पर आधारित फ़िल्मे यहाँ क्यो नही बनती?
डा. नौटियाल:
यह प्रश्न तो मैं भी पूछता हूँ। एक कारण विज्ञान के प्रति आम बेरूखी कहा जा सकता है। पर मुझे याद है, १९९५ में जब दूरदर्शन ने पूर्ण सूर्य ग्रहण का सीधा प्रसारण किया था (जिसमे प्रो यशपाल, प्रो नारलीकर आदि भी थे और मैं भी इरादतगंज से आँखों देखा हाल दे रहा था) तो वह वर्ष के १० सबसे ज़्यादा देखे गए प्रसारणों में था! इसमें संचार माध्यमों द्वारा की गयी गरमा गर्मी का योगदान था।

तो विज्ञान को लोग पसंद नहीं करेंगे कहना शायद सही नहीं है। शायद हम विज्ञान को मनोरंजक रूप में प्रस्तुत करने में सहज अनुभव नहीं करते। मुझे लगता है विज्ञान लेखकों को ही मिल- जुल कर, टेलीविज़न के लिए ही सही, ऐसी शुरुआत करनी चाहिए। अभी उपलब्ध विज्ञान कथाओं पर धारावाहिक बन सकते हैं। ऐसा नहीं कि लोग पसंद नहीं करेंगे। मुझे विज्ञान पर आधारित अपने एक रेडियो धारावाहिक 'अम्बर में बारात' पर जो फीडबैक मिला काफी उत्साहवर्द्धक था शायद इस लिए की जानकारी से लबालब होने के बावजूद उसमें कहानी भी थी। विज्ञान प्रसार ने कई रेडियो धारावाहिक बनाए हैं। और दूसरी भी ऐसी रचनाएं होंगी जिनसे मैं परिचित नहीं हूँ । हाँ, 'अम्बर..' मिला कर, इनमें से कोई भी विज्ञान कथा नहीं है। सत्यजीत रे की कथा पर (शायद) उनके बेटे ने विज्ञान धारावाहिक बनाया था। स्टार ट्रेक की तर्ज़ पर कुछ और टी वी धारावाहिक भी आए थे। पर जहां तक फिल्मों की बात है, कहाँ गए वो लोग, मी. एक्स इन बाम्बे, मी. इंडिया, कोई मिल गया, कृष आदि विज्ञान कथा फिल्म तो क्या विज्ञान फंतासी की श्रेणी में भी शायद न आएं।

विज्ञान फिल्म बनाने में समस्यायें दो हैं। एक तो यह कि आम आदमी को दृष्टिगत रखते हुए फिल्म में विज्ञान को बहुत हल्का कर देना पङता है, यहाँ तक की जुरासिक पार्क की भी यही आलोचना थी। फिल्म तो वे भी देखते हैं जो पढ़ नहीं सकते । दूसरे, फिल्म बहुत बड़ा निवेश है, अपारम्परिक विषय पर खतरा कौन लेगा? अगर कुछ नामी- गिरामी स्टार्स तैयार हों जाएं जैसे कभी सामजिक सरोकार के विज्ञापनों के लिए हो जाते थे, तो शायद काम आसान हो जाए! डा पटैरिया जैसे लोग जो विज्ञान कथाकार भी हैं और विज्ञान प्रचार के सरकारी तंत्र से भी जुड़े हैं, इसमें महत्त्वपूर्ण भुमिका निभा सकते हैं।

स्वप्निल भारतीय: विज्ञान साहित्य ने विज्ञान संबंधी कई विषयों‌ को छुआ है, ज्यादातर विषयों को शोषित किया जा चुका है, एक वैज्ञानिक होने के नाते आपके अनुसार अभी‌ भी कौन से 'वर्जिन' विषय हैं? या दूसरे शब्दों‌ मे किस प्रकार के विषयों‌ पर काम किये जाने की आवश्यक्ता है?
डा. नौटियाल:
मूल भावनात्मक मुद्दे तो सदैव वही रहेंगे। उनको जन्म देने वाले कारण बदल सकते हैं। क्लोनिंग, सरोगेट मातृत्त्व से जनित सामाजिक/ भावनात्मक समस्याएं, प्राकृतिक आपदाओं और उनके क्रियेटिव समाधानों, प्रदूषणों के कारण हुई विकृति तथा मुटेशन, ई टी तथा भू वासियों के सम्बन्ध, कुछ रोचक मुद्दे हैं। भारतीय पुरानों/ आख्यानों को वैज्ञानिक जामे में प्रस्तुत करना भी रोचक होगा पर यह दुधारी तलवार है! हमारे पुरातत्त्व अवशेषों पर आधारित कथाएं रुचिकर हो सकती हैं।

स्वप्निल भारतीय: जहाँ‌ मुख्यधारा के साहित्य मे भारतीय लेखक बाजार मे भारी तादाद मे बिक रहे है, वैसा बाजार विज्ञान साहित्य के क्षेत्र मे क्यो नही है, जबकि विदेशों‌ मे विग़्यान साहित्य का अच्छा बाजार् है?
डा. नौटियाल:
आम आदमी का संपर्क विज्ञान से कम और टेक्नालाजी से ज़्यादा है। वैसे ही हमारे यहाँ कम लोग खरीद कर किताब पढ़ने में विश्वास करते हैं, विज्ञान कथा में रूचि तो और भी कम है। यह भी है की प्रकाशकों की मानसिकता के कारण पुस्तकों के दाम इतने अधिक रखे जाते हैं कि आम पाठक खरीद भी नहीं सकता। ४० साल पहले हिंद पाकेट बुक्स एक- दो रुपये में स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध कराता था। ६-७ रुपये में हर महीने हम डाक से ६- ७ किताबें तक मँगा सकते थे। अब प्रकाशक अपनी घुसपैंठ के आधार पर, पुस्तकालयों में हज़ार महँगी हार्ड बाऊंड प्रतियाँ बेचने में ज़्यादा खुश है। अगर यात्रा के समय मुझे २५ या ५० रुपये में एक अच्छी किताब मिलेगी, चाहे कागज़ बहुत चिकना न हो, तो मैं खरीदूंगा पर ३०० रुपये की होंगी तो सोचूंगा। भाव ३०० गुना तो निश्चित रूप से नहीं बढे हैं।

कुछ ऐसे लेखकों से मेरी बात हुई जिनकी पुस्तकें ३५०/- की हैं। वे दुखी थे कि पेपरबैक संसकरण नहीं आया। उनकी परेशानी है कि अगर पाठक तक किताब पहुँची नहीं तो लिखा क्यों? मुख्यधारा के वे लेखक बिक रहे हैं जिनका नाम स्थापित है (कारणों पर लम्बी बहस हो सकती है) या जिनके पीछे प्रभावशाली प्रकाशक हैं। हम भी पहले किताब के लेखक का नाम अवश्य पढ़ लेते हैं इससे पहले की २०० रुपये दांव पर लगाएं। इनमें अनुवाद भी हैं और विदेशी प्रकाशकों की शक्ति के साथ फिक्शन भी। आप बताइए अगर अच्छी तरह प्रचार हो तो अच्छी और सस्ती किताब क्यों नहीं बिकेगी? मगर कम प्रयास में अधिकाधिक लाभ जहाँ प्रेरक सिद्धांत होगा, पाठकों की चिंता किसे है!

स्वप्निल भारतीय: इस स्थिति को सुधारने के लिये क्या प्रयास किये जाने चाहिये?
डा. नौटियाल:
कम मूल्य पर पुस्तक प्रकाशन को प्रेरित करना। इसमें सरकारी संगठनों की भुमिका भी हो सकती है। लोकप्रिय विज्ञान में देखें तो प्रकाशन विभाग, निस्केयर, विज्ञान प्रसार और सी बी टी आदि भी स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं। विज्ञान कथाएं भी विज्ञान को लोकप्रिय करने का प्रभावी साधन है। पर जब हम यह शर्त लगा देते हैं तो लेखकीय स्वतंत्रता थोड़ी कम हो जाती है। पर इस पर विचार हो सकता है। नेट की सुलभता ने प्रेस पर प्रकाशक के नियंत्रण को फिर से परिभाषित कर दिया है। मैं नहीं जानता की एन ऍफ़ डी सी या बच्चों के लिए फिल्म बनाने वाली सरकारी संस्थाएं अभी हैं या नहीं पर उनको विज्ञान कथाओं पर आधारित फिल्मों को समर्थन देना चाहिए।  

"कल्किआन का उदय भी एक नई आशा का उदय है। यह निश्चित रूप से विज्ञान कथा को आगे बढाएगा।"

स्वप्निल भारतीय: भारत मे आप विज्ञान साहित्य का क्या भविष्य देखते है?
डा. नौटियाल:
भारत में विज्ञान साहित्य के भविष्य पर टिप्पणी करते समय मेरे मन में ये सब बाते हैं -- पहले की तुलना में अधिक इंजिनियर, डाक्टर बन रहे हैं (स्तर भिन्न मुद्दा है!)। यानी टेक्नालाजी पर आधारित कथा पढ़ने वाले संभावित पाठक बढ़ रहे हैं ।

जहाँ तक विज्ञान की बात है, एक आम चिंता है की सबसे अच्छे विद्यार्थी अब विज्ञान में कम और मार्केटिंग में ज़्यादा जा रहे हैं। सतही तौर पर यह खुले बाज़ार की प्रकृति के अनुरूप है, स्वीकार्य होना चाहिए था। प्रश्न यह है कि कुछ साल बाद जब अच्छे वैज्ञानिक और इंजिनियर नहीं होंगे तो मार्केटिंग वाले क्या उत्पाद बेचेंगे? क्योंकि हमारा ३५ करोड़ के माध्यम वर्ग वाला समाज है, अच्छा बाज़ार है इस लिए बहु- देशीय विक्रेताओं के तो यह हित में है। पर क्या हम केवल दूसरों को पैसा देकर मंहगे उत्पाद अपने लोगों को बेचते रहेंगे या कुछ खोजेंगे और बनाएंगे भी?

वैसे ही मौलिक और उपयोगी खोजों में हम बहुत आगे नहीं हैं, बची- क़सर निकल जाएगी प्रतिभाओं के इस अभाव से। विज्ञान कथाएं वैज्ञानिक न भी बनाए, विज्ञान में रूचि बनाने के लिए तो महत्त्वपूर्ण हैं ही। इनके माध्यम से आम आदमी को विज्ञान के महत्त्व से और उससे जुड़े सामजिक मुद्दों से भी परिचित कराया जा सकता है। आज जब पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण और आम आदमी के सरोकार का मुद्दा है, विज्ञान कथाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। विज्ञान- प्रौद्योगिकी हमारे रहन- सहन, संबंधों, सोच सभी को प्रभावित कर रहे हैं। शायद विज्ञान कथाएं हमें इन होने वाले परिवर्तनों से आगाह और परिचित कराने में महत्त्वपूर्ण हों। इन परिवर्तनों में लोगों की रूचि होनी चाहिए और मुझे लगता है इसके लिए ही सही लोग विज्ञान कथाएँ पढेंगे।

स्वप्निल भारतीय: भारतीय विज्ञान साहित्य को आप पश्चिम की तुलना मे कहाँ रखते है?
डा. नौटियाल:
अभी हम काफी पीछे हैं। पर हाल में उभरा उत्साह काफी आशा दिलाता है।



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by Dr. Radut.