आज मेरी साधना के
फूल धरती पर खिले हैं।
ये न मुरझायें कभी
ये न कुम्हलायें कभी,
इनके साथ,
मेरे सभी सपने जुड़े हैं।
मोती जो बिखरे हुए हैं,
इनसे मै माला बनाऊँ,
उलझे शब्दों से,
एक कविता बनाऊँ,
कल्पना से मै मन बहलाऊँ।
पर मन बहलता ही नहीं है,
कोई ख़ालीपन है अभी,
इस ख़ालीपन से ही,
जीवन को गति मिलेगी,
गति ही न हो तो ,
प्राणहीन मै हो जाऊँ।
कुछ सपने सजते हैं कभी,
कुछ टूट हैं जाते ,
आस जिसकी करू,
वो नहीं मिला तो क्या,
जो मिला है बहुत है,
ईश के भंडार से,
इसी मे से कुछ लुटादूँ,
उसीके दरबार मे,
कुछ न ऐसा करूं मै,