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कविता

बोन्साई

पेड़ों को गहरी धरती चाहिए होती है ; पेड़ों को प्रशस्त आकाश चाहिए

आज के संपन्न, सभ्य आदमी के पास न धरती है, न आकाश

पर पेड़ उसे चाहिए।

वह पेड़ को बोन्साई बना लेता है गमलों में पेड़ उगाए जाते हैं

पेड़ बौना हो जाता है, पर पूर्ण रूप से उपयोगी रहता है;

बिना धरती के, बिना सम्भावनाओं की भूख के ।

चतुर आदमी अपनी सन्तान को बोन्साई बना लेता है ।

रचना: 

साँप सीढी

साँप सीढी का खेल
ज़िन्दगी सिखलाती है।
आशा बंधते बधते,
टूट जाती है।
अथक परिश्रम,
सीढी चढ चढ,
निकट शिखर जब आता है,
तभी कोई एक सांप बड़ सा,
डस जाता है।
पुनः शुरू होता है सिलसिला,
सीढी सीढी चढने का,
कौन शिखर पर,
कब पंहुचेगा,
कोई नहीं बता पयेगा,
फिर भी भाग्य के हाथों मे,
जीवन ना छोड़ा जायेगा।
श्रम करते करे साँप डसेंगे,
 फिर भी कुछ तो हासिल होगा,
साँप के डर से,
सीढी चढना छोड़ दिया तो,
कैसे उन्नति कर पायेंगे,
हताश निराश
कोने मे बैठ कर क्या पायेंगे,
चढना शुरू करें तो,
चढने चढने का सुख तो पायेंगे
क्या मिला मुझे

रचनाकार: 
रचना: 

साधना

आज मेरी साधना के
फूल धरती पर खिले हैं।
ये न मुरझायें कभी
ये न कुम्हलायें कभी,
इनके साथ,
मेरे सभी सपने जुड़े हैं।
मोती जो बिखरे हुए हैं,
इनसे मै माला बनाऊँ,
उलझे शब्दों से,
एक कविता बनाऊँ,
कल्पना से मै मन बहलाऊँ।
पर मन बहलता ही नहीं है,
कोई ख़ालीपन है अभी,
इस ख़ालीपन से ही,
जीवन को गति मिलेगी,
गति ही न हो तो ,
प्राणहीन मै हो जाऊँ।
कुछ सपने सजते हैं कभी,
कुछ टूट हैं जाते ,
आस जिसकी करू,
वो नहीं मिला तो क्या,
जो मिला है बहुत है,
ईश के भंडार से,
इसी मे से कुछ लुटादूँ,
उसीके दरबार मे,
कुछ न ऐसा करूं मै,

रचनाकार: 
रचना: 

शीत लहर

भोर मे रवि रश्मि ने जब ,रजनी का है मौन तोडा,
चिरैयौं के शोर ने उषा मे संगीत छेडा,
शीत की इस भोर मे जब, कोहरे ने सूरज को छीना,
चिरैया तो उठ गई हैं हमने ना बिछौना छोडा,
भानु को जब जोश आया, चीर कोहरा मुंह दिखाया.
धूप के इस कतरे को बांधना जो हमने चाहा,
बादलों की टोलियों ने षडयंत्र फिर इक रचाया,
कमरे की खिड़कियों से झोंका पवन का आया,
हमने उसे गले लगाया।

रचनाकार: 
रचना: 

शिमला से....

खिड़की खोली,
दर्शन किये प्रभात के,
सूर्य की किरणे पड़ी जब,
हिम शिखर पर,
विस्तार ज्योतिपुंज का,
मेरे द्वार पे।

ये नोकील पेड़
देवदार के,
प्रहरी बने खड़े हैं,
पर्यावरण के बहार के।

एक सौ तीन सुरंगे,
पार करती
घूमती चढ़ती हुई,
रेल की ये पटरियां,
दौड़ती हैं जिन पर
सुन्दर ,सजीली गाड़ियां।


अति सुखद है यात्रा,
शिवालिक पहाड़ की।

ऊंचे नीचे,टेढे मेढे,
रास्ते पहाड़ के,
रेंगते हैं इन पर वाहन प्रवाह से
ऊंचे शिखर ,नीची वादी,
सौन्दर्य रचनाकार के।

जीवित हूं या स्वर्ग में,
भ्रम मुझे होने लगा है,

रचनाकार: 
रचना: 

बरसात मे...

गूँजा राग मेघ मल्हार
  दिशा दिशा सम्मोहित हैं,
    जब सुना मधुरिम आलाप,
      तान ,तराने रुमझुम रुमझुम,
         तीन ताल मे बन्दिश बाँध।
राग रागिनी, बाँसुरी की धुन,
   वीणा की झन झन झनकार,
     बादल गरजे, चमके बिजुरी,
       झरनों से झरती जल लहरी,
         ताल तलैया सारे भर गये,
           सूखे पौधे हरे हरे हो गये।

रचनाकार: 
रचना: 

कैसे जियें

औद्योगिक नगरों की चिमनी से,
कण कण वायु प्रदूषित होती।
वाहन वायु प्रदूषित करते,
वायु प्रदूषण का विष रिस कर,
निर्जीव फेफड़े कर जायेगा,
कैसै न कैसे जिया जायेगा।

गंगा यमुना भी पवित्र कंहाँ हैं,
घुला रसायन विष इनमे है,
प्रदूषण धरा के नीचे भी है,
कूंओँ का पानी भी विषैला,
अंड़ितयों पर घात केरेगा,
कैसे न कैसे जिया जायेगा।

रचनाकार: 
रचना: 

आस्था

मेरी आस्था मेरी पूजा का नाता मन मस्तिष्क से है,
और है आतमा से।
मेरी पूजा मे ना पूजा की थाली है,
ना अगरबत्ती का सुगन्धित धुँआ है,
प्रज्वलित दीप भी नहीं है इसमे,
फल फूल प्रसाद से भी है ख़ाली,
क्योंकि,
मेरी आस्था मे भावना, प्रर्थना ,शुकराना  है,
और है समर्पण भी।
मेरी आस्था मे न है सतसंग कीर्तन,
ना ही कोई समुदाय है ना संगठन,
मेरी आस्था तो केवल आस्था है,
ना है अहम्
केवल अहसास और अनुभूति है।
ये तो मुक्त है और है बंधन रहित,
क्योंकि,
मेरी आस्था मे ना कोई दिखावा है।
मेरे ईश को अर्पण कर सकूं ऐसा,

रचनाकार: 
रचना: 

आग बरसती असमान से, मेघा तुम कब बरसोगे

आग बरसती असमान से, मेघा तुम कब बरसोगे।
सड़कें सूनी गलियां सूनी, सूने हुए नजारे रे,
मंदिर सूने मस्जिद सूनी, सूने मठ गुरूद्वारे रे,
घाम पसरता डाली -डाली, गर्मी द्वारे -द्वारे रे,
जनजीवन बेहाल हो गया, सिकुड़े नदी किनारे रे ,
श्याम रंग संग लगन लगते, तन थे जो उजियारे रे,
चातक पीहू-पीहू भूले, पानी -पानी पुकारे रे,
हम तरसे तेरे बिन बदरा, तुम भी हम बिन तरसोगे।
आग बरसती असमान से, मेघा तुम कब बरसोगे।

रचना: 

अनिश्चित

क्यों मुझे लगता है कई बार की मैं हूँ ही नहीं।
जबकि,
ये मेरा नेट, ये मोबाईल, ये ऊँचे बंगले
ये मॉल, ये कारें और नशा दौलत का
बड़े होटल, ये जंगल कोंक्रिटों  के
खेल क्रिकेट का, चिअर गर्ल्स, सहारा दौलत का
यही सब तो गवाही हैं मेरे होने की
पर,
क्यों नहीं दिखता है कुछ सड़ता हुआ चारों तरफ
क्यों नहीं सुन पता मैं कुछ सिसकियाँ धीमी धीमी
दर्द है चारों तरफ रिसता हुआ और मैं नींद मैं हूँ
आह, बन कर के धुआं घेर न पाती मुझको
ये  सच्चाइयाँ  मुझको तो नजर आती नहीं
क्यों मुझे लगता है कई बार की मैं हूँ ही नहीं।

रचना: 

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by Dr. Radut.