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भारत में विज्ञान कथा के उत्साहवर्धन की आवश्यकता

यह तो एक सुखद समाचार है कि विज्ञान कथा पर एक गैर विज्ञान कथा की भरी पूरी अंग्रेज़ी की प्रभावशाली पत्रिका - 'डाउन टु अर्थ' – के जनवरी‌२०१२ के अंक में पूरे २७ पृष्ठ दिये गए हैं। यह विज्ञान तथा पर्यावरण की पाक्षिक पत्रिका है।

यह घटना न केवल विज्ञान कथा के लिये शुभ संकेत है, वरन विज्ञान, पर्यावरण, आर्थिक दशा, प्रौद्योगिकी, और समस्त जीवन के लिये शुभ संकेत है। विज्ञान तथा विज्ञान कथा दोनों एक दूसरे के सहायक हैं। किन्तु विज्ञान कथा पढने वाले की दृष्टि मात्र विज्ञान वाले की तरह एकांगी न होकर संतुलित हो जाती है।

आइज़ैक असिमोव ने विपुल मात्रा में विज्ञान कथा लेखन किया है, और जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों पर वैज्ञानिक एवं सामाजिक दृष्टि रखते हुए लिखा है। वरन उऩ्होंने तो ऐसे विषय भी लिये हैं जिनकी‌ रुचि मात्र दार्शनिकों या वैज्ञानिकों या गणितज्ञों को होती‌ है, और उऩ्हें‌ रोचक तथा उपयोगी‌ बनाया है। उदाहरण के लिये उऩ्होंने विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ गौएडल के 'अपूर्ण सिद्धान्त' का अद्भुत उपयोग किया है। यह सिद्धान्त तर्क द्वारा सिद्ध करता है कि कोई भी साध्य या तर्क- आधारित निष्कर्ष (जो क्षुद्र न हो) के अपवाद होते हैं, अत: सभी साध्य अपूर्ण हैं - उऩ्होंने तर्क द्वारा तर्क की अपूर्णता को सिद्ध किया कि तर्क से आप पूर्ण सत्य तक नहीं पहुँच सकते ! इसका एसिमोव ने एक उपन्यास ''रोबाट्स एन्ड एम्पायर' में बहुत ही अद्भुत उपयोग किया है, जो मेरा एक अतिप्रिय उपन्यास ऱहा है।

हिन्दी विज्ञान कथा के परिदृश्य पर एक दृष्टि डालें। हम देखर्ते हैं कि राजीव रंजन उपाध्याय आइज़ैक एसिमोव के समान ही मानव व्यवहार के विशाल क्षेत्र में‌ कार्य करने का प्रयास करते दिखते हैं। हरीश गोयाल, देवेन्द्र मेवाड़ी, अरविन्द मिश्र, अरविन्द दुबे, शुकदेव प्रसाद, स्वप्निल, ज़ीशन हैदर ज़ैदी, ज़ाकिर रजनीश, इर्फ़ान ह्यूमैन, राजेश जैन, अभिषेक मिश्र, एम. मुबीन, अमित कुमार, विश्व मोहन तिवारी आदि आदि अनेक (यह सूची पूरी‌नहीं है) विज्ञान कथा लेखक मिलकर जीवन के एक विशाल क्षेत्र में - पुराणों, मिथकों से लेकर पोस्ट माडर्नवाद तक, पिन से तोप तक, भूकेन्द्र से ब्रह्माण्ड के छोर तक, सूक्ष्म बैक्टीरिया से विशाल डायनासोर, पक्षी, नरवानर तक, तानाशाही से उदार जनतंत्र तक, शैतान से देवदूतों तक – कार्य करते दिखते हैं। इसलिये यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि तब भी हिन्दी ( अंग्रेज़ी में भी) विज्ञान कथा के पाठकों की संख्या आशा से बहुत कम ही है।

जीवन के इतने महत्वपूर्ण क्षेत्र में कार्यरत विज्ञान कथा को भारत में प्रोत्साहित करने के लिये हम क्या कर सकते हैं? एक तो यही है कि हम विज्ञान पढ़ें, विज्ञान कथाएं पढ़ें, जिनका साहित्य यदि प्रचुर मात्रा में‌ नहीं तो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। विज्ञान को आवश्यक नहीं है कि हम पाठ्यक्रम के रूप में‌ ही पढ़ें, एक अभिरुचि की तरह ही पढ़ें। जब विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कृत वैज्ञानिक – एर्विन श्रायडिंजर, राबर्ट ओपनहाइमर, पोल डिरैक, हाइज़ैनबर्ग, आदि - ने जिस तरह, ध्रुवों के समान एक दूसरे से दूर, वेदान्त जैसे विषयों का अध्ययन किया, जिसके फ़लस्वरूप उऩ्हें 'गूढ़तम क्वाण्टम मैकैनिक्स समझ में आई, और उऩ्होंने महान से महान खोजें कीं। हमें चाहे नोबेल पुरस्कार के लिये कार्य न करना हो तब भी जीवन की गुत्थियों को समझने के लिये हम भी विज्ञान और विज्ञान कथाओं का आनंद ले सकते हैं, और उन पर मित्रों से चर्चा कर सकते हैं। एसिमोव ने विज्ञान, दर्शन, धर्म, साहित्य, प्रौद्योगिकी आदि का अध्ययन किया था। और उऩ्होंने न केवल उच्च कोटि की विज्ञान कथाओं की रचना की वरन उऩ्हें अत्यंत विश्वसनीय बनाकर अत्यंत लोकप्रियता भी प्रदान की। इसलिये पढ़िये और लिखिये । लिखने से भी लिखना आता है।

मैं यहां यह कहना उचित समझता हूं कि भारत में अंग्रेज़ी विज्ञान कथा की स्थिति भी बेहतर नहीं है। भारत में और विश्व में विज्ञान कथा लेखन में‌ बहुत अवसर हैं। विज्ञान कथाएं लिखें और समाज का भला करें।



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by Dr. Radut.