कि जनता को ज़बर्दस्ती अंग्रेज़ी पढ़ाकर गूंगा बनाया जा रहा है;
कि यह सरकार जब हिन्दी को नहीं हरा पा रही है तब हिंग्लिश को मान्यता दे रही है
कि न चाहते हुए भी
उसके बच्चों को इंग्लिश पढ़ाया जा रहा है;
जो यह समझ रहे हैं कि यह आक्रमण केवल हिन्दी पर है, वे भूळ कर रहे हैं कयोंकि यह हमला समस्त भारतीय भाषाओं पर है;
अब जनता हिन्दी, बांग्ला, मराठी, कन्न.ड, तमिल, उड़िया, गुजराती नहीं वरन हिंग्लिश, बंगिंग्लिश, मराइंग्लिश, कन्निंग्लिश, तमिंग्लिश, उड़िंग्ग्लश, गुजिंग्लिश बोलेगी;
वह नहीं जानती कि भ्रष्ट भाषा से भ्रष्ट संस्कृति ही आएगी
उसका इतिहास और उसकी विरासत को कूड़ेदान में डाला जा रहा है;
आब वह राणा प्रताप्, शिवाजी को नहीं जानेगी वरन लार्ड क्लाइव और माउंटबैटन को जानेगी;
अब वह वाल्मीकि को नहीं शेक्स्पियर को ही जानेगी, ;
अब वह केवल भोग जानती है त्यागमय भोग नहीं,
जनता को लूट लूटकर इतना 'गरीब' बना दिया गया है कि उसे केवल रोटी या स्काच के ही सपने आते हैं;
अर्थात यह जनतंत्र नहीं वरन व्यापार तंत्र है जिसमें वोटें खरीदी जाती हैं,
यह धोखाधड़ी तंत्र है, लूटतंत्र है।
क्या भाषा के भ्रष्ट होने पर संस्कृति भ्रष्ट होती है, इसके लिये और प्रमाण चाहिये, क्या यह भ्रष्ट भाषा का भ्रष्ट समाज हमें नहीं दिख रहा है !
भारतीय भाषाएं बचाओ, देश बचाओ, संस्कृति बचाओ, मानवता बचाओ क्योंकि विदेशीभाषा तो राक्षस बना रही है।
साहित्यकारों को का क्या हो गया है वे क्यों नहीं भाषा बचाने के लिये लड़ रहे हैं जैसे वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिये लड़े थे ? क्या वे भी टी वी और स्काच के नशे में मस्त रहते हैं ?
कथाकारो, विशेषकर विज्ञान कथाकारो उठो, जागो, और समाज को जगाओ, संस्कृति तथा विज्ञान के प्रति प्रेम बढ़ाओ ।