प्रतिवाद :- "यहाँ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष भोजन की तलाश मे दर दर ठोकरें खाता, प्रकृति के खतरों से दो चार होते हुये अनिश्चित्ता का जीवन जीता था, वहीं दूसरी ओर किसान एक ही स्थान पर रह कर सुरक्षा, भोजन की उप्लब्ध्ता सुनिश्चित करने के कारण समाजिक ढाचे मे सटीक बैठता होगा।
वर्तमान समाज मे भी यदि देखें तो जो पुरूष काम के चलते यात्राओं पर रहते हैं और उनकी पत्नियाँ पीछे अकेली रह जाती हैं, उन परिवारों के टूटने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार सेना मे आत्महत्या की दर बढ सी गयी है। अन्य प्रमुख कारणों मे से एक कारण यह भी है --अफगानिस्तान तथा इराक युद्ध के कारण युवा सैनिकों को मोर्चे पर जाना पढा और वे लम्बे समय के लिये अपनी प्रमिकाओं से अगल हो गये। पुरूष की अनुपस्थिति के चलते प्रेमिकाओं ने संबंध विछेद कर दिये। यह सैनिकों के लिये असाह्य प्रतीत हुआ और वे दुखी हो कर आत्म हत्या करने लगे।
यह समान्य मानव प्रवृति उस काल मे भी रही होगी और नदारत रहने वाले शिकारी तथा घुमन्तु पुरूषों की अपेक्षा आस पास बने रहने वाले खेतिहर पुरूष परिवारों के गठन मे अधिक सफल रहे। "
वाद :-
यह तो ठीक है कि शोध में बहुपत्नीत्व की चर्चा नहीं की गई है, किन्तु यह एक कारन हो सकता है कि जिसके द्वारा एक किसान एक आखेटक की अपेक्षा कई गुनी संतानें उत्पन्न कर सकता होगा, अत्: यह विचार शोध के निष्कर्ष की पुष्टि करता है। और इस विधि में किसान तथा आखेटक के बीच अधिक वैमनस्य भी नहीं होगा। इसका एक उदाहरन आज लद्दाख में मिलता है। लद्दाख में कोई सौ वर्ष पहले मुसलमानो की संख्या बहुत कम थी। वहां उर्वरा जमीन की कमी के कारण बहुपतित्व प्रथा या महिला लामा की प्रथा चलती थी, अभी भी कुछ् चल रही है। अत: बहुत स्त्रियां अविवाहित रह जाती थीं/ हैं। आज के जमाने में अब जीविका केवल कृषि पर आधारित नहीं है, किन्तु हिन्दुओं तथा बौद्धो ने अपनी परम्परा नहीं छोडी। मुसलमान बहु पत्नीत्व् करते हैं अत: वे अविवाहित स्त्रियां अब पिछले कुछ् दशकों से कम संख्या वाले मुसलमानो के साथ विवाह कर लेती हैं, और वहां मुसलमानो की आबादी तेजी से बढ़ रही है।
मूल शोध पत्र में एक तो घुमन्तुओं की चर्चा नहीं की गई है, तुलना केवल आखेटक तथा कृषक की है। दूसरे, 'आखेटक- फ़लाहारी' लोग 'घुमन्तू' नहीं होते। यह दो सांस्कृतिक रूप से अलग अलग समुदाय हैं। जैसे घुमन्तू भारत तथा 'निकट तथा मध्यपूर्व ' में आज भी मिलते हैं वैसे यूरोप में नहीं मिलते हैं। घुमन्तुओं के विषय में प्रतिवाद में जो कहा गया है वह यद्यपि सिद्धान्तन ठीक है, किन्तु घुमन्तुओं वाला तर्क यहां उतना प्रासंगिक नहीं है।
आखेटक घुमन्तुओं जैसा नदारत नहीं रहता, चाहे वह गुफ़ाओं में रहे या पत्थरो आदि को जोड़कर बनाए गए टपरो में। वे एक प्रकार से स्थायी जीवन ही जीते थे/हैं, उनकी गुफ़ाओं में बने चित्र आदि उनके स्थाई जीवन शैली को संपुष्ट करते हैं।
एक तथ्य दृष्टव्य है यह कि पुरुष आखेटक का जीवन अधिक संकटो से गुजरता होगा अत्: उसकी आयु अन्य की अपेक्षा कम होती होगी, अत: उनके समाज में स्त्रियों का अनुपात पुरुषो की अपेक्षा अधिक होता होगा, और आखेटक समाज में एक पुरुष के लिये अधिक संसाधनो का अर्जन बहुत कठिन होता होगा। इसलिये उस समाज में अतिरिक्त स्त्रियां विवाह के लिये उपलब्ध रह्ती होगी।
प्रतिवादी के इस कथन से मैं सहमत हूं :"प्रयाण पर यह आवश्यक नही कि विवाहित (?) पुरूष ही जाता हो।"
"दूसरा प्रश्न यह है कि क्या आखेटको ने बिना युद्ध किये अपनी महिलाओं को स्वतंत्रता दे दी थी कि वे स्वेच्छ से कृषको के पास जाएं?" किसी स्तर पर शायद महिलाओं के लिये संघर्ष हुआ हो, लेकिन अधिकांश मामलों मे शिकारी पुरूष नये स्थान पर बढ जाते और वापस लौटने की बजाये वे घुमन्तू जीवन यापन करते। इससे संघर्ष कम होता होगा।"
प्रतिवादी का उपरोक्त तर्क घुमन्तू अवधारणा के कारण अप्रासंगिक है।
"यदि युद्ध हुआ होगा तब वैसे तो आखेटको को जीतना चाहिये था। तब क्या कृषको के पास बेहतर हथियार थे?" यदि आखेटक बाहरी थे और वे किसी समुदाय पर हमला करें तो कृषक समाज एक जुट हो कर मुकाबला करेगा। आखेटक होने के बावजूद उनके हथियार तो सामान्य ही थे -- मूलत: चाकू या भाले सदृश्य। धनुष-बाण सरीखे उन्न्त हथियार तो काफी बाद मे (१०,००० बी.सी.ई. पूर्व) आये।
आखेटक तो मूल निवासी थे और कृषक बाहर से पहुंचे थे। मेरा अनुमान है कि उन दिनों तो जमीन बहुत उपलब्ध थी, अत: कृषक लोग उपलब्ध जमीन पर खेती प्रारंभ करते होगे। युद्ध भी होते होगे। कृषको के पास आर्थिक तथा तकनीकी संसाधन भी अतिरिक्त थे तथा अवकाश भी; और उऩ्हें अपने संसाधनों की रक्षा की चिन्ता भी अधिक होती होगी, अत: उऩ्होने बेहतर हथियारों के आविष्कार कर लिये होंगे । युद्ध में उनके जीतने की संभावना अधिक होती होगी। अरुणाचल प्रदेश में मैं आपातानी समुदाय से मिला हूं. उस क्षेत्र में मुख्यतया वे कृषक हैं और चारों तरफ़ आखेटकों से घिरे हैं। किन्तु वे बहुत समृद्ध हैं और अपनी रक्षा करते रहते हैं, क्योंकि आज भी ( कोई बीस वर्ष पहले, जब मैं मिला था) उन पर हमले होते हैं यद्यपि हमलों की दर कम हो रही है। ये आखेटक अवसर मिलने पर न केवल उनके चावल लूटते हैं वरन उनकी स्त्रियों को भी लूट कर ले जाते हैं। अत: आपातानी ने अपनी स्त्रियों के सुन्दर मुख पर उऩ्हें कुरूप बनाने वाले गुदने गोद दिये हैं। अब यह गुदने गोदने की प्रथा कम होती जा रही है।
प्रतिवाद के लिये धन्यवाद कि मुझे अपने पक्ष को बेहतर प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
डा. श्याम गुप्त ने मुख्यतया वाद को ही समर्थन दिया है, उऩ्हें भी धन्यवाद्। पुरातन काल के समाजों पर मानवशास्त्रियों ने जो खोज की है उसके अनुसार पितृ सत्तात्मक् तथा स्त्री सत्तात्मक समाज दोनों ही थे । स्त्रीप्रधान समाज में तो स्त्री स्वतंत्र रही होगी और् उसने स्वेच्छ से अधिक सभ्य कृषक का वरण किया होगा या उसके साथ रहना पसंद किया होगा। मैने जो तर्क दिये हैं वे दोनों तरह के समाजों पर सटीक लगते हैं