इससे पूर्व की हम बात आगे बढायें, आपको इस नये स्तंभ की थोडी जानकारी दे दें। हम रचनायें प्रकाशित करते हैं, उन्हे पढते हैं लेकिन उनका समालोचनात्मक विश्लेषण नही होता है। ब्लागिगं जगत की तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी प्रवत्ति कल्किआन मे वर्जित है। इसीलिये हम 'जानकारी के लिये आभार' सरीखी उपस्थिति दर्शाने वाली टिप्पणियाँ नही छापते। आज से हम 'वाद-प्रतिवाद' नामक स्तंभ प्रारंभ कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत कल्किआन पर प्रकाशित रचनाओं पर बहु-पक्षीय चर्चा-परिचर्चा होगी। आप सभी पाठको से सहभागिता की अपेक्षा है।
प्रारंभ मानद सम्पादक के एक लघु लेख से किया जा रहा है। मानद सम्पादक विश्व मोहन तिवारी जी ने इस समाचार [युरोपीय पुरूष पूर्व से आये किसानो के वंशज हैं] पर यह वाद [यूरोपीय पुरुष टाइग्रिस – यूफ़्रैटीज़ (लगभग परि- इराकी) क्षेत्र से आए] प्रस्तुत किया था। अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुये मै सावधान हूँ।
मै उस वाद से इन वाक्यों को प्रतिवाद के लिये चिन्हित करूँगा: "शायद यह कहना अधिक स्पष्ट होगा कि एक एक कृषक अनेक पत्नियां को सहारा दे सकता होगा। जब कि आखेटक- फ़लाहारी समाज में तो औरत को ही जंगल में फ़ल इक्ट्ठे करना पड़ते होगे ।किन्तु क्या कृषक जन जब प्रयाण पर जाते होगे तब वे अपनी पत्नियो को नहीं ले जाते होगे? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या आखेटको ने बिना युद्ध किये अपनी महिलाओं को स्वतंत्रता दे दी थी कि वे स्वेच्छ से कृषको के पास जाएं? यदि युद्ध हुआ होगा तब वैसे तो आखेटको को जीतना चाहिये था।तब क्या कृषको के पास बेहतर हथियार थे?"
यहाँ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष भोजन की तलाश मे दर दर ठोकरें खाता, प्रकृति के खतरों से दो चार होते हुये अनिश्चित्ता का जीवन जीता था, वहीं दूसरी ओर किसान एक ही स्थान पर रह कर सुरक्षा, भोजन की उप्लब्ध्ता सुनिश्चित करने के कारण समाजिक ढाचे मे सटीक बैठता होगा।
वर्तमान समाज मे भी यदि देखें तो जो पुरूष काम के चलते यात्राओं पर रहते हैं और उनकी पत्नियाँ पीछे अकेली रह जाती हैं, उन परिवारों के टूटने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार सेना मे आत्महत्या की दर बढ सी गयी है। अन्य प्रमुख कारणों मे से एक कारण यह भी है --अफगानिस्तान तथा इराक युद्ध के कारण युवा सैनिकों को मोर्चे पर जाना पढा और वे लम्बे समय के लिये अपनी प्रमिकाओं से अगल हो गये। पुरूष की अनुपस्थिति के चलते प्रेमिकाओं ने संबंध विछेद कर दिये। यह सैनिकों के लिये असाह्य प्रतीत हुआ और वे दुखी हो कर आत्म हत्या करने लगे।
यह समान्य मानव प्रवृति उस काल मे भी रही होगी और नदारत रहने वाले शिकारी तथा घुमन्तु पुरूषों की अपेक्षा आस पास बने रहने वाले खेतिहर पुरूष परिवारों के गठन मे अधिक सफल रहे।
दूसरा यह कि प्रयाण पर यह आवश्यक नही कि विवाहित (?) पुरूष ही जाता हो। नवयुवक तथा एकाकी पुरूष ही स्थापित परिवार छोड कर जाते हों इसकी अधिक संभावना है। सबसे बडा कारण है स्रोतों पर अनावश्यक बोझ कम करना। स्थानीय खेती द्वारा सीमित भोजन उपलब्ध कराने के कारण युवकों को नये इलाके खोजने के लिये जाना पढता हो। यही युवक नये स्थानों पर स्थानीय महिलाओं के साथ परिवार बसाते हों?
"दूसरा प्रश्न यह है कि क्या आखेटको ने बिना युद्ध किये अपनी महिलाओं को स्वतंत्रता दे दी थी कि वे स्वेच्छ से कृषको के पास जाएं?" किसी स्तर पर शायद महिलाओं के लिये संघर्श हुआ हो, लेकिन अधिकांश मामलों मे शिकारी पुरूष नये स्थान पर बढ जाते और वापस लौटने की बजाये वे घुमन्तू जीवन यापन करते। इससे संघर्ष कम होता होगा।
"यदि युद्ध हुआ होगा तब वैसे तो आखेटको को जीतना चाहिये था। तब क्या कृषको के पास बेहतर हथियार थे?" यदि आखेटक बाहरी थे और वे किसी समुदाय पर हमला करें तो कृषक समाज एक जुट हो कर मुकाबला करेगा। आखेटक होने के बावजूद उनके हथियार तो सामान्य ही थे -- मूलत: चाकू या भाले सदृश्य। धनुष-बाण सरीखे उन्न्त हथियार तो काफी बाद मे (१०,००० बी.सी.ई. पूर्व) आये।
मै अपना पक्ष यहाँ समाप्त करता हूँ, पाठकों तथा मानद सम्पादक से पुन: वाद की अपेक्षा।
-- स्वपनिल भारतीय