यूरोपीय पुरुष टाइग्रिस – यूफ़्रैटीज़ (लगभग परि- इराकी) क्षेत्र से आए

मुझे यह समाचार -- युरोपीय पुरूष पूर्व से आये किसानो के वंशज हैं -- पढ़कर तनिक सा आश्चर्य हुआ, क्योकि वहां के आधुनिक विचारक तो यही कहते आ रहे हैं कि पुरुष तो मंगल से आए हैं ! खैर पहला कथन समाज शास्त्रियो का है। दूसरा लैस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको का है जो (पब्लिक लाईब्रेरी आफ़ साईस) बायलोजी जरनल में प्रकाशित हुआ है। और यह युग वैज्ञानिको का है, अत: हम उऩ्हीं की बात मानेंगे।


उऩ्होने तो वाई क्रोमोसोम की व्याप्ति को जाँचा और पाया कि इनकी‌ बहुलता दक्षिणपूर्व से उत्तर पश्चिम की तरफ़ बढ़ती जाती है। यह स्वाभाविक भी लगता है। तथा यह प्रयाण कृषि के आविष्कार के साथ साथ चलता है। अर्थात परि-इराकी क्षेत्र के कृषको की आबादी कृषि की सफ़लता के कारण तेजी से बढ़ी और पश्चिम की तरफ़ उसने प्रयाण किया और आखेटक- फ़लाहारी समुदाय पर विजय पाई।इससे एक बात यह भी सिद्ध होती सी नजर आती है कि कृषि का यह विस्तार कौशल तथा प्रौद्योगिकी का विस्तार विचारो तथा सांस्कृतिक आदान प्रदान के द्वारा न होकर विषयगत मनुष्यो के 'प्रयाण' से हुआ।

और बडा आश्चर्य तब होता है कि जब वे यह बतलाते हैं कि आधुनिक यूरोपीयो के क्रोमोसोम में यूरोप के मूल आखेटक – फ़लाहारी पुरुषो के क्रोमोसोम नगण्य हैं किन्तु उनकी‌ मूल महिलाओं के आनुवंशिकी पहचान अधिकांशतया मिलती है। इसे अनुसंधानी- लेख की प्रथम  लेखिका पैट्रिशिआ बैलैरैस्क यह कहकर समझाती हैं कि शायद उस काल में 'ईट वास जस्ट सैक्सियर टू बी ए फार्मर।' यह तो उऩ्होने विनोद में कहा है।

शायद यह कहना अधिक स्पष्ट होगा कि एक एक कृषक अनेक पत्नियां को सहारा दे सकता होगा। जब कि आखेटक- फ़लाहारी समाज में तो औरत को ही जंगल में फ़ल इक्ट्ठे करना पड़ते होगे ।किन्तु क्या कृषक जन जब प्रयाण पर जाते होगे तब वे अपनी पत्नियो को नहीं ले जाते होगे? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या आखेटको ने बिना युद्ध किये अपनी महिलाओं को स्वतंत्रता दे दी थी कि वे स्वेच्छ से कृषको के पास जाएं? यदि युद्ध हुआ होगा तब वैसे तो आखेटको को जीतना चाहिये था।तब क्या कृषको के पास बेहतर हथियार थे?

अनुसंधान का यही तो मजा होता है कि वे जितने प्रश्नो का हल करते हैं उससे ज्यादा प्रश्न खड़े कर देते हैं।

-- विश्व मोहन तिवारी


चर्चा परिचर्चा मे शामिल हों‌ और चर्चा आगे बढायें।