कुछ लोग एक्सालाट्ल को अज्ञानतावश व्यस्क सैलेमेन्डर का भ्रूण मान बैठते हैं और मान लेते हैं कि यह अव्यस्क आयु मे ही प्रजनन करने लगता है। यह असत्य है। एक्सालाट्ल दरअसल सामान्य परस्थियों मे शारीरिक बदलाव की प्रकिया से गुजरने मे असर्थ होता है अत: व्यक्स होने के बावजूद भी लारवा या भ्रूण जैसा ही दिखता है और सामान्य रूप से प्रजनन करता है -- इसे नेयोटेनी कहते है। नेयोटेनी वह प्रकिया है जिसमे व्यस्क होने के बावजूद भी शरीर "किशोरावस्था" मे ही रहता है।
घटना है सन १८६३ की जब एक समुद्री जहाज द्वारा ६ वयस्क एसोल्टल मैक्सिको शहर से पेरिस भेजे जा रहे थे। फ्रांसीसी जीव विज्ञानी आग्स्ते डुम्रिल जिन्होने यह जीव मंगवाये थे उन्हें एसोल्टल की नियोटेनि (या वयस्क होने के बावजूद शारीरिक बनावट नवजात जैसी) का पता नही था। जब उन्होने अपना 'सामान' देखा तो वे भौंचक रह गये क्योंकि वहाँ तो एक्सालाट्ल की जगह एक नये जीव की प्रजाति थी जो काफी कुछ सैलेमेण्डर से मिलती थी। यही घटना नियोटेनि पर शोध का आधार बनी।
इसके उपरान्त तरह तरह के प्रयोगो के बाद जर्मनी के विलेम लाउफबर्गर ने थायराइड हार्मोन का प्रयोग करके एक एक्सोलोट्ल को व्यस्क सैलेमेण्डर मे परिवर्तित करने से सफतला हासिल की। उसके बाद से यह जीव वैज्ञानिकों का प्रिय जीव बन गया। लेकिन उसका कारण उसका रूप रंग नही वरन कटे उपांगों को पुन: उगा लेने की क्षमता है।