क्षितज छोर पर चमका मधिम सा एक गोला
पर्वत, टीलों, गड्ढों को किरणों से तोला
उसके पीछे क्रोधित अंधी फिर फुफकारी
अट्टहास करती भीषण भवरों के धुधकारी
धरती की सूखी घटी पर घूम रही है
मौत हठीली यम् तांडव में झूम रही है
वह दिनकर उठकर लटक गया सीने में नभ के
आग बरसती धरती की नंगी छाती पे
सूखे बदल सूखी नदियाँ सूखे सागर