डॉ. अरविन्द दुबे

एक शहर की मौत

आज उस शहर की अन्तिम निशानी भी पानी में समा गई। ये उसके घंटाघर के ऊपर लगे तड़ित चालक की नोंक थी। वैसे तो ये अपने आप में कोई खास चीज नहीं थी पर परिस्थितियों के चलते ये उस मरते शहर की पहचान बन गई थी। हर रोज कुछ तमाशबीन उस डूबते हुये शहर को देखते जुड़ते, आपस में बातें करते, "अरे अभी तो उस घंटाघर का गुम्बद दिख रहा है.....लो आज उसका आखिरी कंगूरा भी डूबा...अब तो बस तड़ित चालक का सरिया ही बचा है....।"

असत्यं प्रियम वेलकम पर ख़बरदार! न ब्रूयात सत्यम अप्रियम

विज्ञान कथा का जिन्न

बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी के बादशाह की सल्तनत में सब कुछ मजे से चल रहा था। काम करने वाले, ठलुये, चापलूस, चोर, घूसखोर, बनिये-वक्काल सब मजे में थे। बीरबल की पांचवीं पीढी के वशंज शाम को तर माल सून्त कर पेट पर हाथ फेर ही रहे थे कि बादशाह का बुलावा आ पहुँचा। जैसे-तैसे धोती की लांग समेटते वे हुजूर के दरबार में दाखिल हुये कि देखो आज कौन सी मुसीबत आ पड़ी है, तो देखा बादशाह सलामत तो विदेशी महंगी सिगार मुंह में दबाये आसमान ताक रहे हैं।

डाक्टर डी

"हुं तो आप डाक्टर डी के साथ काम करना चाहते हैं?" भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के निदेशक ने मुझे सिर से पांव तक घूरा।

"जी मैं ही डाक्टर देवाशीष के साथ काम करने का इच्छुक हूँ।"

"देवाशीष? कौन देवाशीष ? अब कोई देवाशीष नही बचा है। वह खगोल भौतिकी का सितारा, पॉंच-पॉंच नोबेल पुरूस्कारों का विजेता तो कब का खत्म हो गया। अब तो एक सनकी बद-दिमाग घुन्ना डाक्टर डी बचा है। पता नही क्यों सरकार इसे अब तक रखे है इस संस्थान में?" निदेशक के स्वर में हाताशा भी थी, दुख भी और क्रोध भी।

हिन्दी विज्ञान कथा : एतिहासिक परिदृश्य

हिन्दी विज्ञान कथा के उद्भट इतिहासकार श्री शुकदेव प्रसाद व अन्य कई विद्वानों के अनुसार हिन्दी विज्ञान कथा का इतिहास सन् 1884 से 1888 के मध्य व्यास यन्त्रालय भागलपुर, मध्य प्रदेश से प्रकाशित पत्रिका 'पीयूष प्रवाह' में धारावाहिक रुप से प्रकाशित लम्बी विज्ञान रचना 'आश्चर्य वृतान्त' से प्रारम्भ होता है (1)(18)(19)। अध्ययन की सुविधा हेतु हम हिन्दी विज्ञान कथा को मुख्यत: तीन खण्डों में बांट सकते है।

आदि विज्ञान कथा (प्रोटो साइन्स फिक्शन)
विज्ञान कथा के एक स्वतन्त्र विधा के रूप में स्थापित होने से पूर्व लिखी गईं विज्ञान कथाओं को 'आदि विज्ञान कथाओं' की श्रेणी में रखा जाता है। हमारी पौराणिक व धार्मिक पुस्तकों में बहुत सारे ऐसे वृतान्त मिल जाते हैं जिनमें विज्ञान कथाओं के तत्व मिलते हैं। कुछ हिन्दी विज्ञान कथा मर्मज्ञ इन विवरणों की वैज्ञानिकता को तो स्वीकार करते हैं पर उनके अनुसार ये विज्ञान कथा के मानदण्डों पर खरी नहीं उतरतीं हैं। इसके विपरीत कुछ विज्ञान कथा विशेषज्ञ इन्हें विज्ञान कथा के रूप में सर्वथा अस्वीकार करते हैं क्योंकि इनमें उन्हें कहीं विज्ञान या वैज्ञानिक तत्व दृष्टिगोचर नहीं होते, भविष्य दर्शन के कोई तत्व नहीं मिलते।

उपलब्ध जानकारियों के हिसाब से देश-काल के साथ-साथ  वैज्ञानिक परिभाषायें और वैज्ञानिक मान्यतायें बदलतीं रहतीं हैं। विज्ञान तो हर क्षण विकसित होने वाला क्षेत्र है। इन पौराणिक कथाओं के लिखे जाने के समय विज्ञान अपनी अविकसित मान्यताओं के साथ अति प्रारिम्भक अवस्था में ही रहा होगा। तब न अणु का ज्ञान था न आणविक ऊर्जा का, न राकेट थे न स्पेस शटल। ये मानना तर्कसंगत नहीं हैं कि वैदिक युग में विज्ञान चरमोत्कर्ष  पर था और आज उसका ह्रास हो गया है। वैज्ञानिक मान्यताओं की उस भ्रूणावस्था में जब इस तरह के दृष्टान्तों में किसी असम्भव कार्य की कल्पना करते समय उस काल के लेखकों के पास ऐसे कार्यों को सम्पन्न कराने के लिये दो प्रकार के ऊर्जा विकल्प ही होते होंगे, एक तो शारीरिक बल की अतिरंजना (जिसका कि उस समय के लेखकों ने भरपूर उपयोग किया है, जैसे कि भीम में साठ हजार हाथियों का बल था या मरते घटोत्कच्छ का शरीर इतना बड़ा हो गया था कि गिरते समय सेना का एक बड़ा हिस्सा उसके शरीर के नीचे दब कर नष्ट हो गया।) पर इस प्रकार की सोच की भी एक सीमा थी। अपनी सोच को और विस्तार देने के लिये उनके पास जो दूसरा ऊर्जा विकल्प था वह था मानसिक ऊर्जा का प्रयोग जिसका उपयोग करके वे किसी भी असम्भव कार्य की कल्पना कर सकते थे। इन दृष्टान्तों में उपयोग किये गये मन्त्र शक्ति, वरदान व श्राप की शक्ति, जिनसे उन्होंने अपनी कथाओं में असम्भव कार्यों की कल्पना की, वे सब इसी मानसिक शक्ति के अवतार ही तो हैं। तब इसमें अवैज्ञानिक क्या है? कहने का इस तात्पर्य यह है कि इन तथाकथित अवैज्ञानिक या 'पृच्छन्न विज्ञान कथानकों' का यदि सावधानी से सूक्ष्मान्वेशण किया जाये तो ये भी विज्ञान कथायें ही साबित होतीं हैं।

प्रख्यात  लेखक विज्ञान कथा सम्पादक  जार्ज मन अपने 'मैमोथ इनसाइक्लोपीडिया ऑफ साइन्स फिक्शन' के पहले ही वाक्य में स्वीकार करते हैं कि विज्ञान कथाये तो प्रगैतिहासिक काल से ही अस्तित्व में हैं।(2) प्रख्यात विज्ञान कथा लेखक ओम प्रकाश शर्मा ने पौराणिक दृष्टान्तों में विज्ञान के तत्व ढूढ़ने के प्रयास किये हैं (1) पर इसके बाद के विज्ञान कथा लेखकों ने इन आख्यानों को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। समकालीन वरिष्ठ विज्ञान कथा लेखक डा. राजीव रंजन उपाध्याय ने अपनी नवीनतम पुस्तक 'वैज्ञानिक पुरा कथायें' (2009) (3) में इस दिशा में एक गम्भीर प्रयास किया है। अपनी इस पुस्तक में उन्होने पौराणिक कथाओं में विर्णत वैज्ञानिक तथ्यों की समकालीन वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर विद्वता पूर्ण विवेचना की है। पुस्तक के हर वाक्य में इस वेदज्ञाता  ब्राह्मण का दशकों में अर्जित वैदिक अध्यवसाय और अद्भुत तार्किक शक्ति साफ दिखाई देती है। वस्तुत: राजीव रंजन उपाध्याय की पुस्तक 'पुरा वैज्ञानिक कथायें' हिन्दी प्रोटो साइन्स फिक्शन पर एक अति महत्वपूर्ण दस्तावेज है जो पौराणिक कथाओं के बारे में न केवल विज्ञान कथा लेखकों की दृष्टि को नये आयाम देता है वरन आने वाले समय में ये विज्ञान कथा लेखकों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता रहेगा।

आज जब हम उस समय के (जब ये विज्ञान कथायें लिखीं गईं थीं) विज्ञान  की परिसीमाओं की दुहाई दे कर ठेठ अवैज्ञानिक और असंभाव्य 'फ्रेन्कस्टीन' (लेखिका-मेरी शैली-1818) (4) और 'मार्शियन क्रानिकल्स' (लेखक- रे ब्रेडबरी-1950) (5) जैसे कथानकों को सिर्फ विज्ञान कथा ही नहीं वरन विश्व की सर्वप्रथम विज्ञान कथा साहित्य और कालजयी विज्ञान कथा की श्रेणी में रख सकते हैं तो हमारी धर्मिक पुस्तकों में वर्णित  इन वृत्तान्तो को क्यों नहीं? आज जब विज्ञान कथा विशेषज्ञ, अनुमानत: ईसा से भी 2000 वर्ष पूर्व, प्राचीन ईराक में लिखित कविता 'गिल्गामेश एपिक' (6) में विज्ञान कथा के तत्व खोजने की बात कर रहे हैं तब हमें भी अपने इन वैज्ञानिक दृष्टान्तों के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

'एपिक आफ गिल्गामेश' में वर्णित बाढ़ का दृश्य हमारे धार्मिक ग्रन्थों में वर्णित महाप्रलय से एक दम मिलता है पर हम न जाने क्यों इन सब पर इस दृष्टिकोण से विचार करने को तैयार ही नहीं हैं?

छद्म विज्ञान कथायें (स्यूडो साइन्स फिक्शन)
मैने एक विशेष प्रयोजन से विज्ञान कथा के इस वर्ग की कल्पना की है। मेरी जानकारी के अनुसार अब तक 'स्यूडो साइन्स फिक्शन' शब्द का प्रयोग कही नहीं किया गया है। जो शब्द प्रचलन में है वह है 'साइन्स फिक्शन इन स्यूडोसाइन्स' और ये दोनों शब्द समानार्थी नहीं हैं। मेरे अनुसार वह विज्ञान कथायें जो देखने पर तो सामान्य विज्ञान कथाओं जैसी ही दिखाई देतीं है पर गौर से देखने पर पता चलता है कि इनमें वर्णित तथ्य वैज्ञानिक तथ्यों की यत्र-तत्र अवहेलना ही करते हैं उन्हें ही 'स्यूडो साइन्स फिक्शन' के अन्तर्गत रखा जा सकता है। एक विषम संयोग से देवकी नन्दन खत्री रहस्य और रोमांच से भरे तिलिस्मी साहित्य लिखने में पृवत्त हुये और सन् 1918 में उनकी पहली पुस्तक 'चन्द्रकान्ता' प्रकाशित हुई और इसके प्रकाशन के साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध की सारी हदें पार कर लीं। वस्तुत: ये रहस्य रोमांच और चमत्कारों से भरा लेखन था जिसे एक शब्द 'तिलिस्म' में समायोजित किया जा सकता है। निश्चित रुप से ये विज्ञान कथायें नहीं है पर इन्होने विज्ञान कथा लेखन हेतु वातावरण तैयार करने में काफी मदद की है। (1)
            
पल्प साइन्स फिक्शन
हर काल में ऐसा साहित्य विज्ञान कथा की मुख्यधारा के समानान्तर रहा है और कभी-कभी तो इसका पाठक वर्ग मुख्य विज्ञान कथाओं के मुकाबले काफी विशाल रहा है। "दिवाकर" के छद्म नाम से लिखने वाले एक लेखक (हो सकता है ये लेखकों का एक समूह रहा हो और ये छद्म नाम प्रकाशक का दिया हुआ हो) की कई पुस्तकें यथा सूरज की भेंट, दिमागों का अपहरण, लेडी रोबो, शुक्र ग्रह पर धावा, नक्षत्रों का युद्ध, समय के स्वामी, किरणों के चोर आदि काफी चर्चित रहीं हैं। इसके अतिरिक्त अन्तरिक्ष का दानव, हरे-प्रेतों का आक्रमण, वृह्मांण पर हमला जैसी अनेकों पुस्तकें किशोर वय के पाठकों की पसन्द रहीं हैं। इधर दृश्य-श्रव्य माध्यमों ने भी इस तरह की छद्म विज्ञान गल्पों को बहुत प्रश्रय दिया। शक्तिमान, केप्टन व्योम जैसे धरावाहिक इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।(7)

(पल्प साईंस फिक्शन पर एक श्रंखला अमेरिकी वाईल्ड कैट बुक के प्रकाशक, रान हैन्ना द्वारा कल्किआन अंग्रेजी मे प्रकाशित हो रही है)।

समकालीन विज्ञान कथा साहित्य
हिन्दी विज्ञान कथा के क्षेत्र में 'सरस्वती' नामक पत्रिका का प्रकाशन एक मील का पत्थर है। हिन्दी में सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन सन् 1900 में प्रारम्भ हुआ। इसके प्रथम वर्ष के छटवें अंक (जून 1900) में प्रकाशित हुईं थी, श्री केशव प्रसाद सिंह लिखित 'चन्द्रलोक की यात्रा' जिसे बहुत समय तक हिन्दी की प्रथम विज्ञान कथा माना जाता रहा। अन्तत: अम्बिका दत्त व्यास लिखित विज्ञान कथा 'आश्चर्य-वृतान्त' को ही संपादकों और विज्ञान कथा विशेषज्ञों ने हिन्दी की पहली विज्ञान कथा माना हैं क्योंकि इसका रचना काल (1884-1888 तक) 'चन्द्रलोक की यात्रा' के रचना काल (जून 1900) से पहले का है। (1)  वस्तुत: कौन सी विज्ञान कथा हिन्दी की पहली विज्ञान कथा माने जाने योग्य है इस विशय में चर्चा फिर कभी।

आगे चल कर तो 'सरस्वती' पत्रिका में ही बहुत सारी विज्ञान कथायें प्रकाशित हुइं पर इनमें से अधिकांश या तो पाश्चात्य लेखकों की रचनाओं का भारतीयकरण भर थीं या फिर उनका शब्दश: अनुवाद। उदाहरणार्थ-चन्द्रलोक की यात्रा (ले.-केशव प्रसाद सिंह,1900), आश्चर्यजनक घण्टी (ले.-सत्यदेव परिव्राजक, 1908), विज्ञान की कहानियां व चन्द्रलोक की प्ररिक्रमा (ले. - केशव सदाशिव केलकर), उड़ते अतिथि (ले.-विनोदिनी मिश्रा), चन्द्रलोक की यात्रा (ले.-सूर्य कान्त साह), आकाश में युद्ध (ले.-सत्य प्रकाश पाण्डेय), बैलून विहार (ले.-शिव सहाय चतुर्वेदी, 1918), भूगर्म की सैर (अनुवाद), विमान विध्वंसक (अनुवाद) आदि।

डा. नवल बिहारी मिश्र, अम्बिका दत्त व्यास, केशव प्रसाद सिंह, प्रेम बल्लभ जोशी, दुर्गा प्रसाद खत्री, अनादिधन बन्दोपाध्याय, हरि किशोर, राजेश्वर प्रसाद सिंह, निहाल करण सेठी, यमुनादत्त वैष्णव 'अशोक', बृजमोहन गुप्त, रमेश वर्मा, डा. सम्पूर्णानन्द, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, लाल श्री निवास दास, डा. ओम प्रकाश शर्मा आदि इस युग के प्रमुख विज्ञान कथाकार थे (1)।

डा. नवल बिहारी मिश्र का विज्ञान कथाओं  के क्षेत्र में योगदान अविस्मरणीय हैं उन्होने स्वयं तो उस समय के महान विज्ञान कथाकार एच.जी. वेल्स की दो रचनाओं 'फर्स्ट मैन ऑन दी मून' (सन् 1964 'विज्ञान जगत' में प्रकाशित) और वार ऑफ दी वल्र्ड (सन् 1965 में 'विज्ञान जगत' में प्रकाशित) का हिन्दी अनुवाद कर इन रचनाओं से हिन्दी भाषियों का परिचय कराया। इतना ही नहीं उनकी देख-रेख में फ्रेंच और अंग्रेजी भाषाओँ  की कई कालजयी रचनायें हिन्दी में अनूदित होकर हिन्दी भाषी पाठकों को उपलब्ध हो गईंं।

अन्य हिन्दी पत्रिकाओं में विज्ञान कथायें
केवल सरस्वती ही नहीं कई अन्य समकालीन हिन्दी पत्रिकाओं ने विज्ञान कथाओं को बढ-चढ़ कर प्रश्रय दिया यहां तक कि कइयों ने तो अपने 'विज्ञान कथा विशेशांक' तक निकाले। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग और सारिका जैसी पत्रिकाओं का नाम इससे अग्रणी है।

हिन्दी विज्ञान कथा को पहला आघात
बीसवी शताब्दी के छटवें दशक के समाप्त होते होते सरस्वती का प्रकाशन बन्द हो गया। सारिका, धर्मयुग व साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी व्यासायिकता की होड़ में असमय बन्द हो गये। आचार्य चतुरसेन, डा. सम्पूर्णानन्द और राहुल सांकृत्यायन जैसे लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारों के अतिरिक्त हिन्दी कथा साहित्य के समकालीन लेखक हिन्दी विज्ञान कथा लेखन में रूचि नहीं ले रहे थे। इसका मुख्य कारण ये था कि वे सब विज्ञान पृष्ठभूमि विहीन लोग थे। विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का लेखन उनके आकाश कुसुम ही था। उनकी ये हीनता ग्रन्थि ही शायद विज्ञान कथाओं के प्रति उनकी अरूचि और अघोषित प्रवेश निषेध के रूप में उजागर हुई। इन सारी परिस्थितियों चलते हिन्दी विज्ञान कथा में पहली बार स्थगन महसूस किया गया।

फिर आया पुनरुत्थान काल
हिन्दी विज्ञान कथा में आया ये स्थगन काफी समय तक नहीं टिका। हिन्दी विज्ञान कथाओं में बढ़ती अभिरुचि के चलते जल्दी ही ऊर्जावान लेखकों के एक समूह का उद्भव हुआ जिसने हिन्दी विज्ञान कथा को अवर्णनीय गति दी। इस समय में लिखी गई हिन्दी विज्ञान कथाओं सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि इसमें अधिकांश विज्ञान कथायें मौलिक थीं कथानक में भी, सोच में भी। इसे सैद्धान्तिक रूप से समंकालीन 'हिदी विज्ञान कथा का स्थापना काल' भी कहा जा सकता है। इस काल के कुछ ऊर्जावान विज्ञान कथाकार व उनकी प्रथम प्रकाशित विज्ञान कथायें निम्न हैं-

अजित चटर्जी (सूर्यदाह 1971), अमलतास (क्यूपिड कम्प्यूटर 1976), अमित कुमार (अदृश्य मानव 1993), अमित कुमार विश्वा (अन्तरिक्ष के वासी 2008), अरविन्द मिश्र (गुरू दक्षिणा 1985), अरविन्द दुबे (डाक्टर डी 1990), बुशरा अलवेरा (अन्तिम समाधान, एक सोच 2004), देवेन्द्र मेवाड़ी (सभ्यता की खोज 1970), हरीश गोयल (कालजयी यात्रा 1984), इरफान ह्यूमन (उड़न तश्तरी 1989), जगदीश कुमार लूथरा (महामारी उन्नीस सौ पचासी 1977),जाकिर अली 'रजनीश' (एक कहानी 1990), कैलाश साह (मुत्युंजयी 1971), कल्पना कुलश्रेष्ठ(खोज 1993), कमलेश श्रीवास्तव (नेताओं के क्लोन), कुमुद नागर (शीशे का आदमी 1973), मनोज पटैरिया (प्रदूषण महात्म्य 1979), माया प्रसाद त्रिपाठी (आकाश की जोड़ी 1980), पीयूष  पान्डेय (आक्रामक पक्षी 1991), प्रेमानन्द चन्दोला (वनस्पति मानव 1985), पुष्पेश पन्त (कायाकल्प 1986), राजेश्वर गंगवार (शीशियों में बन्द दिमाग 1975), राजीव रंजन उपाध्याय (मेरे मित्र 1984), रामलखन सिंह (शहीद 1965), रमेश दत्त शर्मा (क्रान्तिकारी अमीबा 1960), रमेश सोमवंशी (प्रयोगशाला में कैद वैज्ञानिक 1994), सत्य प्रभाकर (पराजय 1964), शक्ति कुमार त्रिपाठी (उड़न तश्तरियों का रोमान्स 1980), डा. शशि  सिंह (भविष्य का भूत 2000), शुकदेव प्रसाद (वसुधैव कुटम्बकम 1977),  सुरेश उनियाल (किताब 1999), स्वप्निल भारतीय (यू.वी.आर.जी.-1 1996), विनीता सिंघल (विडम्बना 1994), विष्णु दत्त शर्मा (प्रतिध्वनि 1953), विश्वमोहन तिवारी (आवाज 1986), जीशान हैदर जैदी (सिलीकॉन मैन 1992) आदि।

इसके अतिरिक्त समकालीन समर्थ हिन्दी विज्ञान  कथा लेखकों में लक्ष्मी नाराण कुशवाहा, संयोगिता लखेरा,  मुनीन्द्र कुमार जैन (मारण यन्त्र), जीवन नायक (यूरेका), बृजलाल उनियाल (अखिलोडियो), मनमोहन सरल (परिवार, समय की लहरों पर) आदि उल्लेखनीय हैं जिन्होंने हिन्दी विज्ञान कथा लेखन को गति और ऊर्जा प्रदान की। (1)

हिन्दी विज्ञान पत्रिकाओं में विज्ञान कथायें
हिन्दी में प्रकाशित विज्ञान पत्रिकाओं में अनियमित रूप से विज्ञान कथाओं का प्रकाशन होता रहा है। इस सन्दर्भ मे आविष्कार, विज्ञान प्रगति, इलेक्ट्रानिकी आपके लिये, विज्ञान, विज्ञान भारती, विज्ञान दूत, लोक विज्ञान, वैज्ञानिक बालक, विज्ञान डाइजेस्ट, विज्ञान गंगा, बाल स्पुतनिक, विज्ञान लोक आदि पत्रिकायें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

हिन्दी विज्ञान कथा उपन्यास
यद्यपि हिन्दी में विज्ञान कथा उपन्यासों पर काम अपेक्षाकृत कम ही हुआ है तथापि स्फुट तरीके से विज्ञान कथा उपन्यास लिखे जाते रहे हैं। हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण विज्ञान कथा उपन्यास हैं-

आश्चर्य वृत्तान्त (ले.- अम्बिका दत्त व्यास 1893),    परीक्षा गुरू (ले.-लाल श्री निवास दास 1916), स्वर्ण रेखा (ले.-दुर्गा प्रसाद खत्री), स्वर्ण पुरी (ले.-दुर्गा प्रसाद खत्री 1921), सागर सम्राट (ले.- दुर्गा प्रसाद खत्री), सागर सम्राट (ले.- दुर्गा प्रसाद खत्री), प्रतिशोध (ले.- दुर्गा प्रसाद खत्री 1925), लाल पंजा (ले.-दुर्गा प्रसाद खत्री 1925), रक्त मण्डल (ले.- दुर्गा प्रसाद खत्री 1926), साकेत (ले.- दुर्गा प्रसाद खत्री), बाईंसवीं सदी (ले.-राहुल सांस्—तायन 1924), मृत्यु किरण (ले.-राजेश्वर प्रसाद सिंह 1932), चक्षुदान (ले.-यमुनादत्त वैष्णव  'अशोक' 1949), पृथ्वी से सप्तर्षि मण्डल (ले.-डा. सम्पूर्णानन्द 1953), अन्न का आविष्कार  (ले.-यमुनादत्त वैष्णव 'अशोक' 1956), मंगल यात्रा (ले.-डा. ओम प्रकाश शर्मा 1958), महामानव की मंगल यात्रा (ले.-डा. ओम प्रकाश शर्मा 1959), जीवन और मानव (ले.-डा. ओम प्रकाश शर्मा), गांधी युग पुराण (ले.-डा. ओम प्रकाश शर्मा), युगमानव (ले.-डा. ओम प्रकाश शर्मा), खग्रास (ले.-आचार्य चतुरसेन शास्त्री 1960), सिन्दूरी ग्रह (ले.-रमेश वर्मा 1961), अपराध का पुरूस्कार (ले.-डा. नवल बिहारी मिश्र 1962), अदृश्य शत्रु (ले.-डा. नवल बिहारी मिश्र 1963), उडती मोटरों का रहस्य (ले.-डा. नवल बिहारी मिश्र), पाताल लोक की यात्रा (ले.-डा. नवल बिहारी मिश्र), अन्तरिक्ष स्पर्श (ले.-रमेश वर्मा 1962), पराजय (ले.-सत्य प्रभाकर 1964), अपराधी वैज्ञानिक (ले.-यमुनादत्त वैश्णव 'अशोक' 1968), अन्तरिक्ष के कीड़े (ले.-रमेश वर्मा 1969), हिमसुन्दरी (ले.-यमुनादत्त वैश्णव 'अशोक' 1971), मंगल की सैर (ले.-सुशील कपूर 1977), नियोगिता नारी (ले.-यमुनादत्त वैष्णव 'अशोक' 1982), गिनीपिग (ले.-जाकिर अली 'रजनीश' 1999), फिर एक ययाति (ले.-हरीश गोयल 2007), ताबूत (ले.-जीशान हैदर जैदी 2007), प्लेटिनम की रवोज (ले.-जीशान हैदर जैदी 2009) आदि।(1)

हिन्दी विज्ञान कथा नाटक
हिन्दी में जो विज्ञान कथा नाटक लिखे गये हैं उनमें से अधिकांशत: हिन्दी विज्ञान कथाओं के रेडियो या दूरदर्शन के लिये किये गये 'नाट्य रूपान्तर' ही हैं। चूंकि इन रुपान्तरों में से अधिकांश कभी कहीं भी प्रकाशित ही नहीं हुये हैं अत: इनके प्रमाण भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। डाक्टर-डी (लेखक-डा.अरविन्द दुबे), पागल लोग (लेखक-डा. अरविन्दु दुबे), आपरेशन ग्रे मैटर (लेखक-डा. अरविन्द मिश्र), पागल बीबी का महबूब (लेखक-जीशान हैदर जैदी), बुढ्ढा फ्यूचर (लेखक-जीशान हैदर जैदी), आदि कुछ ऐसे गिने-चुने विज्ञान कथा नाटक हैं जो मूलत: हिन्दी विज्ञान कथा नाटक के रूप में ही लिखे गये थे पर इनमे से 'डाक्टर -डी' और 'आपरेशन ग्रे मैटर' अन्तत: अपने लेखकों के हाथों ही विज्ञान कथाओं की गति को प्राप्त हुये। विज्ञान कथा की इस विधा बारे में ऐसा बहुत कुछ है जिसका ज्ञान बहुत सारे लोगों को नहीं हैं। इस विषय में बहुकेन्द्रीय शोध की आवश्यकता है ताकि विज्ञान कथा नाटकों का यत्र-तत्र बिखरा कोश प्रकाश मे आ सके। इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति फैजाबाद व राष्ट्रीय विज्ञान एवम् प्रौद्योगिकी संचार परिषद्  नई दिल्ली द्वारा किये गये संयुक्त रूप से आयोजित विज्ञान गल्प लेखन कार्यशालाओं में बहुत सारे रंगमंचीय और रेडियो विज्ञान कथा नाटकों का सृजन किया गया और बहुत से प्रतिष्ठित विज्ञान कथा लेखकों की महत्वपूर्ण कृतियों का नाट्क रुपान्तर किया गया। सबसे सराहनीय बात ये थी कि इन विज्ञान कथा नाटकों के सर्जक अधिंकाशत: कार्यशिविरों के वे प्रतिभागी थे जिनका ये प्रथम प्रयास ही था।

भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति फैजाबाद (उ.प्र.)
समकालीन उत्साही विज्ञान कथा लेखकों, विशेषकर डा. राजीव रंजन उपाध्याय, डा. अरविन्द मिश्र, जीशान हैदर जैदी, इरफान ह्यूमन, कमलेश श्रीवास्तव आदि के अथक प्रयासों से सन् 1995 में ये समिति अंस्तित्व में आई। श्री राजीव रंजन उपाध्याय इसके सभापति और श्री अरविन्द मिश्र इसके सचिव बने। हिन्दी विज्ञान कथा की प्रगति और उसे नई दिशा देने के क्षेत्र में समिति ने अप्रतिम योगदान दिया है। इसकी त्रैमासिक पत्रिका 'विज्ञान कथा' के माध्यम से हिन्दी के पाठक न सिर्फ बहुत से विश्व प्रसिद्ध अन्य भाषाओँ के विज्ञान कथाकारों की रचनाओं से रुबरु हुये अपितु उन्हें हिन्दी विज्ञान कथा के स्थापित व समकालीन लेखकों की रचनायें भी पढ़ने को मिलीं।

हिन्दी में बाल विज्ञान कथा साहित्य
बाल विज्ञान कथा साहित्य में सबसे बडी समस्या ये है कि बाल विज्ञान कथाओ को परिभाषित कैसे किया जाये? क्या बाल विज्ञान कथायें उन्हें कहा जाना चाहिये जो बाल मन की समझ, सोच और रुचि के अनुकूल हों?

सरसरी नज़र  से देखने से बाल विज्ञान  कथाओं की ये परिभाशा काफी सन्तोषजनक लगती है पर इन मानदण्डों का निर्धारण काफी कठिन है और इनमें एक ही कथा पर अलग-अलग निरीक्षकों की राय में वैविध्य होने की (सब्जेक्टिव वैरियेबिलिटी) की सम्भावनायें काफी हैं। कभी-कभी विज्ञान कथाओं के विषय ही ऐसे होते हैं जिनमें बालकों, किशोरों और वयस्कों की समान रुचि होती है। मेरे मत में वे विज्ञान कथायें, जिनके मुख्य पात्र बच्चे हों और जिनकी कथा वस्तु बाल सुलभ समस्याओं पर आधारित हो उन्हें ही 'बाल विज्ञान कथायें' माना जाना चाहिये। जब तक इस विषय पर बहस होकर कोई सर्वमान्य वर्गीकरण सामने नहीं आता तब तक तो मेरे द्वारा सुझाये गये इस गये वर्गीकरण से ही काम चलाया जा सकता है। एक सन्दर्भ ग्रंथ "बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोष भाग-४ बाल विज्ञान कथाएं" में इसके संपादक श्री शुकदेव प्रसाद इस झमेले से साफ बचते नज़र आतेहैं इसीलिये उन्होंने इसी ग्रन्थ के भाग-१ में विज्ञान कथाओं के उत्स की खोज की तर्ज पर बाल विज्ञान कथाओं के उत्स की खोज का जोखिम भी नहीं उठाया है।

मेरी नज़र  में शुकदेव प्रसाद सम्पादित ग्रन्थ 'बीसवीं शती का विज्ञान विश्व कोष् भाग-4, बाल विज्ञान कथायें' ही ऐसी एकमात्र पुस्तक है जिसमें बाल विज्ञान कथा के बारे में प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध है। इस पुस्तक में हिन्दी की बीस बाल विज्ञान कथायें और बारह बाल विज्ञान कथा उपन्यास संकलित है। पर इसमें चौदह "तथाकथित विज्ञान कथायें" ऐसीं हैं जो किसी नज़रिये से बाल विज्ञान कथाये नहीं मानी जा सकतीं। इसमें संपादक की अपनी कहानी 'हिमीभूत', हरिकृष्ण देवसरे का बाल विज्ञान कथा उपन्यास 'डा. बोमा की डायरी' भी है जिसको बाल विज्ञान कथा की श्रेणी में रखना अनुचित है। इसके अतिरिक्त इसमे दिल्ली मेरी दिल्ली (लेखक देवेन्द्र मेवाडी-1997), घर का जासूम (लेखक प्रेमानन्द चन्दोला-1985), धरती में बसा अजब नगर (लेखक जय प्रकाश भारती-1997) व दानी पेड़ (लेखक अरविन्द गुप्ता-1997)  तो विज्ञान कथायें ही नहीं हैं (1)। वस्तुत: इनको पर्यावरण कथाओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिये।

इस सब के बावजूद हिदी की कुछ प्रमुख बाल विज्ञान कथायें हैं-

ऊपर या नीचे (ले.-निहाल करण सेठी 1916), हरे जीवों के चुंगल में (ले.-राममूर्ति 1975), घटता हुआ आदमी (ले.-रमेश शर्मा 'एकाकी' 1967), रोबो अध्यापक का नया अविष्कार (ले.-महेन्द्र कुलश्रेष्ठ 1975), उड़न तश्तरी (ले.-नीति खरे 1989), बृहस्पति ग्रह पर पीछा (ले.-हरीश गोयल 1995), राहुल की मंगल यात्रा (ले.-अरविन्द मिश्र 2009) आदि।(1)

इसके अतिरिक्त अब तक के प्रमुख बाल विज्ञान  कथा उपन्यास हैं- मंगल की सैर (ले.-सुशील कपूर 1977), चलो चन्दा के देश (ले.-शंकर बाम 1988), अद्भुत पनडुब्बी (ले.-हरीश नायक 1989), रोहित का सपना (ले.-वृहमदेव 1993), सीपियाण्डेला की सैर (ले.-डा. शोभ नाथ लाल 1993) आदि।(1)

हिन्दी विज्ञान कथा में कम प्रयुक्त विधायें
१. लघु कथायें 
विज्ञान कथा में लघु कथा लिखना एक बहुत ही धैर्य, चित्तन एवम् कारीगरी भरा कार्य है। हिन्दी के क्षेत्र में अधिकांश विज्ञान कथा लेखकों ने इस विधा में लेखनी चलाने का साहस ही नहीं किया है। वरिष्ठ लेखक राजीव रंजन उपाध्याय की पुस्तक 'वैज्ञानिक लघुकथायें' नाम से तो इस विधा में लिखी गई एकमात्र पुस्तक होने का भ्रम तो पैदा करती है पर इसे अद्योपान्त पढ़ने के पश्चात ये स्पष्ट हो जाता है कि ये 'लघु विज्ञान कथायें' नहीं हैं। ये तो जनसाधारण के बीच फैली भ्रान्तियों, संषयों और अंधविश्वासों का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण मात्र है। तब लघुकथाओं की शैली में लिखी गईं इन रचनाओं को क्या कहेंगे? क्या से हिन्दी विज्ञान कथा लेखन में एक नई उप विधा का प्रादुर्भाव तो नहीं है?(16)

हास्य विज्ञान कथायें
विज्ञान कथा में क्षेत्र में इस विधा पर बहुत ही कम रचनायें मिलतीं हैं। हिन्दी विज्ञान कथाओं में शुद्ध हास्य की विधा में लिखने वाले विज्ञान कथा लेख जीशान हैदर जैदी ही हैं। वैसे तो जैदी जी की रचनाओं में हास्य उत्पन्न करने वाले दृष्टान्त स्वाभाविक रूप से मिल ही जाते हैं पर शुद्ध हास्य की उनकी तीन ही रचनायें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं- एक कहानी, 'खयाली संगीतकार' (2005), एक रंगमंचीय नाटक, 'पागल बीबी का महबूब' (2007) और कठपुतली नाटक, 'बुढ़ढा फ्यूचर' (2008)। इसके अतिरिक्त तो इस विधा में शून्य ही व्याप्त है।

व्यंग विज्ञान कथायें
उपरोक्त दो विधाओं की तरह व्यंग का क्षेत्र भी विज्ञान कथा में लगभग अछूता ही है। अब तक लेखक की नज़र से निम्न व्यंग विज्ञान कथायें ही गुजरीं हैं- डा. अरविन्द दुबे का रेडियो नाटक 'बस अब और नहीं' (1991), डा. मनोज पटैरिया की विज्ञान कथा 'प्रदूषण महात्म्य' (1979) व नाटक 'वरदान' (2002) और डा. राजीव रंजन उपाध्याय की विज्ञान कथा 'प्रिया पकडी गई' (2009)।(15)(17),

ललित कलायें
विज्ञान कथा के क्षेत्र के बारे मे ये विधा भी अछूती है। अरविन्द दुबे ने इस क्षेत्र पिछली शताब्दी के नौवें दशक में कुछ नौटंकी लिखने के प्रयोग किये हैं जिन्हे बाद में 'प्रसार भारती' और 'राश्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी संचार परिषद्' के द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित बहुभाषीय व 156 कड़ियों वाले विज्ञान धारावाहिक 'मानव का विकास' की कुछ कडियों में सफलता पूर्वक समाहित कर लिया गया। इसके अतिरिक्त जीशान हैदर जैदी ने 'बुढ़ढा फ्यूचर' नामक 'हास्य कठपुतली नाटक' भी लिखा है जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है।
 
विज्ञान कथा कवितायें
विज्ञान कथा कविताओं के नाम पर अब तक जितनी भी कवितायें अब तक लिखी गईं हैं वे वस्तुत: या तो साहित्यिक कवितायें हैं या फिर विशुद्ध विज्ञान कवितायें। वस्तुत: विज्ञान कथाओं के अन्दर हमेशा एक विज्ञान कथा छिपी रहती है। अगर सीधे शब्दों में कहूं तो विज्ञान कथा में वर्णित सामिग्री को कोशिश करके जस का तस विज्ञान कथा में परिवर्तित किया जा सकता है। वर्ष 2009 में कल्किआन नामक ऑन लाइन हिन्दी पत्रिका में  महाविस्फोट (लेखक-विश्व मोहन तिवारी), प्रकृति और हम (लेखक-हेमन्त द्विवेदी) मंगल (लेखिका-निर्मला कपिला) आदि कुछ 'विशुद्ध हिन्दी विज्ञान कथा कवितायें' प्रकाशित हुई हैं।

विज्ञान कथा फिल्में
हिन्दी के फिल्म निर्माताओं ने विज्ञान कथाओं के कथानकों पर फिल्म बनाने के इक्का दुक्का प्रयास ही किये हैं पर बाजारीकरण के चलते ये फ़िल्में फिल्मी मसालों के साथ चूं-चूं का मुरब्बा बन कर रह गईं हैं। वैसे तो सचमुच में कोई विज्ञान कथा फिल्म अब तक हिन्दी में बनी ही नहीं है पर जो हिन्दी फिल्में विज्ञान कथा होने का भ्रम पैदा करतीं हैं वे हैं-

वहां के लोग (नि.-निसार अहम अंसारी 1967), चाँद पर चढ़ाई (नि.-टी. आर. सुन्दरम 1967), मिस्टर इण्डिया (नि.-शेखर कपूर 1987) और राकेश रोशन निर्देशित स्टीवन स्पील की फिल्म 'ई. टी.' और सत्यजीत की अप्रसारित फिल्म 'दि एलिएन' से प्रभावित फिल्म 'कोई मिल गया'(2003), व इसी फिल्म की अगली श्रंखला के रुप में बनाई गई 'क्रिश' (2006)।

इक्कीसवीं शताब्दी में हिन्दी विज्ञान कथा
वीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध में हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों में जो उत्साह की लहर आई थी वह उत्तरोत्तर धीमी पड़ती जा रही है। हालांकि अभी भी लेखकों को वही ऊर्जावन समूह (एक दो को छोड़कर) मौजूद हैं पर  विज्ञान कथा लेखन में ठहराव व निष्क्रियता साफ लक्षित हो रही है। इस निष्क्रियता के पीछे कई कारण हो सकते हैं। बहुत सारे विज्ञान कथा लेखक विज्ञान कथा को बढ़ावा देने के स्थान पर स्वयं अपने को बढ़ावा देने के प्रयास में तत्पर हैं।

बहुत से स्थापित  हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों ने अपने आप को हिन्दी विज्ञान कथा का 'स्वयंभू मसीहा' घोषित कर दिया है। उन्हें लगता है हिन्दी विज्ञान कथा उन्हीं के कंघों पर चढ़कर 'कालक्रम की  वैतरणी' कर पायेगी। बहुत से स्थापित हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों के लिये हिन्दी विज्ञान कथा लेखन का काम हाशिये पर आ गया है। अधिकांश स्थापित हिन्दी विज्ञान कथा लेखक हिन्दी विज्ञान कथा लेखन की जगह विज्ञान कथा के बारे में ज्यादा चर्चा करते नज़र आते हैं ।

बहुत सारे हिन्दी विज्ञान कथा लेखक हिन्दी विज्ञान कथा के मुकाबले अपने 'व्यक्तिगत ब्लॉग्स' के प्रति ज्यादा समर्पित हो चले हैं और कम्प्यूटर उपयोग का हाल ये है कि तीन चौथाई से ज्यादा विज्ञान कथा लेखक ही इन ब्लॉग्स पर कभी 'लॉग' नहीं करते, विज्ञान कथा पाठकों की कौन कहे? इस प्रकार जो कुछ 'उपयुक्त-अनुपयुक्त लेखन' ये लोग इन ब्लॉग्स पर पोस्ट कर भी रहे है उसे इन विज्ञान कथा लेखकों को व्यक्तिगत मित्र या सहचिठ्ठाकार ही पढ़ पाते हैं। बहुत बार इन ब्लॉग्स पर ऐसी सामग्री पोस्ट की जाती है जिससे हिन्दी विज्ञान कथा का कोई सरोकार नहीं होता।

हिन्दी विज्ञान कथा में अघोषित आपात काल
आज के प्रतिष्ठत विज्ञान कथाकारों से मेरा निवेदन है कि वे इस बात को स्वीकार करें कि हिन्दी विज्ञान कथा आज एक अघोषित आपात काल से गुजर रही है। 'आविष्कार' नामक विज्ञान पत्रिका नें हिन्दी विज्ञान कथा की गिरती गुणवत्ता से निराश होकर अघोषित रूप से पत्रिका में विज्ञान कथायें न प्रकाशित करने का निर्णय ले लिया है। अन्य प्रमुख विज्ञान पत्रिकाओं में अब विज्ञान कथायें कम ही नज़र आतीं हैं। बाजारीकरण के चलते हिन्दी की सामान्य पत्रिकायें वैसे ही विज्ञान कथाओं में कोई खास रुचि पहले से नहीं ले रहीं थीं।

समकालीन विज्ञान कथा लेखकों से निवेदन
साहित्य की किसी विधा की उन्नति के लिये उसमें लेखन की निरन्तरता अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दी विज्ञान कथा लेखन की निरन्तरता में अब व्यवधान स्पष्ट दिख रहा है। पिछ्ले एक दो वर्षों में कितनी उल्लेखनीय विज्ञान कथायें लिखीं गई है? अत: स्थापित और नवोदित रचनाकारों को चाहिये कि हर तिमाही मे वे कम से कम एक विज्ञान गल्प अवश्य लिख कर हिन्दी विज्ञान कथा के कोष को समृद्ध करें। हिन्दी विज्ञान कथा पर चिन्तन, अन्वेषण, स्थापना व विवेचना के कार्य को द्वितीय प्राथमिकता बनायें। ये कह कर मेरा आशय उनके आज के हिन्दी विज्ञान कथा की स्थापना के लिये किये जा रहे प्रयासों को कम करके आंकना नहीं हैं। पहले विज्ञान कथायें यथेष्ट मात्रा में लिखी जायें फिर उनकी स्थापना का कार्य हो। अगर विज्ञान कथाओं की स्थापना, अन्वेषण और विवेचना के कार्य में उनसे कुछ कमी रह भी जायेगी तो विज्ञान कथा का कोष समृद्ध होने पर इसे समय और सुधी पाठक मिलकर स्वंय कर लेंगे।

आशा की किरण
हिन्दी विज्ञान कथा पाठकों के लिये आशा की दैदीप्यमान किरणों की तरह हिन्दी विज्ञान कथा को पूर्णता समर्पित दो पत्रिकायें है- विज्ञान कथा और कल्किआन हिन्दी।

विज्ञान कथा -भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति फैजाबाद द्धारा, डा. राजीव रंजन उपाध्याय के सम्पादकत्व में ये त्रैमासिक पत्रिका सन् 2002 से निंरतर प्रकाशित हो रही है। कुछ समय से ये इन्टरनेट पर निशुल्क उपलब्ध है, कल्किआन हिंदी‌ पर भी इसके अंक उपलब्ध हैं।

कल्किऑन हिन्दी-15 अगस्त 2009 से हर माह की 15 तारीख को प्रकाशित होने वाली इस ऑनलाइन पत्रिका ने जिस सहजता से नवोदित विज्ञान कथाकारों को प्रकाशन हेतु मंच प्रदान किया है वह प्रसंशनीय है। इस प्रत्रिका में हिन्दी विज्ञान कथा से जुड़ी हर विधा में रचनायें निरन्तर छप रहीं हैं। माह में हर रोज इसमें हिन्दी विज्ञान कथा से जुड़ी एक नई रचना अवश्य प्रकाशित होती है। इतने अल्पकाल में इस पत्रिका ने देश व विदेश में हिन्दी भाषा समझने वाले पाठक वर्ग में अपनी जो पहुंच बनाई है वह आश्चर्यचकित करती है।

सन्दर्भ
1.शुकदेव प्रसाद (2007)-बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग 1 से 4), किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली।
2.जार्ज मन (2001)-मैमोथ इनसाइक्लोपीडिया ऑफ साइन्स फिक्शन, कान्सटेबल पब्लिशर्स, लन्दन।
3.डा. राजीव रंजन उपाध्याय (2009)-वैज्ञानिक पुरा कथायें, आर्य प्रकाशन मण्डल, नई दिल्ली।
4.मैरी शैली (1831)-फ्रेन्केनस्टीन ऑर दी मॉर्डन प्रोमेथियस http://www.gutenberg.org
5.रे ब्रेडवरी (1950 )- दी मार्शियन क्रॉनिकल्स, डबल डे एन्ड कम्पनी,न्यूयोर्क।
6.गिल्गामेश एपिक (अनुमानत: ईसा से 2000 वर्ष पूर्व) -- http://www.gutenberg.org
7.मनीश मोहन गोरे और अरविन्द मिश्र (2000)-विज्ञान कथा का सफर, मंजुली प्रकाशन नई दिल्ली।
8.केशव प्रसाद सिंह (1900)- चन्द्रलोक की यात्रा, प्रति सन्दर्भ बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग-1)
9.जूल्स वर्न (1863)-फाइव वीक्स इन ए बैलून, ग्रेट वर्क्स ऑफ जूल्स वर्न, ब्लेक रोज पब्लिकेशंस, दिल्ली
10.जूल्स वर्न (1865)-फ्राम दी अर्थ टू दी मून, http://www.gutenberg.org
11.अम्बिका दत्त व्यास (1884)- आश्चर्य वृत्तान्त, प्रति सन्दर्भ बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग-1)
12.जूल्स वर्न (1864)- ए जर्नी टू दी सेन्टर ऑफ दी अर्थ, ग्रेट वर्क्स ऑफ जूल्स वर्न, ब्लेक रोज पब्लिकेशंस, दिल्ली।
13.मनोज पटैरिया, अरविन्द मिश्र एवम राजीव रंजन उपाध्याय (2002)- प्रसारण माध्यमों के लिये विज्ञान गल्प (आकाशवाणी, टेलीविजन), भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति, फैजाबाद।
14.मनोज पटैरिया (2009)-विज्ञान कथायें, मन भायें, कल्किऑन हिन्दी- अगस्त 2009
15.राजीव रंजन उपाध्याय एवम् अरविन्द मिश्र (2000)-संचार माध्यमों के लिये विज्ञान कथा, भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति, फैजाबाद।
16.राजीव रंजन उपाध्याय (1989)- वैज्ञानिक लघु कथायें, प्रतिभा प्रतिष्ठान, दरियागंज, नई दिल्ली-2
17.राजीव रंजन उपाध्याय (2009)- प्रिया पकड़ी गई, कल्किऑन हिन्दी।
18.श्रीनारायण चतुर्वेदी (1961)- सरस्वती हीरक जयन्ती अंक (1900-1959), इण्डियन प्रेस (पब्लिकेशंस), प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद।
19. शिवगोपाल मिश्र (मई 2000)- आश्चर्य-वृतान्त, ले. अम्बिका दत्त व्यास, अतीत के झरोखे से, विज्ञान, विज्ञान परिषद्, प्रयाग।

साइ-फाइ-कू


इस आलेख का उद्देश्य हिन्दी कविता प्रेमियों को हिन्दी कविता की नवीनतम और अब तक लगभग अनजानी विधा से परिचित कराना है, इस विधा का नाम है साइ-फाइ-कू।

तेरी भी वाह-वाह, मेरी भी वाह

बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी के बगलगीर (बगल में बैठे) बीरबल के वंशज के साथ आज बादशाह के साले साहब भी तशरीफ फरमा (बैठे) थे। यूं तो साले साहब पिछिले दो हफ्तों से शाही महल में कयाम किये हुये थे और अगले एक महीने तक पयाम (प्रस्थान) की कोई सूरत (स्थिति) नजर नहीं आ रही थी।

पांडियन ठीक कहता है

अगर कोई और कहता तो शायद रूबी खुद भी भरोसा नहीं कर पाती कि ऐसा हो सकता है। पर ऐसा हुआ और उसी के साथ हुआ, बेहद शर्मनाक और दुखद।

बैलों वाली कार

वह एक सामान्य शहर था...आदमियों से खचाखच भरा...बत्तीसवीं सदी का शहर। जनसंख्या नियंत्रित थी क्योंकि लोग बढ़ती जनसंख्या के बुरे असर से बुरी तरह प्रभावित हो चुके थे। अब तक जनसंख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि पानी से बाहर बची धरती के दो तिहाई हिस्से पर इन्सान रहते थे। बची एक तिहाई भूमि का करीब आधा भाग धरती का तापक्रम बढ़ने से और मिट्टी के रासायनिक प्रदूषण से कुछ भी उपजाने लायक नहीं बचा था। खाने की चीज़ों की मारा-मारी होने लगी थी। हालांकि उन्होने शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिये प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीके से बनाई गयी विटामिन्स और पोषक तत्वों की बनी गोलियॉं ईजाद कर लीं थीं। इन 'लाइफ टैब्स' से शरीर तो स्वस्थ रहता था, भूख मिट जाती थी पर जीभ के स्वाद का इनसे कोई नाता नहीं था। वह तो सचमुच के  भोजन से ही मिलता। परंपरागत चीज़ों जैसे रोटी, चावल, दाल, सब्जी, मिर्च, मसाले वाला भोजन एक तरह की विलासिता माना जाता था जिसे काफी धनवान लोग ही खा सकते थे या कभी-कभी फिजूलखर्ची करके मध्यमवर्गीय लोग खाते। गरीब लोगों को तो इन बिना स्वाद वाली, हर जगह उपलब्ध 'लाइफ टैब्स' को ही निगलकर जिंदा रहना पड़ता।

यातायात की स्थिति तो और भी खराब थी। अब से करीब एक हजार साल पहले इक्कीसवीं-बाईसवीं सदी के लोगों में वाहनों की ऐसी होड़ बढ़ी कि एक वाहन क्रांति की ही शुरूआत हो गई। वाहनों के बाजार में एक घमासान शुरू हो गया। एक से बढ़कर एक विशेषताओं वाले दोपहिए और चौपहिए वाहन तैयार किये जाने लगे। जो वाहन जितने कम पेट्रोल या डीजल की खपत करता उसकी मांग उतनी ही ज्यादा होती। वाहन निर्माताओं में इसकी होड़ लगी थी कोई वाहन एक लीटर पेट्रोल में 120 किलोमीटर चलता तो कुछ 'स्निफ एंड रन` श्रेणी के वाहन तो एक लीटर पेट्रोल में तीन सौ किलोमीटर तक चलते। खरीदने की शर्तेंं इतनी सरल थी कि आपकी जेब में सिर्फ एक रूपया हो तो चले जाइये वाहन विक्रेता के पास, कुछ फार्म भरिये और चमचमाता वाहन लेकर लौटिए। चौपहिया वाहन के लिये आपके पास महज एक हजार रूपये होने चाहिए और फिर सहूलियत से चुकाते रहिये, छोटी-छोटी आसान किश्तों में बाकी का पैसा। फोन घुमाइये वाहन विक्रेता के लोग आपके घर पर आकर आपको वाहन दे जाएंगे। दस रूपये रोज़ की किश्तों पर कार मिल सकती थी, तीन रूपये रोज की किश्त पर मोटरसाइकिल और दो रूपये रोज की किश्त पर मोपेड। साइकिलें तो गुज़रे ज़माने की चीज हो गयीं थीं। ज्यादातर साइकिल बनाने वाली कंपनियां या तो बंद हो गईं थीं या फिर उन्होंने दोपहिया वाहनों का निर्माण शुरू कर दिया था। हर आम और खास आदमी के हाथों में वाहन देने की, वाहन निर्माताओं की योजनाएं फल-फूल रहीं थीं। क्लर्क से लेकर फेरी लगाने वाले तक, मज़दूर से लेकर भीख मांगने वाले तक हर एक के पास अपना कम से कम एक स्वचालित वाहन जरुर था। कुछ लोगों के घरों में तो प्रति व्यक्ति चार से छह चौपहिया और एक, दो पहिया वाहन तक थे। सड़कें यहां तक कि मोहल्लों की गलियों तक इन ईंंधन चालित वाहनों से पटने लगीं थीं। यातायात में लगनें वाले `जाम` हर शहर व गांव तथा बस्ती की सड़क पर सब आम हो गए थे। लोगों के पास वाहन खड़े करने तक की जगह न थी। धनवान लोगों ने तो कई तल्लों वाले गैराज बनवा लिये थे पर मध्यमवर्गीय लोगों के वाहन सड़कों पर बेतरतीब, घरों के सामने खड़े रहते या फिर बाज़ारों में मोटी रिस्सयों के सहारे दीवारों पर टंगे रहते थे। दिन या रात के किसी भी समय सड़कों पर वाहनों की संख्या इतनी अधिक होती थी कि चौराहों पर घंटों खड़े रहना पड़ता...घंटों लाग जाम में फंंसे रहते। रेडियो पर सड़कों पर के ऐसे जामों  की सूचनाएं प्रसारित की जाती ताकि लोग इधर-उधर से होकर न जाएं। फिर भी लोगों को छोटे-छोटे फासले तय करने में कभी-कभी काफी समय लग जाता। लोग रेल या बस पकड़ने जाते समय वहां तक पहुचने के समय में जाम में लगने वाले समय की संभावना को ध्यान में रखकर काफी जल्दी घर से निकलते।

ऑफिस छूटने के समय तो वाहनों से निकलने वाला धुआं अपने चरम पर होता। चौराहों पर धुएं के काले बादल मंडराते। ऐसे समय में लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती। ज्यादातर लोग सड़क पर चलते समय मास्क पहनते। फिर भी धुएं से उनकी आंंखों में जलन होती, उनका दम घुटता। हर घर में चार मे से तीन लोग खांसी या दमा का शिकार थे।

इतना होने पर भी लोगों में रोज नये-नये वाहन खरीदने की होड़ जारी थी। जिसके पास जितने वाहन होते, वह इतना ही इज्जतदार और धनी माना जाता। ये चलन सिर्फ भारत में ही नहीं दुनियां भर में था। वाहनों के क्षेत्र में हो रही इस हलचल से कुछ मुट्ठी भर लोग बड़े परेशान थे। ये थे पर्यावरण की फिक्र करने वाले और ऊर्जा के परंपरागत संसाधनों के लगातार खत्म होने की फिक्र करने वाले लोग।

पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छू रहीं थीं पर इन आसमान छूती कीमतों का वाहनों की खरीद-फरोख्त पर कोई असर नहीं था। पेट्रोलियम की कीमत जितनी बढ़ती लोगों में दो पहिया और चार पहिया वाहन खरीदने की ललक उससे चौगुनी बढ़ती। जिनके पास चौपहिया वाहन होते वे किसी प्रकार जुगत करके चौपहिया वाहन लेने की सोचते, जिनके पास पुराना चौपहिया वाहन होता वे एक नया चौपहिया वाहन और लेने की कोशिश में रहते। पृथ्वी में पेट्रोलियम के भंडार तेजी से कम हो रहे थे। विश्व की राजनीति पेट्रोलियम के चारों ओर घूमने लगी थी। जिस देश के पास पेट्रोलियम का जितना बड़ा भंडार होता उसे उतना ही शक्तिशाली और समृद्ध माना जाता। विश्व के सारे प्रमुख संगठनों में उसका उतना ही अधिक दबदबा रहता। बिना पेट्रोलियम वाले देश एक तरह से उनके सामने हाथ फैलाते रहते...उनकी जी-हुजूरी करते...गाहे-बगाहे उनकी गलत मॉंगों के सामने सिर भी झुकाते। ये पेट्रोलियम के बड़े भंडारों वाले देश अकसर मनमानी पर उतर आते। थोड़े-थोड़े समय पर ये पेट्रोलियम और क्रूड आयल के दाम बढ़ा देते। बिना पेट्रोलियम वाले देशों के सामने और कोई चारा न होता वे इन 'पेट्रो राष्ट्रों' की ये बढ़ी हुईं कीमतों पर ये पेट्रोलियम और क्रूड आयल खरीदने को मजबूर होते। दुनिया भर के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, तक्नीिशयन अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी करते ही ऐसे पेट्रो राष्ट्रों की ओर भागते थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि वर्तमान इन्ही का है..सम्पन्नता इन्हीं के पास है।
        
इस सब के बीच में ही कहीं पेट्रोलियम से जुड़े अपराध भी धीरे-धीरे अस्तित्व में आने लगे थे। ये अपराध व्यक्तिगत स्तर पर थे, प्रांतों के स्तर पर थे तो राष्ट्रीय और अंर्राष्ट्रीय स्तर पर भी थे। पेट्रोलियम से भरे ट्रक कड़ी सुरक्षा के बीच लाए जाते थे फिर भी लूट पाट की घटनाएंं हो ही जाती थी। दो देशों के युद्ध में अब सेना श़त्रु सेनाओं की रसद पर ही नही वरन् उनकी पेट्रोलियम सप्लाई पर भी हमला करती थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पेट्रोलियम अपराध तेजी से पनप रहे थे। विकसित और बलवान देश कमजोर 'पेट्रो राष्ट्रों' पर हमला करके उन पर अधिकार करने की कोशिश करते। तभी उस पेट्रो राष्ट्र की सहानुभूति पाने की गरज से बिना मांगे ही बिना पेट्रोलियम वाले देश उसकी मदद को जुट जाते। विश्वयुद्ध के से हालात बन जाते फिर मानवता की अस्तित्व रक्षा के नाम पर दुनिया को विश्वयुद्ध से बचाने के नाटक होते। हमलावर और सहायता करने वाले देशों के बीच समझौता होता और दोनों मिलकर उस छोटे पेट्रो देश को हथिया लेते। किसी पेट्रो राष्ट्र को इस तरह बेइमानी से...जोर जबरदस्ती के बल पर हथियाने को एक सुंदर सा नाम दिया गया था 'अधिग्रहण'। अगर कभी कोई पेट्रो राष्ट्र इस प्रकार के 'अधिग्रहण' का विरोध करता या उनके खिलाफ उठ खड़ा होता तो भयंकर लड़ाइयां होतीं...हजारों जानें जातीं...उस राष्ट्र के तेल के कुओं में आग लगा दी जाती। कभी-कभी तो वे पेट्रो राष्ट्र खिसिया कर खुद ही अपने तेल के कुओं में आग लगाकर 'राजस्थानी जौहर' का परिचय दे देते। जब कभी दो पेट्रो राष्ट्र किसी मसले पर आपस में लड़ बैठते तो कोई न कोई विकसित और बलवान राष्ट्र उनके झगड़े में जरूर कूद पड़ता जिसका अंत कभी सिर्फ विपक्षी या कभी-कभी दोनों देशों के तेल भंडारों के 'अधिग्रहण' में होता।

लोग गैर परंपरागत ईंधनों के व्यवहारिक उपयोग के लिये फिक्रमंद थे। इन पर बड़े-बड़े सेमिनार होते। विकसित देशों की सरकारें इन शोधों पर अरबों रूपए प्रतिवर्ष खर्च करतीं। वैज्ञानिकों ने सूरज की ऊर्जा से वाहन चलाने के प्रयास किए, बिजली से बैटरियांं चार्ज करके विद्युत कारें और विद्युत बाइक चलाने के प्रयास किये गए। कुछ वैज्ञानिकों ने पानी को पेट्रोल और डीज़ल के स्थान पर वाहनों में प्रयोग करके देखा तो कहीं कुछ वनस्पतिक तेलों को वाहनों में ईंधन की तरह प्रयोग किया गया। कुछ प्रयोगशालाओं में ये लोग गोबर गैस आदि को वाहनों में ईंधन की तरह प्रयोग करने की संभावनाएंं तलाश रहे थे। पर इन सारे प्रयोगों मे से किसी में भी कोई ऐसी गुंजाइश नहीं दिखी थी कि ये भविष्य में व्यवहारिक रूप से पेट्रोलियम ईंंधन का स्थान ले सकेगा। एक बार गोबर गैस के प्रयोग से इसमें उम्मीद की एक किरण जागी थी पर अब वह भी व्यवहारिक नहीं रह गई थी। जानवर उन दिनों केवल लाइफ टैब्स पर ही पाले जाते थे जिनसे इतना गोबर ही नहीं मिलता था जिसे पेट्रोलियम के विकल्प के रूप में देखा जा सके।

एक दिन वही हुआ जिसका अंदेशा बरसों से सबको था। पेट्रोलियम के भंडार समाप्त हो गए। वाहनों की बढ़ती भीड़ ने धरती का सारा पेट्रोलियम चूस लिया था। वैज्ञानिक बिरादरी पहले ही पेट्रोलियम की खोज में धरती का चप्पा-चप्पा तलाश चुकी थी...समुद्रों का इंच-इंच खंगाल चुकी थी। इस दौरान जो पेट्रोलियम के इक्का-दुक्का छोटे-छोटे भंडार मिले थे, उन्हें उन देशों की सरकारों ने आपातकालीन रिज़र्व भंडार घोषित कर दिया था। अपने इन आपातकालीन पेट्रोलियम भंडारों की सारे राष्ट्र बड़ी तन्मयता से कड़ी सुरक्षा करते थे...इनके बारे में पूरी गोपनियता बरती जाती थी। सब जानते थे कि अगर विश्व युद्ध हुआ तो ये पेट्रोलियम के भंडार उनमें निर्णायक भूमिका निभाएंंगे और ये ही दुश्मन के आक्रमण का पहला निशाना होंगे।

जन सामान्य के लिए पेट्रोलियम के उपयोग पर रोक लगा दी गई। पेट्रोलियम का किसी भी रूप में जन सामान्य द्वारा प्रयोग अपराध घोषित कर दिया गया। धुआं उड़ाती मानवता का चक्का जाम हो गया। चोरी-चुपके भंडार किया 'ब्लैक' का पेट्रोल आखिर कब तक चलता?सारे वाहन धीरे-धीरे सिर्फ गैराजों की शोभा बनकर रह गए। जब उन्हें चलाने के लिए ईंंधन ही नहीं तो वाहनों का क्या होता? वाहन निर्माता कम्पनियॉं धड़ा-धड़ बन्द होने लगीं या फिर से साइकिलों के निर्माण में उतर आईं। तभी कुछ लोगों ने स्थानीय स्तर पर इन वाहनों के साथ अनूठे प्रयोग करने शुरु कर दिये। वे अपने पुराने वाहनों, खासकर चौपहिया वाहनों में जानवरों को जोतने लगे। लोग इसमें तेज दौड़ने वाले जानवर जोतन लगे जैसे कि घोड़े, बैल, ऊंंठ आदि। भारत में व्यवहारिक रूप से बैलों को इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त और किफायती पाया गया। इसमें एक रस्सी या लोहे की छड़ की सहायता से कार के आगे दो बैल जोते जाते थे और कार में लोग बैठते थे। बैल इस कार को खींचते थे। कार के आगे का शीशा या 'विंडस्क्रीन' हटा दिया जाता था ताकि लोग कार के अंदर बैठे-बैठे ही बैलों की रासें पकड़ कर वहीं से बैलों को नियंत्रित कर सकते थे। इस स्थानीय आविष्कार को लोग 'बुलौक कार' या 'बैलों वाली कार' कहते थे।


ये बीसवीं शताब्दी में प्रचलित बैलगाड़ी का संशोधित संस्करण मालूम देता था। धीरे-धीरे बहुत सारी बंद पड़ी चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं इस धंधे में आ गईं। 'बुलौक कार`  में नये-नये प्रयोग किये जाने लगे। अब चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं कार भी सप्लाई करती और इससे जुतने वाले बैल भी। इसमे जुतने वाले बैलों को चारा आदि देने की जरुरत नहीं थी। वैसे ही जानवरों का चारा जैसी फालतू की चीज उगाने के लिये उस बत्तीसवीं शताब्दी में जमीन कहां मिलती जबकि इन्सानों के भोजन की जरुरी चीजें उगाने भर की जमीन ही नहीं बची थी। इन जानवरों को भी भोजन के रुप में प्रयोगशालाओं में विकसित की गई विटामिन और पोशक तत्वों के 'क्न्सन्ट्रेट' से बनी 'लाइफ टैब्स' खिला कर ही पाला जाता था जो आसानी से हर जगह उपलब्ध थे।

इन बैलों या जानवरों के मस्तिष्क में एक छोटे से आपरेशन के जरिये एक कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप फिट कर दी जाती थी। कार के अंदर भी एक लगा होता था। इस कम्प्यूटर से सिग्नल भेजकर कार में बैठे-बैठे ही उन बैलों के मस्तिष्क में लगी माइक्रोचिप की सहायता से उन्हें तेज चलने, धीमे चलने, रूकने, दाएंं या बॉयें मुड़ने के निर्देश दिये जाते थे जिनका वे सही-सही पालन करते थे। पर इस माइक्रोचिप का उनके पूरे मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं था। फिर भी वह थे तो जानवर ही, वे कभी- कभी  इस मिनी कम्प्यूटर के आदेशों को झुठला जाते। ऐसे में बैलों को वापस कम्पनी भेजना होता जहॉ या तो उनकी ये कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप बदल दी जाती थी या फिर बैलों की नई जोड़ी ही सप्लाई कर दी जाती थी। ये बैलों वाली कारें, अब खूब प्रयुक्त होने लगीं थीं पर ये धनवानों तक ही सीमित थीं। आम आदमी में प्रचलित वाहन थी साईकिल - पैरों से चलाई जाने वाली या फिर विकलांगों द्वारा हाथों से चलाई जाने वाली साईकिल। लोग अब लम्बी यात्राएं कम ही करते। नाव यात्रा अब काफी विकसित होने लगी थी। पेट्रोलियम की समाप्ति ने लोगों के विकास के क्र्रम को पीछे की ओर, उल्टे पांव चलने को मजबूर कर दिया था।

राजू आज ऐसे ही बैलों वाली कार से अपने पिता के साथ अपने हॉस्टल से वार्षिक छुट्टी में घर लौट रहा था। सड़क थोड़ी खराब थी इसलिए उन्होंने कार में मिनी कंप्यूटर के जरिए बैलों को मध्यम गति से चलने के आदेश दे दिए थे। अचानक न जाने क्या हुआ? कार में जुते बैल भड़क उठे। इस उबड-खाबड़ सड़क पर वे बैलों वाली कार लेकर सरपट दौड़ने लगे। राजू के पिता कार में मिनी कंप्यूटर से जितना उन्हें नियंत्रित करने के आदेश देते तो वे उतना ही सरपट भागते। कार उलटने-उलटने को हो जाती। राजू के पिता के माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। राजू भी परेशान था। उसने घबराकर पूछा- `पापा यह सब क्या हो रहा है?

"मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा हूंं बेटे। कंप्यूटर से कोई भी आदेश दो, कोई सिग्नल दो बस बैल भड़क कर भागना शुरू कर देते हैं। लगता है बैलों के मस्तिष्क में फिट माइक्रोचिप से सिग्नल लीक होने लगे हैं जिससे चिप के चारों ओर का उनका मस्तिष्क इन अनावश्यक सिग्नलों को ग्रहण करने लगा है।"
"पर ऐसा क्यों पापा," राजू काफी घबरा रहा था।
"माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने या सूजन होने से ऐसा हो जाता है और वे सामान्यत: माइक्रोचिप से निकलने वाले वीक सिग्नल, जिन्हें स्वस्थ दशा में वे जान भी नहीं पाते, को ग्रहण करने लगते हैं। इसलिए हमारे हर कमांड पर उनके मस्तिष्क के इस सूजे भाग को एक बिजली का सा झटका लगता है और वे बिलबिलाकर दौड़ना शुरू कर देते हैं।"
"अब क्या होगा पापा?"
"यही मैं भी सोच रहा हूंं बेटे। जब कार के निर्माता हमें बैल सप्लाई करते हैं तो वे दोनों बैलों के मस्तिष्क में फिट इन "माइक्रोचिप" को पूरी तरह सिनक्र्रोनाइज़ करते हैं ताकि हमारे मिनी कंप्यूटर पर दिए गए एक कमांड को दोनों बैल एक ही तरह समझें।"
"पर अब पापा?"
"राजू बेटे लगता है कि एक बैल के माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने से वह सिंक्रोनाइजेशन समाप्त हो रहा है।"
"इसका मतलब पापा?"
"इसका मतलब यह कि हमारे सिग्नल को एक स्वस्थ बैल एक तरह से ग्रहण कर रहा है और इनफेक्टेड मस्तिष्क वाला बैल दूसरी तरह से।"
"यह तो बहुत खतरनाक होगा पापा, एक बैल दौड़ना चाहेगा तो दूसरा धीमे चलेगा, एक दाएं जाएगा तो दूसरा बाएं...यानि की हमारी कार कभी भी पलट सकती है?
"हॉ," पापा ने चिन्तित स्वर में कहा।
"पापा अगर हम बैलों को कोई भी सिग्नल न दें तो?"
"राजू मैं ऐसा कर रहा हूंं, पर इनफेक्टेड बाएंं बैल की माइक्र्रोचिप से सिग्नल लीक होना रूक ही नहीं रहा।"
"हे भगवान अब क्या होगा?"
"पता नहीं पर मैं कोशिश करूंगा...अंत तक कोशिश करूंगा।"
"पर कैसे पापा?"
"सोचता हूँ कार के बोनट तक किसी तरह पहुंंच जाऊंं और बैलों को कार से जोड़ने वाली रॉड को काट दूंं।"
"पर ऐसी उछलती, सरपट दौड़ती कार में पापा...नहीं पापा बहुत खतरनाक है यह...नहीं पापा नही..."                                              
"नहीं बेटे मुझे ऐसा करना होगा...मैं तुम्हारा पापा हूंं न। यकीन करो मुझे कुछ नहीं होगा।"
             
राजू के पापा ने उस तेज और धक्के खाती कार का दरवाज़ा खोला फिर वे खिसक कर कार के बोनट की ओर बढ़े। तभी कार एक खड्डे में जा गिरी और उलट गई।
राजू तेजी से चिल्लाया, "पापा"
"क्या हूआ बेटे," पापा राजू के ऊपर झुके उसका सिर सहला रहे थे।
"..."
"क्या हुआ, क्या कोई बुरा सपना देखा?" पापा पूछ रहे थे।
राजू ने धीरे-धीरे ऑंखे खोली। सामने पापा थे। वह पापा से लिपट गया, "पापा आप ठीक तो हैं न?"
"हॉं बेटे मैं बिलकुल ठीक हुंं पर तुझे क्या हुआ है?
" पर पापा, वह बैल...वह बैलों वाली कार...वह दुर्घटना..."
"ओहो! तो जनाब ने आज फिर कोई बुरा सपना देखा। कितनी बार तुमसे कहा है कि सोते समय उल्टे-सीधे कॉमिक्स न पढ़ा करो। तो क्या देखा आपने आज के इस सपने में?"
    
 राजू ने अपने पिता को अपने सपने के बारे में पूरी कहानी सुनाई। कहानी खत्म होते-होते राजू के पिता ने राजू के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"पापा मुझे तो यकीन ही नहीं आ रहा है कि ये सब सिर्फ एक सपना था," राजू कह रहा था।
"सच कहते हो राजू सचमुच ये सपना नहीं था। तुमने बंद ऑंखों से हमारा आने वाला कल देखा है...ऊर्जा के संसाधनों के साथ जो अति हम आज कर रहे हैं उसका दुष्परिणाम देखा है...शायद प्रकृति तुम्हारे माध्यम से हमें चेतावनी दे रही है," पापा कहीं दूर देख रहे थे।
"मैं समझा नहीं, क्या कह रहें हैं आप?"
"राजू जिस रफ्तार से ये दोपहिये और चौपहिये वाहन बढ़ रहे हैं, अगर वही रफ्तार जारी रही तो क्या होगा? कहां से आएगा उनके लिए इतना पेट्रोल, इतना डीजल?"
"..."
" हमें थोड़ी दूर जाना हो तो क्या जरूरी है कि हम बाइक से ही जाएंं...कार से जाएंं? साइकिल पर भी जा सकते हैं...जैसे कि तुम अपने स्कूल।"
"समझा पापा, समझा, इससे पेट्रोल बचेगा और कसरत भी होगी।"
"हॉं, आज लोग कार से जाते भी हैं तो हर कार में सिर्फ एक आदमी। ऐसा भी तो किया जा सकता है कि एक ही जगह जाने वाले ऐसे पांच-छ: लोग बारी-बारी से किसी एक की कार में एक साथ जाएंं। लोग कार और मोटर साइकिल पर हवाखोरी और टहलने के लिए निकलते हैं। अरे ये कैसी हवाखोरी, टहलना हो तो पैदल जाओ।"
"मैं तो पापा अब साइकिल से ही स्कूल जाया करूंगा। हॉस्टल से स्कूल है ही कितनी दूर," राजू ने उत्साहित होकर कहा।
" और क्या साइकिल चलाना कोई शर्म की बात तो है नहीं। चीन में तो अस्सी प्रतिशत लोग साइकिल का ही प्रयोग करते हैं," पापा ने जानकारी दी।
"इससे तो पेट्रोलिंयम की कितनी सारी बचत होगी, है न पापा?"
"हॉं आज लोगों को मालूम है कि 'जेट्रोफा' जैसे पौधों से वाहनों में प्रयोग किया जाने वाला डीजल बनाया जा सकता है पर आम आदमी की तो इसमें रूचि ही नहीं। अगर ये चीजे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश न पा सकी तो न जाने कल क्या होगा," पापा ने गहरी सॉंस ली।
"मैं बताऊंं पापा, बैलों वाली कार होगी पापा बैलों वाली कार," राजू ने कहा और दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।

-- डॉ. अरविंद दुबे

क्यों सिर्फ दौलू है, हिन्दी विज्ञान कथा लेखक?

गॉवों में एक कहावत प्रचलित है, "माया तेरे तीन नाम, दौलू, दौलत, दौलत राम", यानि कि किसी के स्टेट्स के साथ उसका नाम भी बदलता जाता है। आज हिन्दी विज्ञान कथा के लेखकों पर विचार करते समय अनायास ही ये बात मुझे याद आई। आप किसी साहित्यिक गोष्ठि में हिन्दी विज्ञान कथा के बारे में बात करके देख लीजिये, इसकी शान में कसीदे पढ़े जाने लगेंगे, इसे हिन्दी साहित्य का अति महत्वूर्ण तत्व, अनुपम विधा, और न जाने क्या-क्या कहा जाने लगेगा। ऐसे में उत्साहित होकर कहीं आपने हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों की बात छेड़ दी तो परिदृश्य एकदम बदल जायेगा, सबके उत्साह पर पानी फिर जायेगा।

मलूक दास की डायरी

ये बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी थी। मान लेने में क्या हर्ज है कि बादशाहत कायम थी। बादशाहत तब भी खानदानी होती थी, विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती थी। बादशाहत अभी भी विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती है पर हर पांच साल पर सबसे स्वीकृति का ठप्पा लगवाने का स्वांग भर होता है जिसकी जरूरत पहले नहीं थी।

बादशाह की तरह खानदानी वजीर (चापलूस) के रुप में बीरबल की पाँचवी पीढ़ी भी बादशाह की बगलगीर थी। मजेदार बात ये थी कि दरबार में सवाल भी पुराना ही था। सामने कागज पर पडोसी देश के एक कलाकार द्वारा खीची गई एक रेखा थी। रेखा खीचने वाले की शर्त थी कि इस रेखा को छेडे बिना इसे छोटा करना है। आप सोचेंगे इसमें क्या खास बात है। वही घिसी-पिटी बात... इसके ऊपर एक दूसरी बडी रेखा खींच दो नीचे वाली अपने आप छोटी हो जायेगी। ये तो मियां बीरबल पीढ़ियों पहले कर गये थे। पर परेशानी ये थी कि इतनी पीढ़ियां गुजर जाने के बाद एक सीघी रेखा खीचने का सलीका ही किसमें बचा था।

सब हसरत से कागज पर खिंची उस एकदम सीधी लकीर को देख रहे थे और मन ही मन जल रहे थे कि काश हम भी ऐसी ही सीधी...एक दम सीधी रेखा खींच पाते। पर ये लोग तो बरसों से रेखाओं की वकालत करते आ रहे थे -- कभी नक्शे की पर खिंची रेखाओं की वकालत करते तो हजारों-हजार प्रजा के सम्बन्धों के बीच अलगाव की रेखायें खिंच जातीं, कूट नीति की रेखाओं पर बहस करते तो हजारों बेगुनाहों के खून की हजारों टेढ़ी-मेढ़ी, मोटी बदसूरत रेखायें सडकों गली कूचों में बनने लगतीं। उन्हें लगता था उनका काम है दूसरों को ऐसी ही रेखायें खींचना सिखाना, फिर कागज पर रेखायें खींचने का अम्यास करने का समय ही कहॉ था उनके पास? वे तो अब उस्ताद हो गये थे रेखायें-वेखायें खींचने का काम तो नौसिखियों का था। पर आज इस एक विदेशी रेखा ने उनके माथे की रेखाओं को गहरा दिया था। 

वीरबल का वंशज क्रोध में था, "हम साले जो इतने पढ़े-लिखे माने जाते हैं...दुनिया हमें आलिम-फाजिल कहती है और हम इतनी सीधी एक रेखा नहीं खींच सकते...और ये दर-दर भटकने वाले ये फाकाक़श बेऔकात लोग एक दम इतनी सुडौल सीधी रेखा खींच कर हमारे लिये चुनौती बन गये हैं...कुछ करना पडेगा," बीरबल का वंशज गुस्से में फुंफकारा।

"हॉ तो क्या राय है आप सब की इस विषय पर?" तत्कालीन बादशाह ने अपने दरबारियों का आवाहन कर लिया।

जो समझदार थे वे मुंह लटका कर बैठ गये, उस दिन को मन ही मन कोसने लगे जब उन्होने खुद रेखायें खींचना छोड़कर उस्तादी ओढ़ ली थी। वे मन ही मन अफसोस कर रहे थे, "हम चाहे जो करते रहते पर एक सीधी व नायाब रेखा खींचने का अभ्यास जारी रखते तो आज ये दिन न देखना पड़ता।"

दरबारियों के एक और तबके ने सुझाया कि, "इस रेखा को चुपके से दोनों तरफ से थोडा-थोड़ा बिगाड़ दो, कौन जान पायेगा कि ये हमने ही किया है?"

"पर ये तो बईमानी होगी, सरासर बेईमानी, इस लाइन को तो छेड़ना ही नहीं है," बादशाह ने प्रतिवाद किया।

"राजनीति में क्या बेईमानी, क्या ईमानदारी, जिस तरह से देश की इज्जत बचे वही विधान है...अपना काम बने वही नियम है, वही ईमानदारी है," उन्होंने कहा।

वैसे मन ही मन वह हंस रहे थे और सोच रहे थे, "जिस साले को राजनीति का ये क,ख,ग नहीं आता उसे बादशाह बनने का हक क्या है...अगले पांच साला स्वांग पर इसे भी समझा जायेगा," पर प्रकटत: परिस्थिति देख कर वे खामोश हो गये। 

दरबारियों का एक ओर वर्ग था उसने कहा, "असलियत तो यह है कि जो रेखा सामने खिंची हुई है वह एक नायाब रेखा है...किसी के अभ्यस्त हाथों का कमाल। क्यों न हम ईमानदारी की बात करें और मान लें कि ये रेखा सचमुच बहुत अच्छी बन पड़ी है..फिर रेखा खीचने वाला कोई इतना गैर भी नहीं है...अपना पडोसी ही तो है। क्यों न उसे बुला कर उसके कौशल की तारीफ करें, उसे शाबासी दे, आशीर्वाद देकर उसका उत्साहवर्धन करें।


"अरे तुम साले," बीरबल का वंशज गुस्से में चिल्लाया, "तुम साले उसके के ग्रुप के लगते हो...साले बंधुआ मजदूर, खाते इस देश का हो तारीफ उनकी...चमचे साले लगता है उसने तुम्हें हमारे दरबार में प्लांट किया है।"उसके मुंह से बेतहाशा थूक के छींटे निकल रहे थे। वह बादशाह की ओर मुडा और अर्ज किया, "जहांपनाह ये सब साले उसके (रेखा खीचने वाले के) ग्रुप के है इन्हें दरबार से निकाल दिया जाये।" हालांकि प्रकटत: वह अनुरोध कर रहा था पर स्वर धमकी भरा था।

बादशाह सलामत सोच में थे अगर इसकी मानते नहीं है तो अगले "पांच साला स्वांग" में लेने के देने पड़ जायेगे। वैसे जो वह करवा रहा है वह शायद ठीक नहीं है। हमें अगर सीधी रेखा खींचना आता होता तो कोई लफड़ा ही नहीं था एक इससे बड़ी सीधी रेखा ऊपर खींच देते और सारा मामला रफा-दफा हो जाता पर राजनीति में ये सब ऐसा छूटा कि कलम पकड़ते ही पसीना आने लगता है। अन्तत: बादशाह सलामत की उंगली उठी और देश के हित-चिन्तक, वे लोग जिन्हें बीरबल के वंशज ने उस दूसरे देश के कलाकार का बंधुआ या "प्लांट किया" करार दिया गया था, उन्हें सिपाहियों द्वारा धक्का देर बाहर निकाल दिया गया। वे दरबार के चारों ओर लगे सींखचों में से पहले तो बाहर से हल्ला मचाते रहे फिर थक कर खामोश होकर, दरबार को भगवान के भरोसे छोड़कर, दरबार की कार्यवाही देखने लगे।

"तो वजीरे आला इस गम्भीर समस्या का हल क्या है...इस वक्त इज्जत कैसे बचाई जाये?" बादशाह सलामत बीरबल के वंशज से मुखाबित हुये।

"एक नायाब तरीका समझ में आया है बादशाह सलामत," बीरबल के वंशज ने बोलना शुरू किया।

"जल्दी बोलो, पहेलियां मत बुझाओ।"

"बादशाह सलामत जिस कागज पर ये रेखा खिचीं है उस कागज को ही दोनों ओर से थोड़ा-थोड़ा फाड़ दें कागज के साथ रेखा भी छोटी हो जायेगी।" 

दरबार में जो समझदार थे पर जिनके मुंह पर डर के और हिचक के ताले लगे थे वे उदास हो गये। सिर झुकाकर सोचने लगे "अब इस राज्य को मिटने से कोई नहीं बचा सकता।" 

जो बेवकूफ थे, अवसरवादी थे, चापलूस थे उन दरबारियों ने तालियां बजाईं, "वाह क्या नायाब तरीका बताया है, ऐसा ऑरिजिनल आइडिया तो ऑरिजिनल बीरबल मियॉ भी न सोच पाते...लायक पूर्वजों की सुपर लायक औलाद।" 

दरबार के बाहर बाहर निकाले गये और सीखचों के बाहर से ही दरबार की कार्यवाही देखते लोग चिल्लाये, "ये गलत है ऐसे तो इस कागज पर कभी भी इससे बडी रेखा खींची ही नहीं जा सकेगी...आप इस तरह रेखा खीचने की विधा के विकास और कौशल पर ही कुछ कुठाराघात कर रहे हैं।"

"पर इससे रेखा तो छोटी हुई...हमारे राज्य की नाक तो गिरते गिरते बची," बीरबल का वंशज चिल्लाया।

"पर किस कीमत पर...विधा के विकास के नाश की कीमत पर, ये तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है!"

"चूल्हे में गया तुम्हारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जीत आखिर जीत होती है," बीरबल का वशंज आगे बढ़ा उसने कागज को दोनों ओर से फाड़ कर छोटा कर दिया। रेखा अब छोटी लगने लगी थी।

बीरबल का वंशज मूछों पर ताव दे रहा था, बेवकूफ बादशाह अब राहत महसूस कर रहा था, सीखचों के बाहर खड़े बुद्धिमान दरबारी अपना सिर धुन रहे थे और चापलूस चाटुकार बीरबल के वंशज की जय जयकार कर रहे थे।

पुनश्च- प्रिय पाठक उपयुक्त व्यंग रचना क्या आपको विज्ञान कथा के क्षेत्र में व्याप्त किसी दुष्पृवत्ति की ओर इशारा करती प्रतीत होती है? यदि हां तो देखिये कि आपके आसपास, आपका कोई चहेता, परिचित व्यक्ति प्रमादवश या क्रोध में इस प्रकार की दृष्पृवत्ति में लिप्त तो नहीं है? यदि  है तो उसे समझाइये कि उसके इन प्रयासों से विज्ञान कथा की क्षति हो रही है। आपके बार-बार समझाने पर भी हठ पूर्वक यदि वह कुछ भी सुनने को तैयार न हो तो साहस करके सामने आइये और सार्वजनिक रुप से उसकी भतर्सना करिये और विज्ञान कथा के संरक्षण एवं सम्वर्धन की इस पावन मुहिम में हमारा साथ दीजिये -- -- डा. अरविन्द दुबे

 

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