किन्हीं अनगढ़ हाथों के जोड़े ने बनाई थी वह मूर्ति, जिसे कल रात प्रतिष्ठित किया गया देवी-जागरण के लिये।
(ये धंधा था उनका, उनका रोजगार,कोई श्रद्धा नहीं) चार जोड़ी आंखों ने देखी वह मूर्ति मोहित हुये, आंखों में भर ली सुगढ़ देहयष्टि, उपयुक्त रहेगी प्रतिष्ठा के लिये। अगले मोहल्ले वालों से अच्छी है लाख गुना।
(जागने लगा था धर्म भी थोड़ा-थोड़ा) प्रतिष्ठा हुई, श्रंगार हुआ लोगों ने की वाह-वाह। क्या छांट कर लाये हैं, कितनी आकर्षक।
(हम भी लायेंगे ऐसी ही अगले साल) रात भर बजता रहा झांझ, ताल-मदंग ढोलक मंजीरा। झूम-झूम कर गाते रहे भक्त,
वह पति-पत्नी दोनो फायर प्लेस के पास कुर्सियां डाले बैठे थे। आज सर्दी और दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक थी भी। एकाएक पत्नी उठी और अपना शाल उठा लाई और उसे इस तरह फैलाया कि दोनों के पैर व शरीर के आधे भाग शाल से ढंक गये। शाल के नीचे से पति ने अपना हाथ बढ़ाया और नीचे से ही कुर्सी के हत्थे पर रखा पत्नी का हाथ कस कर पकड़ लिया।
“क्या करते हो”, पत्नी चिंहुकी।
मीतू के विवाह में सबसे अधिक काम मुझे ही करना पड़ा था। सारा दिन थका देने वाला उबाऊ काम; गेहं साफ करना, मसाले पीसना, दिन भर भाग दौड़ कर लोगों से काम कराना और न जाने क्या-क्या? मम्मी ने तो सारा कुछ मुझ पर सौंप कर व्यस्तता का लबादा पहन लिया था। घर की बड़ी लड़की होने का एक औपचारिक अधिकार जबरदस्ती उन्होंने मेरे सिर थोप दिया था, और मैं करती भी क्या?