यहां बैठे बैठे मै यह सोच रहा था कि विज्ञान साहित्य की सबसे बडी त्रासदी यह है कि उसे अभी उसका मुकम्म्ल स्तर नही मिल पाया है। इस स्मस्या का करण ढूढने पाया कि इसका प्रमुख कारण विज्ञान कथाकारो व मुख्यधारा के कथाकारो के बीच संवाद कि कमी है. क्या इस संवाद कि कमी को पाटा जा सकता है? हां. लेकिन कैसे?
कल्किआन हिन्दी के अनावरण की सारी तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। मै यहाँ जर्मनी में बैठ कर साईट के निर्माण में लगा हुआ हूँ तो वहां भारत में बैठे मेरे मित्र कथाओ, आलेखों व् अन्य रचनायों को एकत्रित करने में लगे हुए है। यह सोच कर ही मन खुशी से झूम उठता है की शीघ्र ही भारत की एक अपनी विज्ञान कथा की साईट हिन्दी में भी होगी। आपका क्या विचार