कल्किआन अब मुख्यधारा की कहानिया भी प्रकाशित् करेगी

यहां बैठे बैठे मै यह सोच रहा था कि विज्ञान साहित्य की सबसे बडी त्रासदी यह है कि उसे अभी उसका मुकम्म्ल स्तर नही मिल पाया है। इस स्मस्या का करण ढूढने पाया कि इसका प्रमुख कारण विज्ञान कथाकारो व मुख्यधारा के कथाकारो के बीच संवाद कि कमी है. क्या इस संवाद कि कमी को पाटा जा सकता है? हां. लेकिन कैसे?

हमे एक रास्ता दिखा और वह रास्ता है विज्ञान कथाओ व् मुख्यधारा की कहानियों को एक मंच पर एक साथ लाया जाएयह प्रयास थोड़ा कठिन तो अवश्य है परन्तु दीर्घकालिक परिणामो को देखते हुए यह सबसे जरूरी प्रयास लगता हैमैंने इस विषय में कल्किआन हिन्दी के संपादक श्री विश्व मोहन जी से चर्चा की तो उन्हें भी मेरा सुझाव काफी पसंद आयामुझे याद है की यह उनका की दबाव था की मै कल्किआन का हिन्दी संस्करण भी निकल रहा हूँएक बार तो उन्होंने धमकी जैसी दे डाली थी -- ''अगर हिन्दी की साईट नही शुरू करोगे तो मै ज्यादा दिन तुम्हारा साथ नही दे पाउँगा।"

खैर यह तो मुझे भी पता है की वो साथ नही छोड़ने वाले, हाँ इतना ज़रूर था की मन में ये बात गई की मात्रभाषा के लिए भी कुछ करना हैखासकर जब मेरे भारत छोड़ने की तयारी शुरू हो गई तो मन में वो बात कचोटने लगीमैंने ठान लिया की भारत से विदा होने से पूर्व ही हिन्दी का कार्य आरम्भ कर दूंगामैंने तुंरत मित्रो से संपर्क साधा और कार्य शुरू

खैर बात कहाँ शुरू हुई थी और कहाँ गईतो बात ये थी की मुख्यधारा का साहित्य और विज्ञान साहित्य इन दोनों को करीब कैसे लाया जाएइसका एक कारण यह भी था की मै अब मुख्यधारा के साहित्य के ज्यादा नजदीक हूँ, वनस्पत विज्ञान साहित्य के...कारण की कई बार हिन्दी विज्ञान साहित्य कुछ कमजोर पड़ जाता हैलेकिन फिर इस स्थिति से पलायन भी तो नही किया जा सकताअतः मै इस नए प्रयास से साथ आपके सामने हूँयह सफल होगा या नही यह तो समय ही बताएगालेकिन मै जुटा रहूँगा इसका मुझे पूर्ण भरोसा हैमेरे पास तकनिकी क्षमता है, आर्थिक मजबूती है, साहित्यक रूचि है और सबसे ज़रूरी बात -- कुछ कर सकने की सनक हैहलाकि यहाँ कल्किआन में किसी भी तरह की राजनीती की आजादी नही है इस लिए कुछ लोगो को ये नागवार लगेगा की वो कल्किआन के अध्यक्ष या मंत्री नही है...लकिन हमे इस विद्रूप मानसिकता के बहार निकलना होगा और हिन्दी साहित्य, विशषकर विज्ञान साहित्य की राजनीती के चुंगल से निकाल कर रचनाशीलता के शिखर पर ले जाना होगा।

क्या मेरे लेखक बंधू, मित्र, दोस्त मेरे साथ हैं?

अपडेटः अभी अभी मैने फोन पर अपने अजीज मित्र से बात कि और वो हिन्दी सहित्य और विज्ञान सहित्य के घाल मेल के खिलाफ है. उनका मत है कि कल्किआन को पूर्ण रूप से विज्ञान साहित्य की साइट ही रहना चाहिये. अतः मै अपने शब्द वापस लेता हू. हिन्दी मुख्यधारा के लिये फिर कभी काम किया जयेगा. आप लोगो की प्रतिक्रिया की प्रतीक्ष रहेगी. हालाकिं इस बात से यह चर्चा भी शुरु हो सकती है कि क्या विज्ञान साहित्य और सामान्य साहित्य को अलग अलग रक्खा जाना चाहिये या नही?


Visit blogadda.com to discover Indian blogs