पुराण, इतिहास और विज्ञान: क्या है सत्य?

स्वप्निल द्वारा चिन्हित यह विषय पुराण, इतिहास और विज्ञान प्रेमियो के लिये रुचिकर तो है ही विज्ञान कथा प्रेमियो के लिये भी रुचिकर है। मै उस चर्चा को आगे बढ़ा रहा हूँ।

जैसा कि द्वारका नगरी की खोज की प्रक्रिया से पता लगता है कि आज राजनीतिज्ञो के लिये इतिहास भी उनकी शतरंज की बिसात पर एक मुहरा है। वास्तव में इतिहास भी ' वस्तुपरक सत्य' नहीं, वरन किसी देशकाल की घटनाओं का किसी इतिहासकार की दृष्टि के अनुसार वर्णन है, उसी का वर्णन अलग अलग इतिहासकार अलग अलग कर सकते हैं। विजेता के द्वारा लिखे गए इतिहास और विजित द्वारा लिखे गए इतिहास में जमीन और आसमान का अन्तर होता है। अंग्रेजो ने, अपने आक्रमण को ऐतिहासिक वैधता देने के लिये तो भारत में आर्यों को न केवल बाहरी घोषित किया वरन उऩ्हें आक्रमणकारी भी करार कर दिया, और जिअस झूठ क वे आजतक कुप्रचार कर रहे हैं।

प्राचीन भारत की इतिहास की परिभाषा कहीं अधिक मानवीय थी ! रामायण और महाभारत तात्कालीन घटनाओं का वह स्वरूप हैं जो मानव के लिये कल्याणकारी हैं, अर्थात यह एक आदर्शात्मक दृष्टि वाला इतिहास है।

पुराण के विषय में ठीक ही कहा है कि इसमें पौराणिक कथायें कल्पित कहानियां नहीं हैं। वे इतिहास ही हैं जोकि भिन्न-भिन्न देश, काल में भी प्रासंगिक बनी रहती हैं, क्योंकि  उनके मूल में सत्य सुरक्षित रहता है। वास्तव में उन कथाओं की अन्य कथाओं से विशिष्टता यह है कि उनकी व्याख्या देशकाल के अनुसार बदलने की क्षमता रखती है, वे एक तरह से सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक साहित्य की कोटि में‌ आती हैं।

विज्ञान जिस सत्य की खोज करता है वह भौतिक सत्य है और वह इसे पूरी निष्ठा से करता है। किन्तु विज्ञान की दृष्टि में उदारता नहीं है, क्योकि वह कहता है कि उसके सत्य के अतिरिक्त और कोई सत्य नहीं है (क्या इसमें फ़ंडामैंटलिज़म की बू नहीं आ रही है?)

आत्मा की परिभाषा ऊर्जा की परिभाषा से मिलती जुलती है; वास्तवमें छन्दोग्य उपनिषद (३.२.५) में ही है कि "तपेति ब्रह्म.”;  अर्थात चेतना का ऊर्जामय रूप ब्रह्म है ! माण्डूक्य (९) उपनिषद में यह भी लिखा है कि ,”अयं आत्मा  ब्रह्म.” - यह आत्मा ही ब्रह्म है। और आश्चर्य कि मुण्डक (१.१.८) में यह भी लिखा है,  "तपसा चीयते ब्रह्म, ततो अन्नमभि जायते, अन्नात् प्राण:. मन:, सत्यं, लोका: कर्मसु चामृतम्..” तप अर्थात 'हीट" से ब्रह्म फ़ैलता है (एक्स्पान्डिंग यूनिवर्स) , फ़िर पदार्थ की उत्पत्ति होती है, फ़िर प्राणवायु या जीवन, फ़िर मन और फ़िर सत्य की खोज और फ़िर अनेक ऐसे लोकों की, और फ़िर कर्मों के द्वारा सत् चित् आनन्द (इटर्नल ब्लिस)  की‌ खोज होती है। यह सब इस ब्रह्माण्ड के उद्भव तथा उसकी उत्पत्ति का वर्णन है जो वैज्ञानिक खोज के बहुत निकट है, यह सब ५००० -६००० वर्षों पहले कैसे लिख दिया उऩ्होने !! ऐसी दृष्टि को दिव्य ही कहना चाहिये। मैं अध्यात्म में चला गया  क्योकि असली  सत्य (सत्यस्य सत्यम) की पहचान तो अध्यात्म के पास ही है।