सैलामेंडर संबंधी समाचार पर डा श्याम गुप्त जी ने एक महत्वपूर्ण विषय उठाया है। उनके कथन से मै इस चिठ्ठा चर्चा को आगे बढा रहा हूँ।
"पुराणों की कथाओं के बारे में मूलतः तथाकथित लोग काल क्रम की बात करते हैं, वे मूल कथा के तथ्य भूल जाते हैं कि कथाकार मुख्यतः -- यदि वह इतिहास के चरित्र का पुनर्वर्णन नहीं कर रहा है तो, अन्यथा वह प्रामाणिक इतिहास की घटनायें एतिहासिक उपन्यास की भान्ति लिखता है न कि सामान्य उपन्यास की भातिं। फ़िर कल्पना कोई आसमान से नहीं टपकती, मानव मन की कल्पना उसके अनुभव, अर्थात इतिहास से ही उत्पन्न होती है एवम वास्तविक सत्य होती है -- हां अति रन्ज़ित होसकती है। अपने ही समय के पात्र, घटना, व काल का ही वर्णन करते हैं तो पुराणों में वर्णित पात्रों के काल उन्ही के काल क्यों नहीं होंगे। ये बहुत बडी भूल है कि पौराणिक कथायें कल्पित कहानियां हैं। नहीं वे इतिहास ही है जोकि भिन्न-भिन्न देश, काल के अनुसार बदल जाती हैं, परन्तु उनके मूल में सत्य सुरक्षित रहता है। जब आज का लेखक विग्यान को मिथक बनाकर अतिरन्ज़ित कल्पना-कथा लिखता है तो विग्यान के आविष्कार झूठे नहीं होजाते, सत्य, सत्य ही रहता है, यही बात पौराणिक कथाओं के लिये भी अक्षरसः सत्य है।"
द्वारका नगरी को सागर के भीतर से खोज निकाला गया है। इसी प्रकार के अन्य महत्वपूर्ण पुरातत्त्व-संबंधी कार्य सरकारों के आने-जाने से व्यधित होते रहे। एक राजनैतिक दल ने खोजकार्य प्रारंभ किया तो दूसरे ने रूकवा दिया। इसके साथ साथ विभिन्न शासकों ने इतिहास की खोज तथा व्याख्या अपने अपने हिसाब से की। जब मैने कहा कि इतिहास और पुराण को अलग अलग रखा जाये तो मेरा मन्तव्य था कि इससे पूर्व कि लोग पुराण को तर्क-कुतर्क (वह भी पर्याप्त ज्ञान के अभाव मे) में खीचें, उसे तब तक 'संक्रमण' से सुरक्षित ही रखा जाये।
अब कुछ प्रश्न। क्यों आत्मा की परिभाषा पश्चिम द्वारा दी गयी ऊर्जा की परिभाषा से मिलती सी है? कहाँ से आर्यभट्ट ने धरती की परिधि नाप ली थी? इसीलिये मैने पौराणिक कृतियों के पीछे 'विज्ञान' या 'कोरी कल्पना' की प्रेरणा की चर्चा की थी। क्यों है त्रिशंकु सरीखी कथाये जो "लैगरेगियन प्वाईंट" का सटीक विवरण देती हैं? कहाँ से उस काल के लेखको को इन वैज्ञानिक तथ्यों का ज्ञान हुआ?
दूसरा प्रश्न यह उठता है कि इस 'विज्ञान' या 'तकनीकों' (शक्ति, आयुधों) तक केवल कुछ लोगों ही पहुँच क्यों थी? क्या यह संभव है कि किसी आधुनिक परग्रही सभ्यता के लोग प्रथ्वी पर आये हो; यहाँ अपने युद्ध लडे? ईश्वर मे विश्वास निजी तथा आस्था का विषय है अत: मै उसे निरर्थक तक-वितर्क के घेरे मे नहीं लाऊँगा। लेकिन जिस तरह गौतम बुद्ध ईश्वर बन गये, रजनीश "ओशो" भगवान बन गये, क्या यह संभव नही कि उस काल के लोगों (सामन्य जन) के लिये यह पारलौकिक यात्री देवता बन गये? यह एक लम्बी तथा कभी न खत्म होने वाली चर्चा है। लेकिन ऐतिहासिक परिपेक्ष मे घटनाओं को रख कर, विश्लेषण आवश्यक है जिससे सत्य की सथापना हो सके।
हमारे समाज की एक बडी समस्या है वह मध्यवर्ग जो विमूढ़, भ्रमित है -- नौकरी के लिये उसे अंग्रेजी शिक्षा चाहिये क्योकि अंग्रेज यही नींव डाल कर गये हैं। गांधी के स्वराज्य की बजाये हमने नेहरू का रूस प्रेरित 'समाजवाद' अपना लिया। गांव समृध होने के बजाये भारी उद्योग आधुनिक भारत के मंदिर बन गये। गरीब और गरीब, अमीर और अमीर होता चला गया। शिक्षा ज्ञान अर्जन का नही नौकरी पाने का माध्यम बन गयी।
कहते हैं कि भारतीयों का जी.के. बहुत अच्छा होता है (सामान्य ज्ञान भी नही कहते, जी के कहते हैं)। क्या सच मे? पूछें ज़रा अपने १५ वर्षीय से 'अमरीका / ब्रीटेन की राजधानी' -- तुरंत जवाब मिलेगा। अब पूछें मंगोलिया की राजधानी -- सन्नाटा। घोर सन्नाटा। कहाँ है समान्य ज्ञान? वह सामान्य ज्ञान नही -- पश्चिम ज्ञान है। और करेला वह भी नीम चढा। इस पश्चिमी करण को हम आधुनीकरण कह देते हैं। आधुनीकरण मैला उठाने वाली टोकरी से हट कर फलश वाले शौचालय हैं न कि अंकल आंटी और हिंगलिश। हिंदी लिखते लिखते अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग तो वैसा ही हो गया है जैसे खाना खाते खाते डकार ले लेना -- एक आध तो आ ही जाते हैं।
भाषा का उद्देश्य है विचारों का संप्रेषण अब इसमे 'ईलीट' या 'सुपीरियर' (जानबूझ कर प्रयोग किया गया है) महसूस करने वाली बात कहाँ से आ गयी? मै अमरीका के 'बार्डर्स' पुस्तक भंडार मे किताबे ढूंढ रहा था। मुझे जर्मन सीखनी थी और मेरी पत्नी को हिंदी। शर्मसार हो गया जब देखा कि 'भाषा' खंड मे चीनी जापानी सीखने की तो ढेरो किताबें है लेकिन हिंदी के एक भी नही। क्यों? क्योंकि जिनको आती है वे शर्म के मारे बोलते नहीं और बोलते भी है तो मिलावटी होती है। और अंग्रेजी के सब पंडित -- तो कोई भला क्यों सीखे हिदी?
भारत के एक जिले के बराबर के देश की भाषा हमारी हिंदी पर भारी पड रही है। पिछ्ले दिनों एक दक्षिण भारतीय मित्र से बात हो रही थी -- अब पता नही वे लोग खुद को दक्षिण भारतीय क्यों कहते है। मैने किसी उडिया को पूर्वी भारतीय या राजस्थानी को पश्चिम भारतीय या भोपाली को मध्य भारतीय कहते नही सुना।
खैर उनसे चर्चा का विषय था कि भारत की बौधिक्ता के विभाजन की एक जड भाषा भी है -- क्यों न एक सार्वजनिक भाषा हो जिससे सूचना का आदान प्रदान आसानी से हो सके और ज्ञान का संयोजन -- हिंदी वैसे भी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। तो उनका कहना था कि नहीं हम यहाँ हिंदी नही बोलते। वहाँ से राजनैतिक दलों ने हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने से इन्कार कर दिया। मत तो बटोरने ही है तो कोई धर्म, कोई जाति कोई भाषा के नाम पर बटोर रहा है। खैर, उनका कहना था कि हिंदी सीखने की क्या आवश्यकता? यदि साहित्य पढना हो तो भाषान्तर कर लें। यह पूछने पर कि शेष दुनिया से संपर्क के लिया क्या है उनके पास -- जवाब आया 'थैन्स टू ईन्गलिश, विच इज़ लिन्किन्ग अस टू द वर्ड" (अंग्रेजी का आभार कम से कम उसने हमे बाहरी दुनिया से जोडे रखा है)। तो साहब, अंग्रेजी सीखने मे कोई आपत्ति, कोई राजनीति, कोई क्षेत्रियता नही। दुनिया से जुडने के लिये तैयार लेकिन भारत को एक सूत्र मे बांधने से गुरेज। यह तो भला हो कि हिंदी की रक्षार्थ कुछ कार्य हुआ वर्ना मध्य पूर्व से आये आक्रांताओं ने तो फारसी स्थापित कर ही दी थी। (इस विषय पर विश्व मोहन तिवारी जी से लेख का आग्रह करूंगा)।
खैर, इस हीन भावना, इस अंग्रेजी के प्रति उच्चता का बोध हमारे ही भविष्य के लिये घातक है। कहीं चर्चा पढी थी कि भाषा का सरलीकरण होना चाहिये। वहाँ भ्रम की स्थिति है -- प्रश्न भाषा के सरलीकरण का है या विषय के? फिर, विषयों के आधार पर शब्दों का खेल भी होता है। यदि हम खाने से पूर्व हाथ धोने की बात करे तो यह अत्यंत सरल भाषा मे कहा जाना चाहिये -- ग्रहण करने वाला बच्चा भी हो सकता है। लेकिन अब यदि मै अंभियंता वर्ग के लिये "इमबेडेड सिस्टम" पर एक श्वेत पत्र लिखूं तो उसमे भाषा या विषय का सरलीकरण व्यर्थ है। बल्कि सरलीकरण शायद उसे अपाठ्य बना दे। अनावश्यक सरलीकरण समय का दुरूपयोग भी है। और फिर वह सबके पढने के लिये है भी तो नही!
हाँ यदि हमारा उद्देश्य ही आम पाठक, जिसमे बच्चे भी शामिल हैं, को उस विषय से परिचित कराना हो तो अलग बात हैं; वहाँ पर लेखक को पाठक के ज्ञान के स्तर का ध्यान भी रखना पडेगा। मजे की बात यह भी है कि जो लोग हिंदी सरलीकरण की बात करते हैं, उन्हे जब खुद अंग्रेजी मे कुछ लिखना होता है तो शब्दकोश खोल कर नये से नये शब्द प्रयोग करके यह दिखाने की चेष्ठा करते है कि देखो हमे कितना आता है।
लेखन अभिव्यक्ति की कला है -- जितनी उन्मुक्त, उतनी सुन्दर।
यह चिठ्ठा अब लंबा हो चला है। बातें बहुत सी हैं लेकिन शेष फिर कभी। यहाँ जर्मनी मे कडाके की सर्दी है और भोजन का समय हो चला है -- शेष अगले सप्ताह। बशर्ते यदि पाठक इस विषय पर चर्चा चाहते हों।
-- स्वप्निल भारतीय
(संस्थापक, प्रकाशक तथा प्रमुख सम्पादक)
नोट: यह एक चिठ्ठा है न कि आलेख। चिठ्ठा के कई रूप हो सकते हैं (कुछ लोगों को स्थापित परिभाषा उपलब्ध होने के बावजूद भी 'पहिये की फिर से खोज' की तर्ज पर हर बात की परिभाषा खोज कर दूसरों का समय नष्ट करने की आदत सी होती है) -- यहाँ यह अपने मूल रूप -- विचारों का आदान प्रदान -- मे उपस्थित है। जैसे हम साथ बैठ कर अनौपचारिक चर्चा कर लेते है -- आध्यात्म से ले कर आदमी तक -- उसी तरह यह एक अनौपचारिक संवाद भर है। दो आवश्यक बातें:
१. मै विचार मे नही, तथ्य मे आस्था रखता हूँ। नये तथ्यों के आगमन और पुराने तथ्यों के खंडन से आस्था मे परिवर्तन संभव है। अत: इन विचारो को मेरा जीवन दर्शन न माने।
२. कल्किआन पर विचारो की अभिवयक्ति की सवतंत्रता (दूसरो के प्रति आदर के दायरे मे) है। लेकिन यह आवश्यक नही कि सम्पादक मंडल के सभी सद्स्य उस विचार का अनुमोदन करें या उससे सहमति रखे। इस चिठ्ठे मे व्यक्त विचार मेरे निज हैं और उन्हे अन्य सम्पादकों, लेखको के विचारों से संबद्ध न किया जाये।
३. व्यक्तिगत विचारों के लिये मेरी वेब-साईट देखें।