हवाई-जहाज़ से उतर कर पहला कदम बाहर रखते ही एक हल्की सी बौछार ने चेहरे को भिगो दिया। दिल्ली से चले थे तो वहाँ भी बहुत इंतज़ार करने के बाद बारिश ने अपनी आहट दे दी थी, लेकिन इस बौछार में गोवा की गंध थी। यह गंध ही हमें एक ही मौसम के अलग-अलग रंगों में नहाने का अवसर देती है। शहर की गंध एक ही मौसम का रंग बदल देती है। बाहर निकले। सितादे-दे-गोवा के कुछ लोग हमारे इंतज़ार में तख़्तियाँ और छाते लिए खड़े थे। खुले हुए छाते के नीचे सिमटते हुए हम कुछ हक़ीक़त और कुछ फ़सानों में भीग रहे थे। होटल की कोच कुछ ही पलों के बाद हरियाली और पानी के बीच तेज़ी से वैंगुइम बीच की ओर भागी जा रही थी। यहीं और इसी बीच पर था होटल।