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प्रताप सहगल

बारिशों में गोवा

हवाई-जहाज़ से उतर कर पहला कदम बाहर रखते ही एक हल्की सी बौछार ने चेहरे को भिगो दिया। दिल्ली से चले थे तो वहाँ भी बहुत इंतज़ार करने के बाद बारिश ने अपनी आहट दे दी थी, लेकिन इस बौछार में गोवा की गंध थी। यह गंध ही हमें एक ही मौसम के अलग-अलग रंगों में नहाने का अवसर देती है। शहर की गंध एक ही मौसम का रंग बदल देती है। बाहर निकले। सितादे-दे-गोवा के कुछ लोग हमारे इंतज़ार में तख़्तियाँ और छाते लिए खड़े थे। खुले हुए छाते के नीचे सिमटते हुए हम कुछ हक़ीक़त और कुछ फ़सानों में भीग रहे थे। होटल की कोच कुछ ही पलों के बाद हरियाली और पानी के बीच तेज़ी से वैंगुइम बीच की ओर भागी जा रही थी। यहीं और इसी बीच पर था होटल।

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पत्थर, पानी और जंगल प्रताप सहगल

पत्थर, पानी और जंगल                                      प्रताप सहगल 
28।2।2009

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वह आदमी

महेश डलहौजी पहली बार आया था. अपनी शादी के तीस साल बाद. इससे पहले वह कई  हिल-स्टेशन घूम चुका था, लेकिन डलहौजी के बारे में उसके मन में एक उजाड़ हिल-स्टेशन की छवि बनी हुए थी. इसलिए डलहौजी आना वह बार-बार टालता रहा.

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