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डा रमेशदत्त शर्मा

प्रयोगशालीय प्राण

लिआना : 2 सितम्बर 2120 ई.
"नहीं, नहीं, नहीं, हैरिस मुझे प्यार नहीं करता। बड़े भ्रम पाल लिए हैं मैंने हैरिस को लेकर। आज दो महीने बाद मेरी उससे भैंट हुई। मैं एंटार्कटिका चली गई थी। डाक्टर का ख्याल था कि मुझे इस तमाम भीड़ और शोर-शराबे से दूर- बहुत दूर कहीं एकान्त में चले जाना चाहिए। मगर एंटार्कटिका में भी अब कहां धरा है एकान्त। भीड़ से ऊबे हुए लोगों ने ही वहां कैसी खासी भीड़ जमा कर रखी है। उपग्रह से प्रसारित होने वाले टेलीवीजन कार्यक्रम वहां भी इस दुनिया की खबरें पहुंचाते रहते हैं। दो पल को भी नहीं लगा कि मैं किसी ऐसे शान्त स्थान में रह रही हूं, जहां न अन्तरिक्ष युद्ध की भयावक आशंका की प्रेत छाया है और न कम्प्यूटरों का घेराव। शायद हैरिस मेरे साथ होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। पर उसे मेरी पीड़ा समझने की फुर्सत ही कब है। जब देखो तब अपनी टिश्यू कल्चर लैबोरेटरी की चर्चा लेकर बैठ जाएगा। सोचती थी दो महीने बाद उससे मिल रही हूं। देखते ही मुझे बांहों में भर लेगा। चूम-चूम कर बेहाल कर देगा। बार-बार पूछेगा, "क्यों चली गईं थीं तुम। तुम्हारी तबियत अब कैसी है। तुम्हारी याद में पता है किस तरह काटे हैं ये दो महीने।"

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by Dr. Radut.