राजेश्वर वशिष्ठ

श्री सूर्य

आसमान ढका है बादलों के शामियाने से
जिसे ठीक से धो नहीं पाया मुहल्ले का धोबी
दिखाई दे रहे हैं काले-सलेटी धब्बे
सिलवटें और जँग लगी इस्त्री के दाग
कभी-कभी अकेले बूढ़े-सा सूरज
झाँक लेता है शामियाने के बाहर
खँखार कर गला फिर कर लेता है
उदास चेहरा सिलवटों के भीतर
कई कोशिशों के बाद
शाम तक थक जाता है लाचार

मृत्यु

मृत्यु तुम आना
जैसे आती है पवन गुलाब के बग़ीचे में
दबे पांव ओस की चमकती आंखों से बचते-बचाते
सहलाना कुछ देर स्नेह से सभी को
दुलारना उन्हें भी जिनकी अभी तक मुरझाई नहीं है एक भी पंखुड़ी
तुम्हारा स्पर्श खोलता है जीवन के नित नए अर्थ

मृत्यु तुम आना
जैसे आते हैं स्वप्न भोर की छाया में
तिलिस्म में क़ैद राजकुमारी को

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