डा श्याम गुप्त

कृष्ण लीला: वैज्ञानिक व सामाजिक तत्वार्थ...

(कुण्डली छंद )

१. राक्षस नाश.....
विविध रूप बहुभाव युत, असुर किये संहार,
यह लीला कर 'श्याम ने, समझाया यह सार।
समझाया यह सार,  नगर गृह वर्ग ग्राम में,
अनाचार पल्लवित,प्रकृति शासन जन मन में।
मिटे अनैतिकता,  अक्रियता,  फ़ैली बहु विधि,
जन जन मन हर्षाय,विकास नित होय विविध विधि।।

कन्या कुमारी पर...

सागर की उत्ताल तरंगो, लहर लहर कर लहराती हो,
भारत मां की चरण-वन्दना में मधुरिम स्वर में गाती हो।

ईश्वर, विज्ञान व धर्म

जब् ईश्वर नहीं था,
कितना सादा था जीवन,
रहा करते थे हम-
पेडों पर, पर्वतों पर, गुफ़ाओं में;
कुछ उन्नत लोग
झौंपडी भी बना लिया करते थे।

जीवन की रचना: कृत्रिम जीवन, कोशिका की प्रयोगशाला में उत्पत्ति

अमेरिकी जीन वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में जीवन की उत्पत्ति की सफलता, मानव की सफलताओं की कथा में एक और मील का पत्थर है।

प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा

प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली अपने समय में अपने समयानुसार अति उन्नत अवस्था में थी। भारतीय चिकित्सा के  मूलतः तीन अनुशासन थे --

भविष्य का महा-मानव (जीवन, जीव व मानव: भाग-३)

यदि जीव-सृष्टि का  क्रमिक विकास ही सत्य है तो प्रश्न उठता है कि मानव के बाद क्या? व कौन? यद्यपि अध्यात्म व वैदिक विज्ञान जब यह कहता है कि मानव, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व है, जो धर्म अर्थ काम व मोक्ष –चारों पुरुषार्थ में सक्षम है, तो संकेत मिलता है कि मानव अन्तिम सोपान है; हां इससे आगे युगों--सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग व कल्प, मन्वन्तर आदि—के वर्णन से स्वयम मानव के ही पुनः पुनः सदगुणों, विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि में अधिकाधिक श्रेष्ठ होते जाने के विकास-क्रम का भी संकेत प्राप्त होता है, अविकसित मानव से मानव से महामानव तक।

मानव - भाग २

प्रस्तुत प्रलेख के पिछले अंक भाग १. में हमने शीर्षक विषय पर आधुनिक वैज्ञानिक मत प्रस्तुत किया था। इस भाग में हम उपर्युक्त विषय पर वैदिक व भारतीय दर्शन सम्मत मत प्रस्तुत करेंगे।

जीवन, जीव व मानव: भाग १- पाश्चात्य दर्शन व आधुनिक वैज्ञानिक मत, डार्विन सिद्धान्त.

सृष्टि- क्रम के क्रमिक आलेख के इस  द्वितीय क्रम 'जीवन, जीव व मानव'  में हम,  --जीवन कैसे आरंभ हुआ, जीव में गति, आकार वर्धन व सन्तति वर्धन (रीप्रोडक्शन ), लिंग भिन्नता भाव, सन्तति वर्धन की लिंगीय स्वतः चालित प्रणाली (सेक्सुअल ओटोमेशन फ़ोर रीप्रोडक्शन ) कैसे प्रारंभ हुआ एवम मानव का विकास क्रम तथा भविष्य का मानव –विषयों पर, आधुनिक वैज्ञानिक मत, पाश्चात्य दर्शन व भारतीय वैदिक विज्ञान सम्मत विचारों से, निम्न तीन प्रलेखों द्वारा अवगत करायेंगे :

क्या विज्ञान ही ईश्वर है?

आज रविवार है, रेस्ट हाउस की खिड़की से के सामने फैले हुए इस पर्वतीय प्रदेश के छोटे से कस्बे में आस पास के सभी गाँवों के लिए एकमात्र यही बाज़ार है। यूं तो प्रतिदिन ही यहाँ भीड़-भाड़ रहती है परन्तु आज शायद कोई मेला लगा हुआ है,कोई पर्व हो सकता है।

भारत माता

भाल रचे  कुंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाये।
राष्ट्र के गीत बसें मन में, उर राष्ट्र के ज्ञान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पाँव सदा, नैनों में विशाल गगन लहराए।
गंगा यमुना शुचि नदियों ने, मणि मुक्ता हार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश जहां,  हरियाली जिसकी मन भाये ।
भारत माँ शुभ्र ज्योत्सनामय, सब जग के मन को हरषाये।

हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन  भाया।
उगता रवि जब इस आँगन में, लगता सोना है बिखराया।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सज़ी, दो सुन्दर बाहों युत काया।
वो पुरुष पुरातन विन्ध्याचल, कटि- मेखला बना हरषाया ।
कण कण में शूर वीर बसते, नस नस में शौर्य भाव छाया।
हर तृण ने इसकी हवाओं के, शूरों का परचम लहराया ।

इस ओर उठाये आँख कोई, वह शीश न फिर उठ पाता है।
वह दृष्टि न फिरसे देख सके, जो इस पर जो दृष्टि गढ़ाता है ।
यह  भारत प्रेम -पुजारी है, जग हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व शान्ति हित के नायक, यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान ध्वजा, नित नित फहराता जाता है।

इतिहास बसे अनुभव संबल, मेधा बल  वेद ऋचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे, चल दिया पुनः नव राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर, विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण, फैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें, इस देश की कला कथाओं में।
ललचाते देव,  मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में।

--डा श्याम गुप्त

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