Jump to Navigation

निर्मला कपिला

संजीवनी

जैसे ही मानवी आफिस मे आकर बैठी ,उसकी नज़र अपनी टेबल पर पडी डाक पर टिक गयी। डाक प्रतिदिन उसके आने से पहले ही उसकी टेबल पर पहुँच जाती थीपर वो बाकी आवश्यक काम निपटाने के बाद ही डाक देखती थी। आज बरबस ही उसकी नज़र एक सफेद लिफाफे पर टिक गयी जो सब से उपर पडा था।उसके एक कोने पर भेजने वाले के स्थान पर वी लिखा था। पहचान गयी,पत्र विकल्प का था। क्या लिखा होगा इस पत्र मे?वो सोच मे पड गयी। कभी पत्र लिखता नहीं है । टेलीफोन पर बात कर लेता है। अब तो चार महीने से न टेलीफोन किया और न ही घर आया । पीछली बार भी एक दिन के लिये आया था और बहस कर चला गया। शायद मुझ पर रहम खाने आया था। सुधाँशू की मौत के बाद अकेली जो हो गयी हूँण ! मुझ से नौकरी छुडवा कर साथ चलने के लिये कह रहा था। हुँ... ! महज औपचारिकता... ! जब मुझे मान सम्मान नहीं दे सकता, मेरी हर बात उसे बुरी लगती है... तो फिर साथ रखने की औपचारिकता कैसी?  जैसे ही उसने लिफाफा खोला उस मे से एक और लिफाफा निकला जिस पर लिखा था कि इसे घर जा कर फुरसत मे पढें।

रचना: 

चाँद और फिज़ा

फिज़ा अब बस करो
क्यों पीट रही हो लकीर
तेरी लुट चुकी है तकदीर
बेकार है हर तदबीर
क्या नहीं देखी थी
अखबार मे वो तस्वीर
जो भेजी थी चँद्र्यान ने
उसने ये भी बताया था
कि चाँद के सीने में
धडकता हुआ दिल नहीं है
वहाँ पथरीली चट्टाने है
और उसकी आँख मे कभी
जो पानी हुआ करता था
वो अब मर चुका है
उसी कि तलाश मे है चन्द्र्यान
उसने ये भी बताया था
चाँद अपनी सीमा के
अभेद्य सन्नाटे मे है
वो तो अपनी बाहरी
चमक दमक से
दुनिया को लुभाता रहा है
कभी मोहन बन कर
कभी मोहम्म्द बन कर
भरमाता रहा है
और उसकी सीमा
इतनी मजबूत है
कि कोई फिज़ा उसे
भेद नहीं सकती
अब सब्र कर
छोड चाँद छूने की जिद
इतना ही काफी है
तेरे लिये कि
तू सबक बन गयी है
लोगों के लिये
अब कभी कोई फिजा
किसी चाँद को पाने
उसकी सीमा पर
जाने से पहले घबरायेगी
चली भी गयी
तो तेरी मौत मर जायेगी

-- निर्मला कपिला

मंगल

भेजी हैं
नासा ने
मंगल से
कुछ तस्वीरें,
कहा
मंगल पर कभी
हुया करती थी
नहरें,

शायद कभी टकराया था
केतू कोई
और कर दिया था
मंगल के दिल पर छेद्

मगर मैं जानती थी
बहुत पहले
सुना भी था कि मंगल का
संबन्ध तुम से था
और मेरा वीनस [शुक्र] से

मुझे पता है
वो नहर मेरे
आँसूओँ का समुद्र था
जो तुम्हारी  की
निर्दयता पर
मैने ने बहाये थे
वो केतू और कोई नहीं
मेरी आहों का
धूम केतू था
जिसने तुम पर बरसाये

तमाम उम्र आँसू
मगर तोड सकी न
तेरा गरूर
और सूख गया
वो दरिया भी
ज्यों ज्यों जली मेरे
जज़्बातों की अर्थ
शाप दिया था मैने
नहीं पनपेगा
तुझ पर जीवन
मेरे बाद
और आज भी तू
पत्थर ही है
केवल पत्थर की चट्टान

-- निर्मला कपिला

मनुष्य जब चाँद पर जायेगा

मनुष्य जब चाँद पर जायेगा
मनुष्य चाँद पर रहने जायेगा?
धरती को सहेज पाया नहीं
चाँद पर क्या गुल खिलायेगा?

ऐसा नहीं कि मुझे चाँद से
इश्क नही
मगर सच कहने में भी
हिचक नहीं कि
जब मनुष्य चाँद पर
नयी दुनिया आबाद करेगा
तब इसं अंधी दौड मे
धरती को बर्बाद करेगा
नंगे भूखों की सीढी बना

Subscribe to RSS - निर्मला कपिला


Main menu 2

by Dr. Radut.