इस दुनिया में अनेकों ऐसी चीज़ें हैं, जिनकी तरफ हम खिंचते हैं। जैसे फिल्म, टेलीविजन, मोबाइल...। दूसरी तरफ ऐसी भी चीज़ें हैं जिनसे हम दूर भागने की कोशिश करते हैं। जैसे कोर्स की किताबें, आफिस का काम, थाना पुलिस वगैरा। आज से दस पन्द्रह साल पहले बच्चे कोर्स की किताबों के बीच कामिक्स छुपाकर पढ़ा करते थे। आज के बच्चे मोबाइल या कम्प्यूटर गेम खेलने में बिजी रहते हैं। और ये सभी काम अभिभावकों से बचकर होते हैं। दूसरी तरफ अभिभावकों की लाख कोशिशों के बावजूद यही बच्चे विज्ञान और गणित के फार्मूले याद करने में नाकों चने चबा डालते हैं। लाखों में गिने चुने ही टापर्स हो पाते हैं। कभी हमारा देश विज्ञान व गणित के क्षेत्र में अग्रणी था। यहाँ का पूरा प्राचीन अध्यात्म गणितीय गणनाओं पर आधारित है। लेकिन आज वैज्ञानिक जागरूकता व लोकप्रियता देश में लगातार कम हो रही है। जबकि वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल हद से ज्यादा बढ़ा है।
आज हमारे देश के सामने अनेकों चुनौतियां हैं। गरीबी उन्मोलन, बढ़ती जनसंख्या की ज़रूरतों की पूर्ति, सब के लिए स्वास्थ्य और साथ में प्रदूशण, ग्लोबल वार्मिंग जैसी विश्वव्याप्त समस्याओं से जूझना। इन सब से उबरने के लिए अच्छी योजनाओं के साथ नित नयी तकनीकों के विकास की अत्यन्त आवश्यक्ता है। और यह सब केवल एक ही तरीके से संभव हो सकता है। विज्ञान को अपने जीवन व देश के परिमंडल में उसी तरह शामिल कर लिया जाये जैसे हमने धर्म को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया हुआ है। लेकिन इस में सबसे बड़ी अड़चन ये है कि बचपन से ही विज्ञान व गणित को हमारे सामने हव्वा बनाकर खड़ा कर दिया जाता है। कुछ हद तक इसमें देश की शिक्षा व्यवस्था भी जिम्मेदार है जिसमें प्रैक्टिल ज्ञान की बजाय थ्योरेटिकल ज्ञान पर ज्यादा जोर दिया जाता है। ऐसे में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना स्वयं अपने में एक बड़ी चुनौती है।
विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में ऐसी विधाएं उपयोगी हो सकती हैं, जो आम जन को आकषिZत करती हैं। जैसे फिल्में, सीरियल, किस्से कहानियां, कार्टून, कामिक्स, मोबाइल व कम्प्यूटर गेम इत्यादि। इन्हीं में से अत्यन्त लोकप्रिय विधा है विज्ञान कथा। और उपरोक्त सभी विधाएं इससे किसी न किसी रूप में जुड़ती हैं। विज्ञान को लोकप्रिय माध्यमों से जोड़कर उसकी सक्रियता बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करती है विज्ञान कथा। अर्थात विज्ञान कथा ऐसा बल उत्पन्न करती है जो आकर्षण व प्रतिकर्षण के दो पूर्णत: विपरीत ध्रुवों को परस्पर जोड़ देता है।
इसके अतिरिक्त विज्ञान कथा कुछ और उददेश्यों की भी पूर्ति करती है जो इस प्रकार हैं:
भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति की झलक देखना, वैज्ञानिक प्रगति के सामाजिक प्रभाव का अवलोकन, वैज्ञानिक प्रगति की सही दिशा निर्धारण करना ताकि विज्ञान मानव जाति के लाभ के लिए हो न कि विनाश के लिए। किन्तु किसी भी विज्ञान कथा की पहली शर्त है, उसका रोचक होना। अगर इसमें भी विज्ञान का शुष्क वर्णन कर दिया जाये तो कोर्स की किताबों और विज्ञान कथा में कोई फर्क नहीं रह जायेगा। किसी भी कथा को रोचक बनाने के लिए उसमें कुछ फ्लेवर्स मिलाये जाते हैं। जिनमें नौ रसों (श्रंगार, वीर, हास्य, रौद्र,.....इत्यादि) का उपयुक्त मिश्रण, कहानी का कसा हुआ उतार चढ़ाव, पात्रों व माहौल का चुनाव इत्यादि शामिल हैं। विज्ञान कथा को भी रोचक बनाने के लिए इन फ्लेवर्स का इस्तेमाल होना आवश्यक है। इसके साथ ही प्राचीन कथाओं, लोक कथाओं एवं धार्मिक मान्यताओं के रंग शामिल करने पर इन कथाओं में चार चांद लग सकता है।
विज्ञान फंतासी उन सभी रूपों में लिखी जा सकती है जो लोगों के बीच लोकप्रिय हैं, जैसे कि लघु कथा, उपन्यास, नाटक, कामिक्स, झांकी, टी.वी. धारावाहिक स्क्रिप्ट, फिल्म स्क्रिप्ट, कविता इत्यादि कोई भी विधा विज्ञान कथा का प्रतिनिधित्व कर सकती है। कोई विज्ञान कथा सामाजिक हो सकती है, सस्पेंस, हारर या जासूसी हो सकती है या फिर पूर्णत: हास्य हो सकती है। जरूरत है बस उसमें वैज्ञानिक तथ्य खूबसूरती व रोचकता के साथ शामिल करने की। भारतीय परिवेश में ऐसी कथाएं लिखने के लिए विज्ञान विशेषज्ञों, अच्छे लेखकों का संयुक्त प्रयास अत्यन्त उपयोगी होगा। जो विज्ञान के स्थानीय अथवा ग्लोबल विषयों को लेते हुए देश में प्रचलित कहानियों से थीम लेते हुए अच्छी कहानियां तैयार कर सकते हैं। जिनका अंतिम टार्गेट है, रोचकता के साथ विज्ञान प्रचार के महत्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति।
विज्ञान कथा की अहमियत को देखते हुए इसे देश में प्रमोट करना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए कुछ उपयोगी सुझाव इस प्रकार हैं :
अच्छी विज्ञान कथाओं को स्कूलों के कोर्स में शामिल किया जाये
विज्ञान फंतासी ड्रामों को प्रोत्साहन दिया जाये
स्थानीय स्तर पर विज्ञान कथा आधारित प्रोडक्शन (सी.डी., डी.वी.डी. इत्यादि ) को प्रोत्साहन
विज्ञान आधारित सीरियलों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए
साइंस फिक्शन फिल्मों के निर्माण हेतु सुविधाओं व सिब्सडी की व्यवस्था हो। ताकि निर्माताओं में इसके प्रति रूझान पैदा किया जा सके। पिश्चम में प्राकृतिक प्रकोप, व मानवीय गलतियों से उत्पन्न भयानक भविष्य पर आधारित वोलकानो तथा द डे आफ्टर टूमारो ने तहलका मचाया है। इसमें पृकृति के अंधाधुंध दोहन से उत्पन्न प्राकृतिक त्रासदियों एवं उससे मानव के संघर्ष को रोचक ढंग से दिखाया गया है। प्रोत्साहन मिलने पर देश में भी ऐसी फिल्में बन सकती हैं।
विज्ञान कथा लेखन के लिए लेखकों को भी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसके लिए सरकारी अथवा अच्छे गैर सरकारी संस्थान पुरस्कार इत्यादि की व्यवस्था शुरू कर सकते हैं। चूंकि यह एक महत्वपूर्ण विज्ञान संचार का माध्यम है अत: विज्ञान संचार के जिम्मेदार संस्थानों जैसे एन.सी.एस.टी.सी. में विज्ञान कथा के लिए अलग विभाग होने चाहिए। और इसमें विज्ञान कथा लेखकों अथवा इससे सम्बिन्धत लोगों की नियुक्ति भी होनी चाहिए।
इसी के साथ स्कूल व कालेज अपने यहाँ विज्ञान कथा पर आधारित अच्छी फिल्में दिखाने की व्यवस्था कर सकते हैं।
इस तरह विज्ञान कथा देश में विज्ञान संचार के एक ऐसे माध्यम के रूप में विकसित होता दिखाई देता है जो अत्यन्त शक्तिशाली है और विज्ञान संचरण को एक आन्दोलन के रूप में परिवर्तित कर सकता है। यह बच्चों में विज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा करता है। यह भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति की झलक भी दिखाता है और विज्ञान के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का अवलोकन भी करता है। बस जरूरत है इसे योजनाबद्ध ढंग से विकसित व प्रमोट करने की। तथा इसे अन्य विधाओं अर्थात नाटक, सीरियल, फिल्म इत्यादि के साथ सम्बद्ध करने की।
-- ज़ीशान हैदर ज़ैदी