Jump to Navigation

विजय पाटनी

मैं आम आदमी हूँ ...

मैं आम आदमी हूँ ...
मै खरीद के आम ला नहीं सकता, शक्कर इतनी महंगी कि ख़ुशी में भी मीठा मँगा नहीं सकता।
मै भूखा रह नहीं सकता, और इस महंगाई में पेट भर खा नहीं सकता
अब तो बिना चेकिंग कराये में भगवान के दर भी जा नहीं सकता,
आरक्षण का डंक ऐसा कि, कितना भी पढ़ लूँ मैं अव्वल आ नहीं सकता।
घुटनों में रहता है दर्द हमेशा, पर मैं महंगे पेट्रोल का खर्चा भी उठा नहीं सकता
सपने रोज बुनता हूँ आशियाना बनाने के, लेकिन बढती ब्याज दरें, अब EMI चुका नहीं सकता।

रचनाकार: 
रचना: 

आज कुछ नहीं मेरे भाई आज सिर्फ महंगाई

लो फिर दाम बढ़ गए है, सुना है हमारे मनमोहन सिंह जी अर्थशास्त्री है, और वो व्यर्थ में कुछ करते नहीं है, सही है,  अब कसाब भाई जान का, और तिहाड़ में इतने बड़े बड़े VIP लोग बैठे है तो उनका रोज का खर्चा कहाँ  से चलेगा?
उन सब कि अच्छे से देख भाल तो हम लोगो को ही करनी है, आखिर वो हमारे जमाई है उनकी सेवा तो बनती है, अतिथि देवो भव: क्यों भूल रहे है हम?

रचनाकार: 
रचना: 
Subscribe to RSS - विजय पाटनी


Main menu 2

by Dr. Radut.