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हिन्दी में विज्ञान साहित्य की दशा और दिशा

हिन्दी में विज्ञान साहित्य की दशा, एक तो निश्चित ही हिन्दी की दशा पर निर्भर करती है और दूसरे, विज्ञान की दशा पर। भारत मे हिन्दी ही क्या सभी राष्ट्र्भाषाओ की दशा अन्ग्रेज़ी की प्रभुता के कारण दयनीय है। जब गरीब देश में नॊकरी के लिये अंग्रेज़ी अनिवार्य हो तब देशी भाषाएं कौन पढेगा! किन्तु भारत में अभी भी वह सन्तति सक्रिय है जिसने स्वतन्त्रता का सन्घर्ष लडा है , देखा है और उनमें देशप्रेम तथा स्वभाषा प्रेम जीवित है। इनमे साहित्यकार तथा अन्य कलाकार है जिनके बल पर भारतीय साहित्य तथा कला का विश्व मे सम्मान है। किन्तु अगले दस वर्षो मे ही देशी भाषाओ तथा साहित्य की द्शा अत्यन्त दयनीय हो जाएगी। मौलिक सोच ही दुर्लभ हो जाएगी। बस पश्चिम की नकल ही करते रहेंगे। यह समझने के लिये इतिहास पर तनिक दृष्टि डालना पडेगी।

अंग्रेज़ी की प्रभुता का सूत्रपात १८३५ में लार्ड मैकाले ने कर दिया था जिसमें उन्होने घोषणा की थी कि 'उन्होने चार वर्ष सारे भारत में भ्रमण किया है और उन्हे न तो कोई चोर मिला है और न कोई भिखारी। ऐसे देश पर राज्य तभी किया जा सकता है कि जब उसकी संस्कृति को हीन सिद्ध किया जाए। ऐसा करने के लिये इस देश की शिक्षा अन्ग्रेज़ी भाषा में की जाए। तब कहीं इस देश में ब्राउन साहब पैदा किये जा सकेंगे जिनकी सोच हमारे अनुकूल होगी।' मैकाले की घोषणा अकल्पनीय रूप से सिद्ध हुई। आज इस देश ने अंग्रेज़ी की दासता स्वतंत्ररूप से स्वीकार कर ली है, आज हम, विशेषकर हमारा अधिकांश युवावर्ग, खुशी खुशी डिस्को और शराब में मस्त है, युवा अपने माता पिता, दादा, दादी को आउट आफ़ डेट कहता है, महत्वाकांक्षी इतना है कि दफ़्तर में दिन में बारह घन्टे काम करता है। और उसका विवाह अक्सर तलाक में बदलता है, उसे अपनी मातृभाषा तथा संस्कृति से जो प्रेम होना चाहिये वह नहीं है, उसका जीवन मुख्यतया स्वकेन्द्रित है। वैसे यहां यह स्वीकारोक्ति उचित होगी कि इस व्यवहार में उसका दोष बहुत कम है, दोष शासन का सर्वाधिक है

अब विज्ञान की दशा देखें : यह तो माना कि भारत में विज्ञान के लगभग लुप्त होने के बाद अन्ग्रेज़ ही भारत मे विज्ञान लाए; किन्तु यह भी सच है कि उनकी विज्ञान की प्रगति में उनके द्वारा लूटी गई भारत की सम्पदा का बहुत बडा योगदान है। और यह भी सच है कि भारत में विज्ञान जिस वेग से आने लगा था, उन्होने उसमें अवरोध लगाए। उन्होने शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा रखा ऒर व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा को उचित स्थान नहीं दिया। जगदीश चन्द्र बोस को, वाइसराय की अनुशंसा के बावजूद्, बहुत मुश्किलों के बाद उनके कालेज में एक प्रयोग शाला दी गई थी ।वह भी १५ x१५ फ़ी ट की कोठरी थी जो मूत्रालय के साथ थी!! जगदीश चन्द्र बोस ने मारकोनी से बहुत पहले विद्युत चुम्बकीय तरंगों का उपयोग प्रयोगशाला में दर्शाया था किन्तु उनके स्थान पर मारकोनी को ही प्रथम आविष्कारक का श्रेय दिया गया ।

विज्ञान पढाने के लिये उपयुक्त शिक्षक भी कम ही मिलते हैं। अपनी मातृभाषा में नहीं वरन अंग्रेज़ी में विज्ञान पढने से और प्रयोग शालाएं पर्याप्त तथा उपयुक्त न होने से विज्ञान की पढाई उचित नहीं हो पाती। भारत में विज्ञान शिक्षा के पाठ्यक्रम में विज्ञान का इतिहास नहीं पढाया जाता। इन सबके फ़लस्वरूप विद्यार्थियों में विज्ञान पढ्ने की उमंग नहीं होती, वैज्ञानिक समझ और आविष्कार की सोच पैदा नहीं होती। इस कथन का क्या प्रमाण है?
 

भारत में विज्ञान के स्नातकों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। इज़राएल की आबादी भारत की मात्र ०६ प्रतिशत है। और जहां भारत को विग्यान में पिछ्ले १५० वर्षो में एक ही नोबेल पुरस्कार मिला है वहीं इज़राएल को पिछ्ले साठ वर्षो मे दस नोबेल पुरस्कार मिले हैं । इज़राएल १९४८ में इतिहास में पहली बार एक राष्ट्र बना। और उसने अपनी मूल भाषा हिब्रू को राष्ट्र्भाषा बनाया। शिक्षा का माध्यम बनाया। इसके पहले हिब्रू किसी भी देश की भाषा नहीं थी। किन्तु हिब्रू उनके धर्म की तथा ह्रदय की भाषा आदिकाल से रही थी। जापान भी ऎसा ही एक छोटा सा देश है किन्तु प्रॊद्योगिकी मे विश्व में प्रथम पन्क्ति में है, नोबेल पुरस्कारों में हम से बहुत आगे है, और वह भी शिक्षा जापानी भाषा में देता है। योरोप के सभी छोटे छोटे देश नोबेल पुरस्कारो में तथा विज्ञान प्रौद्योगिकी में हम से बहुत आगे हैं।और वे अपनी राष्ट्र्भाषाओ में शिक्षा देते हैं। इसका निष्कर्ष यही निकलता है कि मौलिक रचना, नवीनीकरण तथा आविष्कार करने के लिये अपने हृदय की भाषा अर्थात मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।विशाल चीन जो हमसे १९४७ तक विज्ञान में पिछ्डा था अब बहुत आगे हॆ , वहां भी शिक्षा का माध्यम चीनी भाषा ही हॆ।

डा शिव गोपाल मिश्र अपनी पुस्तक 'विज्ञान प्रवाह' के 'हिन्दी में विज्ञान कथा लेखन' अध्याय में लिखते हैं, "यह सच है कि हिन्दी की विज्ञान कथाओं में अभी वह शैली विकसित नहीं हो पाई जो शुद्ध साहित्यिक हिन्दी कथाओं में देखने को मिलती है कि हिन्दी की विज्ञान कथा कुछेक शीर्षकों के चारों ओर चक्कर लगाने वाली है। कुछ आलोचकों का कहना है कि विज्ञान कथाकार को पहले सिद्धह्स्तविज्ञानी होना चाहिये। खेद का विषय है कि लगभग सॊ वर्षों के लेखन के बावजूद हिन्दी में उत्तमोत्तम विज्ञान कथाओं का नितान्त अभाव है। मराठी में जिस एक स्वर में हम जयंत विष्णु नार्लिकर का नाम ले सकते हैं, उसी स्वर में हम हिन्दी के किसी एक कथाकार क नाम क्यों नहीं ले पाते? विज्ञान कथा के प्रसार प्रचार में कई पत्रिकाओं ने अहम भूमिका निभाई है : विज्ञान लोक, विज्ञान जगत, विज्ञान प्रगति, आविष्कार तथा विज्ञान। हिन्दुस्तान, धर्मयुग ने तथा बच्चों के लिये पराग, मेला। सारिका जैसी शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी विज्ञान कथा अंक छापा है। एक तरह से १९७५ से १९८५ के बीच ऐसे विज्ञान कथा अंकों की भरमार रही है।"

डा. मनोज पटैरिया कैल्किआन के अगस्त अंक में लिखते हैं, "हिन्दी विज्ञान साहित्य के क्षेत्र में विज्ञान कथा एक प्रभावशाली तथा रोचक विधा है, लेकिन आज भी वह उतनी विकसित नहीं हो पाई है, जितनी कि आज बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक हो जानी चाहिए थी।" किन्तु वे आगे लिखते हैं, "डा. रमेश दत्त शर्मा ने उच्च स्तरीय विज्ञान कथाएं लिखी हैं। प्रमुख हैं- प्रयोगशाला में उगते प्राण (ज्ञानोदया 1967), हरा मानव (1981), हंसोड़ जीन (विज्ञान प्रगति, 1984), आदि। यह प्राय: निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है कि हिन्दी में आधुनिक विज्ञान कथाएं, पश्चिमी अंग्रेजी विज्ञान कथाओं से प्रभावित रहीं, तथापि भारतीय पुराणों में वर्णित कथाओं का भी हिन्दी विज्ञान कथाओं पर प्रभाव नकारा नहीं जा सकता।" उपरोक्त उद्धरण दर्शाते हैं कि हिन्दी साहित्य में विज्ञान कथा की दशा उत्तम तो नहीं है और संतोषप्रद तो बिलकुल नहीं ।

ऐसा भी नहीं है कि किसी देशप्रेमी तथा मातृभाषा प्रेमी ने विज्ञान कथा की दशा और दिशा को समुन्नत करने के लिये अथक प्रयत्न न किये हों । जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है, अनेक लेखक और सम्पादक हैं जिन्होने मातृभाषाओं के लिये शासन द्वारा पैदा की गई विषम परिस्थिति में भी विज्ञान कथाएं लिखी हैं और सम्पादकों ने प्रकाशित की हैं। (इस लेख में भारतीय विज्ञान कथाकारों के नाम लिखने का स्थान नहीं है किन्तु कल्किओन् शीघ्र ही उनकी सूची प्रकाशित करेगा।) विज्ञान कथा पर संगोष्ठियां भी की गई हैं। इनमें एक संगोष्ठी अपनी विशेष उपलब्धि के कारण चर्चित रही है, वह है नवंबर ०९ में वाराणसी में आयोजित 'विज्ञान कथा पर राष्ट्रीय विमर्श', इसका आयोजन किया था 'राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद' की तरफ़ से उसके निदेशक डा. मनोज पटैरिया ने, और सफ़ल संयोजन किया था डा. अविन्द मिश्र ने। इसमें सक्रिय भाग लेने सारे भारत से विज्ञान कथा प्रेमी आए थे। यह अपने प्रकार की भारत में प्रथम संगोष्ठी है। इसमें पांच दिन विग्यान कथा के सभी पक्षों पर् खुलकर चर्चा हुई। और बाद में उन चर्चाओं के सार को 'दस्तावेज बनारस' के नाम से प्रस्तुत किया गया ताकि विज्ञान कथा पर कार्य करने वालों को पथ प्रदर्शन मिले। वह दस्तावेज अंग्रेजी कैल्किआन में उपलब्ध है। यदि पाठक चाहेंगे तब हम उसका अनुवाद हिन्दी में प्रस्तुत करेंगे । इसी संदर्भ में एक अद्वितीय संगोष्ठी ४ सितम्बर ०९ को दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में सम्पन्न हुई ( इसकी रिपोर्ट इसी अंक में प्रकाशित है।) भारत में विज्ञान कथा के विकास के लिये मुद्रित एवं इलॆक्ट्रोनिक दोनों माध्यमों में बहुत प्रयास किये जा रहे हैं। 'कैल्किओन.काम' की दोनों 'साइट' भी इसी दिशा में किये जा रहे प्रयास हैं।

यह तो स्पष्ट है कि भारत अंग्रेज़ी की गुलामी के कारण न केवल, अपनी भाषाओं में, विज्ञान प्रौद्योगिकी और नोबेल पुरस्करो में पिछडा है वरन आत्म सम्मान में और विश्व में सम्मान में भी पिछडा है। और तब इसमें क्या आश्चर्य कि वह विज्ञान साहित्य में भी पिछ्डा है।  किन्तु इसके अपवाद भी हैं। जैसा कि प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार डा, राजीव रंजन उपाध्याय ने कहा है कि भारत में जो विज्ञान में सशक्त हैं और जिन्हें अपनी भाषा से प्रेम है उन्होने विश्व स्तर का विज्ञान साहित्य रचा है। कैल्किओन में कार्य करने से मुझे आशा की किरण दिखाई दे रही है। यदि हम राष्ट्रभाषाओं से प्रेम रखते हुए विज्ञान में लगन से कार्य करते हुए कथा रचते रहें तब कोई कारण नहीं कि इस गौरवशाली देश में विश्व प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार पैदा होंगे।

-- विश्व मोहन तिवारी



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