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हिन्दी विज्ञान साहित्य: दशा और दिशा

भारत को एक ज्ञान राष्ट्र या नालेज नेशन कहा जाता है। विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक, साफ़्टवेयर इन्जीनीयर, डाक्टर इत्यादि भारतीय मूल के हैं। राज्य सभा मे मानव संसाधन मंत्री द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट् के अनुसार, अमेरिका के १२ प्रतिशत वैज्ञानिक, तथा ३८ प्रतिशत डाक्टर भारतीय हैं। नासा मे कार्यरत ३६ प्रतिशत या १० मे से ४ वैज्ञानिक भारतीय हैं। तकनीकी जगत की बात करें तो माईक्रोसाफ़्ट् (Microsoft) (मै इस कम्पनी का बिल्कुल भी समर्थन नही करता हूँ) के ३४%, आई.बी.एम. (IBM) के २८%, इन्टेल (Intel) के १७% और ज़ीराक्स (Xerox) के १३% कर्मचारी भारतीय है। यह एक उत्साहवर्धक आंकडा है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस बुधिजीवी वर्ग का भारत के साहित्य क्या कोई प्रभाव पडा है? साहित्य की वह कौन सी विधा है जो इस वर्ग के कार्य श्रेत्र से संबद्ध है, और उस विधा की क्या स्थिति है?

बगैर विस्तृत शोध किये यह तय कर पाना संभव न होगा कि इस वर्ग का साहित्य क्या है। पर यह तो देखा ही जा सकता है कि इस वर्ग का साहित्य की उस शाखा/विधा पर कोई प्रभाव पडा है या नही जो इस वर्ग के कार्यक्षेत्र के सबसे नज़दीक मानी जाती है। मेरे अनुसार यह विधा है विज्ञान सहित्य। लेकिन भारत जैसे विशाल राष्ट्र मे अनेकोनेक संस्कृतियां है, बहुतेरी भाषायें है। हिन्दी भारत मे सबसे ज्यादा तथा विश्व मे दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। अत: हिन्दी मे विज्ञान साहित्य की स्थिति का आकलन आवश्यक है। इस चर्चा के दो पहलू हैं - दशा और दिशा। इस लेख मे हम हिन्दी विज्ञान साहित्य कि दशा तथा दिशा जानने का प्रयास करेंगे।

समाज और विज्ञान
किसी भी किताब की दुकान पर चले जाईये। हिन्दी की कितनी विज्ञान आधारित पत्रिकायें, पुस्तकें दिख जायेंगी जरा गिन कर बताईये? हम यहां विज्ञान प्रगति या अविष्कार सरीखी विज्ञान पत्रिकाओं‌ की बात नही कर रहे हैं, हम यहाँ शुद्ध वैज्ञानिक साहित्य की बात कर रहे हैं। तो कितनी पत्रिकायें दिखीं‌ आपको? शून्य। यदि आप मुख्यधारा साहित्य की बात करें तो हंस, कथादेश जैसी पत्रिकाओं मे क्या आपको विज्ञान साहित्य मिलेगा? नहीं। साल भर मे भारत मे सैकडो फ़िल्में बनती हैं, उनमे से ज़रा गिन कर विज्ञान कथा पर आधारित फ़िल्मों के नाम बता दीजिये? टी.वी. पर प्रसारित विज्ञान कथा पर आधारित मौलिक कार्यक्रम का नाम बताइये? अफ़सोस, इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको नकारात्मक रूप मे देने पडेंगे। यह सोचनीय, चिंताजनक, भयावह तथा दयनीय स्थिति है।

इस दयनीय दशा को समझने के लिये यहां कि सामाजिक, राजनैतिक तथा अर्थिक स्थिति को समझना पडेगा। एक प्रचलित कथन है -- सहित्य ही समाज् का दर्पण होता है। तो क्या कारण है कि बावजूद इतने सारे वैज्ञानिकों व अभियंताओं के भारतीय सहित्य परिदृश्य से विज्ञान लुप्तप्राय सा है?

कारण है भारतीय समाज और विज्ञान का अजीबो-गरीब रिश्ता। भारतीय समाज अभी भी अंधविश्वासों से ग्रसित है। हमारी ६० प्रतिशत आबादी गावों मे रहती है और अंधविश्वासों से ग्रसित है। बीमारी की स्थिति मे चिकित्सक से इलाज कराने कि बजाये ओझा का आश्रय लिया जाता है। पढे लिखे लोग् भी मकान ख़रीदने, शादी-ब्याह जैसे मामलों‌ मे ज्योतिषों की राय लेते हैं। चेचक् अभी भी एक ओझा ही झाडता है। शनीवार को लोहा नही ख़रीदा जाता। मंगल को बाल नही कटवाया जाता। ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण मिल जायेगे हमें भारतीय समाज में। कहाँ है यहाँ विज्ञान? कहाँ है यहाँ वैज्ञानिक द्रष्टिकोण, तर्किकता और समझ?

कहीं नहीं।

मज़े की बात यह है कि पढे-लिखे लोग जब नया कम्पयूटर ख़रीदते हैं तो उस पर भी सतिया बना देते हैं। न जाने ऐसी कितनी ही अवैज्ञानिक रीतियाँ हैं यहाँ। यहाँ ज्यादातर बात हिन्दू समाज की होती दिखती है, लेकिन मुस्लिम समाज या भारत के अन्य समाजों की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नही है। एक बडी मुस्लिम आबादी अभी भी‌ मदरसों मे तालीम ले रही है। इन शिक्षा संस्थानों में विज्ञान विषय किताबों से लुप्त रहता है (देखें रिपोर्ट)। महिलाओ से भेदभाव बरता जाता है।

बेसिक विज्ञान जानने वाला भी यह समझता है कि जाति के आधार पर वर्गीकर्ण अवैज्ञानिक है। कहां से आयेगी वैज्ञानिक चेतना जब समाज का एक बडा वर्ग 'निम्न जाति' के रूप मे तिरस्कृत किया जाता है? जिस देश मे 'फ़ेयरनेस' क्रीम यह कह कर बेची जाती है कि अगर आपकी त्वचा का रंग गहरा है तो आप 'इन्फ़ीरियर' हैं उससे ज्यादा रंग भेदी समाज भला और कौन होगा? रंगभेद जैसी अवैज्ञानिक सोच मे डूबे देश, औरतों को बुरकों‌ के पीछे कुचलने वाले समाज की दर्पण मे क्या प्रतिलिपि बनेगी? एक वैज्ञानिक समाज की? कभी नही। जिस समाज मे विज्ञान का स्थान इतने पर्ले दर्जे का हो, वहां के सहित्य मे उसका असर झलकना स्वाभाविक ही है।

विज्ञान साहित्य और मुख्यधारा
मुख्याधारा के साहित्यकार विज्ञान साहित्य को बाल साहित्य कहते हैं। यह कुछ हद तक सच भी है। इसके दो कारण हैं। पहला: वैज्ञानिक सोच का आभाव होने कि वजह से मुख्यधारा के सहित्यकार या सम्पादक विज्ञान साहित्य का महत्व या तो जानते नहीं या अच्छी तरह जानते है कि इस प्रकार का साहित्य यहाँ के पाठक वर्ग के लिय अनुपयुक्त है। मजे की बात यह है कि अभी भी बहुत से सम्पादक/लेखक ऐसे हैं जो स्वंम कम्प्यूटर पर टाईप नही कर सकते और ५०० रू प्रति माह टाईपिस्ट पर निर्भर रहते है। उस पर तुर्रा यह कि जब टाईपिस्ट है तो हम टाईप क्यों करें? वाह री 'उपनिवेशक' सरीखी मानसिकता। शुक्र है इस तरह की सोच वाले लेखक, सम्पादक सैनिक नही है वर्ना तो उन्होने बन्दूक चलाने के लिये भी एक गनर रखना पडता।

मुख्यधारा के लेखकों व सम्पादकों मे वैज्ञानिक चेतना का अभाव व नवीनतम टेक्नालाजी के प्रति उदासीनता को देखते हुये उनसे यह अपेक्षा करना कि वे विज्ञान सहित्य को महत्व दे पायेंगे वैसा ही है जैसा राजस्थान मे बर्फ़बारी की उम्मीद लगाना। उनके लिये विज्ञान का समाज पर पड्ने वाले प्रभाव को समझ पाना शायद कठिन है। इसीलिये वैज्ञानिक सहित्य को वे बाल-साहित्य की टोकरी मे डाल देते हैं। हंस या कथादेश सरीखी पत्रिकाओं मे उच्च् श्रेणी के सम्पादकों के बावजूद भी विज्ञान प्रेरित कथाओं का टोटा क्यों है भला? उसका कारण है भारतीय विज्ञान कथा लेखक।

विज्ञान कथा लेखक या ओझा?
मै कई लेखकों को नज़दीक से जानता हूं और अच्छी तरह जानता हूं‌ कि विज्ञान से उनका क्या नाता है। ओझा और अंधविश्वास ने यहां भी डेरा डाला हुआ है। गूढ शोध की तो बात ही बेमानी है कई बार तो 'बेसिक' विज्ञान भी गड्बड् लगता है। समस्या तब बढ जाती है जब व्यक्तिगत संबंधों के चलते इस तरह की कथाओ की समालोचना करने की बजाये, उनकी नाहक तारीफ़ की जाती है। इससे विज्ञान कथा सहित्य का स्तर सुधरने की बजाये, बिगडता चला जाता है, सुधरते हैं‌ तो केवल संबंध। यह ओझा सरीखे लेखक विज्ञान सहित्य का स्तर उठने ही नही दे रहे हैं, क्या करें‌ राजेन्द्र यादव या हरिनारायन।

भारत मे हिन्दी सिनेमा दर्शकों मे विज्ञान कथा पर आधारित फ़िल्मे बेहद सफ़ल हैं, इस हद् तक कि डिस्ट्रीब्यूटर अंगरेजी विज्ञान कथा फ़िल्मों को हिन्दी मे भाषांतरित करके प्रस्तुत करते हैं। लेकिन फ़िल्मों और साहित्य मे जमीन आसमान का फ़र्क होता है। फ़िल्मे मूलतः स्पेशल इफ़ेक्ट्, या एक्शने की वजह से पापुलर होती हैं न कि कहानी की वजह से। आपको यहा जुरासिक पार्क तो मिल जायेगी लेकिन 'ईटरनल सन शाईन आफ़ द स्पाटलेस माईण्ड' नही।

इसका एक और दुखद सच है कि इतनी बडा फ़िल्म उद्योग होने के बावजूद मुंबई फ़िल्म उद्योग विज्ञान कथा पर आधारित एक भी फ़िल्म नही बना सका है। जो लोग 'कोइ मिल गया' या 'क्रिसस' जैसी घटिया स्तर की फ़िल्मों को विज्ञान कथा फ़िल्म कहते है, उन्हे विज्ञान कथा की समझ ही नही है। इन फ़िल्मो मे विदेशों से उडाई कहानियों मे स्पेशल इफ़ेक्ट्, या एक्शन आधारित फ़ार्मूले का सहारा लिया गया। विज्ञान साहित्य हिन्दी फ़िल्म उद्योग मे अनुपस्थित है।

लेकिन इस स्थिति कि वजह क्या है? क्यों इस समाज मे विज्ञान व वैज्ञानिक सोच की उपेक्षा की जाती रही है? कारण बहुत से है। कुछ लोग भाषा को इसका कारण बताते है। कुछ विचारक कहते है कि अंगरेजी मे शिक्षा इसका कारण है और बहुत से नागरिक अंगरेजी से भली-भांति परिचित नही है। यह एक वास्त्विक व बडी समस्या है। लेकिन भारते के साथ एक और समस्या है -- क्षेत्रिय भाषायें। मै तमिल या बांग्ला साहित्य नही पढ सकता अतः उस साहित्य से परिचित हूँ। लेकिन हमे तस्वीर का दुसरा रुख भी देखना चाहिये, क्या अच्छा नही हो कि एक कामन भाषा हो? ख़ैर, भाषा पर चर्चा फिर कभी।

तथ्य यह है कि वैज्ञानिक चेतना के लिये मूल विज्ञान की जानकारी पर्याप्त है। कुछ् विशेषज्ञ यह कहते हैं‌ की अत्यआधुनिक विज्ञान की जानकारी के बिना वैज्ञानिक चेतना नही आ सकती। तो उस वर्ग का क्या होगा जो विज्ञान की बजाये कामर्स, साहित्य, कला इत्यादि को चुनते हैं? (इस विषय पर सम्पादक, विश्व मोहन तिवारी जी का ज्ञानवर्धक तथा अत्यंत महत्वपूर्ण लेख पढें)। भारत के अधिकांश विद्यालयों मे मूल या बेसिक शिक्षा हिन्दी या स्थानीय भाषा मे ही दी जाती है, अतः विद्यालय जाने वाले बच्चे मौलिक विज्ञान से तो परिचित होते है। वैज्ञानिक चेतना के लिये विज्ञान की इतनी जानकारी पर्याप्त है। समस्या तब शुरू होती है जब यह बच्चा घर जाता है और उसका सामना परिवार या समाज से होता है और उसे कुछ जातियों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसे शनीवार को लोहा खरीदने या बाल कटवाने से रोका जाता है। ऐसी स्थिति मे उसका तार्किक मस्तिष्क पेशोपेश मे पड जाता है कि क्या सही है और् क्या गलत है। आखिर मे बाहुबली अतार्किक समाज की जीत होती है और वह बच्चा वैज्ञानिक सोच को छोड कर रूढिवादियों का गुलाम बन जाता है। यही बच्चा आगे चल कर समाज का हिस्सा बनता है और अगली पीढी को उसी रास्ते पर ले जाता है, जिसपर चलना उसने सीखा है। यही बच्चा या तो लेखक, या पाठक बनता है और वैज्ञानिक सोच का अभाव होने के कारण वैज्ञानिक साहित्य से संबंध नही बना पाता है।

वहीं दूसरी तरफ़ पढा लिखा वर्ग मैकाले की शिक्षा जाल मे फ़ंसा हुआ या तो पश्चिम का अनुकरण कर रहा है या उसकी नौकरी। देश का नौजवान साफ़्टवेयर की दुनिया मे पश्चिमी देशों के लिये मजदूरी का काम कर रहा है। इतनी प्रतिभा के बावजूद क्यों नही है यहाँ गूगल, फ़ेसबुक सरीखी कंपनी के जनक? क्यों नही आज तक कोई भी कम्प्यूटर भाषा भारत मे निर्मित हुई? संस्कृत जिसे पश्चिम भी आबजेक्ट बेस्ड कम्प्यूटिंग के लिये आदर्श भाषा मानता है, भारते मे क्यों मृतप्राय है? अतीत वैज्ञानिक साहित्य से भरा पडा है, पर जातिवाद, रंगभेद, नारी शोषण, दहेज ह्त्या, अंधविश्वास और विद्रूप राजनीति से पीडित हमारा देश विज्ञान साहित्य मे पिछडता जा रहा है। चीन मे पिछले दस सालों‌ मे विज्ञान सहित्य ने आश्चर्यजनक प्रगति की है। लेकिन भारत मे स्थिति वहीं‌ की वहीं। यहाँ अभी‌ भी पहली विज्ञान कथा कौन है पर विवाद है। (देखें मानद सम्पादक विशव मोहन तिवारी जी की रिपोर्ट व कार्यकारी सम्पादक डा अर्विंद दुबे का लेख)। 

साहित्य व आर्थिक स्थित

आर्थिक स्थिति भी विज्ञान साहित्य के प्रचार प्रसार मे बडी रुकावट है, अशिक्षा, नवीनतम तकनीक तथा सूचना तक पहुच निम्न आय वर्ग को पिछ्डा बनाये रखती है। यह वर्ग संवेदनशील, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों मे बेहद दिलचस्पी रखता है और उनसे बहुत जल्द आदोलित हो जाता है और उसका लाभ राजनैतिक या धार्मिक दल उठाते है। इस वर्ग को तार्किक व विज्ञानपरक सहित्य कम, और संवेदनशील या निम्न कोटि का सहित्य अधिक पसन्द आता है। सैकडों पत्रिकायें है जो इस वर्ग का मनोरंजन करती है और तथ्यों को तोड्-मरोड् कर प्रस्तुत करती हैं इससे अधिक नुकसान होता है। समाज मे भ्रांतिया फ़ैलती हैं, समस्या कम होने की‌ बजाये बढती है।

कथा लेखक और विज्ञान
विज्ञान कथा लेखकों द्वारा विषयों की गहराई मे गये बिना विज्ञान कथा लिख देना भी निम्न स्तर की वजह है। भविष्योन्मुख कहानिया लिखते समय लेखक उस समय के सामाजिक, रजनैतिक, आर्थिक स्थितिओं का आकलन किये बिना कहानी लिख डालता है। कुछ एक गंभीर लेखकों को छोड कर अधिकांश लेखक लकीर पीटते रहते हैं। कारण? ये लेखक भी तो हमारे उसी समाज से आते हैं। 

ऐसी कोई भी कहानी उठा लिजिये और उसमे आप विज्ञान् ढूढ्ने के लिये संघर्षरत होंगे। फिर् बहुत से एसे लेखक् है जो कि वैज्ञानिक् कि श्रेणी मे आते हैं लेकिन उनके लिये 'ड्रामा' बना पाना मुशकिल् होता है। तो इन कहानियों मे विज्ञान् तो होता है लेकिन 'कहानीपन' नही होता। उसे गाय् पर् लिखा गया निबंध समझ लिजिये। दोनो ही सूरतों मे भारतीय विज्ञान कथायें बाल कथा प्रतीत होती हैं। एक और समस्या है -- प्रोफ़ेश्नलिज़्म का आभाव। बस कुछ लिख डालो, छ्प तो जायेगा ही।

राजनैतिक माफ़ियावाद
अन्य भाषाओं का तो मुझे पता नही, हिन्दी वैज्ञानिक सहित्य से जुडा हूँ तो जानता हूं कि यह विधा एक बीमार राजनीति का भी शिकार हो गयी है। कुछ-एक छुट्भैये नेता हैं‌ जो भारतीय, हिन्दी विज्ञान, सहित्य को अपनी बपौती मानते हैं। उनकी मर्जी के बिना हिन्दी विज्ञान सहित्य मे एक पत्ता भी नही हिल सकता। मफ़िया सरीखे उन्होने वैज्ञानिक सहित्य पर कब्जा जमा रखा है। आप उनके चरणों मे लोट जायें, उनकी चिरौरी करें, उन्हे अध्यक्ष का पद दे दें तो ही आपकी नैया तैर पायेगी। एक वरिष्ठ् कथाकार एक कहानी मे गांवो की राजनीति पर चर्चा कर् रहे थे। उन्होने कहा कि गावों मे लोगों की मानसिकता इस कदर दूषित होती है कि अगर उन्हे पता चला जाये कि पडोसी की लड्की की शादी तय हो गयी है तो, अपने ख़र्चे पर् जा कर् शादी तुडा आयेंगे। वही हाल इन विज्ञान सहित्य के स्वंमभू नेताओं का है. जैसे ही इन्हे पता चलेगा कि आपने हिन्दी विज्ञान कथा को नयी गति देने की कोशिश कि है, तुरंत् ही इन्हे अपनी कुर्सी ख़तरे मे दिखने लगती है और ये फ़ोन पर जुट जाते हैं। ये लोगो को अपने खर्चे पर फ़ोन करके आपके खिलाफ़ महौल तैयार करने की चेष्ठा करेंगे  -- आपकी विश्वस्नीयता पर प्रश्नचिन्ह लगायेंगे। बजाये आपके प्रयासों की सराहना करने के उसका हर मंच पर विरोध और आलोचना करेंगे।

कुछ तो ऐसे है जो मानते है कि उनके मंच (एसोसिएशन्, या ग्रूप) से जुडा हुआ व्यक्ति उनका बन्धुआ मजदूर् है। यदि आप उस मंच के लेखक को अपने यहां लिखने के लिये आमंत्रित करें तो आप पर आरोप लगता है कि आप उनके लोगों को 'तोड्' रहे हैं। अरे भाई हम बुध्दीजीवी वर्ग से संबंधित है, आपके रजनैतिक दल का कार्यकर्ता, आपके खेत के बन्धुआ मजदूर, या आपकी कम्पनी के नौकर नही जो और कहीं‌ 'काम' नही कर सकते। एक बुद्धिजीवी कई संस्थाओं से जुडता है और विकास मे योगदान देता है। इस तरह के माफ़िया सरगना उन लेखकों को अन्य कही प्रकाशित होने से रोक कर उन्के प्रसार को नियंत्रित कर रहे हैं। मै एक बुद्धिजीवी होने के नाते कइ संस्थाओं से जुडा हुआ हूँ। कल्किआन सम्पादक कई संस्थाओं के सद्स्य हैं और उनका नेतृत्व कर रहे हैं। इससे ज्यादा लोग उनके अनुभवा का लाभ उठा पा रहे हैं। यही ज्ञान के प्रसार का सही तरीका है -- स्वतंत्र प्रवाह। न कि उस पर माफ़ियाओं‌ द्वारा बांध बांधना। आप ही निर्णय करें। इस तरह की 'गैर्-पेशेवर'और औपनिवेशक मानसिकता  हिन्दी विज्ञान सहित्य के लिये एक कैंसर है।

भविष्य
इस सबके बावजूद एक ऐसी पीढी भी है जो वैज्ञानिक, अभियंता वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है और हिन्दी विज्ञान सहित्य को जीवित रक्खा है। इसमे प्रमुख नाम हैं‌ -- हरीश गोयल, डा राजीव रंजन उपाध्याय, विश्व मोहन तिवारी, मनोज पटैरिया, देवेन्द्र मेवारी, डा अर्विंद दुबे, डा अर्विंद मिश्रा, इर्फ़ान ह्युमन, ज़ीशान हैदर जैदी, बिमल श्रीवास्तव, चन्द्र मोहन नौटियाल, मनीष मोहन गोरे, अमित कुमार,  कल्पना कुल्श्रेष्ठा, ईत्यादि। इनमे से जहाँ वरिष्ठ पीढी के लेखकों ने भावी पीढी के लिये ज़मीन तैयार कर दी है, युवा पीढी के लेखकों ने बागडोर संम्भालना शुरू कर दिया है। हांलाकि पुरानी पीढी के एक-आध औपनिवेशक मान्सिक्ता से ग्रसित लेखक नयी पीढी का मार्गदर्शन करने की बजाये, उन्हे अपनी खोखली सत्ता के लिये ख़तरा मानते हुए, उनके रास्ते मे रुकावटें खडी करते हैं। अपनी खोखली राजनीति कि रोटी सेंकते समय वे यह भूल जाते हैं कि वास्तव मे वे विज्ञान साहित्य के विकास मे रूकावटें खडी कर रहे हैं। भविष्य उन्हें क्षमा नही करेगा।

विदेशी बनाम देसी
हमारे सामने अन्य चुनौतियों मे से एक है, पश्चिमी विज्ञान साहित्य के 'डोमिनेन्स' से बाहर निकलना। भारत तथा विदेश मे बसे हिन्दी लेखकों को एक छ्तरी के नीचे ला कर हिन्दी विज्ञान साहित्य को विश्व मंच पर स्थापित करना। कल्किआन ने यह मंच तैयार करना शुरू कर दिया है, हमारा सामना माफ़िया सरगनाओं, स्वमभू नेताओं से हो चुका है। कल्किआन अंग्रेजी विश्व की प्रथम बहु-सास्कृतिक, बहु-भाषीय साईट बन गयी है जो विज्ञान साहित्य को समर्पित है। कल्किआन अंग्रेजी का लक्ष्य है भारतीय और विदेशी लेखकों को एक ही मंच पर प्रकाशित करना जिससे न केवल तुलनात्मक अध्यन किया जा सके बल्कि विश्व को भारतीय विज्ञान साहित्य से परिचित भी कराया जाये। मात्र ५ माह मे कल्किआन अंग्रेजी, मासिक से साप्ताहिक साईट बन गयी है। कल्किआन मे प्रकाशित हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों‌ को हमने कल्किआन अंग्रेजी मे प्रकाशित करने का निर्णय लिया है जिससे भारत के उच्च स्तरीय विज्ञान साहित्य से विश्व परिचित हो सके।

यह अच्छा संकेत है। लेकिन जिस् क्षण हम अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुँचते हैं, नकारात्मक शक्तियाँ उन पर विदेशी होने का आरोप लगाना शुरू कर देती हैं। अत: हिंदी विज्ञान साहित्य को परिभाषित करना आवश्यक हो जाता है। भारतीयों द्वारा लिखा गया किसी भी परिवेश या प्रष्ठभूमि पर आधारित साहित्य या भारतीय प्रष्ठ्भूमि पर आधारित भारतीयो द्वारा लिखा गया सहित्य, या भारतीय प्रष्ठ्भूमी पर किसी के द्वारा लिखा गया सहित्य? अगर कोई अमरीकी भारत को केन्द्र बना कर विज्ञान साहित्य लिखता है तो कया उसे भारतीय सहित्य मानेंगे? मेरे विचार से हिन्दी मे किसी के भी द्वारा लिखा गया, किसी भी प्रष्ठभूमी पर आधारित साहित्य हिन्दी विज्ञान साहित्य है। इसमे किसी भी प्रकार का विवाद या संशया की गुंजाईश नही है। यह  ठीक वैसा ही है कि चाहे उसे कोई जापानी गाये, अमरीकी गाये, बरतानी गाये, या भारतीय या पकिस्तानी -- ग़ज़ल, ग़ज़ल ही रहती है, पाँप पाप ही रहता है, रैप रैप रहता है। हाँ इस बात पर बाद मे चर्चा अवश्या हो सकती है कि बाहर बसे भारतीयो द्वारा अंग्रेज़ी मे लिखा गया विज्ञान साहित्य किस श्रेणी मे रखा जाये।

इस सबके बाद हम इस निस्कर्ष पर पहुँचते है कि तथापि वर्तमान मे हिन्दी विज्ञान साहित्य की दशा बहुत अच्छी नही है, लेकिन नयी पीढी ने प्रयास शुरू कर दिये हैं। हमे समाज से उन नकारात्मक शक्तियों को निरुत्साहित् करना होगा जो गुट्-बाजी करने की चेष्ठा कर रही हैं, अवैज्ञानिक सूचना देने वाले ब्लाग/लेखकों को चेतावनी देनी होगी, व्यक्तिगत संबंधों के विकास् की बजाये विज्ञान साहित्य के विकास को केन्द्र बनाना होगा। उसके साथ साथ समाज मे व्याप्त कुरीतियों -- जैसे जातिवाद, नारी उत्पीडन्, रंगभेद्, अंधविश्वास् -- को मिटाना होगा। इन सभी समस्याओं से निपट्ने की एक् ही बूटी‌ है -- वैज्ञानिक द्रष्टिकोण या साइटिफ़िक टेम्परामेंट विकसित करना। वैज्ञानिक द्रष्टिकोण विकसित करने के लिय कक्षा ५ स्तर के ब्लाग लिखने की आवश्यक्ता नही है, जो ब्लागिंग कर रहे है उनके पास पहले से ही इतना वैज्ञानिक द्रष्टिकोण व तकनीक तक पहुँच है। ज़रूरत है ज़मीनी स्तर पर काम करने की। गाँवों‌ में जाने की। जिस् क्षण हमारा समाज विज्ञान के आधार पर आपनी दिशा निर्धारित कर लेगा, उसी क्षण हमारा समाज एक विज्ञान कथा जनक समाज बन जायेगा।

बहुतेरे वरिष्ठ् लेखक हैं जिन्होने अविस्मरणीय रचनाये लिखी है, लेकिन हिन्दी विज्ञान सहित्य के प्रेमचन्द्र को अभी भी जन्म लेना है। विज्ञान् सहित्य की पूस की रात अभी भी अमावस की रात के अन्धकार मे डूबी है।

-- स्वप्निल भारतीय



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by Dr. Radut.