ब्रह्माण्डिकी के द्वार पर आज क्रान्ति दस्तक दे रही है। यह क्रान्ति किन्तु ‘अदृश्य पदार्थ तथा ऊर्जा’ के रूप में है।उपरोक्त चुनौतियों के समाधान प्राप्त करने के लिये आज उपग्रह स्थित वेधशालाएं तथा उच्चशक्ति वाले कम्प्यूटरों का उपयोग किया जा रहा है। अमेरिका में एक ‘ग्रैण्ड चैलैन्ज कॉज़्मोलॉजी कन्सोर्टियम’ की स्थापना हुई है जिसमें ब्रह्माण्ड विज्ञानी तथा कम्प्यूटर–विज्ञानी कार्य कर रहे हैं।
यह तो ठीक है कि ब्रह्माण्ड को समझने की हमारी जिज्ञासा ही हमें खोज एवं शोध की ओर प्रवृत्त करती है। किन्तु इस ‘अदृश्य पदार्थ‘ के विषय में हम इतने अधिक उत्सुक क्यों हैं ? क्योंकि ‘अदृश्य–पदार्थ‘ तथा ‘अदृश्य ऊर्जा‘ समझने से हमारे सामने ब्रह्माण्ड के मुख्य रहस्य खुल जाएंगे। दूसरे हम यह भी जानना चाहते हैं कि जिस ब्रह्माण्ड में हम निवास करते हैं जिसका त्वरण के साथ प्रसार हो रहा है, क्या वह प्रसार अनन्त काल तक होता रहेगा (जैसे इलियट के संसार का अन्त रिरियाते हुए होता है) या रूक कर स्थिर हो जाएगा, या प्रसार बन्द होगा और संकुचन होकर पुन: सारा ब्रह्माण्ड एक सूक्ष्मतम बिन्दु में समा जाएगा? और यदि समा जाएगा तब क्या उसमें पुन: महान विस्फोट होगा?
मजे की बात है कि 1917 के सापेक्षवाद सिद्धान्त के आधार पर निर्मित ब्रह्माण्ड के अनुसार, आइस्टाइन के ब्रह्माण्ड में तीनों संभावनाएं स्पष्ट थीं। इनमें से कौन सी संभावना मूर्त होगी, वह उन सूत्रों में निहित एक ‘ब्रह्माण्डीय नियतांक’ (कॉस्मोलॉजिकल कॉन्स्टैन्ट) या प्रति–गुरुत्वाकर्षण नियतांक के मान पर निर्भर करती है। इस प्रतिगुरुत्वाकर्षण में तथा अदृश्य ऊर्जा में संबन्ध तो है। आइन्स्टाइन ने भी ‘शून्य–ऊर्जा‘ की अवधारणा बनाई थी और यही ऊर्जा ब्रह्माण्ड का विस्तार करती है। मजे की बात यह है कि जिसे आइन्स्टाइन ने अपने जीवन की भयंकरतम गलती मानी थी, आज वही सर्वाधिक मह<वपूर्ण खोज के मनन का विषय है।
आइन्स्टाइन की गणना के अनुसार शून्य ऊर्जा या अदृश्य ऊर्जा की मात्रा नियत है, विज्ञान को इसे भी परखना है। एक आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक पाल डेवीस आइन्स्टाइन से सहमत हैं कि अदृश्य ऊर्जा की मात्रा नियत है। और उन की मान्यता है कि अदृश्य ऊर्जा का संबन्ध ‘क्वान्टम शून्य’ से है। अणुओं के भीतर के शून्य में क्वार्क जैसे क्वान्टम कण होते हैं, इस क्वान्टम शून्य में प्रतिगुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है जो अत्यन्त अल्प तो होती है, किन्तु उसका गुणा समस्त ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले क्वान्टम शून्यों से करेंगे तब हमें अच्छी मात्रा में अदृश्य ऊर्जा का स्रोत समझ में आ सकेगा। इसे प्रमाणित करना बाकी है।
सुपरनोवा पर किये गये अवलोकनों से जो ‘शून्य ऊर्जा‘ का क्रान्तिक ऊर्जा से अनुपात ‘लैम्बडा’ का मान 0.75 निकाला गया है। इस अनुपात का ब्रह्माण्ड के विस्तार पर प्रभाव जानने के लिये पदार्थ के घनत्व की भी आवश्यकता होती है। क्योंकि ‘शून्य ऊर्जा‘ तो प्रसार बढ़ाती है, तथा पदार्थ का घनत्व उसे रोकता है। इस समय हमारे खगोग वैज्ञानिकों के सामने जो अत्यधिक गूढ़ समस्या है वह है अदृश्य पदार्थ तथा अदृश्य ऊर्जा को समझना, खोजना इत्यादि।
ब्रह्माण्डिकी की स्थिति आज कुछ वैसी ही दुविधापूर्ण तथा अनबूझ पहेली–सी है जैसी बीसवीं शती के प्रथम दशक के प्रारम्भिक वर्षों में थी। उस समय मिकिल्सन मोरले के सिद्धान्त तथा यथार्थ के अन्तर्विरोध को उजागर करने वाले अवलोकनों ने वैज्ञानिकों के सामने एक अबूझ पहेली खड़ी कर दी थी जिसे आइन्स्टाइन ने सुलझाया था। आज एक पहेली है कि ब्रह्माण्ड में एक पदार्थ है, अतिविशाल मात्रा में है किन्तु उसे आत्मा की तरह न तो काटा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न गीला किया जा सकता है और न सुखाया जा सकता है। आत्मा तो पदार्थ नहीं है, किन्तु यह कैसा पदार्थ है? किन्तु इसका नाम ‘अदृश्य पदार्थ‘ दिया गया है। यह क्रान्ति एक सौ वर्ष पूर्व हुई आइन्स्टाइन के सापेक्षवाद से भी बड़ी क्रान्ति हो सकती है।
कुछ विद्वान कहते हैं कि हमें सभी प्रश्नों के सर्वमान्य उत्तर नहीं मिलेंगे! यह कथन एक तरह से ऋग्वेद के उपरोक्त पुरुषसूक्त (10/7/90) के कथन को ही स्वीकार–सा करता लगता है। आखिर 10–43 सैकैण्ड के बाद तो ब्रह्माण्ड के प्रसार में तथा तारे तथा मन्दाकिनियों आदि का निर्माण भौतिकी के नियमों के आधार पर ही हो रहा है। मानवकी बुद्धि तथा रचनाशीलता मिलकर उन नियमों को खोजने की क्षमता रखती है। मेरा मानना है कि मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु है तथा उसमें क्षमता है कि वह उचित उत्तर खोज निकाले और इस बार वह ब्रह्माण्डिकी में एक क्रान्ति ला सकता है।