एस्ट्रॉनॉमिकल जर्नल के मार्च 2004 अंक में एक प्रपत्र प्रकाशित हुआ है जिसे प्रिंसटन विश्वविद्यालय ने प्रस्तुत किया है। इन्होंने दूरतम स्थित चार क्वेसारों का अध्ययन करने के लिये उपग्रह स्थित उच्च विभेदक हबल दूरदर्शी का उपयोग किया है। ये क्वेसार हमसे इतनी दूर स्थित हैं कि उनकी आयु ब्रह्माण्ड की आयु के 10 प्रतिशत से भी कम है।
ये क्वेसार आश्चर्यजनक तीव्रता से चमक रहे हैं और ऐसा माना गया कि ये ऐसे विशाल कृष्णविवर हैं जिनके द्रव्यमान अनेक अरब सूर्यों के बराबर होना चाहिये। और यह एक रहस्य है कि इतनी छोटी आयु में इन्होंने इतना अधिक द्रव्यमान कैसे प्राप्त कर लिया। प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त के कटु आलोचक इसे इस सिद्धान्त की विफलता का एक प्रमाण मानते हैं। किन्तु यदि इनके प्रकाश की तीव्रता गुरुत्वाकषीर्य लैन्स के कारण बढ़ी हुई दिखती है तब तो इनके द्रव्यमान को इतना अधिक होने की आवश्यकता नहीं रहती। किन्तु यह भी देखा गया कि इन चारों के बिम्ब गुरुत्वाकषीर्य लैन्स के द्वारा ‘एक के चार’ नहीं बने हैं। अथार्त वैज्ञानिकों को इस तथ्य को समझने के लिये गम्भीर विमर्श करना पड़ेगा।
अनवरत पुष्टियां
इस तरह हम देखते हें कि ब्रह्माण्ड विज्ञान ने पिछले 6–7 वर्षों में उपग्रह स्थित वेधशालाओं की मदद से तीव्र तथा मह<वपूर्ण प्रगति की है। यह तो निश्चित है कि ब्रह्माण्ड का प्रसार हो रहा है तथा उसके प्रसार का वेग बढ़ रहा है। कि अधिक विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ब्रह्माण्ड की आयु 1370 करोड़ वर्ष है। कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य पदार्थ 23 प्रतिशत है, अदृश्य ऊर्जा 73 प्रतिशत है तथा दृश्य पदार्थ मात्र 4 प्रतिशत है। इस सिद्धान्त से हमें कण – भौतिकी को समझने में भी बहुत मदद मिली है। इन सभी निष्कर्षो की पुष्टि फिर भी करते रहना है। अब अधिकांश वैज्ञानिक प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त को निर्विवाद मानते हैं यद्यपि उसे भी संपुष्ट करने के लिये आगे बहुत कार्य करना है।
ब्रह्माण्ड–विकास की प्रक्रिया को समझने के लिये प्रसारी सिद्धान्त के आधार पर अवलोकनों या घटनाओं को अभिव्यक्त करने वाले गणितीय सूत्रों का निर्माण वैज्ञानिक करते हैं। इन सूत्रों की व्याख्या तथा उनसे उद्भूत निष्कर्ष अत्यन्त दुष्कर तथा अबोधगम्य होते हैं। अतएव इनके हल के लिये आजकल सुपर कम्प्यूटरों की सहायता ली जा रही है। और अब यह भी कहा जा रहा है कि आजकल ब्रह्माण्ड तो कम्प्यूटर में समा गया है।
जिज्ञासाओं का प्रसार
अभी ब्रह्माण्ड के विषय में अनेक जिज्ञासाएं हैं। ब्रह्माण्ड का उद्भव कैसे प्रारम्भ हुआ? बिन्दु में ब्रह्माण्ड का सागर समाया कैसे? 10–45 सैकैण्ड के पहिले क्या हुआ? अदृश्य पदार्थ तथा ऊर्जा हैं क्या आखिर? अदृश्य ऊर्जा ब्रह्माण्ड का प्रसार कैसे करती है? क्या ब्रह्माण्ड का प्रसार रूकेगा? नहीं रूकेगा तो क्या सारा ब्रह्माण्ड शून्य में समा जाएगा? यदि प्रसार रूकता है तो क्या ब्रह्माण्ड स्थिर रहेगा या उसका संकुचन होना प्रारंभ होकर, पुन: वह एक बिन्दु में समा जाएगा? क्या सृष्टि और विशेष अर्थ में प्रलय चक्राकार हैं? दृष्टव्य है कि ऐसी अवधारणाएं भारतीय शास्त्रों में मिलती है। चक्राकार सृष्टि के बीज भी आइन्सटाइन के व्यापक आपेक्षिकी में हैं।
‘अदृश्य’ के अंधे मोड़ पर खड़े होकर अब वैज्ञानिक नितान्त नतीन अवधारणाओं पर भी विचार कर रहे हैं। ली स्मॉलिन तथा जेकब बैलैन्स्टाइन का मानना है कि सृष्टि की रचना में पदार्थ तथा ऊर्जा के साथ ‘जानकारी’ का मह<वपूर्ण हाथ है। जान व्हीलर तो मानते हैं कि यह ब्रह्माण्ड ‘जानकारी’ से निर्मित है जिसमें पदार्थ तथा ऊर्जा आनुषंगिक है या, अधिक से अधिक, सहगामी हैं। यह विचार भारतीय ‘चेतना’ की प्रमुखता के निकट आता दीखता है।