ब्रह्माण्ड का प्रसार पदार्थों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बावजूद त्वरण के साथ हो रहा है, अथार्त कोई शक्ति है जो गुरुत्वाकर्षण की विरूद्ध दिशा में कार्य कर रही है। ज्ञात शक्तियों में एसी कोई ऊर्जावान शक्ति नहीं है। यद्यपि फोटान जैसी ऊर्जा अपने संचरण की दिशा में दबाव डालती हैं, किन्तु गुरुत्वाकर्षण विरोधी ऐसे कोई फोटान अथवा अन्य ऊर्जा ‘दृष्टिगत’ नहीं हो पाई है। अतएव इस प्रसारकारी ऊर्जा का नाम ‘अदृश्य ऊर्जा‘ रखा गया है।
‘साइन्स’ पत्रिका के 19 दिसम्बर, 2003 के अंक में यह समाचार प्रकाशित हुआ है, “अब अदृश्य ऊर्जा के गुण भी जांच–पड़ताल के घेरे में आ रहे हैं। ‘विल्किंसन माइक्रोवेव एनाइसोट्रोपी प्रोब’ (डब्ल्यू एम ए पी) तथा ‘द स्लोन डिजिटल स्काई सर्वे‘ (एस डी एस एस) से प्राप्त जानकारी तथा सुपरनोवा पर किये गये नवीन अवलोकनों से ऐसा प्रतीत होता है कि अदृश्य ऊर्जा के व्यवहार शीघ्र ही समझने में आने लगेंगे। विल्किंसन प्रोब (डब्ल्यू.एम ए पी) ने 2003 में ब्रह्माण्डीय पृष्ठभूमि सूक्ष्मतरंग विकिरण के पर्याप्त विवरण सहित स्पष्ट फोटो लिये हैं। इनके विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि ब्रह्माण्ड में मात्र 4 प्रतिशत सामान्य पदार्थ हैं, 23 प्रतिशत अदृश्य पदार्थ हैं तथा शेष 73 प्रतिशत अदृश्य ऊर्जा हैं।
‘वैदिक सृष्टि विज्ञान’ में अरुण कुमार उपाध्याय अज्ञेय के विषय में मह<वपूर्ण तथ्य प्रकाश में लाए हैं। वे कहते हैं कि आधुनिक विज्ञान निश्चयात्मक सिद्धान्तों से प्रारम्भ तो होता है किन्तु बाद में अनिधार्र्यता पर आ जाता है। वेद अज्ञेय से ही प्रारम्भ करता है। ब्रह्माण्ड या विश्व का प्रथम प्रतिरूप पुरुष कहलाता है। पुरुष रूप में निर्मित पदार्थों का जो जटिल क्रम दीखता है, वह वास्तविक पुरुष का मात्र एक चौथाई भाग है, शेष तीन चौथाई भाग अदृश्य है तथा स्थायी है। “एतावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुष:।” (पुरुष सूक्त, ऋग्वेद 10/7/90)।
यह तीन चौथाई अदृश्य भाग 73 प्रतिशत अदृश्य ऊर्जा के तो बहुत निकट है। 96 प्रतिशत अदृश्य पदार्थ तथा ऊर्जा बहुत दूर नहीं है। विल्किंसन प्रोब ब्रह्माण्ड की आयु भी परिशुद्धता से मापकर 1370 करोड़ वर्ष निधारित की है जिसकी याथार्थिकता अतिशुद्ध (दस प्रतिशत) मानी जाती है।अक्टोबर 2003 में स्लोन तन्त्र (एस डी एस एस) ने भी अपने स्वतन्त्र अवलोकनों का विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्माण्ड में अधिकांश ऊर्जा ‘अदृश्य’ है।यह क्या विचित्र बात नहीं कि जो पदार्थ ब्रह्माण्ड में लगभग नगण्य मात्रा में है उसके विषय में हम थोड़ा बहुत जानते हैं और जो प्रचुर मात्रा में हैं उनके विषय में हम नगण्य जानते हैं।किन्तु इस अज्ञान का अहसास भी तो एक बड़ी बात है।