अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व का सैद्धान्तिक आधार भी है। स्फीति युग के सिद्धान्त के अनुसार स्फीति युग में तो पदार्थ का घनत्व क्रान्तिक घनत्व के बराबर था। अत: इस समय भी बराबर होना चाहिये। किन्तु आकलन करने के बाद यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्माण्ड में पदार्थ का घनत्व क्रान्तिक–घनत्व से बहुत कम है। स्फीति सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भिक क्षणों में जब अकल्पनीय तीव्र स्फीति हुई, उस समय के सूक्ष्म ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म अन्तरों के अतिरिक्त पूर्ण समांग था। यही सूक्ष्म अन्तर बाद में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के कारण विशाल शून्य के भीतर मन्दाकिनियां आदि पिण्ड बने।
इनके बनने के लिये भी दृश्य पदार्थों का गुरुत्वाकर्षण पर्याप्त नहीं था, उसे भी अतिरिक्त पदार्थ की विशाल मात्रा में आवश्यकता थी। यह घटना स्फीति सिद्धान्त का, जो कि अन्य दृष्टियों से बहुत सफल सिद्धान्त है, विरोध करती हैं। अथार्त स्फीति सिद्धान्त के अनुसार भी ब्रह्माण्ड में जो ‘दृश्य’ पदार्थ है वह अनेक घटनाओं को समझने के लिये पर्याप्त नहीं है, और चूंकि उस ‘अदृश्य’ का प्रभाव हमें गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के तुल्य दिखता है, उसे हम अदृश्य पदार्थ कहते हैं। किन्तु आज यह सत्य है कि वैज्ञनिकों को नहीं मालूम कि ब्रह्माण्ड का 96 प्रतिशत किन पदार्थों या ऊर्जा से बना है। यह तो हमारा तार्किक निष्कर्ष है कि अदृश्य पदार्थ होना चाहिये।वास्तव में हम यह भी नहीं जानते कि अदृश्य पदार्थ कौन से मूल कणों से बना है। किन्तु जिस तरह वैज्ञानिकों ने तार्किक आधार पर उस समय सौर मण्डल में अदृश्य यूरेनस तथा प्लूटो ग्रहों के अस्तित्व और स्थिति की भविष्यवाणी की थी और जो खोजने पर उसी स्थान पर मिले थे, उसी तरह यह घोषणा है जो अदृश्य पदार्थ के वैज्ञानिक खोज की मांग करती है।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है ‘अदृश्य ऊर्जा‘ (डार्क इनर्जी) की। समान आवेशित कण या चुम्बकीय ध्रुव एक दूसरे को विकर्षित करते हैं, गुरुत्वाकर्षण दो पदार्थों में आकर्षण पैदा करता है। किन्तु पदार्थों में विकर्षण पैदा करने वाली ऊर्जा – प्रतिगुरुत्वाकर्षण ऊर्जा सामान्य बुद्धि के विपरीत लगती है। विशालतारों में गुरुत्वाकर्षण से जब संकुचन होता है तब उस संकुचन को कौन शक्ति रोकती है? संकुचन से तारों के अन्दर का तापक्रम बढ़ता जाता है और तब तक बढ़ता जाता है जब तक कि वह संकुचन को रोक न दे। वही उस तारे की उसके एक जीवनकाल की स्थायी दशा होती है। हमारे सूर्य का आन्तरिक तापक्रम करोड़ों शतांश है। तापक्रम के बढ़ने से प्रभावित त<वों का कम्पन और इसलिये उनका दबाव बढ़ता है, जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव पर रोक लगाता है और यह विकर्षण पदार्थों द्वारा उत्पन्न ऊर्जा की मदद से होता है। किन्तु ब्रह्माण्ड में मन्दाकिनियों का जो त्वरण है उसके लिये विकर्षण शक्ति या ऊर्जा कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती। ब्रह्माण्ड का औसत तापमान तो परमशून्य के लगभग तीन कैiल्वन ऊपर ही है। यही अद्भुत रहस्य है, अबूझ पहेली है। स्फीति सिद्धान्त मानता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति का इस प्रतिगुरुत्वाकर्षण शक्ति या अदृश्य ऊर्जा से सन्तुलन आवश्यक है। यदि अदृश्य ऊर्जा कम होगी तब गुरुत्वाकर्षण शक्ति ब्रह्माण्ड को बिन्दु में संकुचित कर देगी, और यदि गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम हुई तो न केवल ब्रह्माण्ड अनन्तकाल तक प्रसार करता रहेगा, वरन ये तारे, ये मन्दाकिनियां आदि भी टूट जाएंगे। ब्रह्माण्ड के महान विस्फोट के बाद से लगता है कि अदृश्य ऊर्जा का प्रभाव अधिक है, और इसीलिये ब्रह्माण्ड के प्रसार में त्वरण है।
अदृश्य पदार्थ के कुछ प्रत्याशी पिण्ड ऐसे दिखे हैं जो, सम्भवत: गुरुत्वाकर्षण को बढ़ा रहे हों और जिन्हें हमने पहले इस दूष्टि से नहीं देखा है। एक उदाहरण है ‘भूरा बौना’ (ब्राउन ड्वार्फ) और भी उदाहरण हैं ‘धवल बौना’ (ह्वाइट ड्रवार्फ), न्यूट्रान तारे, कृष्ण विवर आदि। भूरा बौना वे विशाल तारे हैं जो अपनी ‘तीव्र ऊर्जा आयु’ को पारकर ठण्डे हो रहे हैं अतएव इनका विकिरण दुबर्ल होता है अतएव ये कठिनाई से ही दृष्टिगत होते हैं। एक ऐसा भूरा बौना वैज्ञानिकों को ‘देखने’ में आया है।
न्यूट्रनो अत्यन्त सूक्ष्म, आवेश रहित अत्यन्त अल्प द्रव्यमान तथा अत्यधिक वेग वाले कण हैं। इसमें इतनी ऊर्जा तथा इसका वेग इतना अधिक है, तथा यह सारे ब्रह्माण्ड में विपुल मात्रा में मिलता है कि लगता है कि यह भी वह, अदृश्य पदार्थ’ हो सकता है जिसकी खोज हम कर रहे हैं। किन्तु वैज्ञानिक अभी इससे सन्तुष्ट नहीं है। क्योंकि न्यूiट्रनों यदि यह कार्य कर रहे हैं तो वह केवल विशाल पैमाने पर कर सकते हैं। छोटे पैमाने पर भी अदृश्य पदार्थ की आवश्यकता होती है।
अदृश्य पदार्थ के उपरोक्त उदाहरण ‘उष्ण अदृश्य पदार्थ‘ कहलाते हैं क्योंकि इनमें से ऊर्जा, चाहे अल्प सही, विकिरित हो सकती है। जो अदृश्य पदार्थ सामान्य भारी कणों से बने हैं उन्हें ‘बेर्यानी अदृश्य पदार्थ‘ भी कहते है। उष्ण अदृश्य पदार्थ का एक उदाहरण है ‘मैकौस’ (संपुंजित अन्तरिक्षी संहत प्रभा मण्डल) जिनका अस्तित्व प्रमाणित हो चुका है। इनके गुणों पर शोध हो रहा है। इनका औसत द्रव्यमान हमारे सूर्य का भी लगभग आधा निकलता है। और इनकी संख्या भी अधिक है, किन्तु उससे अदृश्य पदार्थ की आवश्यक मात्रा में विशेष योगदान नहीं होता। अतएव अन्यत्र खोज जारी है। अदृश्य पदार्थ का दूसरा वर्ग है ‘शीतल अदृश्य पदार्थ‘। इसके उदाहरण हैं ‘विम्प्स’ (वीकली इंटरैक्टिव मैसिव पार्टिकल्स, ये वे संपुंजित द्रव्य कण हैं जिनकी क्रियाशीलता दुबर्ल होती है), ‘एक्सआयन’, ‘फ़ोटिनोज़’, ‘अतिसममित कण’ आदि।
‘विम्प्स’ अथार्त ‘दुबर्ल क्रियाशील संपुंजित कण’ विशाल पैमाने पर कार्य न कर, तारों या मन्दाकिनियों के स्तर पर कार्य कर सकते हैं। अतएव शीतल तथा उष्ण दोनों तरह के अदृश्य पदार्थों की आवश्यकता लगती है।
यदि उष्ण तथा शीतल दोनों वर्ग के अदृश्य पदार्थों को हम प्रत्याशी मानकर जोड़ लें तब स्थिति कुछ बेहतर अवश्य होती है किन्तु तब भी पदार्थ की आवश्यक मात्रा प्राप्त नहीं होती। नाभिकीय संश्लेषण सिद्धान्त ने आशातीत सफलता न केवल हाइड्रोजन, हीलियम, लीथियम आदि के निर्माण की प्रक्रिया में दशार्ई थी और उनके अस्तित्व का पूर्वानुमान किया था वरन उनका आपस में सही अनुपात भी बतलाया था। इन पूर्वानुमानों की, जो सही निकले थे, आधारभूत मान्यता थी कि उस काल में मूल बैयौर्निक पदार्थों की कुल मात्रा का घनत्व द्व=0।1 था। बैर्यानिक पदार्थों का घनत्व हमें आज भी इससे थोड़ा कम ही मिल रहा है। और यदि शेष मिल भी जाए तो अदृश्य पदार्थ की मात्रा में उसका योगदान नगण्य ही होगा। इसका एक निष्कर्ष यह भी निकल सकता है कि अदृश्य प्रदार्थ बैर्यानेतर अथार्त प्रोटान न्यूट्रानों से इतर होना चाहिये। उसे समझने का भौतिक शास्त्र ही अलग हो सकता है। मुझे मुण्डक उपनिषद का एक मन्त्र ( 1.1.4–5) सटीक लगता है, “द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति – परा चैव अपराच। तत्र अपरा ऋग्वेदो यजुर्वेद सामवेदो अथर्ववेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।।” अथार्त ज्ञान प्राप्त करने के लिये दो प्रकार की विद्याएं हैं – परा तथा अपरा। अपरा वेदों में है तथा परा वह है जिससे उस अक्षर ‘(अदृश्य)’ परमात्मा का ज्ञान होता है। यह दोनों विद्याएं नितान्त अलग हैं। यही बात ईशावास्योपनिषद में (11) कही है, “विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदो भयं सह।" अथार्त जो विद्या तथा अविद्या दोनों को जानता है वही मृत्यु को पारकर अमृतत्व पाता है। इसी तरह दृश्य पदार्थ तथा अदृश्य पदार्थ को देखने की विधियां या उपकरण नितान्त भिन्न हो सकते हैं।
‘अदृश्य’ होने से यह अवधारणा विस्मयकारी तो निश्चित हो जाती है, और चुनौती देने वाली भी। प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त का विरोध करने वाले वैज्ञानिक उपरोक्त दोनों – अदृश्य–पदार्थ तथा अदृश्य–ऊर्जा का सहारा लेकर प्रसारी–सिद्धान्त को मृतप्राय घोषित करते रहे हैं।