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ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य 10: अदृश्य पदार्थ और अदृश्य ऊर्जा

अदृश्य पदार्थ क्या केवल कल्पना है या इसके कुछ ठोस प्रमाण भी हैं? जब कोई पिण्ड गोलाकार घूमता है तब उस पर अपकेन्द्री बल कार्य करने लगता है। इसी बल के कारण तेज मोटरकारें तीखे मोड़ों पर पलट जाती हैं, मोटरसाइकिल वाला सरकस के मौत के गोले में बिना गिरे ऊपर–नीचे मोटरसाइकिल चलाता है।

इसी अपकेन्द्री बल के कारण परिक्रमारत पृथ्वी को सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अपनी ओर अधिक निकट नहीं कर पाती है, और वह अपनी नियत कक्षा में परिक्रमा करती रहती है। जो अपकेन्द्री बल पृथ्वी के परिक्रमा–वेग से उत्पन्न होता है वह गुरुत्वाकर्षण बल का सन्तुलन कर लेता है। इसी तरह की परिक्रमा हमारा सूर्य (200 कि. मी./सै.) अन्य तारों के साथ अपनी मन्दाकिनी–आकाश गंगा– के केन्द्र के चारों ओर लगाता है। चूंकि यह सारे पिण्ड अपनी नियत कक्षाओं में परिक्रमा रत हैं अथार्त  उन पर पड़ रहे गुरुत्वाकर्षण बल तथा उनके अपकेन्द्री बल में सन्तुलन है।

एक और विस्मयजनक घटना है। एक तारा और कुछ ग्रह मिलकर सौरमण्डल (सोलार सिस्टम) के समान तारामण्डल बनाते हैं; कुछ (करोड़ों) तारे मिलकर मन्दाकिनी बनाते हैं; कुछ मन्दाकिनियां मिलकर ‘स्थानीय समूह’ (लोकल क्लस्टर) बनाती हैं; ऐसे कुछ समूह मिलकर विशाल गुच्छ (बिग क्लस्टर) बनाते हैं; कुछ विशाल गुच्छ मिलकर मन्दाकिनि–चादर (गैलैक्सी शीट) बनाते हैं, और ऐसी चादरें मिलकर ब्रह्माण्ड बनाती हैं। हमारी मन्दाकिनी आकाश गंगा, पड़ोसन एन्ड्रोमिडा तथा कोई पन्द्रह पड़ोसन छोटी मन्दाकिनियां मिलकर स्थानीय समूह बनाती हैं जो ‘कन्या’ (’वर्गो‘) नामक विशाल गुच्छ के किनार पर स्थित है।

आकाश गंगा तथा एन्ड्रोमिडा एक दूसरे की ओर गतिमान हैं, स्थानीय समूह विशाल कन्या गुच्छ के केन्द्र की ओर गतिमान है।पूरा कन्या गुच्छ एक अन्य विशाल गुच्छ के साथ ‘विशाल आकर्षक’ नामक किसी अतुलनीय पदार्थ की ओर तीव्र गति से भाग रहा है। यह समस्त गतियां ‘प्रसारी’ गतियों के अतिरिक्त हैं, अथार्त प्रसारी गतियों के कारणों से इन गतियों को नहीं समझा जा सकता।

हबल के अभिरक्त विस्थापन का उपयोग कर किसी भी परिक्रमा रत पिण्ड का वेग जाना सकता है, और उस वेग का सन्तुलन करने के लिये आवश्यक गुरुत्वाकर्षण बल की गणना की जा सकती है। तत्पश्चात गुरुत्वाकर्षण पैदा करने वाले पदार्थ की भी गणना की जा सकती है। ऐसी गणनाएं करने पर ज्ञात हुआ कि अन्तरिक्ष में विशाल पिण्डों के अपकेन्द्री बलों का सन्तुलन कर सकने वाली पदार्थ की जो मात्रा आवश्यक है, वह दृश्य पदार्थ की मात्रा से कई गुना अधिक है। और चूंकि वह पदार्थ हमें ‘दिख’ नहीं रहा है, इसलिये वह ‘अदृश्य पदार्थ‘ है।

अन्य विधियों से भी यही निष्कर्ष निकलता है।यथा ब्रह्माण्ड में पदार्थ के घनत्व का आकलन करने के लिये वैज्ञानिक विशाल मन्दाकिनियों द्वारा उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा तथा उनके द्रव्यमान के अनुपात का उपयोग करते हैं। यह अनुपात भी दशार्ता है कि ब्रह्माण्ड में जितनी मात्रा में पदार्थ होना चाहिये उतना नहीं है। अतएव वैज्ञानिकों ने 1999 में उस पदार्थ को अदृश्य–पदार्थ की संज्ञा दी है।



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by Dr. Radut.