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यूनिवर्स - एक इण्टेलिजेंट डिजाइन

अणु (माल्क्यूल): इण्टेलिजेंट डिजाइन जो इस पूरे ब्रह्माण्ड की शक्ल में हमारे सामने मौजूद है, उसपर गौरो फिक्र की इस कड़ी में बात करते हैं अणु पर।

इस दुनिया की ईंटें हैं तत्व। हमें यह मालूम हो चुका है कि जमीन पर सौ के लगभग तत्व पाये जाते हैं इनमें से किसी भी तत्व का अपना एक अलग परमाणु होता है, जो दूसरे तत्व के परमाणु से पूरी तरह अलग होता है।

अब एक अहम सवाल। अगर हम अपने आसपास गौर करें तो हमें दिखते हैं ज़मीन पर पदार्थ के लाखों प्रकार। पानी, तेल, नमक, चीनी, आक्सीज़न, हाईड्रोजन, प्रोटीन। गिनते जाईए पदार्थ की वेराईटीज़ की कोई हद नहीं। कोई भी पदार्थ दूसरों से गुणों के एतबार से पूरी तरह अलग। तो सवाल पैदा होता है कि अगर ज़मीन पर लगभग सिर्फ सौ तरह के तत्व मिलते हैं तो पदार्थ की इतनी ज्यादा शक्लें कैसे पैदा हो जाती हैं?

इसका जवाब बहुत आसान है कि तत्वों में आपस में जुड़कर एक नया पदार्थ बनाने की ताकत होती है। जब कुछ तत्वों के परमाणु आपस में जुड़ते हैं तो जन्म होता है कंपाउंड यानि एक नये पदार्थ के अणु का।

कोई भी पदार्थ अपनी एक अलग पहचान रखता है और अणु उस पदार्थ का सबसे छोटा कण होता है जिसमें वही गुण होते हैं जो कि उस पदार्थ में होते हैं। मिसाल के तौर पर नमक का ज़ायका जिस तरह नमकीन होता है और पानी में घोलने पर घुल जाता है, उसी तरह उसका सबसे छोटा कण यानि कि उसका अणु भी नमकीन होता है और पानी में घोलने पर घुल जाता है।

एक अणु उस दुनिया का दरवाजा होता है, जिसे वैज्ञानिक माइक्रो यूनिवर्स कहते हैं। ये वो दुनिया होती है जो आँखों से न दिखाई देने वाले बहुत महीन कणों के अंदर मौजूद होती है। रोजमर्रा की दुनिया में हमसे हर वक्त रि’ता बनाये रखने वाले अणु हैं पानी, नमक और आक्सीजन जैसे आम अणु। या फिर डी-एन-ए- और प्रोटीन जैसे पेचीदा अणु जो इंसानों और दूसरे जानदारों के जिस्म को बनाते हैं।

एक या कुछ तत्वों के परमाणु जब आपस में जुड़ते हैं तो अणु का जन्म होता है। जब हाईड्रोजन और ऑक्सीज़न के परमाणु आपस में मिलते हैं तो पानी का अणु पैदा होता है। जो दुनिया के तमाम प्राणियों का अनिवार्य हिस्सा है।

अणु का बनना किसी करिश्मे से कम नहीं है। देखते हैं कि परमाणुओं के आपस में जुड़ने पर किस तरह अणु का बनना मुमकिन हो पाता है।
साइंस की शाखा केमिस्ट्री के अनुसार कई तत्व आपस में तालमेल बिठाकर अणु बनाते है, इसके पीछे वजह होती है वैलेंसी। वैलेंसी केमिस्ट्री का एक नियम होता है, जिसके अनुसार हर तत्व दूसरे से मिलकर जोड़ा बनाने की कुदरत रखता है। ये जोड़े या तो अलग अलग परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन की आपसी साझे से बनते हैं या फिर एक परमाणु से दूसरे में ट्रांस्फर के द्वारा।

जैसा कि हम जानते हैं कि परमाणु में कुछ इलेक्ट्रान एक न्यूक्लियस के चारों तरफ चक्कर लगाते रहते हैं। कुछ खास दायरे होते हैं जिनके भीतर ये इलेक्ट्रान मौजूद होते हैं। इनमें से सबसे बाहरी दायरे के लिए कुदरत ने एक नियम बना दिया है कि इसमें आठ इलेक्ट्रान मौजूद होने चाहिए वरना परमाणु स्थायी नहीं होगा और कुदरत में ऐसा परमाणु स्वतन्त्र नहीं रह पायेगा। नतीजे में अपने को स्थायी करने के लिए

यह परमाणु अपने या दूसरे तत्वों के साथ जोड़े बनाने की फिक्र में रहता है।

मिसाल के तौर पर आक्सीजन। इसकी बाहरी कक्षा में छह इलेक्ट्रान होते हैं। इसकी कक्षा को स्थायी होने के लिए जरूरी है कि इसमें आठ इलेक्ट्रान हों। इसके लिए आक्सीजन का परमाणु अपने ही जैसे दूसरे परमाणु के साथ दो इलेक्ट्रानों का साझा कर लेता है जिसके नतीजे में दोनों परमाणु स्थायी हो जाते हैं और आक्सीजन अणु तैयार हो जाता है। अक्सर आक्सीजन के तीन अणु भी आपस में साझा कर लेते हैं और तब मिलता है ओज़ोन अणु।

अब एक और मिसाल - नमक यानि कॉमन साल्ट का रासायनिक नाम है सोडियम क्लोराइड। सोडियम के परमाणु को स्थायी होने के लिए जरूरी है कि वह अपना एक इलेक्ट्रान दूसरे परमाणु को दे दे। जबकि क्लोरीन को एक इलेक्ट्रान की जरूरत होती है। नतीजे में दोनों जब एक दूसरे के समपर्क में आते हैं तो इलेक्ट्रान का ट्राँस्फर होता है और नमक का अणु अस्तित्व में आता है।    

जब कोई अणु अस्तित्व में आता है तो उसके गुण उन परमाणुओं से बिल्कुल अलग हो जाते हैं जिनसे मिलकर वह अस्तित्व में आता है। मिसाल के तौर पर नमक यानि की सोडियम क्लोराइड। यह सोडियम और क्लोरीन से मिलकर बना होता है।

नमक ठोस क्रिस्टल होता है जबकि सोडियम धातु है और क्लोरीन गैस।

नमक खाद्य पदार्थ होता है जबकि सोडियम और क्लोरीन दोनों ही ज़हर हैं।

नमक को पानी में घोलने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होता। जबकि सोडियम पानी में डालते ही जलने लगता है।

इसी तरह पोटेशियम , कार्बन और नाईट्रोजन तीनों में कोई भी ज़हर नहीं है। लेकिन इनके मिलने से बना अणु पोटेशियम साईनाइड दुनिया का सबसे तेज़ ज़हर है।

अब एक सवाल ये पैदा होता है कि क्या अणु के बनने में कहीं पर किसी डिज़ाइन की झलक दिखाई देती है? जी हां। वैज्ञानिकों ने जब अणु बनने की प्रक्रिया का अध्ययन किया तो कुछ हैरतअंगेज़ बातें सामने आयीं। जैसा कि हम जानते हैं कि इलेक्ट्रान एटम में अपने मरकज़ यानि नाभिक से इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत के जरिये जुड़ा होता है। अब अणु बनाने के लिए इलेक्ट्रानों के साझे या ट्रांस्फर होना है। दूसरे शब्दों में इलेक्ट्रान को कुछ हद तक अपने केन्द्र से अलग होना है। इसके लिए ज़रूरी है कि इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत बहुत ज्यादा न हो। वरना इलेक्ट्रान कभी अपने केन्द्र को नहीं छोड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने जब परमाणु का अध्ययन किया तो पाया कि वाकई में इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत बस इतनी ही होती है कि इलेक्ट्रान अणु बनते वक्त आसानी से अपने केन्द्र से अलग हो जाये। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती। यह इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत इतनी कम भी नहीं होती कि इलेक्ट्रान अपने दायरे में घूमना ही छोड़ दे। और एटम बिखर जाये।

यानि कुदरत ने इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत की ऐसी फाइन ट्‌यूनिंग पैदा कर दी है जिसकी वजह से एक तरफ तो स्थायी परमाणु पैदा हुआ और दूसरी तरफ उसमें दूसरे परमाणु के साथ जुड़कर अणु बनाने की ताकत पैदा हो गयी। अगर ऐसा न होता तो दुनिया में सिर्फ नब्बे या सौ तरह का पदार्थ ही तत्वों की शक्ल में मौजूद होता। और हम अपने आसपास की खूबसूरत दुनिया कभी देख न पाते।

अणु की बनावट भी अपने में काफी दिलचस्प होती है। अणु के अंदर परमाणु आपस में जब जुड़ते हैं तो कुछ खास तरह की संरचनाएं बनती है। मिसाल के तौर पर मेथेन गैस का अणु टेट्राहेड्रान की शक्ल का होता है। यानि एक ऐसा आकार जिसकी चार दीवारें होती हैं और हर दीवार त्रिभुज की शक्ल में एक दूसरे से जुड़ी होती है। कुदरत की कारीगरी के इतने खूबसूरत नमूने हम अणु की बनावट में देखते हैं कि बड़े से बड़े डिजाईनर के नमूने भी उनके सामने फीके पड़ जायें।

कभी कभी कुछ यौगिक एक ही तरह का ज्यामितीय आकार दो तरह से बनाते हैं। दोनों आकार कुछ इस तरह होते हैं जैसे कि एक दूसरे की मिरर इमेज यानि परछाईं हो। ऐसा कार्बनिक यौगिकों में खास तौर से होता है। एक ही तरह की डिजाइन रखने के बावजूद दोनों आकार गुणों के एतबार से पूरी तरह अलग हो जाते हैं। जिन लोगों ने अरबियन नाइट्‌स जैसी तिलिस्मी कहानियां पढ़ रखी हैं उन्होंने हमजाद के बारे में जरूर पढ़ा है जो शक्ल व सूरत में किसी इंसान की तरह होता है लेकिन गुणों और आदत में उस इंसान से पूरी तरह उलट होता है। अगर कोई इंसान शरीफ है तो उसका हमजाद बदमाश होगा। अगर कोई इंसान गोरा है तो उसका हमजाद काला होगा।

कुछ इसी तरह के गुण अणु और उसकी मिरर इमेज बनाने वाले अणु यानि कि हमजाद में दिखाई देते हैं। यानि दो एक ही संरचना के अणु अगर मिरर इमेज बना रहे हों तो हो सकता है उनमें से एक दवा हो और दूसरा ज़हर। या एसपरजीन (Aspargine) अणु की तरह एक मीठा हो तो दूसरा कड़वा।

इसके अलावा पदार्थ के जो अलग अलग हालात हम देखते हैं वह दरअसल अणु के अलग अलग स्थितियों में रहने से पैदा होती हैं। जब कोई पदार्थ ठोस हालत में होता है तो उसके अणु मज़बूती से एक दूसरे से जुड़े हुए लगातार थरथराते रहते हैं। द्रव अवस्था में अणुओं के बीच की ताकत कुछ कम हो जाता है। अत: वो कुछ हद तक आजादी लेते हुए एक दूसरे से दूर जाने लगते हैं।

अब सवाल पैदा होता है कि अणुओं को आपस में बाँधने वाली ताकत कैसे पैदा होती है। वैज्ञानिकों ने इस ताकत को अन्तराण्विक बल नाम दिया है। विज्ञान बताता है कि यह ताकत दरअसल बिजली की ताकत यानि इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स होती है। जब दो अणु पास पास आते हैं तो उनके बीच बिजली की ताकत काम करने लगती है और वो आपस में जुड़ जाते हैं।

लेकिन यहां पर फिर एक सवाल पैदा हो जाता है। देखा जाये तो कोई भी अणु जब बनता है तो उसमें परमाणु एक दूसरे से इलेक्ट्रानों के साझे या ट्रांस्फर के जरिये उदासीन हो जाते हैं। यानि उसमें कोई भी खाली आवेश नहीं रहता। बिजली की ताकत के लिए ज़रूरी है कि अणु पर कोई आवेश हो। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसके बावजूद अणु आपस में जुड़ने लगते हैं यह यकीनन हैरत की बात है।

अगर यह मान भी लिया जाये कि किसी वजह से अणु पर थोड़ा आवेश पैदा हो जाता है तो एक जैसे अणुओं में एक जैसा चार्ज होना चाहिए। मिसाल के तौर पर अगर कहीं पर सिर्फ पानी के अणु हों तो उन सब पर एक ही तरह का आवेश होना चाहिए। अब हम जानते हैं कि एक तरह के आवेश एक दूसरे से दूर भागते हैं। यानि पानी के अणु एक दूसरे से दूर भागने चाहिए। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता। गैसों के अलावा हर तरह के माल्क्यूल में पास आने का गुण होता है। और वे आपस में जुड़ते हुए ठोस या द्रव बनाते हैं।

आज भी कुछ हद तक वैज्ञानिक इस राज़ पर से परदा हटा पाये हैं। और जो थ्योरी सामने आयी है वह यह कि हालांकि अणु उदासीन होता है, यानि उसमें पाजिटिव और निगेटिव आवेश बराबर होता है। लेकिन उसमें आवेश का बिखराव एक जैसा नहीं होता। यह बिखराव कुछ इस तरह से फाइन ट्‌यूनिंग पर सेट है कि अणुओं के बीच हमेशा आकर्षण की ताकत पैदा हो जाती है। यही है आण्विक बल। इसी की वजह से मैटर ठोस या द्रव अवस्था में आ जाता है।

इस बात का फिलहाल कोई जवाब नहीं कि आखिर कैसे अणु में आवेश हमेशा उसी तरह वितरित होता है कि अणु आपस में जुड़ने की ताकत पैदा कर लेते हैं। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सम्भावना इस बात की ज्यादा थी कि आवेश का बिखराव हर अणु में एक जैसा होता और दुनिया के सारे अणु अलग अलग बिखरे पाये जाते। फिर न तो पहाड़ होते, न समुन्द्र न दरिया न इंसान और न ही पेड़ पौधे। क्योंकि ये सब अणुओं के जुड़ने से ही तो बनते हैं।

इन सब के बाद कुदरत ने इन अणुओं को ये आजादी भी दे दी है कि वो उसके बनाये हुए कानूनों पर अमल करते हुए एक दूसरे से जुड़ते हुए नये अणुओं को जन्म दे सके। और पदार्थ की नयी नयी किस्में सामने आती जायें। मिसाल के तौर पर जब खुश्क और स्वादहीन अनाज, दालें वगैरा जब किचन में आग और पानी के साथ मिलती हैं तो नयी ज़ायकेदार डिशेज़ तैयार हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनाज वगैरा के अणु आग और पानी की मौजूदगी में नये अणु तैयार कर देते हैं। इस प्रक्रिया को साइंस की ज़बान में रासायनिक अभिक्रिया कहा जाता है।

कुदरत ने कुछ ऐसी आटोमैटिक मशीनें पैदा कर दी है जो रासायनिक अभिक्रिया करते हुए इंसानों और दूसरे जानदारों की आवश्यकता का सामान करती रहती हैं। जैसे कि पेड़ पौधे जो हवा और मिट्‌टी से पानी, बासी हवा यानि कार्बन डाई ऑक्साइड और सूरज से रौशनी लेकर ताज़ी हवा यानि आक्सीजन और खाना तैयार करते हैं, जिससे जानदार साँस लेते हैं और अपना पेट भरते हैं।

कुदरत ने अपनी आटोमैटिक मशीनों के जरिये इंसान को यह राह दिखाई कि वे भी रासायनिक अभिक्रियाओं के जरिये अपने काम के अणु तैयार करें और इंसानियत को फायदा हासिल हो।

आज इंसान तरक्की की जिन मंजिलों पर है उसमें रासायनिक अभिक्रियाओं से बने हुए अणुओं की पूरी हिस्सेदारी है। विज्ञान की एक पूरी शाखा रसायन विज्ञान इन्हीं रासायनिक अभिक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए बनी हुई है। ये शाखा रोजाना नये नये अणुओं की खोज कर रही है। लेकिन कुदरत का करिश्मा देखिए कि हज़ारों सालों के अध्ययन के बावजूद केमिस्ट्री अभी तक इस सवाल के जवाब तक नही पहुंच पायी है कि पदार्थ की सीमा कहां तक है?

मुर्दा चीज़ों से जिंदगी पैदा होना और जिंदगी का मुर्दा चीजों में बदल जाना भी रासायनिक अभिक्रिया ही है।



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by Dr. Radut.