Jump to Navigation

असत्यं प्रियम वेलकम पर ख़बरदार! न ब्रूयात सत्यम अप्रियम

विज्ञान कथा का जिन्न

बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी के बादशाह की सल्तनत में सब कुछ मजे से चल रहा था। काम करने वाले, ठलुये, चापलूस, चोर, घूसखोर, बनिये-वक्काल सब मजे में थे। बीरबल की पांचवीं पीढी के वशंज शाम को तर माल सून्त कर पेट पर हाथ फेर ही रहे थे कि बादशाह का बुलावा आ पहुँचा। जैसे-तैसे धोती की लांग समेटते वे हुजूर के दरबार में दाखिल हुये कि देखो आज कौन सी मुसीबत आ पड़ी है, तो देखा बादशाह सलामत तो विदेशी महंगी सिगार मुंह में दबाये आसमान ताक रहे हैं।

पास पहुंचते ही बीरबाल ने खंखारा फिर झुक कर सलाम किया, "हुजूर का इकबाल बुलन्द हो, नाचीज खिद्मत में हाजिर है, हुकुम करें", हालांकि वे मन ही मन भुनभुना रहे कि ये भी साली कोई नौकरी हुई कि जब मन किया बुला भेजा वह भी बिना किसी ओवर टाइम भत्ते के। आज आफिस का चपरासी तक बिना ओवरटाइम क्लेम किये शाम 4 बजे तक रूकने को तैयार नहीं........नौकरी न हुई गुलामी हो गई।"

वह तो अच्छा हुआ कि बादशाह सलामत सिगार का एक लम्बा कश लगा एक लम्बी खॉसी का पोज बना चुके थे वरन बीरबल वंशज उन्हे भुनभुनाते दिख जाते। जब बादशाह सलामत की खॉसी का दौर रूका तो उन्हाने इशारे से बीरबल वंशज को बैठने के लिये कहा।
"हुजूर ने नाचीज़ को याद फरमाया", बीरबल वंशज बहुत सावधानी पूर्वक बोल रहा था ताकि अन्दर की तल्खी चेहरे पर न उभर आये।
"हां बीरबल पंचम.....बात ये है कि हम भी एक विज्ञान कथा लिखना चाहते हैं.......... "

बीरबल वंशज जैसे आसमान से गिरा, मन ही मन भुनभुनाया, "इस साले निरक्षर को क्या हुआ? साला काला अक्षर भैंस बराबर..........हर चीज को इतना आसान समझाता है। ये कोई पांच साला स्वांग नहीं कि गुण्डो के बल बूथ कैप्चरिंग करवा ली, विरोधियों को मरवा दिया और बादशाह हो गये। ये तो दिमाग का काम है, दिमाग का......."
"क्या राय है तुम्हारी बीरबल पंचम, चुप क्यों हो?"
बीरबल वंशज सकपका गया पर संभलते हुये बोला, "हुजूर तो इतनी बडी सल्तनत के बादशाह हैं फिर हुजूर का इन छोटी-छोटी चीजों पर वक्त जाया करना, वक्त की बरबादी होगी हुजूर।"
"छोटी-छोटी चीजे पंचम.....", बादशाह ने पूछा।
"हां हुजूर, ये .....क्या कहते है.......हॉ विज्ञान कथा................ये विज्ञान कथायें लिखना तो बेरोजगारों......फाकाकशों का काम है या फिर कुछ खुराफाती दिमागों का शगल.........."
"क्या कहते हो पंचम?"
"जी हुजूर, देख लीजिये किसी बड़े आदमी ने आज तक कोई विज्ञान कथा लिखी है, सिवाय कुछ खप्ती दिमाग वाले बुडबकों के? आप जैसे बुलन्द इक़बाल लोग तो कथायें बनाने के लिये हैं, लिखने के लिये तो ऐसे ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे बहुत घूमते हैं।"

बीरबल वंशज की बाते मन माफिक न लगने से उकताये बादशाह जोर से बोले, "खामोश"
बीरबल वंशज सकपका कर चुप हो गया।
"वह साला पडोसी राज्य का नायब तक इतनी अच्छी विज्ञान कथायें लिखता है। रियाया के लोग उसकी विज्ञान कथाओं को उस दिन कितने डूब कर सुन रहे थे कि हमारी मौजूदगी भी फालतू हुई जा रही थी।
"जी" बीरबल वंशज ने थूक सटका।
"तुम मानो न मानो पंचम, विज्ञान कथा लेखकों का गलैमर ही अलग होता है....उसके आगे हमारी सारी आन-बान का ताम-झाम फीका है। कुछ भी हो बीरबल हम एक विज्ञान कथा लिख कर रहेंगे", बादशाह ने अपनी इरादा जाहिर कर दिया।
"बीरबल पंचम समझ गये कि बादशाह पर "लिखास का भूत" चढ़ गया है। "बिना लिखे ये मानेगा नहीं ये बेवकूफ", वे मन ही भुनभुनाये।
"अब बताओ लेखन भी कोई ऐसी चीज है जो हर ऐरा-गैरा-नत्थू खैरा कर ले, फिर विज्ञान कथा का लेखन जिसमें विज्ञान में महारत भी जरूरी होती है और साथ में लेखन की सिद्धि भी, वरना सब ऐरे-गैरे आइजक आसिमोव न बन जाते। इन्हे तो एक ही विज्ञान आता है जोड़-तोड़ का विज्ञान, दल-बदल का विज्ञान, राजनीति की शह और मात का विज्ञान। हुं विज्ञान कथा लिखेंगे, चिढ्ठी तो ढंग से लिख नहीं पता बुड़बक। वह तो मोबाइल फोन का भला हो कि लोगों का चिठ्टी लिखना ही टूट गया वरना एक ये और छीछालेदर होती", बीरबल मन ही मन सोच  रहे थे।
"क्या सोच रहे हो बीरबल पंचम? कुछ इन्तजाम करो, विज्ञान कथा तो मुझे लिखनी ही है। वह पड़ोसी राज्य का नायब साला........उसे जबाब देना है। हमारी इज्जत, सल्तनत की इज्जत है और सल्तनत की इज्जत को तो हर हाल में बचाना ही है चाहे सच से या झूठ से।"
"बजा फरमाया हजूर, राजनीति का यही उसूल है..........आज तो हर सल्लतन के बादशाह प्रेस और मीडिया तक के सामने झूठ बोल रहे हैं। ......... दूर क्यों जाइये, अपनी पडोसी सल्तनत "इस्लामिस्तान" को ही ले लीजिये", बीरबल पंचम ने नहले पर दहला जड़ा।
"वह तो ठीक है पंचम पर जल्द से जल्द हमारे विज्ञान कथा लिखने को इन्तजाम कीजिये", बीरबल की चापलूसी से उकताये बादशाह, चिढ़ कर बोले।

"इतंजाम" शब्द सुनकर बीरबल पंचम के दिमाग में कई बल्ब जले-बुझे फिर उन्होने अपनी समझ से सबसे मौजूं इन्तजाम पेश (प्रस्तुत) किया।
"हुजूर ऐसा करते हैं अपनी सल्तनत के सबसे बढ़िया विज्ञान कथा लेखक से गुपचुप एक विज्ञान कथा लिखवा लेते हैं। उसे हुजूर के नाम से किसी नामचीन खबरनामे में शाया (प्रकाशित) करा देंगे फिर हुजूर के ही चर्चे होगें......हुजूर के।"
"पागल हुये हो बीरबल, हमारी खिलाफत वाले लोगों को इसकी हवा लगेगी तो अगले पांच साला स्वांग में वे इसका भी मुद्दा बना लेंंगे। साले मुद्दत से सियायत से दूर है सो ठलुआ बैठे हैं कहो तो अभी से ही सडकों पर उतर आयें।"
"हुजूर.................."
साले हगने-भूतने की बातों तक को तो मुद्दा बना लेते है। कौन किसको साथ ऐश कर रहा है......अरे सालो तुम अपनी के साथ ऐश करो न........बूता है तो......."
बीरबल पंचम अवाक खड़े बादशाह का ये प्रलाप सुने जा रहे थे और बीच-बीच में "लाहौल बिला कुब्बत", मन्त्र का जाप किये जा रहे थे।
बादशाह अपनी रौ में कहे जा रहे थे "....सालों नें पिछिले महीने हमारे नोटों की माला पहनने पर कितना हंगामा किया...............अरे हम सल्तनत के बादशाह हैं कोई राह चलते छुटभइये नहीं। अगर हमने एक दो बार कुछ करोड़ के नोटों की माला पहन भी ली तो इनके पेट में दर्द क्यों है........ इनमें मांग कर तो लाये नहीं। हमारी जनता का माल है और जनता के बादशाह होने के नाते हमें ये हक है कि हम इसका जैसे चाहें इस्तेमाल करें, जनता का माल हमारा माल फिर हम उसकी माला पहनें, पार्क बनवायें या अपनी और अपनों की मूर्तियां लगवायें।"

बीरबल को लगा कि बादशाह का ये गुबार तो जल्दी थमने वाला नहीं है अत: वे निहायत चापलूसाना अन्दाज में बादशाह से मुखातिब हुये "जान की अमान पाऊं तो एक मशवरा है।"
"क्या विज्ञान कथा के बारे मे......बोलो बीरबल ....फौरन से पेश्तर (पहले) बोलो"
"ऐसा करते हैं जिससे विज्ञान कथा लिखवाते हैं उसे अगले दिन जन्नत रसीद करा देंगे.....सफाई से...........कोई एक्सीडेंट बगैरह दिखा के.....फिर बकते रहे सब........सबूत कहां से लायेगें......वक्त के साथ सब ठण्डा पड़ जायेगा।"
"बीरबल", बादशाह तेज आवाज में बोले, फिर स्वर नीचा करते हुये बोले, "माना कि सियासत में ये सब जायज़ है सौ क्या उसके आगे के भी खून माफ हैं राजनीति में, मगर विज्ञान कथा लेखक बनने के लिये ये सब? नहीं बीरबल मेरे जमीर को ये गवारा नहीं।
बीरबल पंचम मन ही मन भुनभुनाये, "जमीर, एक और शिगूफा, इस बेवकूफ के अन्दर कोई जमीर (अन्तर्रात्मा) भी है......राजनीति में किसी के पास कोई जमीर या ईमान होता है.........जमीर की सुनी तो हो गई सियासत.........पता नहीं आज कौन सा जिन्न सवार हो गया है इस पर, पहले विज्ञान कथा फिर जमीर और ईमान।

पर प्रकट में बीरबल ने हथयार डाल दिये, जैसी हुजूर की मंशा। एक हफ्ते की मोहलत अता फरमायें तो कोई इन्तजाम करते हैं।

विज्ञान कथा का इन्तजाम
बादशाह की बातों से परेशान बीरबल पंचम ने घर आते ही शैम्पेन के दो पैग गटके फिर उनके दिमाग की बत्ती जली। अगले दिन ही बर्तानवी सल्तनत के एक पुराने और मशहूर लेखक की एक पुरानी पर नायाब विज्ञान कथा का आइडिया जस का तस मार लिया गया फिर सल्तन के नामचीन अदीबों को इस के मद्देनज़र अखबारों और इन्टरनेट पर जो कुछ भी शाया हुआ था उसकी कतरनें इकठ्ठी करके उसकी "समरी" बनाने को काम सौंपा गया (बीरबल की पांचवी पीढ़ी में इतनी सलाहियत ही कहां बची थी जो वे खुद ऐसा काम कर पाते)। इसके बाद  बीरबल विज्ञान कथा का आइडिया और कुछ कागजों पर लिखी "सिनोप्सिस" लेकर बादशाह सलाम्त के हुजूर में एक हफ्ते की छुट्टी और हरामखोरी के बाद पेश हुये।

ब्यौरा सुन कर बादशाह कागजों का पढ़ने को उतावले हो उठे। दरबारियों को उन्होने कहा, "तखलिया" और बरीबल को लेकर अपने कमेटी रुम में तशरीफफरमा हुये।

बादशाह ने कागजों पर एक सरसरी नज़र डाली फिर अपने दिमाग पर कुछ जोर देते हुये बोले, "अपनी स्कूली तर्बियत के जमाने में, हमें लगता है, हमने ऐसा कुछ कहीं पढ़ा है।"
बीरबल को चापलूसी करने की मानमांगी मुराद मिली, बोले, बज़ा फरमाया हुजूर, ये आइडिया उस (वर्तानवी अफसाना निगार का नाम लेकर) की बहुत मशहूर विज्ञान कथा से उड़ाया है, बस इस में कुछ हल्का सा फेर-बदल कर के इस सिनोप्सिस के सहारे लिख मारिय, और कुछ न हो सके तो इसके पात्रों के नाम ही बदल दीजिये..........बाकी का जिम्मा हमारा"
"लाहौल बिला, बीरबल" हम एक पेंच निकालते है तो तुम दूसरा लगा देते हो। राजनीति में तो हम से "पेंच फ्री" राजनीति करवाते आये हो आज तक। लोगों को पता नही लगा जायेगा कि कहां से हमने "इस्टोरी" मारी है। तुम हमारी किरकिरी कटाने का पूरा संरजाम करके लाये हो?"

बीरबल पंचम को इस हमले से संभलने में थोड़ा वक्त लगा फिर दो लम्हों की डुबकी लगा कर दूर की कौड़ी खोज लाये।
"खातिर जमा रखें हुजूर, हिन्दी विज्ञान कथा में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। हिन्दी फिल्मों से लेकर हिन्दी विज्ञान कथा तक किसी को इस बात से परहेज नहीं है कि आपने आइडिया या पूरी की पूरी  कहानी कहां से मारी है?"
"क्या कहते हो बीरबल पंचम", बादशाह भौचक्के थे।
हुजूर का इकबाल बुंलद हो, हिन्दी विज्ञान कथा में तो और भी सुभीता है....."
"वह कैसे"?
"हुजूर सुनते हैं कि सन् 1900 में किन्हीं शिव प्रसाद सिंह ने एक विज्ञान कथा लिखी "चद्रलोक की यात्रा"। हुजूर महज स्टोरी आइडिया ही नहीं, हू-बहू पूरी कहानी मार दी, जर्मनी के एक पुराने नामचीन लेखक जूल्स बर्न की दो कहानियों "फाइव वीक्स बैलून" और "फ्राम दी अर्थ टू दी मून" से पर किसी ने चूं तक नहीं किया, उल्टे बडे आदर के साथ सबने इसे हिन्दी की पहली विज्ञान कथा का ताज भी पहना दिया।"
"और लोगों ने इसे मान लिया बिना चूं चपड़ किये?"
"अरे हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों को आपसी थुक्का-फजीहत से फुर्सत ही कहॉ है जो इस पर उनका ध्यान जा पाता? वह तो एक दूसरे की पीठ खुजाने में मस्त हैं।
"फिर भी........" बादशाह सहसा इस लापरवाही पर यकीन नहीं कर पा रहे थे।
"हां हुजूर कुछ लोगों ने आगे चलकर मुखालफत तो की मगर इस चोरी की नहीं वरन बस इस बात की कि उड़ाई गई इस विज्ञान कथा "चद्रलोक की यात्रा" से पहले भी एक अफसानानिगार ऐसी कोशिश (चोरी) कर चुके है।"
"बहुत खूब"
"हां हुजूर एक नामचीन अफसानानिगर कम शायर हुआ करते थे, अल्लाह उनहें जन्नतनशीन करे, नाम था अम्बिका दत्त व्यास। अपनी शायरी लिखते-लिखते एक रोज उनको न जाने क्या सूझा कि विज्ञान कथा लिखने की सनक चढ़ गई। बस फिर क्या था उन्होने भी इन्हीं जर्मन लेखक जूल्स बर्न की कि कहानियों से सिर्फ आइडिया ही नहीं मारा वरन, पूरी की पूरी कहानी ही सीधे-सीधे हिन्दी में लांच कर दी .........बस पात्रों के नाम भर बदले  और लिख मारी एक विज्ञान कथा "आश्चर्य वृतान्त"। अपने घर का रिसाला था और अपने ही घर की प्रेस, सो आसानी से छाप भी ली।
"तो? "
"तो क्या हुजूर, आज हिन्दी विज्ञान कथा में हुज्जत इस मसले पर हो रही है कि पहली नकल को हिन्दी की पहली विज्ञान कथा माना जाये या दूसरी नकल को, गरचे एक लेखक द्वारा दूसरे  दूसरे लेखक की पूरी की पूरी कहानी अपने नाम से छाप लेने पर किसी को कोई गुरेज़ नहीं।
"कमाल है!"
"वही तो कहता हूं, हुजूर, आप तो नाहक परेशान हैं। हिन्दी में तो इस विधा विज्ञान कथा की इब्तदा (शुरूआत) से ही लोगों को चोरी की कहानियां पढ़ कर पचाने की आदत है। आप भी ऐसा कर लें तो यकीन मानिये किसी को कोई उज्र नहीं होगा, फिर आप तो इस सल्तनत के बादशाह हैं, आपकी शान में गुस्ताखी करने की जुर्रत भला कौन करेगा?"
"सच पंचम!"
"हां हुजूर, इसके उल्टे ये भी हो सकता है कि इस सल्तनत के अदीब आपकी "विज्ञान कथा वाचस्पति" के ताज से ताज पोशी करें........आप एक बार लिख डालिये हुजूर फिर इसका जुगाड़ तो हम चुटकियों में करवा देते हैं, किसी भकुये को अपने यहां की "विज्ञान कथा एकेडेमी" का अध्यक्ष बनाने का टुकड़ा भर फेंकने की देर है।"

बादशाह दूने उत्साह से भर गये, विज्ञान कथा लिखने का उनका इरादा और पक्का हो गया।

बादशाही "विज्ञान कथा"
एक हफ्ता और बीता और बादशाह सलामत ने एक विज्ञान कथा लिख ही मारी। हालांकि सचमुच की विज्ञान कथा से वह बिलकुल मेल नहीं खाती थी मगर उसे सल्तनत के बादशाह ने विज्ञान कथा मान कर लिखा था तो उसे विज्ञान कथा ही होना था, भले ही उसमें विज्ञान कहीं पड़ा था और कथा किसी दूसरे ओर का रूख अख्तियार किये थी। पता ही नहीं लग पा रहा था कि ये शुरू किधर से होती है और जहॉ खत्म बताई जाती हे वहॉ खत्म कैसे हो गई क्योंकि वहॉ तक तो बमुश्किल-तमाम कथा शुरु ही हो पाई थी..........निराकार ब्रह्म की तरह, न आदि न अन्त। बादशाह सलामत अपनी इस सफलता (कारगुजारी) पर बेहद खुश थे........इतने खुश कि विज्ञान कथा (?) खत्म होते ही उन्होने तुरन्त बीरबल के यहां हरकारा दौड़ा दिया, बिना इस बात को इल्म लिये कि इस समय रात का एक बजा है।

मरता क्या न करता? सिर पर अचानक टूट पड़ने वाली किसी मुसीबत अन्देशे से या कि दिसम्बर की हवा की सरदी से कंपकंपाते बीरबल पंचम बादशाह की ऐशगाह में नमूदार हुये।रात का एक बजा होने के वावजूद बादशाह सलामत पूरी तरह चौकन्ने भी थे और अच्छे मूड में भी थे।
बीरबल ने घुसते ही कुछ रटा-रटाया "चापलूसी वाचन" करना चाहा पर बादशाह ने बात बीच में ही लपक ली, बोले, "भाई बीरबल देखो तो क्या नायाब शाहकार...वह क्या कहते है विज्ञान कथा लिख मारी है मैने........लो.......लो जरा पढ़ो तो"
"अरे यही तो हुजूर की फितरत है कि जिस जगह हाथ लगा दें कमाल हो जाना लाजिमी है।"
बादशाह खुश हुये। उन्होने अपनी लिखी विज्ञान कथा (?) बीरबल की ओर बढ़ाई", "पढ़ो पंचम, फिर बताओ कैसी है?"

बीरबल पंचम पशोपेश में थे। वजीरे आला तो हैं पर पढ़ाई? राजनीति में पढाई लिखाई की जरुरत ही कहॉ थी? बस कुल मिलाकर जैसे-तैसे किताब पढ पाते हैं। स्कूल के वक्त पढ़ाई तो वे जैसे तैसे कक्षा छह तक धकेल पाये थे फिर उन्हे आगे लगा कि ये उनके बस की नहीं। इसी दौरान अच्छी-खासी गुण्डई भी करने लगे थे सो राजनीति में उनका भविष्य उज्जवल था। एक बार वे राजनीति में कूदे तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा। पढ़ तो नहीं पाये पर राजनीति में गुने खूब। उनकी सियासी चालों पर बडे-बड़े धूल चाटने लगे। वैसे ही आज वे बादशाह के दरबार के इहलौते रत्न (नवरत्न तो अब पांचवी पीढ़ी की बादशाह अफोर्ड ही नहीं कर सकता था) नहीं थे।

बीरबाल बादशाह का लिखा पढ़ने का नायाब ड्रामा करने लगे। बीच-बीच में बादशाह की ओर देखते और कभी कहते "क्या खूब", कभी कहते "माशा अल्लाह" गरचे वे एक मंझे हुये अदीब हों और विज्ञान कथा की नस-नस से वाकिफ हों।

बीरबल पंचम पढ़ने में कुछ ज्यादा ही वक्त ले गये, इतना कि बादशाह सलामत उकताने लगे और जब सब्र न हुआ तो आखीर में खुद ही पूछ बैठे कि कैसी है ?
बीरबाल ने पढ़ने का नाटक बन्द कर आंखे बन्द कीं दोनों हाथ ऊपर उठाये, "क्या खूब लिखा है जहांपनाह...............आपका ये हुनर भी माशा अल्लाह, आप तो धरती को बख्शी गई खुदा की नेमत हैं नेमत.........कलम तोड़ दी है हुजूर कलम.......जी करता है लिखने वाले के हाथ चूम लूं।"
बादशाह सलामत ने हड़बड़ा कर अपने हाथ पीछे खींचे और घबरा कर बोले, "कलम कहॉ टूटी है पंचम, कलम तो साबुत है, ये देखो..........."
"नहीं हुजूर ये मुहावरा है। जब कोई नायाब शाहकार लिखता है तो ये कहने का रिवाज़ है कि कलम तोड दी"
"ओहो", बादशाह सलामत फूल कर कुप्पा हो गये।
"बीरबल पंचम अब आपकी ये जिम्मेदारी है कि हमारी ये विज्ञान कथा किसी नामचीन रिसाले में शाया हो, जरुरत पड़े तो इसके एवज में उस रिसाले हो इफरात में सरकारी इश्तहार दे दिये जायें।"
"हुजूर की ज़र्रानवाज़ी है जो बन्दे को इस काबिल समझा। आप मान लीजिये कि काम हो गया। अदब के फील्ड में भी मशहूर होने को तैयार हो जाइये हुजूर।"

बादशाही विज्ञान कथा की रॉयल्टी
बीरबल तो बालू में से भी तेल निकालने के उस्ताद थे सो अगले दिन ही रिसालों में इश्तहार दे दिये गये कि बादशाह सलामत ने एक नायाब विज्ञान कथा लिखी है। ये दुनिया की "किसी बादशाह द्वारा लिखी पहली विज्ञान कथा" है। इसे प्रकाशित करने के मुन्तज़िर प्रकाशक अपने बायोडेटा व रायल्टी की रक़म के साथ शाही दफ्तर में तशरीफ लायें।

जैसा कि बीरबल को उम्मीद थी, लोगों में बादशाह की विज्ञान कथा छापने की होड़ लग गई। हर कोई जानता था कि खुद बादशाह सलामत से नजदीकी का मतलब क्या होता है....... रिसाले को सरकारी इश्तहारों से भर दिया जायेगा और कहीं बादशाह की नज़रे करम हो गई तो दरबार मे सीट मिलना भी कोई अजूबा नहीं। कई औद्योगिक घरानों ने तो आनन-फानन में अपने नये प्रकाशन ही शुरू कर दिये।

काफी जिद्दोजहद के बाद बीरबल ने सल्तनत के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के ताज़ातरीन शुरू हुये रिसाले पर करम कर दिया। पिछले "पांच साला स्वांग" में इस घराने नें बीरबल को चुनाव फण्ड में इतने पैसे दिये थे कि अंधाधुध खर्च करने के बाद भी एक अच्छी-ख़ासी रक़म बच गई थी। आखिर सौदागर राजनीति में पैसा लगाते काहे को हैं......वक्त पर सहूलियतें पाने के लिये ही तो।

बादशाही विज्ञान कथा की तारीफे रिसालों में छपतीं थी। अखबारनवीसों, नामानिगारों के पास तो मानो इसके अलावा और कोई चर्चा ही न थी। वे बडे-बडे रिव्यू लिखते और बादशाह की तारीफों के पुल बांध देते । ऐसे लेखक रिव्यू के नीचे बाकायदा अपना नाम पता और फोन नम्बर भी लिखते, पता नहीं कब बादशाह सलामत की नज़र में चढ़ जायें ओर जिन्दगी में चिरागां हो जाये। कुछ लोगों ने बाकायदा बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स बनवाइं जिसमें बादशाह को विज्ञान कथा को धन्य करने पर मुबारकबाद दी गई होती थी ओर नीचे निवेदकों के फोटो, जिनके चन्दे से ये होर्डिग खडी गई होती थी। अकसर ये स्थानीय गुण्डे होते या राजनैतिक छुटभइये जो हमेशा कहीं "लटक लेने" की फिराक में रहते। हालांकि ये सारे लोग जब अपने कुछ खासमखास दोस्तों के साथ होते तो दो पैग गटकते ही सच बोलने लगते, "देखा साली मेढ़की को भी जुकाम हो गया.....? काला अक्षर भैंस बराबर..........लिखने चले हैं विज्ञान कथा। विज्ञान कथा लिखना न हुआ हगना-मूतना हो गया कि जहां चाहा कर मारा.....वाह विज्ञान कथा....न साली में विज्ञान है न कथा, पढ़ो तो सर में दर्द हो जाता है। मगर करें क्या? वृन्दावन मे रहना है तो राधे-राधे कहना है।"

ये सारे लोग रात को नशे में ये कह तो जाते पर सवेरे नशा उतरते ही एक दूसरे के घर भागते और एक दूसरे से कसम लेते देते कि रात को नशे की झोंक में न हमने कुछ कहा है, न तुमने ही कुछ सुना है.....इसकी किसी को कानों कान खबर न हो।

बड़े-बड़े सभागार किराये पर लिये जाते, इसरार कर के उनमें "सरकारी अदीबों" को न्योते दिये जाते। फिर वहंा उनसे बादशाही विज्ञान कथा की प्रंशसा की उिल्टयां कराईं जातीं। सबको इसके एवज में मोटे-मोटे लिफाफे की शक्ल में पत्रम्-पश्पम् देकर रुखसत किया जाता। बीरबल और उनकी मण्डली आज कल बहुत बिजी चल रही थी क्योकि विज्ञान कथा पर बादशाह द्वारा किये गये इस उपकार के लिये वे बादशाह सलामत का एक भव्य सम्मान समारोह करने वाले थे
 
और फिर वह समीक्षा:
बादशाह सलामत सुरूर में थे, कुछ तारीफों के कुछ शैम्पेन के। आस-पास बैठे थे कई चापलूस जो बादशाह की शान में कसीदे पढ़े जा रहे थे। एक नशा दूसरे को गहरा कर रहा था। जाहिर है ये सारी महिफिल पंचम ने ही जुटाई थी। तभी द्वारपाल ने आकर किसी के बाहर जाने की सूचना दी जिसे अन्दर ही बुला लिया गया।
आने वाला परिचित ही था, बीरबल पंचम की मण्डली का ही एक गुर्गा । आते ही उसने एक तुड़ा-मुड़ा अखबार बीरबल की ओर बढ़ाया।
"क्या है," बीरबल ने पूछा।
"खुद ही देख लीजिये," बादशाह की विज्ञान कथा की समीक्षा छपी है।"
"समीक्षा" बादशाह ने झपटकर अखबार ले लिया और आंखे मिचमिचा का पढ़ने लगे। बादशाह सलामत जैसे-जैसे आगे पढते जाते, उनके चेेहरे एक रंग सुर्ख होता जाता था। बीरबल पंचम के भी कान खड़े हुये। आखिर माजरा क्या है?

बादशाह सलामत तब तक सारा मजमून पढ़ चुके थे, उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था।
"नामाकूल" बादशाह सलामत चिल्लाये।
"क्या हुआ हुजूर", बीरबल पंचम इस तरह घिघियाये गरचे नामाकूलपन का काम उन्हीं ने अंजाम दिया हो।
"ये देखो", बादशाह सलामत ने अखबार बीरबल की ओर फेंका, "साले इस टटपूंजिये लेखक की हिम्मत तो देखो................,अरे जब कोई अच्छा काम किया जाता है तो उसकी तारीफ की जाती है.........आखिर हिन्दी विज्ञान कथा में हमारे अलावा लोग ही कितने हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं.............इस नामाकूल को विज्ञान कथा की समझ ही कितनी है..........किसी की चार विज्ञान कथायें छप जाने से क्या उस में विज्ञान कथा की समझ पैदा हो जाती है....", बादशाह के मुंह से गालियों का सैलाब उमड़ा।
बीरबल हड़बड़ाहट में अखबार खोलकर जल्दी-जल्दी पढ़ने लगे। पहले पेज पर ही तो छपा था "न विज्ञान, न कथा : बादशाही विज्ञान कथा"। ये तो उसी खुराफाती लेखक का अखबार था जो अपने आपको सल्तनत का "वाहिद (अकेला) ईमानदार अदीब" कह कर तार्रूफ कराता था.......दो टूक बात ही करता था, चाहे भली लगे या बुरी। हां अदीबों में उसका रुतबा था इसीलिये बीरबल ने भी उसे एक बार तो भाव भी दिये थे पर उसकी "ईमानदाराना हरकतों" से तंग आकर बीरबल ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके बहुत से प्रकाशनों में उसी रचनाओं के प्रकाशन पर आघोशित बैन लगवा दिया था। मगर वह काड़ियल आदमी था। उसने अपना सब कुछ दॉव पर लगाकर एक प्रेस खोल लिया था, उसी से वह चार पेज का ये अखबार छापता था जिसे खरीदकर पढ़ने वाले शायद ही दस पांच लोग थे।

"आखिर सच्चाई सारी कोशिशों बावजूद सामने आ ही गई", बीरबल मन ही मन सोच रहे थे।

"इस मच्छर जैसे अदना लेखक को मैनेज नहीं कर सके तुम सब", बादशाह दहाड़े, पूरी सल्तनत क्या मैनेज करेंगे आप? मैने पिछली बार ही कहा था कि ठिकाने लगवा दो साले को पर आपको न तो न जाने कितने डर थे? बीरबल की सबके सामने नीची हो रही भी सो बादशाह के सुर में सुर मिलाते हुये बोले "अभी नामाकूल का हिसाब करता हूं..........आप खातिर जमा रखिये" और महफिल बर्खास्त हो गई।

इस वाकये क्या अन्त हुआ होगा क्या अब भी ये बताने की जरूरत है? इसके बाद उस अड़ियल ईमानदार अदीब की पेरस में कई बार अश्लील साहित्य बरामद हुआ जिसके चलते उसे कई बार जेल की हवा खानी पड़ी। बेमौसम ही उसकी पेरस में आग लग गई, जिसमें उसका सब-कुछ जल कर खाक हो गया। उसे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया जाने लगा और अन्तत:एक दिन राजधानी के अखबारों में चौथे पेज पर चौथाई कालम की एक खबर छपी "प्रतिबन्धित आन्तक वादी संगठन................का प्रेस सचिव गिरफ्तारी से बच कर भागने की कोशिश में राजधानी की पुलिस की गोलियों का शिकार"।

नीचे जिस कड़ियल आदमी की तस्वीर छपी थी, उसे सल्लतन के अदीबों ने पहचानकर भी नहीं पहचाना कि ये उसी अड़ियल अदीब की तस्वीर है जिसने बादशाही विज्ञान कथा की "वह बकवास समीक्षा" छापी थी। जो हश्र उसका हुआ, खुदा करे किसी का न हो।

हां उसके बाद अपनी पहली विज्ञान कथा की तारीफों से उत्साहित हो बादशाह ने और भी कई विज्ञान कथायें लिखीं (छपवाई) वे सब अब पुस्तकाकार में आने वाली हैं। बीरबल पंचम बादशाह को सल्तनत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान "विज्ञान कथा भूशण" दिये जाने के लिये आयोजित होने वाले भव्य समारोह की तैयारी में बहुत बिजी हैं।


पुनश्च:- प्रिय पाठक, उपर्युक्त व्यंग कथा पढ़ कर क्या आपको हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों में फैली किसी दुष्पृवत्ति की याद आती है। यदि आपके आस-पास आपके कोई मित्र या परिचित लेखक प्रमादवश, स्वार्थवश या भ्रमवश इस प्रवत्ति को शिकार हों जो दूसरों की रचनाओं की समीक्षा करते समय रचनाओं के गुण दोश पर न जाकर आपसी सम्बन्धों के कारण या किसी प्रतिदान की आशा में उनकी किसी भी प्रकार की रचनाओं का गुणगान करने से न थकतें हो तो उन्हें समझाइये कि उनकी ये हरकत उनकी आत्मिक तुष्टि और स्वार्थसिद्धि का साधन तो हो सकती है पर इससे हिन्दी विज्ञान कथा का नुकसान ही होगा।



Main menu 2

by Dr. Radut.