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विज्ञानकथा : अतीत वर्तमान एवं भविष्य

वैदिक वाङ्मय, महाभारत, रामायण और पुराणों में उल्ल्खिखित विविध प्रकार के आख्यान, कथाएँ भारतीय जीवन के संवेग और संकल्प के मुख्य बिन्दु हैं। ये आख्यान और रोचक विवरण हमारी सांस्कृतिक शाश्वतता और सततता के ऊर्जा स्रोत हैं। भारतीयता की भागीरथी के अक्षुण्ण प्रवाह के कारक हैं। ये कथाएँ भारतीय मनीषी ऋषियों की उर्वर मेधा की सजनात्मक शक्ति की जीवंत प्रतीक है। इन आख्यानों, कथाओं की मधुमय शक्ति है कथ्यों तथा तथ्यों का रोचक रूप में मानवीकरण, जिसके कारण अतीत की स्मृतियों आज भी जनमानस में सुरक्षित है, रची-बसी हैं।

इन विविध कथाओं में निहित चेतनामूलक इतिहास का अंश आलंकारिक होकर, मिथक बनकर जनमानस में बैठकर, एक ओर दुरूह परिस्थितियों में व्यक्ति को जीवन संबल प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर यह स्वस्थ मनोरंजन करने में सक्षम सिद्ध होता है। प्रत्येक मिथक की, कथा की मधुयुक्त नाभि में, निहित होता है तथ्य, जो सूक्ष्म होते हुए भी, अपना आभास देता है।

जिन कथाओं में यह सूक्ष्म तथ्य विज्ञानसम्मत है, विज्ञान के ज्ञान का आभास देता है, भविष्य के बिंब प्रस्तुत है, जिसके कारण कथा सामान्य कथा से भिन्नता प्रदर्शित करती है, उसे ही विज्ञान कथा कहा जाता है। इन कथाओं में निहित भविष्य दर्शन का गुण उन्हें विशिष्टता तो प्रदान करता ही है, साथ ही साथ यह तथ्य कथा के सृजनात्मक चिंतनशक्ति गुण को भी दर्शाता है।

पुराकालीन कथाएँ, वेदों, पुराणादि बिखरी हुई हैं और इनमें से कथा में निहित विज्ञानसम्मत तथ्य की खोज चिंतनपरक कार्य है। संभवतः यही मुख्य कारण था कि पुराकालीन कथाओं पर, इतिहासविदों और साहित्यकारों की दृष्टि पड़ी परन्तु वैज्ञानिकों ने इन पर दृष्टिपात नहीं किया।

भारत में विज्ञान के विकास के इस युग में में, इन कथाओं पर विज्ञानसम्मत दृष्टि से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि अनेक कथाओं में भविष्यद्रष्टा ऋषियों की दृष्टि में रचा-बसा विज्ञान प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उदाहरण के लिए भारतीय वाङ्मय में, पुराणों में, वेदों में वर्णित विमानों की ही चर्चा आज भी पश्चिमोपासाक भारतीयों के मानस में संशय उत्पन्न करती है। परन्तु तथ्य ऐसा नहीं है।

अतीत के बिम्ब
राइट बंधुओं के विमान के आविष्कार के लगभग दस वर्ष पूर्व 1865 ई. में श्री शिवकर बापू जी तलपदे ऋग्वेद में वर्णित ‘मरुत सखा’ तथा वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान’ के विवरणों के आधार पर वायुमान का एक मॉडल तैयार था।

श्री तलपदे उन दिनों बॉम्बे स्कूल ऑफ आर्ट्स में अध्यापक थे। उन्होंने उपलब्ध वैदिक साहित्य मुख्यतः ऋग्वेद का विमानों में संदर्भ में विशेष अध्ययन किया था और उसी आधार पर विमान, जिसका नाम उन्होंने ‘मरुत सखा’ था, का निर्माण भी किया था। इस आधुनिक ‘मरुत सखा’ का प्रदर्शन उन्होंने 1865 ई. में बंबई (अब मुम्बई) चौपाटी  के मैदान में तत्कालीन बड़ौदा नरेश महाराजा सर सयाजी राव गायकवाड़, श्री लाल जी नारायण और मुम्बई के अन्य गणमान्य नागरिकों के सम्मुख किया था। यह विमान बिना किसी चालक के 15 फीट ऊँचाई तक उड़ा था और फिर स्वतः धरती पर वापस आ गया  था। उसमें एक निश्चित ऊँचाई तक पहुँचकर नीचे उतर आने का एक यंत्र लगाया गया था।

विमान-निर्माण के प्राचीन ग्रंथों में भारद्वाज कृत ‘विमान शास्त्र’, ‘अगस्त संहिता’, समरांगण सूत्रधार आदि ग्रंथ चर्चित हैं। आवश्यकता है उनमें निहित वैज्ञानिक तथ्यों के सूक्ष्म विवेचन की। भारत की प्राचीन वैमानिक कला के नष्ट होने का एक प्रमुख कारण है, इस विधा से सम्बन्धित पांडुलिपियों के नष्ट  हो जाने के कारण उनकी दुर्लभता तथा उपलब्ध पांडुलिपियों की, में मिश्रित किए गए प्रक्षिप्त अंशों के कारण, तथ्यपरकता का अभाव। परन्तु इसके उपरान्त प्राचीन काल की वैमानिक विधा असंदिग्ध है। लेखक की प्रकाशित ‘वैज्ञानिक पुराकथाएँ’ नामक संग्रह की विमान संबन्धित त्रिपुर, अंतरिक्ष में तीन नगर, मनचालित विमान-सौभ, हिरण्यनगर नामक कथाएँ, इसके पुराकालीन अस्तित्व की साक्षी है।1

भारत का आयुर्विज्ञान कितना विकसित था, सर्जरी कितनी विकसित थी, इसके प्रमाण चरक संहिता तथा आयुर्वेद संबन्धित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध हैं। इसी के दर्शन अश्विद्वय के चिकित्सकीय उपलब्धि के विवरणों में, और आज प्रयोग में लाई जा रही विविध आयुवैदिक औषधियों के साथ-साथ ‘महर्षि च्यवन’ के पुनयौंवन प्रदायक च्यवनप्राश के प्रयोग से स्पष्ट है। इसी प्रकार ‘क्षार-सूत्र’ पद्धति जो सर्जर  शल्य- शाल्यक के अमर ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ में वर्णित है, का अर्श (बवासीर) के निदान में प्रयोग आज भी हो रहा है। उपर्युक्त संग्रह की संजीवनी, महर्षि भृगु का चमत्कार महर्षि च्यवन, विशल्या, अश्विद्वय, गणेश, महर्षि दध्यङ तथा उपमन्यु नामक कथाएँ  हमारे पुराकालीन आयुर्वेदीय ज्ञान की परिचायक हैं।1

बुढ़ापा एवं मृत्यु का भय मनुष्य को सदैव से सताता रहा है। दीर्घ और अमर जीवन तथा सदैव यौवनयुक्त रहने की मानव की अनादिकाल से कामना रही है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानव सदैव प्रयत्नशील रहा है। इसी प्रभाव का प्रतिबिंब समुद्र-मंथन और राजा ययाति नामक कथाओं में विद्यमान है। आज भी चिकित्सक एवं वैज्ञानिक अमरात्व एवं सुदीर्घ यौवन प्रदान करने वाली औषधियों के निर्माण करने के प्रयास में लगे हुए है।

पर्यावरण के क्षरण और औद्योगिक प्रगति के बहुआयामी प्रसार से उत्पन्न से होने वाले ठोस, द्रव एवं गैसीय पदार्थों के कारण वातावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है, इस तथ्य से सभी परिचित हैं। प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य का सीधा संबन्ध है।

अनेक प्रकार के रसायन जो वातावरण में प्रदूषण के फलस्वरूप विद्यमान है2, के प्रभाव के कारण आने वाले समय में लिंग-परिवर्तन की घटनाओं में वृद्धि होगी। उसका प्रभाव अब दृष्टिगोचर होने लगा है। आधुनिक शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के माध्यम से सेक्स-ट्रॉसफॉरमेशन के ऑपरेशन अब समाज में कुतुहल के मामले नहीं रह गए हैं। लोग इस प्रकार के ऑपरेशन कराए हुए लोगों को सामान्य दृष्टि से देखते हैं।

सेक्स-ट्रॉसफॉरमेशन (लिंग-परिवर्तन) की घटनाएँ पुराकाल में भी होती रही होगी और इसी तथ्य की ओर इंगित करती कथाएँ हैं शिखंडी तथा इला की।1

मानवों में अपनी प्रजाति की सततता और उसकी वृद्धि का माध्यम है गर्भाधान। इस संदर्भ में वैदिक ऋषि कहता है ‘‘आर्या पतिं समाविश्य स यस्मान जायतेपुनः’’ प्रकृति का यह नियम इस धरा पर कहीं अपवाद नहीं है। परन्तु कभी-कभी यह गर्भाधान की क्रिया सामान्य रूप से संपादित नहीं हो पाती, उस स्थिति में कृत्रिम संसाधनों का सहारा लेना पड़ता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में इन विट्रो-फर्टीलाइजेशन कहते हैं आजकल यह संतान विहीन दम्पतियों को संतान लाभ कराने की लोकप्रिय विधि है। द्रोणाचार्य, कौरवों तथा वेन से उत्पन्न पुत्र की कथा प्राचीन आख्यानों में सुरक्षित है जो उस युग में भी मौजूद कृत्रिम गर्भाधान विधि की ओर संकेत करती है।1

पुरुष-शरीर में निहित स्तन-वृद्धि नियंत्रक और यौन कार्य संपादन में प्रभावी जैव रसायनों के स्राव में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप, आधुनिक विज्ञान में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुरुष में स्तन-वृद्धि ही नहीं होती वरन् उसके स्तनों से दुग्ध-स्राव भी हो सकता है। राजा मांधाता की कथा इसी  तथ्य को प्रदर्शित करती है।1

भारतीय संस्कृति का अविभाज्य अंग गणित है। इसके विषय में वेदांग ज्योतिष नामक ग्रंथ में कहा गया है-

यथा शिखा मयूराणाम् नागानाम् मणियो यथा।
तद्ववेदांग शास्त्रांणां गणित मूर्द्धनि स्थितम्।।

जिस प्रकार मयूरों की शिखाएँ तथा सर्पों की मणियाँ सर्वोपरि स्थान सर पर स्थित होती हैं, उसी प्रकार वेदांग शास्त्रों में गणित का स्थान सर्वोपरि है।

वास्तव में यह तथ्य अतिशयोक्ति रहित है। वैदिक काल के भारतीय गणितज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि गृत्समद ने शून्य का आविष्कार किया। दशमलव प्रणाली भी भारतीय चिंतक ऋषियों को अवदान है। इसी प्रकार एक से लेकर परार्ध 1x1012 तक की संख्याओं की चर्चा महर्षि मेधातिथि यजुर्वेद में करते हैं। महर्षि मेधातिथि ने ही इन संख्याओं को दस के गुणांकों में अंकित किया था।

गणित में निहित वैज्ञानिक तर्कशील पद्धति के उपयोग को प्रदर्शित करती कथाएँ हैं- ध्रुव, राजा त्रिशंक और असुर त्रित की ऋग्वेदिक कथा।1

अधिकांश भारतीय विज्ञानवेत्ता इस तथ्य को अब स्वीकार करते हैं कि शून्य की उत्पत्ति भारतीय ऋषि गृप्समद की उर्वर मेधा का परिणाम है तथा सूर्य चन्द्रमा का एवं पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमने के सिद्धान्त को भारतीय ऋषि एवं वैज्ञानिक आर्यभट्ट प्रथम ने ईसा की पांचवी सदी में अपनी आयु  के 23 वें वर्ष में ही, यूरोपीय वैज्ञानिक कोर्पनिक्स, से करीब हजार वर्षों पूर्व सिद्ध कर दिया था। इसी प्रकार भास्करचार्य द्वितीय ने 35 वर्ष की आयु में सन् 1150 में, सर आईजक-न्यूटन से सैकड़ों वर्षों पूर्व ‘‘आकृष्ट शाक्तिश्च महीतपायत स्वस्थ गुरू स्वाभिमुखं शक्तया’’ कहकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्ष सिद्धान्त का प्रतिपादन अपनी प्रसिद्ध कृति ‘‘सिद्धान्त शिरोमणि’’ में किया था। कालान्तर में यही तथ्य कल्पना के पंखों पर आसीन होकर, बहुचर्चित त्रिशंकु की कथा को जन्म देने में सफल हुए।1

हम आप सभी भागवत् पुराण में वर्णित राजा उत्तानपाद एवं ध्रुव की कथा से परिचति हैं। ज्योतिष के चरमोत्कर्ष के समय में नक्षत्रों के मानवीकरण के प्रयास द्वारा ज्योतिष के ज्ञान को, जन सामान्य तक संप्रेषित करने हेतु इन कथाओं की रचना की गयी थी।

भागवत् पुराण में वर्णित है कि राजा ध्रुव ने 36000 वर्षों तक राज्य किया था। यह प्रत्येक ज्योतिष का छात्र जानता है कि ध्रुव नक्षत्र एक राशि पर 3000 वर्षों तक रहता है। इस प्रकार 12 राशिओं वह वह 36000 वर्षों तक रहता है- यही इस नक्षत्र-ध्रुव का राज्य काल है। ध्रुव की भूमि नाम्नी पत्नी-जिसका अर्थ परिक्रमा भी होता है, से दो पुत्र उत्पन्न हुये थे।

यह सर्व विदित तथ्य है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक वर्ष में पूरी करती है। यह अवधि ‘‘वत्सर’’ कहलाती है। इसी शब्द में संवत शब्द संलिष्ट होकर संवत्सर बन गया है। सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र की परिक्रमा एक कल्प में पूरी करता है। यही ‘‘कल्प’’ ध्रुव की पत्नी भूमि का दूसरा पुत्र है। एक हजार चतुर्यगों का एक कल्प होता है।   

भागवत् पुराण में ‘‘वत्सर’’ की पत्नी स्ववीथी (अयन) के 6 पुत्र हैं। यही षड् ऋतुयें हैं जो वर्ष भर गतिमान रहती हैं। वत्सर के छठे पुत्र की पत्नी प्रभा है जिसके तीन पुत्र प्रातः, मध्यान्ह और सायं हैं। यह स्व-स्पष्ट तथ्य दिन के प्रहरों  से  संबद्ध है। इसी प्रकार की पैराणिक कथाएं तारामण्डल, चन्द्रमा एवं वृहस्पति आदि नक्षत्रों से संबन्धित हैं। संस्कृत साहित्य की विविध कथाआंे  में, यंत्रों का, सचल सीढ़ियों का, यंत्र चालित नौंकाओं का, धूमपूरित ऊपर उड़ने वाले गुब्बारों का, सुन्दर  वर्णन मिलता है। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ‘‘धूम पूरित-चर्म्मपुट, गैसपूरति गुब्बारों का प्रयोग उद्यन (670 ई.) के समय में बहुतायत से होता था। संक्षेप में विज्ञान समस्त तथ्यों को कथाओं का स्वरूप प्रदान कर हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ने एवं साहित्यार्चायों ने जनमानस में विज्ञान का संप्रेषण करने में अविस्मरणीय योगदान दिया है।

उपर्युक्त सभी कथाएँ मनोग्राही, एवं आकर्षक  ही नहीं है वरन् मैं उन्हें ‘‘प्रच्छन्न विज्ञान कथाएँ’’ मानता हूँ। जिनको प्रच्छन्न शब्द के उच्चारण में कष्ट है, ऐसे कुछ अंग्रेजीदाँ लोग इन्हें ‘‘प्रोटो-विज्ञान कथा कहते हैं पर इन विज्ञान कथाओं को वे आदि-विज्ञान कथा, भी आत्मसंतोष करने हेतु कह सकते हैं।

राजा ध्रुव की चर्चित कथा के उपरान्त ऋग्वेद (1,105,19) में वर्णित असुरत्रित नामक कथा पर दृष्टिपात करना आवश्यक हो जाता है। इन्द्र, देवराज इन्द्र के पराजित होकर असुर त्रित एक कुएं में छिप गया और उसके अनुयायियों ने उस कूप के मुख को घेर लिया। देवराज इन्द्र से असुर त्रित भगाने हेतु, उन्हें पराजित करने हेतु गुरु बृहस्पति से सहायता मांगी। देवगुरु के सहयोग से असुर पराजित हुआ और उसका का वध हुआ। यह अलंकारिक मंत्र निम्न है-

त्रितः कूपोवाहितो देवान्हवत ऊतए।
तछुश्राव वृहस्पतिः कुष्वन्न हूरणादुरु।।
(ऋग्वेद 1,105,19)

उस कूप के निर्माण में निहित तथ्य उसका पूर्ण-रुपेण गोल न होना था, उसकी दीवारे  900 पर नहीं थीं, इस कारण त्रित उसमें वासकर सका था। उस त्रृटि रूप असुर त्रित का शोधन, शमन गणितज्ञ देव गुरु बृहस्पति द्वारा कर दिया गया। इस प्रकार असुर त्रित का बध हो गया-कूप निर्माण में निहित त्रृटि दूर हो गयी। भविष्य में कूप निर्माण में इस तथ्य का ध्यान रखा जाने लगा। ऋग्वेद विश्व का धरोहर है, विश्व का सर्व प्राचीन ग्रन्थ है, और उसमें वर्णित असुर त्रित की कथा निश्चित रुपेण विश्व की प्रथम विज्ञान दर्शन कराती विज्ञान कथा है।1

इन लोक कथाओं के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी का कथन ‘‘इन कहानियों में कहानीपन की मात्रा इतनी अधिक है कि हजारों वर्षों से न, जाने कितने कहने वालों ने इन्हें  कितने ढंग से और कितनी प्रकार की भाषा ने कहा है-फिर भी इनका रसबोध ज्यों का त्यों बना हुआ है’’, यह रस बोध इन कथाओं की अमरता का द्योतक है एवं इस तथ्य की नाभि में निहित है कथानकों और कथोपकथन की सहजता।

यह निर्विवाद तथ्य है कि, क्लोनिंग तकनीक विशेषकर मानवीय संदर्भ में, पुरकाल के चिंतकों, वैज्ञानिकों का अज्ञात थी। वे इस प्रोद्यौगिकी की आधुनिक विधा से परिचित नहीं थे। परन्तु उनके उर्वर मस्तिष्क में संभवतः इस विधा के भविष्य में विकसित हो जाने के बिंब थे, जिसके कारण अर्थमानव, अर्धपशु की कल्पना उन्होंने नृसिंह के रूप में की थी। नृसिंह की कल्पना को रेखांकित करती यह कथा एक सुन्दर, प्रभावी भविष्योन्मुखी विज्ञान कथा है।1

भारतीय ऋषियों के रसायन ज्ञान का दर्शन कराती कथा है महर्षि आरुणि उद्दालक की (चर्चित श्वेतकेतु उपाख्यान के माध्यम से) बहुवर्णित मृत्यु के पूर्व अथवा मृत्यु के अवसर पर मानव का अपने सूक्ष्म शरीर, ‘अंगुष्ठ मात्रः पुरुषों ज्योतिरिवाधूमकः (कठोपनिषद् 1/2/13)’ के रहस्य को तन्त्रिका वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया। आधुनिक विज्ञान की संदेशवाहक बहुश्रुत कथा है- सत्यवान की।’1

एक वस्तु को अनेक स्वरूप प्रदान करना शिल्प है। भारतीयों कें शिल्प का ज्ञान विश्वविख्यात रहा है। हम सभी को शिल्प विद्या के प्रतिष्ठापक विश्वकर्मा और मय दानव की कथाएँ भली-भाँति ज्ञात हैं। वज्र के निर्माण में निहित शिल्प का प्रयोग वृत्तासुर-विनाश, सुदर्शन चक्र तथा महर्षि दधीचि की कथाओं में हुआ है।  

भारतीय ऋषि भूगर्भीय परिवर्तन, उनके परिणाम एवं प्रभाव से वे अछूते नहीं थे। उन्होंने पृथ्वी पर उभरते और पुनः धरा में लोप होते पर्वनों को देखा था। ऋग्वेद का यह मंत्र इसी तथ्य का उद्घोष करता है-‘‘यः पृथ्वी व्यथमानाभदृंह द्य पर्वतान  प्रकुपिकतां अरम्णास। यो अंतरिक्ष विममे वरीयो यो द्यातस्तम्नात्स जानस इन्द्रः।’’ (हे लोगों, जिससे व्यतिथ-हिलती पृथ्वी को दृढ़  किया। जिसने कुपित, चंचल क्षुब्ध पवतों को शान्त किया, जिसने आकाश की स्थिर किया, यह इन्द्र हैं।) जिस प्रकार खंड-प्रलय के उपरान्त अनंत सलिल राशि से धरा का पुनः प्राकट्य उनकी स्मृति में विद्यमान था, इसी भाँति भूगर्भीय गैसों की ज्वलनशीलता से वे पूर्ण परिचित थे। विंध्यगिरि, श्वेत वराह, खंड प्रलय एवं और्व-अग्नि नामक कथाएँ भूगर्भ के विविध पक्षों को चित्रित करती हैं।1

गणित और भौतिक विज्ञान एक दूसरे से जुड़े हुए हैं-सर्वविदित तथ्य है। प्रकाश के कणों को (फोटानों को) एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रेषित करना-अब फैक्स की भाँति संभव है। नारद के ब्रह्माण्ड भ्रमण में मुझे पदार्थ-पारण का प्रयोग दिखा तथा परमाणु-विस्फोट का आश्चर्यजनक, विवरण जो हमारे पुराणों, रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध है, वह आंखों द्वारा देखा हुआ प्रतीत होता है। क्या यह मात्र माननीय कल्पना, ऋषियों की कल्पना-शक्तिका प्रतिबिम्ब है अथवा इस प्रकार के लघु परमाणु-विस्फोट करने की (ब्रह्मास्त्र के माध्यम से) विधि ज्ञात थी? परीक्षित के जन्म की कथा इसी प्रकार के प्रभाव से सम्बद्ध हैं।1

यदि वामन अवतार की कथा सूर्य के प्रकाशपुंज विवर्तन के प्रभाव से जुड़ी है, तो वास्तविक अहल्या कौन थी, इस तथ्य को, इस कथा को सरमा (जो इन्द्र की कुतिया थी) की कथा में निहित आलंकारिक तत्त्वों के विवेचन से समझा जा सकता है।1 उर्वशी के नाम से, शची पति देवराज इंद्र के नाम से, उनकी कथा से सभी परिचित हैं। देवराज शचिपति इन्द्र स्वर्ग का स्वामी था। परन्तु यह स्वर्ग था कहाँ? यह विचारणीय प्रश्न है।

कश्यप सागर के, कैस्पियन सागर के क्षेत्र में, कश्यप के पुत्रों में, देवों और दैत्यों-दानवों के मध्य बारह देवासुर संग्राम हुए थे। इनमें से अनेक संग्रामों में देवों को विजयश्री दिलाने में उनके नायक का इन्द्र का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अधिकांश देवासुर संग्रामों की पृष्ठभूमि में, भू-क्षेत्र का विवाद रहता था।

उस पुराकालीन समय में आर्यगण अजर वाइजो-आर्यवाइजो क्षेत्र जो आधुनिक अजर बाईजान (रूसी और ईरानी) हैं-में अपना विस्तार कर रहे थे।  यह तथ्य पारसियों-प्राचीन ईरानियों, अग्निपूजक आर्यों के विवरणों में जिंद अवेस्ता’ में सुरक्षित है।

प्राचीन ईरानी आर्यों की भोगवादिता प्राचीन काल से ही चर्चित रही है-जिसकी झलक विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक, चिंतक, ज्योतिषी, गणितज्ञ और जीवन रस पान के कवि, उमर खय्याम की रुबाइयों को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है। ईरानी विवरणों के अनुसार स्वर्ग, इन्द्र की राजधानी आधुनिक गिरिराज एल्बुर्ज की उपत्यका में स्थित थी। उर्वशी स्वर्ग-स्थित इन्द्र सभा की मुख्य   नर्तकी थी। रंजित वर्णनकर्त्ता हमारे पुराणकारों ने उसको स्वर्ग की वेश्या के रूप में चित्रित करके उसकी (उर्वशी की) की दुर्दशा कर डाली है।

वास्तव में  आलंकारिक वैदिक भाषा में उर्वशी-उषा का प्रतीक है इस पक्ष से जुड़ी अहल्या, सरमा की कथाओं से लोग कम परिचित हैं। इनसे सम्बन्धित भ्रान्तियों के निराकरण तथा इनकी कथाओं में निहित तथ्यों के स्पष्टीकरण का ध्यान में रखकर, से कथाएँ संग्रहीत की गई हैं।

भारतीय मनीषियों ने   विविध कथाओं का मानवीकरण कर, इन कथाओं को अमरत्व प्रदान किया है। ये कथाएँ जन-मानस की स्मृति का अंश बनकर, भारतीय संस्कृति की शाश्वत परम्परा की ध्वजवाहक बन गई हैं।

ऋग्वेद में वर्णित असुर त्रित की गणित संबंधी कथा प्राचीनतम विज्ञान कथा है तथा शून्य की, अंकों की एवं बौधायन प्रमेय (जिसे भ्रमवश) पायथागोरस प्रमेय कहा जाता है की भाँति ही, विज्ञान कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है, न कि योरप।

वर्तमान-परिदृश्य
आधुनिक विज्ञान-कथाओं के सृजन के परिदृश्य में ल्युसियन ऑफ सोनासाटा की चन्द्रा यात्रा संबन्धित कथा, जो 160 इस्वी में लिखी गयी थी और जिसका विवरण ‘‘वेर-हिस्टोरिया’’ में है, को निश्चित रूपेण योरप को पहली विज्ञान कथा माना जा सकता है। इस कथा का नायक ल्युसियन वायु की शक्ति से चन्द्रमा की यात्रा कर पृथ्वी से भिन्न चन्द्रवासियों से भेट करता है। यह भिन्नता शारीरिक ही नहीं वरन् सांस्कृतिक भी होती   है, जिसका विवरण इस कथा को विशिष्टता प्रदान करता है।

लेखन और चित्रांकन में यद्यपि भावों की अभिव्यक्ति की मूल भावना निहित रहती है परन्तु बहुत  ही कम चित्रकार सफल लेखक होते है। चित्रकार अपनी कल्पनाओं को मूर्त स्वरूप रेखाओं के माध्यम से देता है और लेखक शब्दों के माध्यम से, अक्षरों के माध्यम से। इस तथ्य की कसौटी पर लियोनार्दो द विंची वैज्ञानिक चितेरे हो सकते हैं, विज्ञान कथाकार नहीं।2

आधुनिक विज्ञान का जन्म योरप में हुआ अतः इस विधा के जन्म के उषाकाल में विज्ञान दृष्टि युक्त कथाओं का प्रणयन डैनियल डिफो की विज्ञान कथा, गल्प, फैन्तासी ‘द कन्सालिडेटर’ का सृजन ई. 1705 में एक महत्त्वपूर्ण अवदान प्रतीत होता है। परन्तु तथ्यतः वास्तविक विज्ञान कथा प्रसिद्ध रोमांटिक, आंग्ल कवि पी.वी. शैली की पत्नी मेरी शैली (1749-1851) की लेखनी से ‘‘फ्रेन्केस्टाइन’’ के रूप में निसृत हुई थी।

पश्चिमी विज्ञान कथा का वास्तविक शंखनाद प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक, कवि एडगर पो. द्वारा ‘‘बैलून होक्स’’ के रूप में 1844 ई0 में किया गया था। इस कथा के कारण एडगर एलन पो. प्रथम विज्ञान कथाकार के रूप में चर्चित ही नहीं हुए वरन ख्याति प्राप्त विज्ञान लेखक एवं इस पत्रिका के संपादक हयूगो गन्सबैक ने उन्हें ‘‘फादर ऑफ साइन्टीफिक्शन’’ माना था। वास्तव में इसी शब्द का संशोधित रूप है ‘‘साइन्स फिक्शन’’। पश्चिमी गोलार्थ में योरप और अमेरिका में सृजित हो रही  विज्ञान कथाओं के करीब चालीस वर्ष बाद मूर्धन्य वैज्ञानिक सर जगदीश चन्द्र बसु द्वारा बंगाल की प्रथम विज्ञान कथा ‘‘पालतक तूफान’’ 1897 ई. में भारत में प्रकाशित हुयी थी।

बंगाली भाषा के, बंग्ला साहित्य की भाँति मराठी भाषा का भी साहित्य अतीव समृद्ध है परन्तु इस भाषा की प्रथम विज्ञान कथा ‘तरचेहास्य’ 1915 में प्रकाशित हुई थी, उपर्युक्त दोनों कथाओं में विज्ञान का सम्पुट था। ‘पलातक तूफान’ (तूफान पर विजय) सरफेस टेन्शन पर आधारित थी तो तरचेहास्य (तारे के रहस्य) तारे के विज्ञान सम्मत पक्ष से संबन्धित थी।

पश्चिमी गोलार्थ में सृजित क्रमशः एडगर एलन पो, जूल्स बर्न, एच.जी.बेल्स की रोचक रोमांचक विज्ञान कथाओं का प्रभाव बंगला, मराठी तथा हिन्दी की अनुदित तथा मौलिक कथाओं पर स्पष्ट रूप से दृष्टि गोचर होने लगा था। यह कहना अतिशयोक्ति  पूर्ण नहीं होगा कि हिन्दी की प्रथम लम्बी विज्ञान कथा ‘‘आश्चर्य वृत्तान्त’’ जो साहित्याचार्य पं. अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900) द्वारा विरचित तथा उन्हीं के समाचार पत्र ‘‘पीयूष प्रवाह’’ में 1884 से 1888 तक के अंकों में प्रकाशित होती रही,4 वह भी जूल्स बर्न के उपन्यास ‘जर्नी टू सेन्टर आफ द अर्थ’ के चुम्बकीय प्रभाव से अछूती न रह सकी।

इसी प्रकार बाबू केशव प्रसाद सिंह द्वारा5 लिखी गई और उस युग की प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिका सरस्वती के भाग 1 संख्या 6, 1900 ई. के अंक में प्रकाशित ‘‘चन्द्र लोक की यात्रा’’5 जूल्स बर्न के उपन्यास ‘‘फाइव वीक्स इन बैलून’’ के प्रभाव से मुक्त नहीं है। इन दोनों कथाओं के अनुशीलन से एक तथ्य बार-बार स्पष्ट  रूप से दिखलाई पड़ता है। कि इनके लेखकों ने इन कथाओं में भारतीय परिवेश को सुन्दर रूप से चित्रित एवं स्थापित करने का सहरानीय प्रयास किया है। इतना ही नहीं वरन् अब हिन्दी कि विज्ञान कथा इतिहास में ‘‘आश्चर्य वृत्तान्त’’ को बंगाली एवं मराठी विज्ञान कथाओं के पूर्ववर्ती होने का गौरव प्राप्त हो चुका है। सरस्वती में ही, सत्यदेव परिव्राजक की विज्ञान कथा जो भौतिक के अनुवाद सिद्धान्त पर आधारित थी, तथा जिसके पात्र और पृष्ठभूमि अभारतीय थे, ईस्वी 1908 में ‘‘आश्चर्यजनक घण्टी’’ के नाम से प्रकाशित हुई थी। सत्यदेव परिव्राजक की यह कथा उनके दीर्घकालीन विदेश प्रवास एवं अमेरिकन विश्व विद्यालयों में विज्ञान के अध्ययन का परिणाम थी। इस कथा को विज्ञान कथा के इतिहास के अध्येयताओं हेतु विज्ञान कथा त्रैमासिक में पुनर्प्रकाशित किया जा चुका है।6

ऐतिहासिक क्रम से चलते हुए प्रकाश के अपवर्तन पर आधारित प्रेम बल्लभ जोशी की ‘‘छायापुरुष’’ सन् 1915 विज्ञान परिषद प्रयाग की पत्रिका ‘‘विज्ञान’’ में प्रकाशित हुई थी तथा इसी समय अनादिघन वंदोपाध्याय की मंगल मात्रा (1915-16) भी प्रकाश में आई थी। जिसमें पृथ्वी से चार इंच ऊपर रहकर चलने वाली विद्युत गड़ियों की चर्चा है जो क्या आज की मैग्निटिक ट्रेनें नहीं हैं?

इस कथा के प्रकाशित होने के उपरान्त हिन्दी का विपुल पाठक वर्ग, देवकी नन्दन खत्री (1861-1913) जो काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अल्पकाल तक अध्यक्ष रहे थे, ‘चन्द्रकान्ता संतति’ के आकर्षक वर्णनों में डूबा रहा। फलस्वरूप उर्दू का विशाल पाठक वर्ग भी इन उपन्यासों को पढ़ने का  आनन्द उठाने हेतु हिन्दी सीखने को आतुर हो गया। देवकी नन्दन खत्री का तिलिस्म और ऐयार पाठकों के सर सवार होकर इन उपन्यासों की प्रशस्ति ही नहीं गाने लगा वरन् इन पाठकों के माध्यम से हिन्दी भाषा की भी वृद्धि करने में प्रभावी रहा।

आज हम हयूगों गंर्सबैक द्वारा स्थापित विज्ञान कथा की विश्वविद्यालय पत्रिका ‘‘अर्मेजिंग स्टोरीज’’ से परिचित से हैं तथा अमेरिका की दूसरों पत्रिकाओं यथा ‘‘मैगजीन आफ फैन्टसी एण्ड साइंस फिक्शन’’, इन्इरजोन, ‘‘एनालाग साइंस फिक्शन एण्ड फैक्ट्स’’ ‘‘आसिमोवस साइंस फिक्शन’’ आदि पत्रिकाओं के विज्ञान कथा के सृजन क्षेत्र में उनके द्वारा किए जा रहे अवदानों  से परिचित हैं। इन पत्रिकाओं विशेषकर ‘‘मैंगजीन आफ फैन्टेसी एण्ड साइंस फिक्शन’’ से जहाँ एक तरफ हाईकोर विज्ञान कथाएं प्रकाशित होती हैं, जैसे ‘आधुनिक ययाति’ नामक विज्ञान कथा संग्रह की ‘‘डॉ. अलबर्तों वापस न आ सके7 वहीं दूसरी तरफ इस पत्रिका में स्वैरता युक्त, फैन्टेसी युक्त, विज्ञान कथाएँ प्रकाशित होती हैं।’’

स्वैरता-फैन्टासी और तिलिस्म का अर्थ जादू, इन्द्रजाल, करामात आदि होता है, परन्तु इसका उद्भव अरबिक है और वहाँ पर भी यह शब्द का समानार्थी रूप में प्रयोग हो है। फैन्टासी शब्द का अर्थ-इमैजिनेशन, मेन्टल इमेज, आदि हैं। इसी कारण देवकीनन्दन खत्री की ‘चन्द्राकान्ता’ एवं ‘‘चन्द्राकान्ता-संतति’’ में जहाँ पर एक तरफ रंजित विवरण हैं वहीं दूसरी तरफ उन विवरणों में निहित अनेक वैज्ञानिक तथ्य भी हैं, जो इस लेखक की लेखनी के प्रभाव के कारण, क्षमता, के कारण कुछ समय बाद विज्ञान की प्रगति के फलस्वरूप सत्य सिद्ध हुए हैं। क्या यह भविष्य दर्शन नहीं है? क्या यह विज्ञान कथा का एक शिष्ट गुण नहीं है? अब मैं इन उपन्यासों में वर्णित कुछ तथ्यों की चर्चा करना चाहँगा।

यह सर्वाविदित तथ्य है कि ऐयारों के बटुए में बहुत सी वस्तुओं के साथ दो बड़े काम की चीजें रहती थीं । बुकनी और लखलखा। बुकनी किसी प्रकार का भी जड़ी बूटी निर्मित चूर्ण रहा हो जो व्यक्ति को बेहोश करने में सक्षम था तथा लखलखा-अमोनियम क्लोराइड और चूने का सम्भावित मिश्रण सदृष्य कोई वानस्पतिक-मिश्रण रहता होगा-जो (अमोनिया गैस उत्पन्न कर) व्यक्ति को होश में लाने का एक साधन था। इसके प्रयोग से प्रभावित व्यक्ति छींकता हुआ चैतन्य हो जाता है।

इस प्रकार तिलिस्म के भीतर और बाहर बहुत से आतंकित करने वाले आश्चर्यजनक कार्य होते रहते थे जैसे टियर गैस, अश्रु गैसे के फटने से वातावरण का विषाक्त होना, किसी दीवार पर खड़े हुए व्यक्ति का कुछ देर तक नीचे देर तक नीचे देखने के प्रयास के परिणाम स्वरूप नीचे हँसते हुए कूद जाना। क्या यह लाफिंग गैस नाईट्रस आक्साइड का प्रभाव नहीं हो सकता जो किसी अज्ञात हो चुकी विधि द्वारा उत्पन्न की जाती रही होगी? तिलिस्म के भीतर बाजे से गाना सुनाई पड़ना, आधुनिक केसेट रेकार्ड की भाँति, किसी चौकी का चलना, ऊपर नीचे आना (लिफ्ट) चलने वाली पुतलियाँ, (स्यूडोरोबो) स्वतः  खुलने और बन्द होने वाले दरवाजे आटोमेटिक डोर, आज कोई आश्चर्य उत्पन्न नहीं करते पर उस युग में इस प्रकार के विवरण किसी पाठक को चमत्कृत करने के लिए पर्याप्त ही नहीं वरन व प्रभावी रूप में लोकरंजन करने में सफल सिद्ध हुए थे।8

यहाँ पर यह इंगित करना समीचीन होगा कि आगरा के ताजमहल में लगे फौव्वारों को, जो उसके निर्माता के जीवन काल में पूर्णरूपेण कार्यरत थे, उन्हें आज अनेक प्रयास के बाद भी चलाया नहीं जा सका है क्योंकि उनको चलाने की तकनीक का हम समझ नहीं पा रहे हैं। इस कारण उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उन कृतियों के वर्णनों को प्रच्छन्न विज्ञान कथाओं की श्रेणी में रखना उचित होगा न कि उन्हें मानस्विता वश, खारिज कर देना।

देवकीनन्दन खत्री के पुत्र भी दुर्गा प्रसाद खत्री (1895-1974) ने अनेक वैज्ञानिक तथ्य युक्त उपन्यासों की रचना की, उसमें पतिशोध (1925 ई0) तथा सःशब्द से प्रारम्भ होने वाले वैज्ञानिक उपन्यासों में सुवर्णरेखा (1940 ई0) सागर सम्राट (1905 ई0) और साकेत (1952 ई0) हैं।

इन उपन्सायों के शीर्षक के नीचे खत्री जी ने वैज्ञानिक उपन्यास लिखा है। इन उपन्यासों की श्रंृखला में ‘रक्त मंडल’-‘सफेद शैतान’ की गणना किए बिना खत्री जी के वैज्ञानिक उपान्यासों की सूची पूरी नहीं हो सकती। इस उपन्यासों में उन्होंने अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक दृष्टि का प्रयोग कर विज्ञान संभाव्य शोधों एवं आविष्कारों का एक संसार चित्रित किया है, जिसमें परमाणु पिस्टल, चालक विहीन यान, रोबोट की 1921 ई0 में की गई कल्पना के समान स्टील मैन की अवधारणा, फोनोग्राफ, स्वचालित बन्दूक, तथा स्वेज नहर के निर्माण के पूर्व इसकी कल्पना के विवरण सहज सुलभ हैं।9   

खत्री जी के उपन्यासों पर उनके समकालीन अंग्रेजी विज्ञान कथाओं में एच.जी.वेल्स तथा पूर्ववर्ती सर आर्थर कानन डायल का प्रभाव अधिक दिखाई पड़ता है।10 इस प्रभाव की पृष्ठभूमि में खत्री जी के विज्ञान के विद्यार्थी होने का तथ्य भी मुख्य एवं महत्वपूर्ण है। श्री दुर्गा प्रसाद खत्री ने निश्चय ही अंग्रेजी भाषा के उपन्यासों को पढ़ा होगा और यही कारण रहा होगा कि उन्होंने अतिकुशलता से डिक टरपिन के उपन्यास को ‘‘साहसी डाकू’’ को ‘‘मोतियों का खजाना’’10 नाम से अनुवाद कर प्रकाशित किया था।11

निश्चित रूपेण श्री दुर्गा प्रसाद खत्री हिन्दी के प्रथम वैज्ञानिक उपान्यासकार हैं। उन्हीं के समकालीन लाला श्री निवास दास (1852-1878) से अनेक रचनाएँ प्रकाशित हैं परन्तु इन सभी में अति चर्चित है उनकी औपन्यासिक कृति ‘‘परीक्षा गुरु’’ जिसमें  ऐसे वैज्ञानिक आविष्कारों के बिम्ब हैं जो उस समय मात्र लेखक की कल्पना का अंश लगते थे परन्तु कालान्तर में वे सत्य सिद्ध हुए। उन वर्णनों में फोटोग्राफी, बैलून, सूत कातने और बनने वाली मशीनें, लोहे की ढलाई करने वाली मशीन पनचक्की, गैस से उत्पन्न प्रकाश के विविरण अपने अनोखेपन के कारण सभी का ध्यान आकृष्ट करने में सफल रहे।

एक्स-रे के आविष्कार ने विज्ञान कथा लेखकों की कल्पना को अपने को अपने जन्म के समय से ही प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया था जिसका बिम्ब उस युग की लिखित प्रत्येक विज्ञान कथा में दृष्टिगोचर हो सकता है। इन्हीं किरणों  का प्रभाव श्री राजेश्वर प्रसाद सिंह (1903-1987) की कृति ‘‘मृत्यु किरण’’ (1932) में देखा जा सकता है।

‘‘घुमक्कड़ शास्त्र’’, ‘‘सोने की ढाल’’, ‘‘वोल्गा से गंगा’’, आदि तथा ‘‘मध्य एसिया का इतिहास’’ के स्वनामधन्य लेखक श्री राहुल सांस्कृत्यापन (1893-1963) की  उर्वर मेथा का रचनात्मक फलक कितना व्यापक रहा है इसकी यहाँ चर्चा करना अभीष्ट नहीं है, क्योंकि उनके समुद्र समान रचना संसार को कुछ पंक्तियों से समेट पाना असम्भव है। इस कारण उनकी कृति ‘‘बाइसवीं सदी’’ (1921) जो तथ्यतः एक वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न औपन्यासिक कृति है पर कुछ शब्द कहना उचित होगा।

‘‘बाइसवीं सदी’’ किताब महल इलाहाबाद से प्रकाशित (1931) हुई थी तथा प्रकाशन वर्ष से ही यह चर्चा का केन्द्र रही। इस पुस्तक में विश्व सरकार एवं विश्व भाषा की कल्पना ही नहीं विद्यमान थी वरन् फोटोफोन (वीजियों फोन) मोडम, इन्टरनेट जैसे दृष्टिगामी, संचार प्रणलियाँ, सुपर क्राप्स की परिकल्पना (आज की जेनेटिकैली इंजीनियरड क्राप्स) शीत सुप्तवस्था आदि के विवरण कथा सूत्र में पिरोये हुए मिलेंगे। इस प्रकार ‘बाइसवीं सदी’ उपन्यासों की श्रृंखला की अप्रतिम कड़ी हैं।

‘‘जीवन की लहरें’’, ‘‘मन के वातायन’’, ‘‘जिज्ञासा’’  ‘‘स्पप्न एवं सत्य’’, ‘‘दीवाल कब गिरेगी’’ नामक  विज्ञान कथा संग्रह जिसमें वैज्ञानिक की साधना, आराधना, षड्यंत्र, आकाशबेल, प्रेम कीटाणु, कैप्टन बसंत लाल, विज्ञानशाला में, किसके लिए सहारा, प्रश्न का उत्तर दो, एवं संग्रह की मुख्य कथा दीवार कब गिरेगी नामक 12 कहानियां संग्रहीत हैं। डॉ. ब्रज मोहन गुप्त (1916-1972) की साहित्यिक सुजनशीलता इन सभी कथाओं में स्पष्ट दिखती है।

इस संग्रह की कथा ‘विज्ञानशाला में’ पर एच.जी.वेल्स की 1897 ई. में प्रकाशित ‘इनाविजबिल मैन’ नामक रोचक विज्ञान कथा का स्पष्ट प्रभाव है, जो अस्वाभाविक नहीं है। क्योंकि उस समय के अधिकांश विज्ञान कथा लेखक पश्चिम में लिखे जा रहे विज्ञान कथा साहित्य से प्रभावित थे। विज्ञान की पृष्टभूमि और उसका अध्ययन विज्ञानकथा के रचनाकारों के रचना संसार पर कथा की सृष्टि पर कितना विस्मयकारी प्रभाव उत्पन्न कर सकते है इसका अनुमान, श्री दुर्गाप्रसाद खत्री जी जो स्वतः रसायन विज्ञान से स्नातक थे, के द्वारा विरचित उपन्यासों के अध्ययन  से स्पष्ट हो जाता है। यही तथ्य यमुनादत्त वैष्णव अशोक के रचना संसार में भी प्रत्यक्ष रूप में उभर कर सामने आता है। अशोक जी के पांच विज्ञान कथा संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अस्थिपंजर (1941), शैलगाथा (1948), भेड़ व मनुष्य (1953) एवं हिम सुन्दरी (1971) हैं।  अपने साहित्यिक शिल्प, विज्ञान, सम्मत तथ्यों तथा रोचक वर्णनों के कारण पूर्ववर्ती अन्य विज्ञान कथाकारों के तुलना में आपकी रचनाएँ प्रथम पंक्ति में स्थान पाने की हकदार लगती है।

अशोक जी जीवन भर आबकारी विभाग की सेवाकर (1973) में सेवा मुक्त होने के उपरान्त इलाहाबाद में ही बस गए। इलाहाबाद जहाँ पर छात्र रहते हुये उन्होंने हिन्दी परिषद् द्वारा 1937 में आयोजित कथा प्रतियोगिता में भाषा लिया था तथा उनकी विज्ञान कथा ‘वैज्ञानिक की पत्नी’ को प्रथम और हरिवंश राय बच्चन की कथा ‘‘पत्थर और देवता’’ को द्वितीय पुरस्कार मिला था। तथ्यतः अशोक जी ने 1936 से ही कथा लेखन प्रारम्भ कर लिया। उनकी  प्रत्येक कथा की भाव भूमि में जिस प्रकार विज्ञान का सम्पुट विद्यमान उसी प्रकार का कुमाऊँ का पर्वतीय आंचलिक परिवेश एवं उसका नैसर्गिक सौन्दर्य सर्वत्र दिखता है। वे अपनी माटी से जुडे हुए विज्ञान कथाकार थे।

ज्योतिष की गणनाओं  पर आधारित डॉ. सम्पूर्णानन्द का लघु उपन्यास ‘‘पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल’’ (1953) एवं ‘वैशाली की नगर वधू’’, ‘‘वयम् रक्षामः’’ जैसी विख्यात कृतियों के सृजक आचार्य चतुरसेन शास्त्री की लेखनी द्वारा निसृत ‘रवग्रास’ उनकी उर्वर मेधा का चमत्कार है। भाषा, शिल्प विविधता तथा विज्ञान सम्मत तथ्यों युक्त ‘‘रवग्रास’’ (1960) किसी का मनमुग्ध कर लेने सक्षम है।

विशुद्ध साहित्यकारों यथा डॉ. सम्पूर्णानन्द एवं आचार्य चतुरसेन शास्त्री (1891-1960) का विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश कर विज्ञान के माध्यम से पाठकों को नवीन पाठन सामग्री प्रस्तुत करने के प्रयास की जितनी प्रंसशा की जाये वह कम है। मेरी दृष्टि में सरस्वती के वरद पुत्रों में बहुत ही स्वल्प संख्या के साहित्यकार इस प्रकार की व्यापक दृष्टि सम्पन्नता से युक्त होते है।

डॉ. शुभकार कपूर के अनुसार ‘‘प्रस्तुत उपन्यास (खग्रास) कथानक का सबसे बड़ा दोष है, उसका विश्रृंखलित होना।’’11

 इस श्रेणी के उपन्यासों के विषय में डॉ. सम्पूर्णानन्द का कथन ध्यातव्य है। वे लिखते हैं, ‘‘जिस प्रकार कविता में कान्ता सम्मति शैली से नीति और धर्म का उपदेश दिया जाता है, उसी प्रकार कथा छल से नई खोजों का परिचय प्राप्त कराया जाता है। कथा तो बहाना मात्र है, उससे कोरे वैज्ञानिक बखान का रूखापन दूर हो जाता है।’’12

डॉ. नवल बिहारी मिश्र (1901-1978), हिन्दी साहित्य में, मिश्र बन्धु के नाम से विख्यात श्री श्याम बिहारी मिश्र के भास्वर सपूत थे। आपने लखनऊ के किंगजार्ज मेडिकल कालेज से 1920 में एम.बी.बी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर सीतापुर को अपनी कर्मभूमि बनाया। आप की ख्याति एक कुशल चिकित्सक एवं एक निपुण साहित्यकार के रूप में चर्चित थी। तथ्यतः हिन्दी विज्ञान कथा के सृजन घट को परिपूरित करने में आपका अविस्मरणीय योगदान रहा है।

आपने, आज से अनुमानतः 40-45 वर्ष पहले हिन्दी की दो प्रमुख पत्रिकाओं-विज्ञान जगत् (इंडियन प्रेस), इलाहाबाद तथा विज्ञान लोक (महेश न्यूज पेपर्स आगरा) तथा साहित्य पत्रिका ‘निहारिका’ का जिस दक्षता से संपादन किया था, उस की जितनी प्रशंसा की जाये वह न्यून ही रहेगी।

डॉ. नवल बिहारी मिश्र के विज्ञान कथा लेखन एवं विशेष कर फ्रेंच एवं अंग्रेजी में प्रकाशित वैज्ञानिक उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में करने में करने की प्रेरणा का विज्ञान कथा के अनुदित साहित्य सृजन के द्वार को पाठक हेतु खोलने तथा अनूदित साहित्य की उपलब्धता बढ़ानें की तथा युवा वर्ग का अनुवाद की ओर ध्यानाकर्षण करने का प्रयास अतीव सराहनीय है। आपकी विज्ञान कथाओं के दो संग्रह ‘‘अधूरा आविष्कार’’ (1960) तथा ‘‘सत्य एवं मिथ्या’’(1963) प्रकाशित हुए जिनकी अधिकांश विज्ञान कथाएं उस युग की वैज्ञानिक अवधारणा का संस्पर्श करने के हेतु चर्चित रहीं। आपके निर्देशन में 17 फ्रेंच एवं अंग्रेजी की विज्ञान कथाओं एवं उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में प्रकाशित होना (इंडियन प्रेस-प्रयाग) उस समय एक चमत्कारिक उपलब्धि ही थी।

पुराणेतिहास से प्रभावित डॉ. ओम प्रकाश शर्मा का रचना संसार पुरा-कालीन भारतीय घटना क्रमों में रचना बसा है, चाहे वह गंगावतरण की चर्चा को अथवा बुद्ध के बोधिसत्व प्राप्त करने की घटना का। इस प्रकार के प्रयास जहाँ विज्ञान कथाओं के माध्यम से मिथकीय-ऐतिहासिक बिम्बों को पुनः प्रतिष्ठित करना-अपेक्षाकृत कम हुआ है। कुछ अपवादों को छोड़कर जैसे ‘‘आधुनिक ययाति’’ और उसी संग्रह की अन्य कथाएं तथा ‘‘वे चन्द्रमा से आए’’12 की ‘अतीत की शिवा’ आदि13 कथाएं एवं ‘सूर्यग्रहण’ नामक संग्रह की ‘देव-भूमि’14 नामक कथा इस श्रेणी में आती है।

डॉ. ओमप्रकाश शर्मा के उपन्यास ‘मंगल यात्रा’, ‘जीवन और मानव’, गांधीयुग पुराण’, ‘युग मानव’ आदि हैं।

इनकी रचनाओं पर पश्चिम के विज्ञान कथाकारों का परोक्ष प्रभाव है परन्तु उनमें निहित भारतीय तत्व, डॉ. शर्मा की रचनाओं को एक विशिष्टता प्रदान करते हैं।

रमेश वर्मा (1930-1978) ने अतीव कुशलता से विज्ञान के विकसित हो रहे फलक को देखा था, समझा था और उन्हें अपनी विज्ञान कथाओं में प्रतिष्ठित किया था। उन्होंने ‘‘सिन्दूरी ग्रह की यात्रा’’ (1961) ‘‘अतंरिक्ष के कीडे’’ (1968) नामक विज्ञान कथाएं लिखीं थीं जो अपनी तथ्यपरकता तथा लेखक के विज्ञान के रथ पर आसीन होकर मनुष्य के अन्तरिक्ष अन्वेषण प्रयास का सुरुचिपूर्ण रूप में प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास है।

डॉ. रमेश दत्त शर्मा (15 फरवरी 1936) की संपादकीय कला से, उनके विज्ञान कथाओं से उनके विज्ञान आलेखों से हम सभी परिचित है। डॉ. शर्मा की महत्त्वपूर्ण कथाएँ हैं, ‘‘प्रयोगशाला में उगते प्राण’’, ‘‘हरामानव’’ तथा ‘‘हँसोड़े जीन।’’

प्रेमचन्द्र चंदोला ने हिन्दी विज्ञान नाटकों को सूत्रपात किया जिसमें ‘‘बैक्टीरिया अदालत में’’ (1979), ‘गंदगी मल का मुकद्मा’ तथा ‘नाइट्रोजन की पेशी’ बहुचर्चित है। उनके      विज्ञान कथासंग्रह ‘‘चीखती टपटप’’ और ‘‘खामोश आहट’’ हैं।

विज्ञानकथा लेखक कैलाश शाह (1939-1978) एक प्रतिमा सम्पन्न विज्ञान कथाकार थे, जिनकी लेखनी का चमत्कार उनके विज्ञान कथा संग्रह ‘‘मृत्युजयी’’ (1976) में देखने को मिलता है। उन्होंने विज्ञानकथा लेखन को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया था। उनके चार वैज्ञानिक उपन्यास ‘‘अन्तरिक्ष के पार’’, ‘‘हरे दानवों का देश’’, ‘‘मकड़ी का जाला’’ एवं ‘‘मोआम् की यात्राएं’’ प्रकाशित हैं।

माया प्रसाद त्रिपाठी ने अति सहज सहज स्वरूप में विज्ञान कथांए लिखी है। उनके दो कथा संग्रह ‘आकाश की जोड़ी’ में 14 विज्ञान कथाएं संग्रहीत हैं तथा उनका संग्रह ‘साढे सात फुटकी तीन औरतें’ में 13 विविध वर्णा विज्ञान कथाएं हैं।

उसी काल खंड में राजेश्वर गंगवार ने ‘बन्द शीशियों में दिमाग’ (1875), केसर ग्रह (1977) तथा सप्तबाहु (1884) नामक विज्ञान कथाओं का सृजन किया था।

देवेन्द्र मेवाड़ी के दो विज्ञान कथा संग्रह प्रकाशित हैं। ‘‘भविष्य’’ तथा ‘‘कोख’’, एक और युद्ध, डॉ. गजानन के अविष्कार ‘कोख’ में कोख, अलौकिक प्रेम, दिल्ली मेरी दिल्ली, पिता चूहे, अतीत में एक दिन तथा अन्तिम प्रवचन नाम सात विज्ञान कथाएं संकलित हैं। आजकल आप विज्ञान कथाओं के सृजन की अपेक्षा लोक विज्ञान लेखन में अधिक रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं।

हिन्दी विज्ञान कथा वल्लरी को अपने श्रम, सृजन एवं विलक्षण मेथा के तोय से सिंचित करने वाले लेखकों में हरीश गोयल (4 नवम्बर, 1950) अग्रणीय हैं।

वे विज्ञान कथा लेखन में प्रारम्भिक रुचि लेते रहे थे। परन्तु उनका प्रथम चर्चित वैज्ञानिक उपन्यास ‘‘कालजयी यात्रा’’ का प्रकाशन 1984 में हो सका। यह भारतीय वैज्ञानिक के प्रिकार्नस तारामंडल के ग्रह विश्वकर्मा की यात्रा की गाथा है।

हरीश गोयल का विज्ञान कथा सृजन संसार व्यापक है। उनकी लेखनी से अब तक अनेकों विज्ञान कथा संग्रह सृजित हो चुके हैं। इनमें से कुछ प्रतिनिधि रचनाओं पर ही टिप्पणी कर पाना यहाँ समीचीन होगा-

विज्ञान कथा संग्रह ‘‘तीसरी आँख’’ (1989) में तेरह कथाएं है
एड्स एक समर भूमि, थकते डैने, अमानुष, कालयंत्र, मस्तिष्क ज्वर, तीसरी आँख, बायोरोबोटिका का सपना, उड़नपरी, गेस्टोपा, अन्तरिक्ष नरशिप तथा नाभकीय शीत। यह कथाएं क्रमानुसार चिकित्सा, प्रदूषण, प्रयोगशाला में तैयार भस्मासुर, रोबोटिक्स, पुनः चिकित्सा, नर शिशु की कामना और उससे उपजी भयावहता, रोबोटिक्स, उड़नतस्तरी तथा सेटेलाइटों के गिरने पर आधारित कथाएं हैं। इन सभी कथाओं में विज्ञान के तथ्य चमत्कृत कर देने वाली शैली में निबद्ध होकर कथाओं को रोचकता का पुट प्रदान करते हैं।

कथा संग्रह ‘अजनबी’15 (2000) आठ विज्ञान कथाओं का संकलन है, जिसमें काल पात्र, अजनबी, जीवाणु बम, नार्सिंग होम, हाइट, जलप्लावित कलकत्ता तथा तहलका नाम कथाएँ हैं। इन कथाओं में लेखक ने विडियो फोन, सुपर कम्प्यूटर, सौर कार, होलोग्राम नेटवर्क, ह्यूमन जिनोम प्रोजेक्ट तथा एम.आर. आई.का बार-बार प्रयोग करके यह बताने की कोशिश की है कि आने वाले युग में यह तकनीकें सामान्य व्यवहारिक चीजें हो जाएँगी।

मानव क्लोन और तीसरा विश्व युद्ध: (2000) नामक विज्ञान कथा संग्रह में कुल आठ कहानियाँ संग्रहीत हैं। देशभक्त, इस संग्रह की मुख्य कथा, प्रेतात्मा, सूनी कोख, दूसरी सुधा, नकाबपोश, टेलीपैथी एवं सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी नामक कथाएं, लेखक के सृजन क्षमता का परिचालक तो हैं ही पर यह कथाएं विज्ञान के सृजनात्मक एवं विध्वंसात्मक पक्षों पर प्रचुरता से प्रकाश डालती है। कुछ कहानियों में ‘‘जो सपपटबयानी है और क्लोनिंग विधि की जिस तरह व्याख्या की गई है उससे कहानी के बजाए उनमें निबंध के तत्त्व अधिक मुखर हैं।’’16

कथा संग्रह सभ्यता की खोज (2004) में आठ विज्ञान कथाएं संकलित है। मुख्यकथा, आसमान में सुराख, एलडोरेडो, मूर्ति बोल उठी मिनीमाटा, फिनिक्स, प्रत्यारोपण तथा मेकेनिकल एज्यूकेटर।

मिशन एक्स एक्स-5 का प्रारम्भ धरा से होता है और लक्ष्य विशाल अंतरिक्ष में सभ्यता की खोज, वह भी फोटान चालित यान से। परिवार से दूर मानवीय त्रासों से जूझते अन्तरिक्षगामी अन्वेषक, कृष्ण विवर को पार करते अपने लक्ष्य पर पहुँचने में सफल हो जाने हैं यह विवरण कथा को रोचक बना देता है। ओजोन विवर क्षरण से संबद्ध है ‘आसमान में सूराख’ तो मिनीपाटा पारद प्रदूषण से। यद्यपि अत्याधिक अंग्रेजी के शब्द कथा संग्रह में प्रयुक्त हुए हैं पर इन शब्दों के कारण कथाओं की रोचकता न्यून नहीं होती और यह रचना जन-मानस को विज्ञान कथाओं के पठन-पाठन कर ओर ले जाने तथा नवीन शब्दों के अर्थों से परचित होने का अवसर देगी।17

हरीश गोयल का पाँचवा आयाम (2004) नामक विज्ञान कथा संग्रह, अपने अंक में छः विज्ञान कथाओं को समेटे है। वे हैं- मुख्य कथा, आप्रेशन थर्ड, काइन्ड, बारबाड़ी, पेस्टीसाइड, ग्रीन लैण्ड ममी तथा रोबो महिला।

‘‘स्ट्रिंग थ्योरी एकादश आयामों की कल्पना करती है, इन आयामों में से पाँचवें आयाम की अवधारणा को, हरीश गोयल ने स्पष्ट सुग्राह्य और रोचक बनाने का प्रयास बनाने का प्रयास किया है।...... इनमें स्थापित त्रिआयामों में दिक-काल को संयुक्त कर इस आयाम की अतीव बोधगम्य रूप में कल्पना की गयी है जो कथाकार की उर्वर मेधा का परिणाम है।18 इस संग्रह की यद्यपि सभी कथाएं रोचक हैं परन्तु जेनेटिक-इंजीनियरिंग की तकनीक का उपयोग करती ग्रीन-लैण्ड ममी एक प्रभावशाली कथा है।18

‘कायान्तरण’ (2004) में, इसी नाम की मुख्य कथा किराये की कोख, ममत्व, विपाशन, एन्काउन्टर, प्रेम की प्यास, लेड-प्वाइजनिंग तथा अतिमानव नामक आठ कथाएं संग्रहीत है। जिसमें मुख्य कथा जंक डी.एन.ए. के अभिनव प्रयोग से ‘उल्फ मैन’ की कल्पना को साकार करता है। ठीक इसी प्रकार जैसे भविष्य में सम्मोेहन शक्ति का प्रयोग कर उसके उपयोग की ओर संकेत करती कथा ‘एन्काउन्टर’ में चित्रित है।19

भविष्य की विलक्षण आँखें (2004) में आप्रेशन टेराफारमेशन, वेलेन्टाइन डे, जीन-कुण्डली, उड़नशील मानव, जहरीला, धुआँ, एस्ट्राल पोर्ट तथा कमेडिटी भू्रण नामक कथाएं संग्रहीत हैं। सभी कथाएं भविष्योन्मुखी हैं तथा यह विज्ञान कथा संग्रह अनेक अर्थों में भविष्य दर्शन कराकर पाठक को भविष्य, के रहस्यों, तथ्यों, समाज पर पड़ते प्रभावों एवं रोमांचों से परिचय करता है, साथ ही लेखक की लेखनी का चमत्कार प्रत्येक कथा के अन्त तक पाठकों को अपने प्रभाव क्षेत्र से बांधे रहने में सक्षम है।’’20

आपरेशन जेनेसिस (2008) में हरीश गोयल की सम्मोहन, काल जुदाई, तलाश, टेलीपोंटेशन, मणिका तथा आप्रेशन जनेसिस, नामक कथाएँ संग्रहित हैं।

वैसे इस संग्रह की कभी कथाएं मनोग्राही हैं। परन्तु मुख्य कथा विशिष्टता युक्त है क्योंकि ‘‘इस पृथ्वी पर धूमकेतुओं द्वारा लाये गये जीवन के सूक्ष्म कणों से इस धरा पर जीवन का प्रस्फुटन हुआ है, ऐसी वैज्ञानिकों की आवधारणा है। इसी तथ्य को आधार बनाकर संग्रह की मुख्यकथा आप्रेशन जेनेसिस में धूमकेतु पर आसीन होकर मानव द्वारा अपनी जैविक एवं वानस्पतिक सम्पदा का सुदूर जीवन-धारण करने वाले ग्रहों पर जीवन के प्रत्यारोपण के प्रयास को तथा उस सम्पदा के पुर्नदर्शन सत्यापन को यह कथा कुशलता से चित्रित करती है।21

एक अन्य विज्ञान कथा संग्रह आप्रेशन मार्स (2004) में मुख्य कथा, पालीथीन का कहर, अनिंद्य सुन्दरी, खजाना, टोकामन, डाउजिंग तथा क्लोन नामक कथाएँ संग्रहीत हैं। मुख्य कथा में पृथ्वी 90 प्रकाशवर्ष दूर स्थित सिग्मा युग्म ए एवं बी के अधिनायक ब्लैक डेनिस की कथा है जो अपने को गैलेक्टिक सम्राट कहता है। इस ग्रह के विनाश और ध्वंस की कथा है आप्रेशन मार्स। अधिकांश कथाओं में भाषा सम्बन्धी त्रुटियाँ बहुतायत में विद्यमान है। एवं इस कथाओं में तथ्य की अस्पष्टता और भाषा शिल्प का अभाव खटकता है। आशा है कि इन सभी प्रकार की विसंगतियों का निराकरण आगामी संस्करण में संभव हो सकेगा।22 

हरीश गोयल की ‘‘रहस्मयी टैªगिंल’’ (2005) में मुख्य कथा के उपरान्त पिघलता ग्लेशियर, आप्रेशन वेम्पायर, आग , काल-यात्रा, लेड-पाँइजनिंग, फिर धनेरी रात, धूमकेतु और प्रलय तथा और ममी जी उठी नाम रचनाएं संग्रहीत हैं। वैसे इस संग्रह की सभी कथाएं विशिष्टता युक्त हैं पर लेखक की उर्वर मेथा और उसकी गणितीय विशिष्टता युक्त हैं पर लेखक की उर्वर मेथा और उनकी गणितीय अभिरुचि इस कथा (रहस्यमयी ट्राइएंगिल) में देखने को मिलती है।23

हरीश गोयल के एक अन्य विज्ञान कथा संग्रह ‘येती रिटनर्स’ (2005) में मुख्य कथा, रिटोर्ट ईव, फ्लोरोसिस, डायटम, डेजा-बू, मानव-बन्दर, शोर, ग्रीनलैण्ड ममी को जो पाँचवाँ आयाम नामक कथा संग्रह में प्रकाशित है संभवतः पुस्तक की पृष्ठ संख्या विस्तार को ध्यान में रखते हुए संकलित किया गया।24

हरीश गोयल की अधिकांश कृतियों के भॉति की इस संग्रह की कथाओं को रहस्य, रोमांच, पर्यावरण और अन्तरिक्ष की समस्याओं से संबद्ध कहा जा सकता है... एक सुन्दर सिनेतारिका के क्लोन का कमाल इस रचना की अन्तिम कथा में देखा जा सकता है।24

विज्ञान कथा संग्रहों-भविष्य की विलक्षण आँखें, पाँचवाँ आयाम, कायान्तरण तथा आप्रेशन जेनेसिस की समीक्षा सुभाषा लखेड़ा द्वारा भी की गई है। हरीश गोयल ने प्रचुर मात्रा में बाल-विज्ञान कथा साहित्य का सृजन किया है। उनके इस सन्दर्भ में रचित बाल उपन्यास हैं- किरणों का मायालोक, डूमा (1987), कम्पेक्स-39 (1987), परखनली डायनासोर (1987) शुक्रलोक की राजकुमारी (1986), (राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), अज्ञात ग्रह की ओर (1989), अंतरिक्ष परियाँ (2002), हरी चुनरी ओढ़े लोक में- यूरेनस ग्रह (2002) (अभी उनके नवीन उपन्यास ‘‘फिर एक ययाति’’ की समीक्षा विज्ञान कथा में प्रकाशित की गयी है।24

हरीश गोयल के विज्ञान कथा रचना संसार की व्यापकता की पृष्ठभूमि निहित है विज्ञान कथाओं को साहित्य की विधाओं के समक्ष करने की कामना। आप पूर्ण सक्रियता एवं समर्पण की भावना से विज्ञान कथाओं के उन्नयन में रत हैं।  हरीश गोयल, देश की, हिन्दी की एक मात्र एवं प्रथम ‘विज्ञान कथा’ नामक पत्रिका, जो विज्ञान कथा लेखक समिति, फैजाबाद द्वारा विगत 8 वर्षो से प्रकाशित हो रही है, के उपसम्पादक है तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया की ‘‘hindi.kalkion.com’’ जो विज्ञान कक्षाओं को समर्पित है के भी उपसम्पादक हैं।

श्री हरीश गोयल के विज्ञान कथा लेखन क्षेत्र में, उनके अवदान को ध्यान में रखते हुए ‘विज्ञान कथा’ त्रैमासिक का अंक 30, उनके कृतित्व पर केन्द्रित है। 

विज्ञान कथा संग्रह ‘एक और क्रौंच वध’ के लेखक डॉ. अरविन्द मिश्र (19 दिसम्बर, 1957) ने 1985 से विज्ञान कथाओं का प्रणयन प्रारम्भ किया। उनके एक मात्र इस संग्रह में कुल बारह विज्ञान कथाएं है।- गुरुदक्षिणा, धर्मपुत्र, देहदान, सम्मोहन, राज करेगा रोबोट्, अछूत, अनुबन्ध, अन्तरिक्ष कोकिला, अन्तिम दृश्य, आप्रेशन, कामदमन तथा एक और क्रौंच वध जो डॉ. मिश्र को साहित्यिक अभिरूचि और वैज्ञानिक पक्षों के ज्ञान का प्रतीत है।26

इन्टरनेट प्रदत्त वैज्ञानिक सूचना, विज्ञान के त्वरित उपलब्ध ज्ञान की सूचनाओं की भागीरथी के प्रबल प्रवाह में फँस कर कुछ कथाकार विज्ञान लेखक बन गए हैं। डॉ. मिश्र भी इस प्रभाव में अछूते नहीं रहे और वे इस विधा का उपयोग कर भारतीय विज्ञान कथा लेखको के अवदान से वैश्विक स्तर के विज्ञान लेखकों से परिचित कराने में लगे हैं।

इसी संदर्भ में एक संकेत और विज्ञान लेखन अपेक्षाकृत सहज विधा है परन्तु विज्ञान कथा लेखन का क्षेत्र दुरूह और कठिन है। यह सृजनात्मक क्षेत्र है जो लेखक से इस विधा के प्रति समर्पणकी अपेक्षा करता है। यही कारण है कि विज्ञान लेखक यत्र-तत्र बहुतायत में दृष्टिगोचर होते हैं और कथा लेखक मात्र मुट्ठी भर लोग हैं जो इस को तन्मयता से पोषित करने में लगे हैं।

यदि कथा वय और विज्ञान कथा के सृजन की यति भंग करके भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति फैजाबाद से प्रत्यक्ष और परोक्ष से जुड़े रचनाकारों की चर्चा की जाय तो उस स्थिति में सर्वप्रथम जाकिर अली रजनीश का नाम उभर का मानस में आता है।

जाकिर अली, रजनीश (1 जनवरी, 1975) का उपन्यास ‘गिनीपिग’ (1989) साहित्यिक और वैज्ञानिक तथ्यों का अपूर्व सम्मिश्रण है। इस उत्स जैव रसायनों द्वारा प्रेम के स्पन्दन की प्रतिक्रिया का प्रारम्भ है।

वास्तव में युवा विज्ञान कथाकार जाकिर अली का अपनी विज्ञान कथाओं में साहित्य और विज्ञान का उचित संपुट प्रस्तुत करने का प्रयास स्वागत योग्य है।

यही तथ्य उनके विज्ञान कथा संग्रह ‘विज्ञान कथाएं’ में स्पष्ट रूप से झकलता है। जिसमें एक कहानी जरूरत, चुनौती कयामत आने वाली है, उड़ने वाला आदमी, तथा निर्णय नामक कथाएं संग्रहीत है।

जाकिर रजनीश ने कई बाल विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं जो प्रकाशित हुई हैं इनमें प्रमुख हैं-सपनों का राजा, अकरम का रोबोट, मैं स्कूल जाऊँगी आदि तथा उनके द्वारा संपादित ‘‘प्रतिनिधि बाल विज्ञान कथाएं’’ प्रशंसा योग्य है।28

युवा विज्ञान कथाकार जीशान हैदर अली (18 अक्टूबर 1973) विज्ञान कथाओं के प्रभावान स्वर हैं।

इनकी विज्ञान कथा में साहित्य एवं विज्ञान का मिश्रण का हास्य और व्यंग से युक्त होकर, रचनाओं को विशिष्टता प्रदान करता है।29 जीशान हैदर अली की विज्ञान कथाओं की भाषा सरल और भाव स्पष्ट होते हुए भी इनकी कथाएं संदेश विहीन नहीं होती हैं, यही उनके विज्ञान कथा लेखन की प्रमुख विशेषता है। जीशान हैदर द्वारा लिखित कुछ विज्ञान कथाएं हैं-

अनजान पड़ोसी, कम्प्यूटर की मौत, कार कर चक्कर (विज्ञान प्रगति), बदलता मौसम, वैज्ञानिक राजकुमारी (विज्ञान) बौना मामला, स्वप्न मशीन, (दिल्ली ग्रामीण टाइम्स) मुर्दे की आवाज (स्वतंत्रभारत) एथलीन (नेहा) बचाने वाला, परिवर्तन (इलेक्ट्रानिकी आपके लिए,) अकेला, जीवित ऊर्जा (रेडियों प्रसारण), जिस्म खोने के बाद, सौ साल बाद (भारतीय विज्ञान कथा लेखक अधिवेशन) एडहिसिव, अनजान मुजरिम, जेड वन रोशनी का वाहन, तस्वीर, ख्याली, संगीतकार तथा हास्य वैज्ञानिक उपन्यास ताबूत धारावाहिक रूप में त्रैमासिक पत्रिका विज्ञान कथा में प्रकाशित होता रहा है। श्री जीशान हैदर के दो विज्ञान कथा संग्रह ‘‘प्रोफेसर मंकी’’ एवं कम्प्यूटर की मौत भी अभी हाल में प्रकाशित हुए है।29 आज कल जीशान हैदर उत्साह से 'hindi. kalkion.com' को विज्ञान कथा  साहित्य से पूरित करने में लगे हुए हैं।

स्वप्निल भारतीय (15जून, 1977) की कई विज्ञान कथाएं प्रसंशा के योग्य है। कम्प्यूटर की प्रलयकारी शक्ति को प्रदर्शित करती उनकी कथा ‘‘न्यू बी.जी.चर्चित रही है। इंस्टैन्ट डेथ, अपराध विज्ञान पर आधारित है। विस्थापन और समय रेखा30 तथा एक लम्बी विज्ञान कथा ‘प्रतीक्षा’ जिसमें विज्ञान कथा के सभी गुण हैं, विज्ञान कथा में प्रकाशित हुई है।30 स्वप्निल की  प्रारम्भिक रचनाएं विज्ञान प्रगति एवं आविष्कार के अंकों में प्रकाशित होती रहती थीं। इधर स्वप्निल भारतीय हिन्दी विज्ञान कथा सृजन क्षेत्र से आगे बढ़कर अंग्रेजी भाषा में सांइस फिक्शनों  का प्रणयन प्रारम्भ कर दिया है। उनकी अंग्रेजी की साइंस फिक्शन चर्चित हैं। कमर्ठ रचनाकार स्वप्निल ने हिन्दी विज्ञान कथा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर दिलाने के उद्देश्य से  'hindi. kalkion.com'  के द्वारा इन्टरनेट माध्यम से लगे हैं । इस साइट के वे प्रणेता, सम्पादक और  विज्ञान कथा संग्रह स्रोत हैं। यह एक चिर्चित साइट है।

मनीष मोहन गोरे (15 जुलाई, 1981) विज्ञान कथा  लेखन क्षेत्र का पूर्ण ऊर्जा से समृद्ध करने में लगे हैं। इनकी विज्ञान कथाएं रोचक और दीर्घ कलेवर न होने के कारण  स्पष्ट  और विज्ञान तथ्य युक्त होती है। आशा है वय वृद्धि के साथ  मनीष मोहन द्धारा लिखित विज्ञान कथाओं में रस और शिल्प का भी आवश्यकतानुसार समावेश होगा। मनीष मोहन गोरे की कुछ प्रमुख विज्ञान कथाएं हैं-

सुपर कम्प्यूटर, जीवन की तलाश, स्वप्नोपहार, स्वर्गरथ जीवन, की पुर्नउत्पत्ति, क्लोन ऑफ एडिसन, पृथ्वी पुत्र, पुनर्जीवन, मंगल भवन, निराहारी मानव आदि विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

मनीष मोहन गोरे के विज्ञान कथा को प्रत्येक विधि द्वारा सिंचित करने के प्रयास का फल है, उनकी सराहनीय कृति ‘‘विज्ञान कथा का सफर’’ तथा विज्ञान कथा संग्रह ‘‘325 साल का आदमी।31

अमित कुमार (30 जून, 1977) विज्ञान कथा लेखन क्षेत्र में कई वर्षों से सक्रिय हैं। उनकी विज्ञान कथाओं का संग्रह ‘‘प्रतिद्वन्द्वी’’ संग्रह वर्ष 2005 में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह वर्ष की कथा ‘‘अदृश्य मानव’’ रहस्य से ओत-प्रोत कथा है।  जिसमें प्रकाश के कणों के न दिखने का लाभ उठाकर अपराधी बैंक के लाकरों से धन-सम्पत्ति की चोरी करता है। नानों प्रोद्योगिकी के द्वारा मानव को पुर्नजन्म प्रदान करने की संभावनाओं के द्वार खटकाती कथा है ‘‘और फिर मानव जीवित उठेगा।

इरफान ह्यूमन (15 मई, 1968) बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति हैं जो विज्ञान संदेश संचार हेतु ‘‘साइंस टाइम न्यूज एण्ड व्यूज’’ निकालते हैं और उसके साथ रोचक विज्ञान कथाएँ भी लिखते हैं। इकनी कथाएँ विज्ञान प्रगति, आविष्कार, विज्ञान आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इनकी कुछ प्रमुख विज्ञान कथाएँ हैं-आप को क्या हो गया है33,  एक दिन डॉ. राबर्ट के साथ, मैं पहला साइबोर्ग, अदृश्य शक्ति आदि।

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी (10जून, 1945) बाल विज्ञान कथाओं के कुशल चितेरे हैं। इसी कारण आपकी विज्ञान-कथाएं बाल मनोरंजन पत्रिकाओं में अधिकतर प्रकाशित होती रहती हैं परन्तु जब आप विज्ञान कथाओं का प्रणयन करते है तो वे तथ्यपरक और विवरणात्मक जीवन्तता पूर्ण होती है।

आपकी कायापलट, हरीपीठ वाला आदमी, याददाश्त की चोरी, चांद की चोरी, ट्रांसजेनिक साइवोर्ग34 मुक्त का मोबाइल, अदृश्य हत्यारा, टाइम मशीन की चोरी, भावुक रोबोट, मंगल पर मंगल, परीरहस्य, गर्भकुण्ड का सौदा, मरण समारोह, गुरू की गिरफ्त में आदि इसी कोटि की रचनाएं हैं। आपका बाल उपन्यास ‘अन्तरिक्ष के लुटेरे’ विगत वर्ष प्रकाशित हुआ है।34 

‘‘गाँव की नई आवाज’’ के संपादक विजय चितौरी (1953) हल्की-फुल्की व्यंग एवं हास्य का मिश्रण लिए हुए  विज्ञान कथाओं के सृजन में भी सक्षम हैं। आपकी विज्ञान कथाओं की भाषा सरल-सुबोध होती है। जिसमें विज्ञान का सम्पुट रहता हैं। इन तथ्यों से साक्षात्कार विजय चितौरा की युद्धशरण गच्छामि35 भस्मासुर35 नामक कथाओं में किया जा सकता है।

लक्ष्मी नारायण कुशवाहा (15जुलाई, 1946) प्रभाव युक्त विज्ञान कथा लेखन में सिद्ध हस्त हैं। परन्तु वे अपेक्षाकृत व्यस्ततावश कम विज्ञान लिखते हैं। आपकी कथाओं की भाषा स्पष्ट तथा तथ्य परक तो होती है। यह सुन्दर और उचित शब्द विन्यास युक्त होने के कारण पाठक को बाँधे रहने में सफल एवं प्रभावी होती है। ‘‘आवाज की महत्ता’’ ‘‘अपराधिनी माँ’’ एवं ‘‘अकाट्य प्रमाण’’ आपकी कथाओं के कुछ सुन्दर उदाहरण है।36

विज्ञान के छात्र और पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण कमलेश श्रीवास्तव (29 मार्च, 1961) की कथा में संक्षिप्ततायुक्त स्पष्टता, इनकी अपेक्षाकृत कम लिखी गयी विज्ञान कथाओं को विशिष्टता प्रदान करती है। विज्ञान तथ्य एवं कल्पना  को प्रदर्शित करती ‘‘नेताओं का क्लोन’’ ‘‘चिप मैन’’ नामक कथाएं चर्चा योग्य हैं।37

मूलरूप से विज्ञान लेखक, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित विज्ञान शिक्षक तथा विज्ञान प्रसार और प्रसार से जुड़े चन्द्र प्रकाश  पटसारिया नवीन हस्ताक्षर हैं। आप के कथा लेखन का प्रारम्भ विज्ञान कथा पत्रिका में प्रकाशित ‘‘विज्ञान देवता का अभिशाप’’ नामक कथा से हुआ है।38

नवेदित युवा विज्ञान कथा लेखिका सुश्री बुशरा अलवेरा (9अक्टूबर, 1985) की कथाओं में विज्ञान और कल्पना की सराहनीय उड़ान देखने को मिलती है। इनकी कथाओं में भाषा और शब्द शिल्प का सांमजस्य रोचकता की सृष्टि कर पाठक को कथा के समाप्त होने तक बाँधे रखता है। सुश्री बुशरा की विज्ञान प्रगति में प्रकाशित कथा’’ अन्तिम समाधान’’ तथा विज्ञान कथा में प्रकाशित ‘‘जैकेट मैन’’ इन तथ्यों से युक्त है तथा बुशरा अलवेरा की विज्ञान कथा अन्तिम समाधान जनसंख्या विस्फोट का सुन्दर समाधान प्रस्तुत करती है।39 सुश्री बुशरा की ‘उसने कहा’’ नामक विज्ञान कथा प्रकाशनाधीन है। इस युवा विज्ञान लेखिका से विज्ञान कथा साहित्य क्षेत्र में सृजन की नवीन संभावनाएं है।39

डॉ. विष्णु दत्त शर्मा (4 अगस्त 1935)  एक समर्पित विज्ञान लेखक थे तथा आपकी लेखनी विज्ञान साहित्य की विभिन्न विधाओं को परिपूरित करती रही थी। आपने प्रचुर मात्रा में विज्ञान साहित्य का सृजन किया है। जिसकी चर्चा यहाँ पर कर पाना संभव नहीं है। डॉ. शर्मा  ने विज्ञान कथाएं और विज्ञान नाटक भी लिख हैं तथा आप की संपादित ‘‘हिन्दी में वैज्ञानिक नाटक’’ नामक कृति अभी प्रकाश में आई है। डॉ. शर्मा के एक अन्य नाटक ‘‘वृक्षों की महापंचायत’’ विज्ञान कथा पत्रिका के पृष्ठों पर प्रकाशित हो रही थी। परन्तु डॉ. शर्मा की भाषा, सुबोध, पत्रानुकूल रोचक एवं स्पष्ट होती है।40

भारतीय पशु चिकित्सा संस्थान इज्जत नगर, बरेली   में पशु-विकृति विज्ञान के प्रोफेसर, डॉ. रमेश सोमवंशी (17 जून 1966) सिद्धहस्त विज्ञान लेखक एवं संपादक हैं। आपकी कुछ चर्चित पुुस्तकें हैं- ‘‘प्राचीन भारत में पशुपालन एवं पशुचिकित्सा  विज्ञान’’, हिमालय के उपयोगी पशु ‘‘स्वीडेन में नौ माह’’, आदि। वास्तव में शोध लेखन एवं सम्पादक के मध्य अवकाश के क्षणों में डॉ. सोमवंशी की लेखनी कथाओं के क्षेत्र में भी चली है। आपकी चर्चित विज्ञान कथा ‘‘प्रयोगशाला में कैद वैज्ञानिक’’ तो तथ्यतः सुन्दर शैली की प्रभावी विज्ञान कथा है, जिसमें लेखक की तथ्य परकता, सजीव चित्रण क्षमता सधी हुई स्पष्ट, त्रुटिविहीन, विज्ञान सम्मत भाषा, शैली जिसके भीतर रोमाँच के क्षण चिम्बित होकर, इस कथा को विशिष्टता प्रदान करते है।41

एक भारतीय वैज्ञानिक भौतिकीविद् प्रो. दौलत सिंह कोठारी के जीवन पर आधारित हिन्दी में प्रथम उपन्यास के लेखक, भौतिकीविद् प्रो. धनराज चौधरी (1942) एक सिद्धहस्त विज्ञान कथाकार हैं।

आपकी सधी सीधी भाषा जो राजस्थानी शब्दों का पुट लिए रहने के कारण एक प्रकार की नवीनता उत्पन्न करती है, और कभी विज्ञानमय तथ्यों की ओझल नहीं होने देती। उसमें एक प्रकार की सजीवता विद्यमान रहती है। ‘‘बालू का गायन’’ इसी प्रकार की एक सुन्दर रचना है।42

डॉ. धनराज चौधरी द्धारा लिखित विज्ञान कथाएँ और उपन्यास इस प्रकार है-गोपाल मिस्त्री की मशीन बोल गई, प्रतिकार, बालू का गायन, अश्वमुखी की भारत पर उड़ान, तथापि (उपन्यास) पाताल पर कुँआ (लघु उपन्यास) सौर तालाब (एकाँकी) डायनासोर का शिकार (एकाँकी), एवं कीर्ति पुरुष (उपन्यास)।

श्रीमती कल्पना कुलक्षेष्ठ (11 मई, 1963) सिद्धहस्त विज्ञान कथा लेखिका हैं जो इस विधा को प्रारम्भ से ही अपनी विविधवर्णा कथाओं के माध्यम से सिंचित करती रही है। आपकी विज्ञान कथाएँ पत्रों, विज्ञान प्रगति, आविष्कार एवं विज्ञान कथा पत्रिका आदि में प्रकाशित होती रहती हैं। इन कथाओं का एक संकलन ‘‘उस सदी की बात’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। जिसमें कल्पना की रोचक शैली का प्रत्यक्षीकरण होता है।43

‘‘उस सदी की बात’’ नामक विज्ञान कथा संग्रह में जीवित मशीन, विरासत, अपराधी, संभावित, मृत्यु पर विजय, उस सदी की बात, कुछ उलझे रिश्ते, और राबी चला गया, लुप्त होती प्रजाति, नया नौकर, अनुत्तरित नाम विज्ञान कथाएं है। मुख्यतः कुछ कथाओं को छोड़कर अधिकांश कथाएँ मानव समाज, उसकी मानसिकता और तद्जनित के चतुर्दिक घूमती फिरती दृष्टिगोचर होती है। इसी कारण से लेखिका ने उन्हें सामाजिक विज्ञान कथाएं (सोसाई फाई) नाम से उच्चारित किया की यह प्रथम कृति है।43

यह प्रसन्नता का विषय है कि युगल कुमार कुलश्रोष्ठ भी अपनी सहधर्मिणी के पथ का अनुसरण करने हुए अपने कार्य व्यस्तता से बचे समय में विज्ञान कथा लेखन कर विज्ञान कथा को समृद्ध करने की दिशा में सरहानीय प्रयास कर रहे हैं। आपकी कई विज्ञान कथाएं प्रकाशित हुई हैं।44

पूर्ण रूप से मसिजीवों, लेखनी और तूलिका के, कलम और पेन्टिग ब्रश के कौशल पूर्ण प्रयोग में माहिर, उसी के संबल से जीविकोपार्जन करने वाले, आइवर यूशिएल ने अपने नाम रवि लायूटू को बदलकर आइवर यूशिएल के रूप में प्रचारित तो कर दिया पर रवि की रशिमयाँ बातिक कला से चलकर पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञान कथा लेखन में माध्यम से उद्भासित होत रही हैं। आप पर केन्द्रित विज्ञान परिषद् प्रयाग की मुख्य पत्रिका ‘‘विज्ञान’’ का अंक आपके सृजन क्षेत्र के प्रति समर्पण की भावना का प्रतीक हैं।45 आप द्धारा लिखी गई विज्ञान कथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पर प्रचुर मात्रा में इनकी भाव प्रदान कथाओं को स्थान देने का श्रेय आविष्कार एवं विज्ञान प्रगति को जाता है।

आइवर यूशिएल द्वारा लिखित  और ‘‘21वीं शताब्दी के अन्ततक’’ नामक संग्रह में, संग्रहति अनेक विज्ञान कथाओं से एक तथ्य जो बार-बार उभर कर सामने आता है वह मानव के संवेदनात्मक पक्ष का और दूसरा बिन्दु है मानव को तथ्यपरक वस्तु स्थिति को कभी दृष्टि से ओझल न होने देने को चेतावनी, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष में उसके भविष्य से जुड़ी है।

हिन्दी विज्ञान साहित्य सृजन के क्षेत्र में सुभाष लखेड़ा (26 अक्टूबर, 1949) के नाम से सभी परिचित है। बहुआयामी   लेखन में निष्णात लखेड़ा विज्ञान साहित्य के प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हैं। जिनकी लेखनी से विज्ञान लेखन का कोई क्षेत्र अछूता नहीं है।

वैसे तो सुभाष लखेड़ा ने अनेका कथाएँ लिखी हैं परन्तु उन सभी पर  टिप्पणी करना यहाँ सम्भव नहीं है।46

डॉ. श्री गोपाल काबरा (25 दिसम्बर 1936) सिद्धहस्त चिकित्सा अपराध विज्ञान कथा लेखक हैं। आपकी रचनाएँ विज्ञान पक्ष से भरपूर तथ्यों पर आधारित रहती है। आपकी भाषा की स्पष्टता सराहनीय है। आपकी ‘चाहत कौन?’’ आदि अनेक विज्ञान कथाएं इस प्रत्रिका में प्रकाशित तो चुकी हैं।

डॉ. सुबोध महंती (1 मार्च 1954) विज्ञान प्रसार के वरिष्ठ वैज्ञानिक, आपने पत्रिका ड्रीम 2041 के प्रकाशन से प्रारम्भकर अनेक पुस्तकों की रचना के साथ अनेक विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं। जिनमें से अंकिल डोरो का पत्र एवं इ-दुनिया में खलबली, विज्ञान कथा त्रैमासिक में प्रकाशित हुई है। अन्तिम कथा एक प्रभावशाली रचना है।

डॉ. अरविन्द दुबे (20 अक्टूबर 1951) युवा, ऊर्जावान      विज्ञान कथाकार हैं। आपकी जूली, डाक्टर डी, शर्मिन्दा हैं हम, तथा पण्डियन सच कहता है, नामक कथाएं विभिन्न पत्रिकाओं प्रकाशित हैं। आपकी अन्तिम कथा के नैतिक पक्ष पर अवैज्ञानिक दृष्टि युक्त पाठकों ने विपरीत टिप्पणियाँ की थीं। डॉ. दुबे ने अनेक बाल विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं तथा सम्प्रति में आप आन लाइन पत्रिका  'hindi. kalkion.com' जिसका शुभारम्भ 15 अगस्त 2009 से प्रारम्भ हुआ था, और जिसने इतने कम समय में विज्ञान कथा के प्रचार-प्रचार में महती सफलता प्राप्त की है, के ध्वजवाहक कार्यकारी सम्पादक है।

दूसरों की विज्ञान कथाओं पर टिप्पणियाँ  करना अपेखाकृत सहज कर्म है। पर स्व आलोचना अथवा स्व परीक्षण अपेक्षा से अधिक दुष्कर होता है। अतः कुछ साहस जुटा कर अपनी प्रकाशित विज्ञान कथा की कृतियों के विषय में संक्षिप्त में कुछ कहना चाहूँगा।

वैज्ञानिक लघु कथाएँ कथाएँ69 का प्रभात प्रकाशन के उपक्रम प्रतिभा प्रतिष्ठान द्वारा 1989 में किया गया था। यह कथा संग्रह उस समय प्रकाशित हुआ था, जब साहित्य के क्षेत्र में लघुकथाओं का प्रचलन बहुत कम था। परन्तु इसके उपरान्त भी इस संग्रह की एक सौ चौंतीस लघुकथाओं का, इसके पाठकों में विशेषकर नवयुवको-किशोरों ने खुले हृदय से स्वागत किया और इस संग्रह के तीन संस्करण प्रकाशित हुए। तथ्यतः यह लघुकथाएँ पर्यावरण प्रदूषण, स्वास्थ्य, अंधविश्वासों, मान्यताओं पर साधारण भाषा में सूचनाएँ प्रदान करती हैं तथा अपने पाठक को वहीं पर अपनी वानस्पतिक संपदा, कार्बन डेटिंग, कृत्रिम वर्षा तथा स्वेच्छा मृत्यु की अवधारणा पर जिस पर अभी भी भारत के न्यायविद् एकमत नहीं हैं, पर प्रकाश डालती हैं। इस संग्रह की कुछ लघुकथाएँ यथा ‘टेस्ट ट्यूब बेवी’ आदि भविष्य के घटनाक्रमों पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं।

आधुनिक विज्ञान कथाएँ48 का 1991 में प्रभात प्रकाशन के अनुक्रम ग्रन्थ अकादमी द्वारा किया गया था। यदि इस कृति के संस्करणों को ध्यान में रखा जाय तो उससे स्पष्ट हो जाता है कि इसका स्वागत पाठकों ने सहृदयता से किया था। इस पुस्तक में, ‘‘अतिमानव’’ नामक, विज्ञान के दुरुपयोग को, दर्शाती यह कथा, मानव मन में निहित कुण्ठाओं को उद्घाटित करने का प्रयास करती है।

‘‘अफ्रीका का वाइरस’’ मेरे प्रिय नगर पेरिस में एड्सजनित समस्या और स्वतः एड्स को उत्पत्ति को दर्शाती  कथा-एक प्रश्न चिन्ह के साथ अन्त होती है।

‘‘नारंगी’’ नामक कथा का केन्द्र बिन्दु इजराइल का जाफा नामक नगर है जिसे हिब्रू भाषा में जाफो कहते हैं और उसकी विश्वविख्यात नारंरियों पर आधारित है यह कथा। इजराइल के नगर तेलअबीब, अपने ‘‘वाइज मैन इंस्टीट्यूट के प्रवास काल में आता जाता था। जाफो की इन नारंगी के पौधों की संरचना में परिवर्तन और उसके परिणामों को प्रदर्शित करती यह कथा भी पेरिस की विश्व प्रसिद्ध बुलवार-डू-मोपरनास जिसके एक-एक बिन्दु से मेरा परिचय है, के आस-पास घूमती सुखद रूप से समाप्त होती है।

ट्रोन्धाइम-नारवे के नारवेजियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी, जहाँ पर मैं शोध फेलो था तथा युवकों-युवतियों के कार्निवाल में भाग लिया था। उसी के आधार पर एक संस्था विशेष के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति को रास्ते से हटाने की कथा है ‘युक्का’।

ईरान का तबरीज नामक उत्तरी नगर अपनी सुन्दरियों तथा सुस्वाद भोजन के लिए विख्यात है। उसी नगर की पृष्ठभूमि को आधर बनाकर, रेडियोधर्मी तत्व के प्रयोग को रेखांकित करती कथा ‘‘सूप’’ है, जो एजेन्टों विशेषकर इन्टलीजेंस एकत्र करते व्यक्तियों के र्निमूलन के प्रयास को प्रदर्शित करती है। यह तथ्य कथा लिखने के अवधि से लेकर आज तक अपने परिवर्तित रूपों में हमेशा सत्यापित होता चला आ रहा है।

तेल अबीब इजराइल का विश्वविख्यात नगर है। यहाँ पर स्थित है प्राकृतिक सुन्दरता युक्त डीजन गाफ स्ट्रीट। कथा ‘‘विष कन्या’’ इजराइल के नगर रिहोबाथ के बाइजमान इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जहाँ पर कुछ समय तक मैं रह चुका था, को केन्द्र में रख कर तथा ‘‘आनको जीन’’ कैंसरकारी जीनों के डिटेक्शन किट को विकसित करने की जटिलताओं और उसके विकास हेतु संरचनाओं को गायब करने के तथा विष रेसिन का प्रयोग कर उसके विकासकर्त्ता का प्राणान्त कर देने की कथा है।

तथ्यतः औद्योगिक रूप से विकसित देशों में इस प्रकार की विकसित की जा रही प्रौद्योगिकी एवं तकनीकों का गायब कर देना, चुराकर प्राप्त कर लेना अति सामान्य कार्य है भारत में भी यह प्रक्रिया विकसित हो चुकी है। इसी तथ्य की ओर यह कथा इंगित करती है। दूसरे शब्दों में प्रौद्योगिकी के विकास की कड़ियों से जुड़ी यह भविष्य की समस्या का दिग्दर्शन कराती कथा है।

मंगल के उपग्रह फोबोस से सम्बन्ध रखने वाली पेरिस प्रवास काल में लिखी गयी इसी नाम की कथा है ‘‘फोबोस’’।

पेरिस प्रवास काल के दौरान, उसकी सुन्दरता तथा जीवन मृत्यु के मध्य जूझती हुई मानसिक परिस्थितियों, घृणा और दुराग्रह ग्रस्त मानसिकता का परोक्ष में दर्शन करती कथा ‘‘एक्स रे’’ है।

तबरीज-ईरान प्रवास के काल में एक निम्फोमैनियक स्त्री की चर्चा लोगों में थी उसी को आधार बनाकर, विकृत मानसिकता के तथ्य का प्रदर्शित करती ‘‘दोल्में’’ नामक कथा है। जिसमें विषाक्त मशरूम ऐमानिटा फैलायडस का दौल्में में प्रयोगकर, सब कुछ जान चुके अपने पति अली आगा को खानम सेदेही, सदा के लिए अपने मार्ग से हटा देती है। आज के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार की घटनाएँ, हमारे समाज में बढ़ी हैं। अतएव यह कथा समाज-सचेतक कथा है।

समाचार पत्रों में ईर्ष्यावश प्रेमी अथवा प्रेमिका एक दूसरे अंधेरे में रखकर एड्स का विषाणु दे सकते हैं और कभी-कभी इस विषाणु का प्रयोग अधिक व्यापकरूप में भी लोगों को प्रभावित करने, अर्थव्यवस्था को अस्तव्यस्त करने हेतु भी किया जा सकता है। ईरान के परिप्रेक्ष्य में कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के हेतु डॉ. सूसन उसी प्रकार कार्य को स्वरूप देने आई थीं। वह कार्य क्या था यह तो ‘‘एड्स की छाया’’ में को पढ़कर ही समझा जा सकता था।

इजराइल के नगर तेल अवीब के प्रमुख पथ डीजन गाफ स्ट्रीट के एक रेस्ट्राँ की घटना ने निसृत हुई एक एडिक्ट की कथा है ‘‘नशालु’’।

नारवे के नगर ट्रोन्थाइम के समुद्र तट से फेरी अथवा छोटे से स्टीमर द्वारा बीस मिनट के मध्य समुद्र में स्थिति मुंक होल्मेन की वसीलिका अथवा चर्च तक पहँुच जा सकता है। मध्य युग में यह स्थान साधना का, पदारियों की एकान्त साधना का स्थल था। इसी की चर्चा है अर्धरात्रि के देश नारवे के संबध में। इसी स्थल पर ईर्ष्या कुण्ठा वशीभूत होकर हाल्दिस का प्रेमी साधना कक्ष में, मुंक होल्मन के साधना कक्ष में, उसकी हत्या कर देता है। तथ्यों का स्पष्टीकरण डी.एन.ए. फिंगर प्रिटिंग तकनीक द्वारा होता है। ‘‘आधी रात का सूर्य’’ नामक कथा में डी.एन.ए. फिंगर प्रिटिंग तकनीक की प्रथम बार चर्चा, इस कथा को इस दृष्टि से भविष्य दर्शन की कथा बनाती है, क्योंकि यह विधि कानूनी मान्यता प्राप्त करने के काफी समय पहले लिखी गई थी।

नस्ल भेद, वर्ण-भेद ‘‘एपार्थिड’’, कुण्ठा से ग्रस्त, अस्वस्थ मानसिकता का व्यक्ति कौन सा जघन्य कार्य नहीं कर सकता यह इस कथा को पढ़कर जाना जा सकता है। यह कथा आज भी अपने विविध रूपों में विदेशों में घटित होती रहती है।

पत्रकार सोफिया द्वारा गुरुत्वाकर्षण विहीनता की स्थिति में, उस पर नियंत्रण करने वाली औषधि की चर्चा, उससे संबंधित षड्यन्त्रों और हत्या से जुड़ी भविष्य में इस प्रकार के घटनाओं को ‘‘आक्सीजन मास्क’’ में देखा जा सकता है।

विमान और परामानव नामक कथाएं स्वेरतापूर्ण कथा लेखन का सुखद अन्त हैं।

प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार हरीश गोयल ने इन कथाओं के विषयों में अपने आलेख में चर्चा करते हुए लिखा है-

‘‘सभी कथाओं में नये विषय लिए गए हैं। ये विषय अब तक अछूते रहे हैं। विज्ञान कथाओं में इनका पहली बार प्रयोग हुआ। इन कथाओं में बड़े रहस्यमय ढ़ग से गुत्थियाँ उजागर होती हैं। इसमें इन कथाओं में गहरी मानवीय संवेदनाएं होती हैं।’’9

एक दीर्घ अन्तराल के उपरान्त ‘‘सूर्यग्रहण’’ का प्रकाशन हुआ। इस संग्रह में काफ्का की शैली  कथा ‘स्टेथस्कोप’, अपने देश की कन्या के जन्म से संबद्ध विकृत मानसिकता, जिसके परिणामस्वरूप कन्या भ्रूण की हत्या होती है, को केन्द्र बिन्दु में रखकर लिखी गई सचेकतक कथा है। ‘सूर्य ग्रहण’ सामाजिक अंधविश्वास, अविवेक, अवैज्ञानिकता पर कटाक्ष करती है तो स्वैरता पूरित उड़न तश्तरियों की अवधारणा करती कथा है ‘आपरेशन’। विचार तरंगों की भविष्य आने में, वाले समय में, प्रभावी भूमिका की ओर संकेत करती कथा है। ‘ध्यान-मशीन’ ध्यान तरंगों-भाव तरंगों पर विश्व के अनेक वैज्ञानिक भौतिकीविद् कार्य कर रहे हैं।

वैज्ञानिक प्रयोगों में जीव हत्या, बलिदान और पशुओं में तद्जनि पीड़ा यंत्रणा और पशु प्रयोगों को बन्द करने की अवधारणा को प्रोत्साहन देने हेतु लिखी गई कथाएं हैं ‘‘चिम्पैंजी’’, ‘‘गोश्त’’ और ‘‘मूक प्रश्न’’।

‘पुनर्जन्म’, ‘मेरे मित्र’ और ‘रोबो’  नामक कथाएं अंधविश्वास और सामाजिक  जड़ताओं पर कुठारघात करने की दृष्टि से लिखी गई हैं।

पूर्ण रूपेण अपंग और मृत्यु शैत्या पर पड़े व्यक्ति  और इसके कारण उसकी अर्धागिनी की व्यथा को बिम्बित करती कथा है ‘‘मृत्यु का अधिकार’’। यह कथा विज्ञान से अधिक समाज की मानसिकता की तरफ संकेत करती है, इस समस्या के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ओर इशारा है।

‘‘अरे यह क्या?’’ ‘‘और जईद गायब हो गया’’  नामक कथाएं फैन्टासी-स्वैरता युक्त कथाएं हैं। ‘‘पिरामिड’’ और ‘‘बहुपुत्रवती’’ मानव क्लोन तथा इन विट्रो फर्टीलाइजेशन तकनीक से सम्बद्ध होते हुए भी प्रौद्योगिकी जन्य  प्रभावों, दुष्प्रभावों को चित्रित करती हैं। ‘‘गुलाबबाड़ी’’ में नेवले पर सर्प विष का प्रभाव क्यों नहीं पड़ता के तथ्य को स्पष्ट करने का प्रयास है। तथा डॉ. ताण्डव जहाँ पर भारतीय दर्शन को बिम्बित करती है वहीं पर वह कथा वर्टिकल-टेक आफ वायुयानों की चर्चा करती है जो अब वास्तविकता हैं।

‘‘भारहीनता डॉ. रजनी और स्वाद’’ तथा ‘‘काश मैं पूर्ण मानव होता’’ नामक कथाएं विज्ञान के अनैतिक पक्ष को प्रदर्शित करती हैं।

दान और देवभूमि नामक कथाएं परोक्ष में हाइडिलवर्ग (जर्मनी) और तबरीज (ईरान) से जुड़ी हैं। पृष्ठभूमि पौराणिक है पर पात्र आधुनिक हैं, घटनाक्रम आधुनिक है, और एक अन्त सुखद तो दूसरे का अन्त दुखान्त है। इन दोनों कथाओं को सर्वाधिक सराहना मिली है। दान ‘‘इन्द्र प्रस्थ’’ भारती में प्रथम बार प्रकाशित हुई थी।

सूर्य ग्रहण विज्ञान कथा संग्रह बहुसमीक्षित है 9,49,50,51,52, आधुनिक ययाति नामक विज्ञान कथा संग्रह की समीक्षा करते हुए प्रसिद्ध विज्ञान लेखक एवं विज्ञान कथाकार सुभाष लखेड़ा ने लिखा है इस संकलन की सभी कहानियाँ जिस शैली में सामाने आई हैं वह पाठकों को भाव विभोर करने में सक्षम हैं। सभी कहानियाँ साहित्यिक माप दण्डों की कसौटी पर खरी उतरते हुए यह विश्वास पैदा करती हैं, कि विज्ञान कथाओं को इस ढंग से भी लिखा जा सकता हैं। जिससे उन्हें साहित्यिक कृति का दर्जा में किसी को आपत्ति न हो।’53,54,55,56

इस कथा संग्रह में वेगा, समस्थानिक अपराजित, दूसरा नहुष, आधुनिक ययाति, जिससे मानवता बची रहे, डॉ. आलबर्तों वापस न आ सके, लौहभक्षी, फोबस विखण्डित हो गया, उस दुर्घटना के बाद, उस पल के पूर्व, खून अन्तिम जलपल्वन तथा अन्तरिक्ष दस्यु नामक विज्ञान कथाएं हैं।   

इन कथाओं के विषय मेंं, समीक्षा करते हुए हरीश गोयल का विचार है ‘‘आधुनिक ययाति एक स्तरीय व सफल विज्ञान कथा संग्रह है। कथा साहित्य के सामान्य पाठकों को भी यह कथाएं निश्चय ही रोचक लगेंगी, इनके चरित्र, कथानक, विचार सूत्र एडवेंचरस हैं, खोजपरकता के साथ-साथ मानवीय संवदेनाओं से जुड़े हैं।54   

इसी संग्रह की कथा ‘‘डॉ. अलबर्तों वापस न आ सके के विषय में लिखते हुए विज्ञान साहित्य आलोचक डॉ. वीरेन्द्र सिंह के शब्द-‘‘यह कथा संवाद और चरित्र के अन्योन्य सम्बन्ध पर विकसित होती है, जो मुझे रचनात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगी है। जो विज्ञान के तकनीकी पक्ष  को , उसके  तिस्लिम की भी प्रस्तुत करती है, ध्यान देने योग्य है।55 कुछ  इसी प्रकार हैं, इन कथाओं के विषय में, विचार डॉ. रचना भारतीय के भी।56

वे चन्द्रमा से आये13 नामक कथा संग्रह में कुल आठ कहानियाँ इस क्रम में हैं
वे चन्द्रमा से आये, रक्त लेख, अतीत की शिवा, प्वाइंट सालमा, अवसाद का अन्त, एक और सभ्यता का विनाश, चाय दाजिंलिंग की, ओह। वह हरा आकाश।

इस संग्रह की विज्ञान कथाओं के विषय में समीक्षा करते हुए सुभाष लखेड़ा का कथन ‘‘कोरी कल्पना की उड़ान पर आधारित कथा को कभी भी विज्ञान कथा का दर्जा नहीं दिया जा  सकता है इस तथ्य से समीक्षित पुस्तक ‘‘वे चन्द्रमा से आये’’ के लेखक डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय अच्छी तरह से परिचित हैं। यही वजह है कि उनकी विज्ञान कथाओं का स्वरूप चाहे जैसा हो, वे वर्तमान वैज्ञानिकी और तकनीकी ज्ञान के वर्हिनिवेशन के आधार पर लिखी गई हैं, और विज्ञान कथाओं के लिए परिभाषाओं को संतुष्ट करती है।57

‘‘इसी कृति के विषय में चर्चा करते हुए प्रसिद्ध विज्ञान कथाकर हरीश गोयल के विचार हैं ‘‘विज्ञान कथाएं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उपज हैं जो इसे साहित्यिक कथाओं से तनिक भिन्न करती हैं। ये कथाएं खोज परक होती हैं, अन्वेषणात्मक होती हैं।....यह कथाएं साथ ही आकर्षक रोमांच से ओतप्रोत होती हैं। विज्ञान कथा के उपर्युक्त सभी तत्त्व हम डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय की ‘‘वे चन्द्रमा से आये’’ नामक पुस्तक में पाते हैं।’’58

अपने दीर्घकालीन विदेश प्रवास और उन देशों की रीतियों, रिवाजों, खान-पान आचरण, व्यवहार सामाजिक समस्याएं, परिधानों और वर्जनाओं से परिचित होने के कारण मेरी अधिकांश विज्ञान कथाओं के पात्र देशकाल को अनुरूप व्यवहार करते हैं। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह कथाएं भौगोलिक सीमा में न बंधकर-वैश्विक स्तर को प्रतिबिम्बित करती हैं। इनकी विविधता  का उत्स उनकी वैश्विकता है।

विज्ञान कथा त्रैमासिक का मेरी प्रिय कथाओं पर केन्द्रित अंक 26 दिसम्बर-फरवरी 2009 के सम्पादन हेतु मैं हरीश गोयल का आभारी हूँ।

भविष्य की कथाएँ
आधुनिक विज्ञान के विकास ने पश्चिमी गोलार्थ में सर्वप्रथम आविष्कार एवं कल्पना के मिश्रण से उत्पन्न जन सामान्य के बौद्धिक मनोरंजन हेतु नवनीत सम, आधुनिक विज्ञान कथाओं को जन्म दिया। यह मात्र संयोग की बात की बात नहीं है कि कथाकार जूल्स बर्न के राकेट के प्रक्षेपण स्थल से लेकर उस की लम्बाई और भार भी अनुमानत वही था जो उससे अनेकों वर्षों बाद अमेरिकन अपोलो यान का था। यह जूल्सबर्न की उर्वर मेधा का प्रतीक था। इस प्रकार उनके कई वैज्ञानिकों उपन्यासों ने अपने सृजन के समय से लेकर आज तक हमारा मनोरंजन कर अपनी कालजयी महत्ता को स्थापित ही नहीं किया है वरन् विज्ञान कथा को सर्वप्रिय और सर्वमान्य बना दिया है।

विज्ञान कथा के क्षेत्र में इसी प्रकार का अवदान एच, जी,बेल्स के उपन्यासों का रहा है। उनके विवरणों ने जनसामान्य को भविष्य की घटनाओं के विषय में सोचने को बाध्य कर दिया था। इनकी अनेक अवधारणाएँ स्वरूप ग्रहण कर साकार हो चुकी हैं। यही मेरी शैली के ‘फ्रैंकस्टाइन’ से आज कौन परिचित नहीं है।

हम सभी आज सैटेलाइटों के बहु आयामी उपभोगों से परिचित हैं परन्तु कितने लोगों को इस तथ्य का ज्ञान है कि  सर्व प्रथम इनकी कल्पना विख्यात विज्ञान कथाकार सर ए.सी. क्लार्क ने अपने वैज्ञानिक उपन्यास में की थी।

इसी प्रकार आज सर्वमान्य डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिग की तकनीक का उपयोग, विशेषकर मानव हत्या के कारणों का सत्यापन करने के विषय में सर्वप्रथम इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी विज्ञान कथा ‘आधी रात का सूर्य’ में किया था। आज इस विधि की उपादेयता से सभी परिचित हैं और यह विधि-मान्य विधा है। इसी संदर्भ में यह इंगित करना उचित होगा कि आज बहुश्रुत और उपयोगी ‘‘रोबो’’ भी तो पहली बार विज्ञान कथाओं के माध्यम से ही प्रचलन में आया  था। विज्ञान कथाओं में बहुवर्णित ‘‘विचारवान-बुद्धिमान’’ रोबो अब मात्र कल्पना की वस्तु नहीं है वरन् शीघ्र ही यह सामान्य रूप में हमारे समाज के मध्य उपस्थित होकर अपनी उपादेयता को सिद्ध करेंगे।

श्याम विवर अथवा ब्लैक होल्स को जन प्रचलित बनाने में विज्ञान कथा एक सफल माध्यम सिद्ध हुयी है। यह बहुत ही संभव है कि सर ए.सी. क्लार्क के उपन्यास ‘‘फाउन्टेन ऑफ पैराडाइज’’ में वर्णित ‘‘स्पेस एलीवेटर’’ जो सैटेलाइट से, स्पेस लिफ्ट और अन्तरिक्ष यात्रियों को एक वर्टिकल टैंक पर हजारों किलोमीटर की दूरी तक स्पेस में जाने लगे, का निर्माण भविष्य में सफल हो सकता है। इस अवधारणा को मूर्त स्वरूप देने में ‘‘नासा’’ के इंजीनियर और वैज्ञानिक कार्यरत हैं।

ब्लैक होल्स अथवा श्याम विवरों को जन-जीवन में प्रचिलत करने का श्रेय इन्हीं विज्ञान कथाओं को जाता है जिन्होंने मानव और मशीन के संयुक्तिकरण हेतु ‘‘साई बोर्ग’’ शब्द ही नहीं दिया, वरन् इस प्रौद्योगिकी के प्रतिदिन बढ़ते चरण और विकास को एक सफल स्वरूप प्रदान किया है।

आतंकवाद जो आज अपना विकराल मुख खोलकर मद्मत्त होकर विश्व एवं भारतीय गणतंत्र पर प्रहार कर रहा है, ‘रिमोट कन्ट्रोल’ डिवाइस से, इसका संकेत मेरी विज्ञान कथा ‘‘जिससे मानवता बची रहे’’ में अंकित है सभ्यता का विनाश कर सकता है। उन दुर्दन्त, कट्टर नरपशुओं का ध्यान ‘‘जीवाणु युद्ध’’ जिसकी चर्चा उपर्युक्त कथा में है, के ऊपर कब चला जाये कहा नहीं जा सकता।59

इसी संदर्भ के ठीक विपरीत चन्द्रमा पर अपना बेस स्थापित करने के उपरान्त भविष्य में मानव जब मंगल ग्रह पर पहुँचेगा, उस समय उसे किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, इसका माइक्रोग्रेविकी का, गुरुत्वहीनता का और तद्जनित समस्याओं के निराकरण की चर्चा मेरी विज्ञान कथा ‘‘प्वाइंट-सालमा’’ में अंकित है।

यदि हम अन्तरिक्ष की चर्चा से धरा की ओर उन्मुख हों तो प्रौद्योगिकी जन्य तकनीक भविष्य में विकसित होने वाली प्राणलियाँ चाहे वे नानो प्रौद्योगिकी हों, संचार माध्यमों की हों, वंचुअल रिएलिटी-आभासीय जगत् को हों, साईवर पंक की हों, अथवा एम.आई.आई. इमेजिंग की हों, विज्ञान कथाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंच रही हैं। फल स्वरूप मानव का दृष्टिकोण ही नहीं परिवर्तित हुआ है, वरन् उसकी जीवन पद्धति भी प्रभावित होकर बदल गयी है। आज के परिप्रेक्ष्य में इन पंक्तियों के लेखक की अप्रकाशित विज्ञान कथा ‘‘अनुत्तरित-प्रश्न’’ जो स्वताप नियांत्रित, स्व सुगंधित है, भविष्य की मार्केटिंग की नवीन तकनीक फक्शन-मैगनेटिक रेजोनेंस तकनीक पर आधारित है। निकट भविष्य में सोनोग्राफी की भाँति ग्राहक मनांभावों को पूर्व में जान लेने हेतु-यह पद्धति प्रचलित हो जायेगी। प्रौद्योगिकी पर आधारित नवीन जीवन पद्धति कभी-कभी किस प्रकार की विचित्र समस्या उत्पन्न कर सकती है, इसका आभास आप को मेरी कथा ‘‘प्रिया पकड़ी गयी’’ जो इस पत्रिका के अंक 28, सिम्तबर-नवम्बर 2009, पृ.4 पर प्रकाशित है, तो पढ़ कर हुआ होगा ।

लार्ज हेड्रान कोलाइडर (एल.एच.सी.) से सम्बन्धित मेरी पूर्व प्रकाशित विज्ञान कथा ‘‘डॉ. अलबर्तों वापस न आ  सके’’ हार्ड-कोर विज्ञान कथा थी, परन्तु लार्ज हेड्रान कोलाइडर, इलेक्ट्रान प्रोट्रॉन के टकराने के परिणाम, ब्लैकहोल की उत्पत्ति का भय, तत्पश्चात् विनाश की संभावना, जो मीडिया द्धारा गलत ढंग से प्रस्तुत की गई थी, ने परोक्ष में जनसामान्य को अणु-परमाणु आदि से परिचित करा कर-विज्ञान संचार का जो कार्य कर दिखाया है- वह सरहानीय है। यह तथ्य कालान्तर में लोक मानस में वास कर निश्चय ही एक विज्ञान लोक कथा के रूप में संचालित होगा।

इस प्रकार संक्षेप में वह दिन दूर  नहीं जब विज्ञान कथाओं में वर्णित अनेक तथ्य साकार होकर हमारे दैनिक जीवन में आ जायेंगे, जीवन को प्रभावित करेंगे, क्रमशः धीरे-धीरे बिना आहट के, तथा हम उन्हें स्वीकार कर लेंगे।

मेरे विचार के सफल और उत्तम विज्ञान कथाएं मात्र हमारा मनोरंजन ही नहीं करती वरन् वे भविष्य में प्रौद्योगिकी और तकनीकी विकास के नैतिक एवं अनैतिक पक्षांे का दिग्दर्शन  कराती हैं। इसी प्रकार के तथ्य आधुनिक संचार माध्यमों द्धारा प्रसारित-संचारित होकर जनमानस में प्रवेश कर, संरक्षित-सुरक्षित होकर, उनकी स्मृति का अंश बनकर लोक कथा का विज्ञानमय स्वरूप बन जायेंगे।

दूसरे शब्दों में समयानुसार सफल, प्रभावी विज्ञान कथाएँ स्वतः लोक कथा का अंश बन जायेंगी-आधुनिक विज्ञानमय लोक कथाएं बन जायेंगी।

संदर्भ
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3.    सर जगदीश चन्द्र बसु: पालातक तूफान: विज्ञान कथा ( त्रैमासिक) वर्ष 1, अंक जून-अगस्त 2003, पृ.3
4.    साहित्यचार्य पं. अम्बिका दत्त व्यास : आश्चर्य वृत्तान्तः विज्ञान (मासिक) मई 2002, पृ.31 एवं विज्ञान कथा (त्रैमासिक) वर्ष 4, अंक 15-2006, पृ. 5
5.    बाबू केशव प्रसाद सिंह : ‘चन्द्रक की यात्रा’ सरस्वती भाग 1, संख्या-6, 1900
6.    सत्यदेव परिव्राजक: आश्चर्यजनक घण्टीः विज्ञान कथा (त्रैमासिक) वर्ष 1, अंक-3 मार्च-मई 2003 (संक्षिप्त) एवं पुनः वर्ष 5 अंक 17 सितम्बर-नवम्बर 2006पृ.2
7.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: आधुनिक ययाति, ग्रंथ सी 37बर्फखाना, राजपाक, आदर्शनगर जयपुरपृ50
8.    डॉ. मीनूपुरी : विज्ञान कथाएं और कपोल कल्पनाएंः विज्ञान कथा (त्रैमासिक) वर्ष 4 अंक 16 जून-अगस्त पृ.11
9.    हरीश गोयल: हिन्दी में विज्ञान कथाओं का समृद्ध होता इतिहासः मधुमती, दिसम्बर 2008 पृ. 26
10.    डॉ. मीनूपुरी : वैज्ञानिक समीक्षा पर  आधारित हिन्दी उपान्यास, शोध प्रबंध, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर-2002
11.    डॉ. शुभकार कपूर: आचार्य चतुरसेन का कथा साहित्य, पृ. 214,1965
12.    डॉ. सम्पूर्णानन्द : आलोचना, वैज्ञानिक कथा साहित्य, पृ. 149
13.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: वे चन्द्रमा से आयेः ग्रन्थ विकास, सी 37, राजपार्क, बर्फ खाना, आदर्श नगर, राजापार्क, जयपुर-4
14.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: सूर्य ग्रहणः ग्रन्थ विकास, सी 37, राजपार्क, बर्फ खाना, आदर्शनगर राजपार्क-4
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17.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: सभ्यता की खोज; विज्ञान प्रगति मई, 2005 पृ.33
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20.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: भविष्य की विलक्षण आँखें, विज्ञान कथा, वर्ष 3, अंक-12,2005,पृ.26
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25.    सुभाष लखेड़ा : आविष्कार, वर्ष 35, सितम्बर, 2005 पृ. 36
26.    डॉ. अरविन्द मिश्र: एक और क्रौंच वधः भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति, फैजाबाद 1998
27.    जाकिर अली रजनीश : गिनीपिग, गायत्री इन्टर प्राइजेज, एक 3128 राजाजीपुरम लखनऊ -226017, 1998
28.    जाकिर अली रजनीश: विज्ञान कथाएँ, राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, अमीनाबाद, लखनऊ तथा प्रतिनिधि बाल विज्ञान कथाएं, विद्यार्थी प्रकाशन लखनऊ-20028
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        कम्प्यूटर की मौनः क्वीन्स पब्लीकेशन, लखनऊ-2008
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32.    अमित कुमार : प्रतिद्वन्द्वी, मधुर प्रकाशन, सी‘13ए, सेक्टर 20, नोयडा, गौतमबुद्धनगर -2013301, 2005 विज्ञान कथा, वर्ष 3, अंक 2005 पृ. 26
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45.    आईवर यूशिएल: विज्ञान, वर्ष 92, अंक 8, 2006पृ. 21वीं शताब्दी के अन्त तक, किताब घर 24/48/55 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-11002, 2006
46.    सुभाष लखेड़ा: अर्पिता की व्यथा,आविष्कार, वर्ष 2 अंक 9, 2004, पृ. 5 जीवन की तरह बना मौतका कारण, विज्ञान कथा, वर्ष, अंक 15, 2006 पृ. 16 मानव भ्रूणों की चोरी का रहस्य, आविष्कार, वर्ष 36, अंक 5, 221, स्मृति दंश,आविष्कार, वर्ष 32 अंक, अंक 12, 2002, पृ. 553, उड़न तश्तरियोंको न आने का रहस्य, आविष्कार वर्ष 31, अंक 8, 2001, पृ. 359, काश हमने रोबों न बनाये होते, आविष्कार, वर्ष 20, अंक 12, पृ. 2002, पृ. 450 कोमलांगी अभी कुछ कहती, आविष्कार वर्ष 33, अंक 11,2003, पृ. 502।
47.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: वैज्ञानिक लघु कथाएँ-प्रतिभा प्रतिष्ठान, 2685, कूचा दखिनीराय, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
48.    डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय: आधुनिक विज्ञान कथाएं, ग्रंथ अकादमी, 1686 पुराना दरियागंज नई  दिल्ली-110002
49.    सुभाष लखेड़ा: सूर्य ग्रहण आविष्कार, वर्ष 34 अंक 4, 2004 पृ. 175
50.    डॉ. शोभा सत्यदेव: सत्य के सूर्य का ग्रहण से मोक्ष, सूर्य ग्रहण, विज्ञान कथा, वर्ष     अंक-9, 2004, पृ.23
51.    डॉ. रचना भारतीय : नारी स्वातंत्रय अभिव्यक्ति से युक्त विज्ञान कथा संग्रह सूर्य ग्रहण विज्ञान कथा वर्ष 2, अंक 9, 2004, पृ. 25
52.    हरीश गोयल: सूर्य ग्रहण, विज्ञान कथा, वर्ष 2, अंक 6, 2004, पृ. 16
53.    सुभाष लखेड़ा: आधुनिक यथाति, आविष्कार, वर्ष 34, अंक 10, 2004 पृ.
54.    हरीश गोयल: संभाव्य अतंरिक्ष यात्रा वृत्तान्तों एवं पुराकथा बिम्बों युक्त रोचक संग्रह आधुनिक ययाति और मिथकीय प्रसंग, विज्ञान कथा, वर्ष 2, अंक 2004 पृ.28
55.    डॉ. वीरेन्द्र सिंह: भावी अन्तरिक्ष यात्रा और मिथकीय, प्रंसग, विज्ञान कथा, वर्ष 2, अंक 2004 पृ.28
56.    डॉ. रचना भारतीय : प्रेम, बलिदान अतीत की गौरव गाथा है आधुनिक ययाति, विज्ञानकथा, वर्ष 2, अंक 5, 2004, पृ.26
57.    सुभाष लखेड़ा: वे चन्द्रमा से आये, आविष्कार, वर्ष 26 अंक 10 अक्टूबर 2006, पृ.  2006
58.    हरीश गोयल: संभाव्य नव प्रौद्योगिकी एवं वैज्ञानिकों तथ्यों से युक्त रोचक विज्ञान कथा संग्रह, वे चन्द्रमा से आये, विज्ञान कथा, वर्ष 5, अंक 11, 2006, पृ. 21
59.    डॉ. मीनूपुरी: वैयक्तिक चेतना की अभिव्यक्ति, आधुनिक ययाति, विज्ञान कथा वर्ष 9, 29, 2009, पृ.12,



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by Dr. Radut.