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यूनिवर्स - एक इण्टेलिजेंट डिजाइन

जबसे इस धरती पर मानव ने होश संभाला है, हमेशा आसपास की वस्तुओं ने उसके अन्दर जिज्ञासा जागृत की है। प्रकृति के अनसुलझे प्रश्नों को उसने सुलझाने का प्रयास किया है। जो सवाल उसके मन में सर्वाधिक बार उठा वह यह था कि इस सृष्टि की रचना किसने की? या ये सृष्टि अपने आप बनी?

इस बारे में सर्वाधिक मान्य धारणा है ईश्वर गॉड या खुदा की। दूसरी मान्यता यह है कि सृष्टि में सब कुछ स्वयं निर्मित है। साइंस फिक्शन भी इस बारे में मौन नहीं हैं। कुछ कल्पनाओं के अनुसार धरती पर सब कुछ निर्मित हुआ है कुछ एलियेंस द्वारा। और ये एलियेन्स स्वयं किसी अन्य बुद्धिमान रचनाकर्ता द्वारा निर्मित हुए हैं। तो इस तरह जो कुछ भी है सब एक इण्टेलिजेंट डिजाइन का एक हिस्सा है। एक अन्य कल्पना के अनुसार यूनिवर्स खुद एक बुद्धिमान रचना है और उसने अपने अन्दर सब कुछ स्वयं निर्मित किया है।

लेकिन इस ब्लाग में इस सवाल से दूर रहते हुए कि यूनिवर्स का निर्माण किसने किया या कैसे हुआ? हम इस सवाल का जवाब ढूंढेंगे कि यूनिवर्स एक इण्टेलिजेंट डिजाइन है या नहीं? इस अध्ययन के लिए बहुत लंबे चौड़े ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। एक हाईस्कूल लेवेल की किताबों में मौजूद ज्ञान ही मेरी समझसे काफी है।

अपने अध्ययन की शुरुआत करते हैं हर पदार्थ के बिल्डिंग ब्लाक यानि एटम से।

हमारी दुनिया तरह तरह के लोगों और चीज़ों से भरी पड़ी है। कहीं हरियाली, पेड़ पौधे, तो कहीं रेत से भरे रेगिस्तान। कहीं समुन्द्र तो कहीं पहाड़। कहीं इंसान तो कहीं हैवान। कहीं जानदार तो कहीं बेजान। लेकिन एक बात तय है कि इनको बनाने वाला मैटर एक ही है। कैसे?
यह वह राज़ है जिसको इनसान ने हजारों सालों की गौरो फिक्र व एक्सपेरिमेंट के जरिये डिस्कवर किया। वह राज़ है हॉरमनी का। एक होने का। यानि इस दुनिया में जो कुछ भी है सब का बेसिक स्ट्रक्चर एक है। इंसान से लेकर बैक्टीरिया तक, सितारों से लेकर ज़मीन की गहराईयों तक हर जगह वही स्ट्रक्चर दिखाई देता है।

और यह स्ट्रक्चर है एटम का।

जानने की कोशिश करते हैं कि एटम क्या है?

एक काग़ज़ का टुकड़ा लीजिए और उसके छोटे छोटे पीस कर दीजिए। फिर उसके और टुकड़े कीजिए। धीरे धीरे पीस इतना छोटा हो जायेगा कि आँखों से दिखाई देना बन्द हो जायेगा। लेकिन उसके बावजूद उसके और छोटे टुकड़े किये जा सकते हैं। आखिर में आपको वह टुकड़ा मिलेगा कि उसे और छोटे टुकड़ों में तोड़ना मुमकिन न होगा।

इस सबसे छोटे टुकड़े में कुछ गोल गेंद की तरह के शेप एक दूसरे से जुड़े दिखाई देंगे। यही शेप एटम हैं। हर तरह के मैटर को यही एटम एक दूसरे से जुड़कर बनाते हैं।

एटम, जो किसी भी मैटर का सबसे छोटा जर्रा होता है। इतना बारीक कि एक पिन की नोक पर दस करोड़ से ज्यादा एटम समा सकते हैं। लेकिन यही एटम अपने अंदर हज़ारों करिश्मे समेटे हुए हैं। हर रोज़ इंसान इसके किसी न किसी नये करिश्मे से रूबरू हो रहा है। जो यकीनन इशारा है इस बात का कि यह किसी बहुत ही इण्टेलिजेंट डिजाइन का एक हिस्सा है।

एक छोटा सा एटम अपने में एक पूरी दुनिया को समेटे है? यानि हमारी दुनिया के इस सबसे बारीक ज़र्रे में एक शहर से भी ज्यादा हलचल लगातार होती रहती है। लेकिन इस हलचल के बावजूद न तो एटम टूटकर बिखरने पाता है और न ही सिमटकर और छोटा होने पाता है। एक पूरा माइक्रो यूनिवर्स एटम में मौजूद है। जहाँ निगेटिव चार्ज इलेक्ट्रान केन्द्रीय हिस्से न्यूक्लियस के चारों तरफ तेजी से चक्कर लगाते रहते हैं। इलेक्ट्रान की ये स्पीड बहुत ज्यादा होती है। यानि लगभग रौशनी की स्पीड के बराबर। रौशनी जो एक सेकंड में तीन लाख किलोमीटर का सफर तय कर लेती है? यानि जमीन से चाँद तक पहुंचने में उसे लगते हैं डेढ़ सेकंड जबकि चाँद ज़मीन से साढ़े चार लाख किलोमीटर दूर है।

क्या ये हैरत की बात नहीं कि इतनी हाई स्पीड इलेक्ट्रान लगातार कायम रखता है? और न सिर्फ कायम रखता है बल्कि इतनी ही रफ्तार से घूमते हुए दूसरे इलेक्ट्रानों से टकराता भी नहीं। जबकि दूसरे इलेक्ट्रान उससे बस कुछ ही कदम दूर होते हैं।

सर्कस का एक खेल होता है, जिसका नाम है मौत का कुआँ। इस गेम में एक या दो मोटरसाइकिल सवार तेज रफ्तार के साथ गोल घेरे में चक्कर लगाते हैं। ज़रा सोचिए अगर वहीं पर दस पन्द्रह मोटरसाइकिलें सौ किलोमीटर फी घण्टा की रफ्तार से दौड़ानी हैं। और इसके लिए सिर्फ एक पूरा दिन रख दिया जाये तो यकीनन उनमें से चन्द मोटरसाइकिलें ज़रूर टकरा जायेंगी। लेकिन एटम में पचासों इलेक्ट्रान मोटरसाइकिल से लाखों गुना तेज़ रफ्तार से लगातार दौड़ते रहते हैं और ज़मीन पर मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई एक्सीडेन्ट हो जाये।

जो इस बात का सुबूत है कि सृष्टि का जन्म एक्सीडेन्टल नहीं है बल्कि यह एक इण्टेलिजेंट डिज़ाइन है। वह डिजाइन जिसमें कहीं कोई कमी नहीं। 

अब सवाल पैदा होता है कि वह कौन सी ताकत है जो इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ हरकत में रखती है? इस ताकत को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स। यानि बिजली की ताकत। क्या है यह बिजली की ताकत?
सर्दियों में ऊनी कपड़े उतारते वक्त अक्सर जिस्म से चिंगारी निकलती है। साथ ही कपड़े को उतारते वक्त हल्की ताकत भी लगानी होती है। यही है बिजली की ताकत की झलक। जिस्म की रगड़ खाकर कपड़ों में इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा होता है, जिससे पैदा होती है बिजली की ताकत।

तो यही ताकत इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ गर्दिश कराती रहती है। कैसे? दरअसल जिस तरंह इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है उसी तरह न्यूक्लियस में एक पार्टिकिल प्रोटॉन पाया जाता है। और उसपर पाजिटिव चार्ज होता है। इन दोनों के बीच बिजली की ताकत कशिश की होती है। जिससे दोनों यानि इलेक्ट्रान और प्रोटॉन एक दूसरे को खींचते हैं।

प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन से दो हजार गुना भारी होता है। अब अगर इस तरह सोचा जाए कि एक हाथी को चिड़िया से बाँध दिया जाये और दोनों एक दूसरे को खींचें तो यकीनन चिड़िया एक झटके में हाथी की तरफ जाकर गिर जायेगी। मतलब ये हुआ कि अगर कोई रुका हुआ इलेक्ट्रान न्यूक्लियस के पास रखा जाये तो प्रोटॉन उसे अपनी तरफ खींचकर एक झटके में न्यूक्लियस में शामिल कर लेगा। लेकिन यहां पर एक और करिश्मा नज़र आता है। यानि कशिश  के बावजूद इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस में नही समाता। क्यो?

क्योंकि यही कशिश की ताकत एटम में अपना मिजाज बदल देती है। यहां यही ताकत इलेक्ट्रॉन को गर्दिश में ला देती है और वह न्यूक्लियस के चारों तरफ रिवाल्व करने लगता है। यह कुछ इस तरह होता है जैसे एक पत्थर को रस्सी से बांधकर हवा में नचा दिया जाये।
तसव्वुर कीजिए फिजा में नाचते पचासों गोले, जो एक मरकज़ी गोले के चारों तरफ तेज़ रफ्तार से चक्कर लगा रहे हैं। और आज से नहीं बल्कि लाखों सालों से। और एक इण्टेलिजेंट डिजाइन की तरफ इशारा करते हुए।

इस महीन कारीगरी में कुछ और भी बातें हैं हैरत में डालने वाली। दो इलेक्ट्रानों के बीच भी बिजली की ताकत का कानून काम करता है। जिसके नतीजे में इलेक्ट्रान एक दूसरे से दूर भागते हैं। यह परफेक्ट डिजाईनिंग नहीं तो और क्या है कि इस कानून के बाद भी पचासों इलेक्ट्रान एटम में एक दूसरे के आसपास घूमते रहते हैं। कोई भी इलेक्ट्रान पास के इलेक्ट्रानों की ताकत के दायरे में आकर कभी अपने रास्ते को नहीं छोड़ता।

आईए अब कुछ और गहराई में चलते हैं। अब सवाल पैदा होता है कि इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस के चारों तरफ किस तरह के दायरे बनाता है? इनकी स्टडी भी अपने आप में काफी इण्टरेस्टिंग है। इसकी साइंटिफिक गहराईयों में बहुत ज्यादा न जाते हुए आसान ज़बान में इसे समझने की कोशिश  करते हैं।

एक पीतल का पतला कड़ा अगर बीच से दबाया जाये तो एक शेप मिलता है जिसको मैथेमैटिकल जबान में इलिप्स कहते हैं। इलेक्ट्रॉन इसी शेप के रास्ते में न्यूक्लियस के चारों तरफ चक्कर लगाता है। और साथ ही उस रास्ते के दोनों तरफ हिचकोले भी लेता है। यानि वाइब्रेशन  करता है ठीक किसी वेव की तरह।

यह वाइब्रेशन भी इलेक्ट्रान को उसके खास रास्ते से भटकने नहीं देता। अपने तयशुदा रास्ते में वह खूबसूरती के साथ लगातार चक्कर लगाता रहता है। कभी कभी बाहरी एनर्जी पाकर वह अपना रास्ता छोड़कर अपने ऊपर के किसी रास्ते में पहुंच जाता है। लेकिन वहाँ देर तक नहीं टिकता और इलेक्ट्रान फिर से वापस अपनी पुरानी डगर पर लौट आता है। इस दौरान वह ली गयी एनर्जी को रौशनी की शक्ल में बाहर फेंक देता है। यही वह रौशनी है जो इंसानों और दूसरे जानदारों को देखने की ताकत देती है।

अब हम बताते हैं बिजली की ताकत की फाइन ट्‌यूनिंग के बारे में। जिसका हम रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन महसूस नहीं करते। आपने देखा कि एटम में इलेक्ट्रान तेज़ रफ्तार के साथ लगातार एक दायरे में चक्कर लगाता रहता है। और उसका यह मिजाज़ कभी नहीं बदलता। लेकिन उसके इस मिजाज़ में लचीलापन भी है।

आज के दौर में बिजली के बगैर हम दुनिया का तसव्वुर ही नहीं करते। बिजली न हो तो घर की रौशनी और कारखानों का प्रोडक्शन सब कुछ ठप। क्या आप जानते है कि यह बिजली हमें एटम की एक बहुत ही फाइन ट्‌यूनिंग की वजह से मिलती है?

जैसा कि हमें मालूम हुआ कि किसी भी नेचुरल कंडीशन में दुनिया में मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई इलेक्ट्रान न्यूक्लियस का चक्कर लगाना अपने आप छोड़ दे। लेकिन दूसरी तरफ अगर एटम को खास तरह की बाहरी ताकत दी जाये तो यही इलेक्ट्रान अपना आर्बिट यानि कि दायरा छोड़कर तेजी से आगे बढ़ जाता है। वह अपना एटम छोड़ देता है और नतीजे में पैदा होती है बिजली। यह वही बिजली है जो हम अपने रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल करते हैं। तो इस तरह बिजली इण्टेलिजेन्ट डिजाइन का ही करिश्मा है। वैज्ञानिकों ने मालूम किया है कि अगर इलेक्ट्रान और न्यूक्लियस के बीच मौजूद इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स मौजूदा वैल्यू से ज्यादा होता तो इलेक्ट्रान कभी अपना आर्बिट छोड़कर बाहर नहीं निकल सकता था। और हमें बिजली की ताकत कभी नसीब न होती।

दूसरी तरफ अगर इलेक्ट्रान और न्यूक्लियस के बीच मौजूद इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स मौजूदा वैल्यू से कम होता तो सारे इलेक्ट्रान अपने आर्बिट छोड़कर बाहर निकल जाते। और एटम का वजूद बाकी न रहता। तो इस तरह सृष्टि की डिजाइनिंग की फाइन ट्‌यूनिंग एक तरफ तो एटम के जरिये मैटर को बना रही है और दूसरी तरफ बिजली की ताकत की शक्ल में फायदा भी पहुंचा रही है।

एक खास बात और। हर तरह के मैटर में बिजली पैदा भी नहीं होती। तांबे के तार में तो बिजली आसानी से रवाँ हो जाती है। लेकिन प्लास्टिक या रबर में लाख कोशिश के बावजूद कोई बिजली नहीं बनती। ये भी हैरतअंगेज डिजाइन का ही कमाल है। जरा सोचिए, अगर हर तरह के मैटर में बिजली पैदा हो जाती तो फिर ये हमारे किसी काम की न रह जाती। क्योंकि जब तक बिजली के तार पर रबर का कवर नहीं होता, यही बिजली हमारे लिए एक खतरा भी होती है।

ये तो माइक्रो कायनात की एक शुरुआत है। सितारों के आगे जहां और भी है। यानि न्यूक्लियस के अंदर भी क्रियेटर के बहुत से करिश्मे छुपे हुए हैं।

-जारी है।



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by Dr. Radut.