२६ जनवरी विशेषांक: विन्डोज 'अन-इंस्टाल' आन्दोलन

बहुत से लोग सोचते होंगे कि मै 'बधुआ' साफ्टवेयर बेचने वालो के लिये इस प्रकार के "बधुआ" जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोय क्यों करता हूँ! उसका कारण है सूद के साथ उधार चुकता करना। अगर आप से मै कोई किताब मांगू या आप खुशी खुशी मुझे अपनी किताब पढने के लिये दें तो क्या मै चोर, लूटेरा, डकैत, हत्यारा हो गया? नही। ज्ञान के प्रसार का तो आधार ही है बांटना। और ज्ञान का मिल बांट कर उपयोग करना ही मानव विकास की सबसे महत्वपूर्ण शर्त। लेकिन उन बंधुआ साफ्टवेयर बेचने वाले साम्राज्यवादी आपको पाईरेट और इसे पाइरेसी कहेंगे। जरा देखें कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'स्वेट वेयर' उद्यम जो दूसरों को लुटेरा कहती है खुद कितने पानी मे है। 


बिल गेट्स जिनको मुक्तवेयर से इतना परहेज़ है और जिन्होने 'बधुआ' साफ्टवेयर के कंधों पर अपना साम्राज्य निर्मित किया वे स्वंम उस मुकाम तक ना पहुँच पाते अगर उनके जमाने मे साफ्टवेयर के 'कोड' स्वतंत्र रूप से उपल्ब्ध न होते। वैसे भी माइक्रोसाफ्ट साम्राज्य की नीव प्रतिस्पर्धा को कुचलने पर टिकी है न कि अच्छे उत्पाद बनाने पर। विकल्प के अभाव मे लोगो को जो मिला उसी को जन्न्त मान लिया।

खैर माइक्रोसाफ्ट से बिदाई के बाद बिल जी ने सारा ध्यान समाज सेवा पर लगाया। लेकिन वह भी विवादास्पद है। उन पर आरोप है कि उनका मिलिन्डा व गेट्स फाउडेशन भी सिर्फ मुनाफे के लिये कार्य करता है। कई मामलो मे 'दान' मे माइक्रोसाफ्ट संगणक होते है -- समाज सेवा भी हो गयी, करोडों का कर भी बचा और उस दाम का समान एन.जी.ओ. को दान कर दिया अब वह एन.जी.ओ. भी आजन्म माइक्रोसाफ्ट उत्पाद का गुलाम। इससे अच्छी समाज सेवा और कहाँ मिलेगी?

इसके अलावा आरोप यह भी है कि बिल जी की संस्था उन उद्यमो को धन देती है जो वास्तव मे समस्या के लिये जिम्मेवार होते हैं। आरोप है कि बिल जी की संस्था कई कम्पनियों को नये बाजारो मे घुसने मे सहयोग देती है। दवा बनाने वाली‌ कंपनियाँ‌ इसमे प्रमुख हैं। उनका सारा जोर वैक्सीन के इर्जाद मे रहता है -- वैक्सीन उत्पादन एक भारी मुनाफे वाला धंधा है -- स्वाइन फ्लू इसका प्रमाण है। अमरीका की एक प्रमुख दवा बनाने वाली कम्पनी बैक्टर पर आरोप लगा था कि उसने अपने उत्पादों के दाम १३०० % बढा कर स्वास्थ्य सेवाओं को बेचे थे।

इसी के चलते भारत मे दवाओं पर पेटेंट का विरोध हो रहा है। अमरीका की माईक्रोसाफ्ट सरीखी कंपनियाँ पेटेंट की हिमायति है। पेटेंट अब केवल बडी कंपनीयो के दबदबे का साधन भर रह गये हैं। भारत मे माईक्रोसाफ्ट अपने चहेते इन्फ़ोसिस के साथ मिल कर साफ्टवेयर पेटेंट लागू करने के लिये सरकार पर दबाव बना रही है। इन्फ़ोसिस सरीखी पिछलग्गू कंपनियाँ अपने मुनाफे के लिये देश के साथ कोई भी‌ समझौता करने के लिये लालायित बैठी हैं। उन्ही के नन्दन नेलकानी अब यूनिफाईड नेशनल आईडेन्टिटि के मुखिया हैं। किसे शक नही कि निलेकानी जी माईक्रोसाफ्ट की तकनीकों‌ तथा इरादों‌ की पैरवी सरकारी स्तर पर नही करेंगे।

खैर, बिल जी‌ के ऊपर यह भी आरोप है कि वे शोध कार्यों को अनुदान दे कर शोध संस्थानो को सही विकल्प खोजने की बजाने अपने मन माफिक विकल्प खोजने मे लगा देते हैं। मीडिया द्वारा खुलासा किये जाने के बाद सन २००७ मे फाउडेशन ने अपने निवेशों का विश्लेषण करने की घोषणा की थी लेकिन बाद मे इसे रद्द कर दिया गया और फाउडेशन अपनी 'अधिकाधिक' मुनाफे वाली नीति पर कायम रहा।

इस 'समाज सेवा' का उद्देश्य जरूरत मंदो कि सेवा की बजाये पहचान बनाना और उसके द्वारा प्रभाव फैला कर व्यापार का विस्तार करना है। गेट्स ने स्वंम स्वीकार किया है कि "व्यवसायी साम्राज्यों‌ को इस तरह की हानि (समाज सेवा मे लगे निवेश को वे हानि मानते हैं) की भरपायी के लिये कुछ पहचान भी मिलनी चाहिये। इसके आलाव उनका फाउडेशन समस्या कम करने की बजाये बढाता हुआ प्रतीत होता है। एड्स, क्षयरोग, तथा मलेरिया विश्व की तीन सबसे घातक बीमारियाँ है जो हर वर्ष लाखों जाने लेती हैं। बिल के फउडेशन ने इनके लिये अरबों का दान किया है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह दान समस्या को बढाता है। गेट्स ने ज्यादातर संसाधन 'लोकप्रिय' एड्स पर लगाये जिससे उपलब्ध विशेषज्ञ, चिकित्सक, तथा अन्य आवश्यक लोग मुख्य कार्य छोड कर इस बीमारी पर काम करने लगे और इस तरह से प्राथमिक स्वास्थ सेवाओं मे लोगो की कमी हो गयी जिससे हालात और बदतर हो गये। इस पलायन से अन्य जघन्य बीमारियों से लडने के लिये स्वास्थय कर्मियों की भारी कमी हो गयी। इस पलायन से स्वास्थ्य सामग्री का परिवहन तथा पोषण प्राथमिक्ता सूचि मे नीचे गिर गया है जो आगे चल कर और समस्याओं को जन्म देगा।

दवायें और भोजन स्वास्थ्य सेवाओं‌ का प्रमुख अंग है जब। दवायें विकसित करने से ज्यादा जरूरी है जरूरत मंद तक तक दवा और भोजन का पहुँचना, वर्ना क्या लाभ?

अब ट्रक मे सामान लाद कर गाँवों‌ तक पहुँचाने मे न तो शोध की जरूरत है और न भीमकाय मित्र कंपनियों के लिये और मुनाफा कमाने का अवसर, तो ऐसा काम वे भला क्यों करने लगे? उनके सहयोग से वैक्सीन विकसित की जाती हैं (शोध के नाम पर चंदा कर बचाता है)। अनुमान है कि एक बार वैक्सीन तैयार हो गयी तो कुछ फाउण्डेशन के सहयोग से मुफ्त दी जाती है और शेष सामान्य तौर पर बाजार मे बेची जाती होगी। सेवा भी हो गयी और धंधा भी।

इसके अलावा उन पर यह भी आरोप लगा है कि 'गेट्स द्वारा अनुदानिक टीका करण कार्यक्रमों मे स्वास्थ कर्मियो को उन बीमारियों को न केवल नजरंदाज, बल्कि मरीजो को उनकी चर्चा करने से हतोत्साहित करने के निर्देश भी दिये जाते है जिनका यह टीके निदान नही कर सकते। यह चिन्ताजनक और भयावह स्थिति है। यह सारे खुलासे लास एंजलिस टाइम्स द्वारा की गयी‌ जाँच पडताल के बाद सामने आये हैं।

और इतना कुछ सुनने जानने के बाद आप अभी भी विन्डोज मे झांक रहे हैं तो यह सोचनीय है। किस बात की प्रतीक्षा है आपको?

व्यक्तिगत रूप मुझे बिल गेट्स से कोई समस्या नही हैं। तकनीकी रूप मे उनका कोई बहुत बडा योगदान भी नही है। विन्डोज कोई इक्लौता आपरेटिंग सिस्टम नही है, न उस जमाने मे था। माईक्रोसाफ्ट की कुनीतियों के चलते बाकी सारे उत्पाद मर गये। और कुनीति क्या थी -- आई बी एम सरीखी विशाल कंपनियों पर दबाव कि यदि किसी और का साफ्टवेयर दिया तो हमारा साफ्टवेयर नही मिलेगा। सारे विकल्प एक एक करके दम तोडते चले गये। अत:‌ समस्या बिल गेट्स से नही उनके तरीकों से।

जैसा गांधी ने कहा था -- पापी से नही पाप से घ्रणा करो। साम्राज्यवाद, एकाधिकारवाद और ज्ञान पर नियंत्रण घ्रणित है।

गांधी, पटेल, आजाद, भगत सिंह, अशफाक सरीखे आजादी के लिये मर मिटने वालों की मातृभूमी पर सांस लेने वालों क्या नयी आजादी के नर्म झोंके मे सांस लेने का मन नही होता? क्या एक कम्पनी की गुलामी की बेडियाँ तोडने की इच्छा नही होती? रगों मे खून तो वही है, बस एक सैलाब चाहिये। आइए बंधुआ साफ्टवेयर के खिलाफ 'अन-इंस्टाल' (असहयोग) आन्दोलन छेडते हुये मुक्तवेयर और गनू लिन्क्स का आलिंगन करें।

यदि सच्चे भारतीय हैं‌ तो आज ही विन्डोज अनइंस्टाल करें!

गनू लिनुक्स अपनायें।


जय हिंद!

तकनीक कथा लेखकों के लिये यहाँ विचारों के ढेर लग गये है -- लिखिये कथायें, कवितायें, लेख इस तरह के नये साम्राज्यवाद पर और भेज दीजिये कल्किआन को। इसी लेख के साथ हम कल्किआन हिंदी पर गनू लिन्क्स तथा मुक्तवेयर पर का प्रारंभ कर रहे हैं। प्रत्येक सप्ताह प्रकाशित होने वाले इन लेखों‌ मे आपको विस्तार से बंधुआ साफ्टवेयर के विकल्पों‌ के विषय मे बताया जायेगा।

नोट:‌ बधुवा = विन्डोज, फोटोशाप सरीखे प्रोपराईटेरी साफटवेयर