नया दशक प्रारंभ हो गया है। सन् २००९ अपने साथ बहुत कुछ लाया और बहुत कुछ ले कर गया। भारतीय विज्ञान साहित्य के लिये वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना रही कल्किआन रूपी सूर्य का उदय। भारतीय हिंदी विज्ञान साहित्य जिस तरह धीरे धीरे मुख्य विज्ञान पत्रिकाओं की सूची मे नीचे गिरता जा रहा है वह चिंता का विषय है। उनकी समस्या है स्तरीय रचनाओं का अभाव। अब मृत्यूश्य्या पर पडे हिंदी विज्ञान साहित्य को पुनर्जीवित करने के प्रयास करने होंगे। डा राजीव रंजन उपाध्याय के सम्पादन मे "विज्ञान कथा" पत्रिका तथा कल्किआन हिंदी ही अब एकमात्र सहारा हैं।
सत्यम शिवम सुन्दरम:
१. इस नाजुक दौर मे प्रमुख आवश्यकता है कि "सही" तथा "नवीन" सूचना लोगों तक पहुँचायी जाये। बहुत से माध्यम हैं जो वैज्ञानिक सूचना देने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अधिंकाश मामलों मे विषय की समझ का अभाव होने की वजह से अन्तर्जाल पर उपलब्ध सूचना का अनुवाद कर प्रकाशित कर दिया जाता है। लेखकों को विज्ञान का ज्ञान न होने तथा तथ्यों का सत्यापन न होने की वजह से यह अधिक नुकसानदायक सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार के छद्म (सूडो)-विज्ञान लेखक स्थिति को और अधिक चिन्ताजनक बना रहे हैं।
अत: सुझाव है कि विज्ञान के प्रचार प्रसार मे लगे व्यक्ति अपनी सीमाओं के बावजूद शुद्धतम सूचना देने का प्रयास करें। अंतर्जाल पर कोई भी आपके द्वारा दी गय़ी सूचना की जांच कर सकता है इससे आपकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है। अब ठगा सा पाठक बेचारा या तो गलत सूचना को सही मान बैठता है या उसका विज्ञान के प्रति रहा सहा रूझान भी समाप्त हो जाता है।
२. दूसरा, विज्ञान 'मत' पर नही तथ्य, प्रमाण तथा आंकणों पर आधारित होता है। कृपया विज्ञान को मान्यता का विषय न बनायें। बजाये विज्ञान आधारित विषयों पर अपना मत व्यक्त करने के ("मेरा मानना है" जैसे वाक्यों से परहेज करें। )'तथ्य' से अवगत करायें।
३. तीसरा, साहित्य रचना, कल्पना किसी भी समाज की आत्मा है। मेरे विचार से (यह आवश्यक नही कि कल्किआन सम्पाद्क मंडल के सभी सद्स्य इससे सहमत हो), अब हमे समाज मे तकनीक की घुसपैठ को देखते हुये तकनीकी साहित्य पर भी ध्यान देना होगा। मूल विज्ञान से संबंधित विषयों पर पहले ही बहुत लिखा जा चुका जा चुका है। अत: तकनीकी विषयों पर भी ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यक्ता है।
सोने की चिडिया
भारत सरीखी विशाल तथा प्राचीन सभ्यता के पास ज्ञान का अपार भंडार है -- उसमे से काफी कुछ अंग्रेजी शासन मे 'अंधविश्वास' कह कर काल कोठरी मे फेंक दिया गया। साम्राज्यवादियों ने यहाँ के खजाने लूट कर यू.के., फ्रांस पहुँचा दिये। यहाँ के ज्ञान को नष्ट कर दिया और समाज मे अपने गुलाम तैयार कर दिये जो प्राचीन भारतीय विज्ञान को 'अंधविश्वास कहने लगा'। मार्क्सवाद का अनुकरण करना 'बुद्धिजीवी' होना है लेकिन चाण्क्य का नाम भी जुबान पर नही आता। जैसे एक समय मे 'रीडर्स डायजेस्ट' पढना या 'डिस्कवरी' देखना 'सूडो-इन्टेलेक्चुअल्स' के लिये सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय था वैसे ही आज कल मार्कस्वादी होना 'स्टेटस सिंबल' है।
मैकवले सफल रहा। हमारा मनोवैज्ञानिक उत्परिवर्तन हो ही गया अंतत:।
आज स्थिति यह है कि प्राचीन विज्ञान की चर्चा शुरू होते ही उसे धर्म का नाम दे दिया जाता है और चर्चा की दिशा ही बदल जाती है। समस्या की जड यह भी कि इतिहास, पुराण, विज्ञान, मान्यता तथा धर्म को आपस मे मिला दिया जाता है। इससे समस्या यह हुई कि जैसे ही कोई प्राचीन विज्ञान की बात करता है उसे धर्म से जोड जाता है। अजब धर्मसंकट है -- आलोचक भी सही है और लेखक भी। यहाँ आवश्यक्ता है संतुलित हो कर बिना किसी पूर्वाग्रह के विश्लेषण करने की। जैसा की विश्व मोहन तिवरी जी ने सम्पादकीय मे लिखा था कि विज्ञान का तो आधार ही है 'रि-सर्च' -- पुन: खोजें।
विज्ञान द्वारा दिये गये नियमों से अपनी आस्था ना जोडे। उन्हे खंडित हो सकने वाले नियम ही माने। प्रकाश इसका सटीक उदाहरण है -- माना जाता था कि प्रकाश सीधी रेखा मे गमन करता है लेकिन प्रकाश संबंधी नियम समय और खोज के साथ बदलते चले गये। अब यदि कोई प्रकाश सीधी रेखा मे गमन करता है इसे आस्था का प्रश्न बना ले तो वह कहाँ तक उचित है?
हाँ, आस्था का भी विशेष महत्व है। वह भी आवश्यक है। यह आवश्यक नही कि आस्था को वैज्ञानिक मानको के आधार पर सिद्ध भी किया जा सके। पुत्र की पिता के प्रति आस्था, पत्नि की पति के प्रति आस्था -- क्या सिद्ध की जा सकती है? लेकिन "प्रकाश सीधी रेखा मे गमन करता है" जैसी विस्थापित 'आस्था' का विश्लेषण व खंडन किया जा सकता है; किया जाना चाहिये -- आवश्यक है। यह समझना आवश्यक है कि दोनों अलग अलग विचार हैं।
इसका यहाँ उल्लेख इसलिये किया जा रहा है क्योंकि कल्किआन कथा तथा कविता विधा पर केंद्रित है और किसी भी कथा का सृजन समाज से परे रह कर नही किया जा सकता। कथा होगी तो उसमे आस्था भी होगी, विज्ञान भी होगा। लेकिन यदि भेद का ज्ञान नही होगा तो समस्या होगी। इसी प्रकार की बहुत सी जटिलताये हैं। लेकिन हम घर्षण कम से कम रख कर अधिक से अधिक जटिलताओं को कम करने का प्रयास करेंगे। शायद आपको कुछ ऐसे लेख दिखें जिस पर आप कल्किआन मे उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाये। ध्यान देगे तो पायेगे यह तो विस्थापित आस्था के विश्लेषण का मामला है -- आपके विचारों से शायद उसे खंडित करने मे लेखक को सहायता मिले। इस प्रकार का कोई भी लेख यदि कल्किआन मे आता है तो उसे इसी श्रेणी मे रखा जायेगा: "प्रकाश सीधी रेखा मे गमन करता है" जैसी विस्थापित 'आस्था' का विश्लेषण व खंडन आवश्यक है। न कि "पुत्र की पिता के प्रति आस्था" वाली श्रेणी मे।
कल्किआन समय समय पर विभिन्न समस्यों को देखते हुए विशेषांक निकालेगा -- जैसा कि डा अर्विंद दुबे जी के नेतृत्व मे अंधविश्वास तथा फ़ंतासी विशेषांक निकल चुके हैं। आशा है आप आने वाले दिनों मे नयी विचार शैली का स्वागत करेंगे।
खैर लौटते हैं मुख्य विषय पर: तो क्या हो विज्ञान कथा का स्वरूप इस पुनर्जन्म मे? आप सब अन्तरजाल से जुडे है। रोजाना तरह तरह के समाचार सूचना आती रहती हैं। वे आपको सोचने पर विवश तो करती ही होंगी? जैसे कल फ्रांसीसी सेना द्वारा माइक्रोसाफ्ट का उपयोग रोकना -- क्या भारतीय सेना को वही खतरे नही? कितना सुरक्षित है आपका जीवन इन अमेरिकी व्यवसायों के हाथों मे? क्या प्रभाव पडेगा इससे हमारे समाज पर? कैसे तकनीक द्वारा हम भारतीय दशा को सुधार सकते हैं। कैसे भारत 'साफ्टवेयर' मजदूर से 'साफ्टवेयर' मालिक बन सकता है? कुछ न कुछ तो होता होगा आपके अन्तर्मन मे इस सबको ले कर। हमे अब इसी तरह के साहित्य का सृजन करना है। पारंपरिक विज्ञान आधारित साहित्य तो रहेगा ही लेकिन एक नया दीप भी प्रज्ज्वलित करना है।
तो, इसी विश्वास के साथ कि हिंदी विज्ञान /तकनीकी साहित्य एक नयी करवट लेगा, आइये इस यज्ञ मे अपना योगदान करें।
स्वप्निल भारतीय
-- प्रधान सम्पादक