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कुत्ते क्यों‌ होते हैं‌ वफादार और बिल्लियाँ अहसानफरामोश!

कुत्ता इंसान का परम मित्र है -- यह एक अंग्रेजी कहावत है। बिल्लियाँ उसके विपरीत विश्वासपात्र नही मानी जातीं। क्या सत्य है? क्या कहता है विज्ञान इस विषय पर?‌ कुछ पशु ऐसे है जिन्हे हम घरेलू या पालतू कहते हैं और कुछ होते है जंगली। कुत्ते और बिल्ली दो अलग प्रजाति के पशु हैं‌ और उनका व्यवहार, सामाजिकता, उतरजीविता, सब कुछ एक दूसरे से विपरीत है। सबसे पहले बात करते है कुत्तों‌ की।

कुत्ते या केनिस लुपस फेमिलियरिस भेडिया प्रजाति का पालतू बनाया जा सकने वाला पशु है जिसे मानव ने हजारों‌ वर्ष पूर्व पालतु बना लिया था। यह कार्नीवोरा (मांसाहारी) समूह के कैनिडे परिवार से है। इस समूह के सद्स्यों‌ को पहले कार्नीवोरन्स कहते थे। सतनधारियो मे मांसाहारी जीवों का समूह सबसे विशाल माना जाता है क्योकि इसमे सबसे छोटे नेवले से ले कर खुंखार ध्रुवी भालू या पोलर बियर और भीमकाय हाथी सील भी शामिल हैं। शायद किसी ने सही ही कहा था कि "प्रकृति सभ्य नही जंगली और रक्तरंजित है।"

खैर, माना यह जाता है कि कुत्ते प्रारंभ से ही, घोडे के समान, मानव के लिये एक सहायक या सेवक की भूमिका अदा करते चले आ रहे हैं। मानव ने लिये उपयोगी होने के कारण उनकी नस्लों का अलग अलग खूबियों के आधार पर प्रजनन किया गया और कई मानव उपयोगी, तथा सजावटी नस्लें तैयार की गयी (इस पर चर्चा अगले लेख मे)।

इसके विपरीत बिल्लियाँ मौकापरस्त, अविश्वस्त तथा जंगली मानी जाती हैं। यहाँ थोडी भ्रम की स्थिति बन जाती है जब हम यह मान बैठते है कि कुत्ते मानव को अपना मित्र या मालिक मानते हैं, और यह एक प्राकृतिक प्रवत्ति है। यह सिर्फ एक मान्यता है। सच छिपा है कुत्तों‌ और बिल्लियों के विकास व सामाजिक व्यवस्था मे। सामाजिक व्यवस्था तो प्रकृति का अंग है। बिना सामाजिकता, सहयोग, परस्पर निर्भरता के जीवन जैसी जटिल प्रणाली का विकास तथा उत्तरजीविता संभव ही नही है। यहाँ तक की वनस्पतियो (पेड-पौधों) तक मे अपने पराये का भेद भाव होता है।

तो क्या है कुत्ते की समाजिकता? मूलत:, जैसा की हम मनुष्य अभी तक समझ पाये हैं, कुत्तो मे इस 'विश्वासपात्रता' का विकास उनके शिकार करके भोजन जुटाने की प्रवत्ति मे निहित है। कुत्ते झुन्ड मे रहते तथा शिकार करते हैं। यह झुंड या समूह सामाजिक रूप से बेहद कसा हुआ, रूढिवादी तथा स्पष्ट नियमों का पलन करने वाला होता है। इस समूह का एक नेतृत्व या मुखिया होता है जिसे 'अल्फा मेल' कहते हैं, झंड के सभी सदस्यों को भली-भांति यह पता रहता है कि सरगना कौन है और उसका अधिकार क्षेत्र क्या है।

इस समूहीकरण के न केवल उन्हे सुरक्षा मिलती है, वरन यह उन्हे अपने से बडे जीवों का शिकार करने करने की क्षमता भी प्रदान करता है जिससे सभी को भोजन मिलता रहता है। वैसे कुत्तो के शिकार करने का तरीका शिकार के लिये बेहद निर्मम होता है क्योकि कुत्ते अपने शिकार को जिन्दा ही खाना शुरु कर देते हैं। बडे जीवों‌ को घेर कर मारने के लिये संख्याबल, रणनीति, सामंजस्य तथा संगठन की आवश्यक्ता होती है, यह केवल एक समूह द्वारा संभव है -- और समूह को नेतृत्त्व की आवश्यक्ता होती है -- ऐसा नेतृत्त्व जिसके निर्देश का पालन किसी भी स्थिति मे किया जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि समूह के प्रत्येक सदस्य को समूह मे अपने स्थान या हैसियत पता होना बेहद आवश्यक है जिससे समूह भली प्रकार कार्य कर सके। मिलजुल कर शिकार करने के अलावा कुत्ते इस शिकार को मिल बांट कर खाते हैं।

जबकि बिल्लियाँ अपने इलाके मे भोजन की उपलब्धता के आधार पर बेहद कमजोर सामाजिक ढांचा बनाती है, यदि भोजन की उपलब्ध्ता अच्छी हो तो वे अकेले ही रहती हैं, व अकेले ही शिकार करती है। कुत्तों‌ के विपरीत वे अमूमन (बडी बिल्ली के विपरीत) अपने से छोटे जीवों‌ का शिकार करती हैं, अत: अकेले शिकार करने के बावजूद शिकार पकडने की संभावना अधिक होती है। लेकिन कोई भी बिल्ली अपना शिकार दूसरी बिल्ली से नहीं बांटती।

दोनो पशु गिद्ध की तरह ही पहले से मरे हुये जानवर को भी खा लेते हैं। जहाँ कुत्ते आमतौर पर केवल अपने समूह को ही पहले से मरे जानवर खाने की अनुमति देते है, बिल्लियाँ दूसरी बिल्लियों से इस लूटपाट मे इस शर्त पर साझा कर सकती है कि वहाँ पर्याप्ता भोजन उपलब्ध हो।

कुत्ते समूह मे रहते हैं और समूहे के मुखिया के अनुयायी होते हैं; कोई भी कुत्ता या तो मुखिया होगा या अनुयायी। घरेलू माहौल मे इंसान को वह अपना मुखिया मानता है क्यों - क्योकि यह मुखिया उसे भोजन, रहने की जगह तथा सुरक्षा प्रदान करता हैं। अकसर देखा होगा यदि आप किसी आवारा कुत्ते को खाना देना शुरू कर दे तो वह आपके आगे पीछे दुम हिलाने लगता है। यहाँ यह आपके प्रति 'विश्वासपात्रता' नही बल्कि मुखिया के समक्ष अपनी स्थिति का बोध है। और अपनी प्रवत्ति के अनुसार वे अपने मुखिया को प्रसन्न भी रखना चाहते है जिससे शिकार के बाद उन्हें भी खाने का अवसर प्राप्त हो। यही प्रवत्ति इंसान से साथ रहने पर भी दिखती है और कुत्ता अपके आगे पीछे दुम हिलाये घूमता रहता है -- कुत्ते की सहज प्रवत्ति उसे आपका विश्वास जीतने के लिये कुछ भी करने के लिये प्रेरित करती है -- इसे हम मनुष्य के प्रति स्वामिभक्ति मान लेते हैं।

इसके विपरीत बिल्लियाँ की सामाजिक व्यवस्था कुत्तों‌ की तुलना मे बेहद कमजोर होती है। वे कुत्तों की तरह वर्ग या श्रेष्ठ-निम्न, या मुखिया-अनुयायी सदृश्य व्यवस्था नही अपनाती हैं। और न ही समूह या झुंड बनाती हैं। हालांकि वे कई बार अपने परिवार से किसी‌ सदस्य के साथ मिलकर एक छोटी सी बस्ती या अपना इलाका अवश्य तय कर लेती हैं‌ और उसी इलाके मे शिकार करती हैं। इस तरह साथ रहने से वे अपने से बडे जीव का शिकारे भी कर लेती हैं। बिल्ली परिवार के बडे सदस्य (बाघ इत्यादि) साथ मिलकर हाथी तक का शिकार कर लेते है। यहाँ नर तथा मादा की सामाजिक्ता मे भी मे फर्क होता -- जहाँ इस तरह का कमजोर जोडा मुख्यत: मादायें‌ बनाती हैं, नर हमेशा अकले ही रहते हैं। नर सवछंद रूप से दूसरी बिल्लियों की बस्तियों‌ मे आते जाते रहते हैं। जहाँ कुत्ते 'व्यक्तिगत' संबधों को प्राथमिक्ता देते हैं‌ -- क्यों कि मुखिया ही भोजन जुटाने का कारक होता है। बिल्ली समूहों‌ (जिसमे परिवार के बडे सदस्य - शेर तथा बाघ - शामिल हैं; शेर तथा बाघ की समाजिकता मे फर्क होता है उस पर चर्चा फिर कभी।) में मादा समूह की मुखिया होती है और अधिकतर मामलों मे नर झुंड से अलग रहते हैं। उसका कारण यह नही कि नर 'आत्मनिर्भर' होते हैं‌ वरन झुड मे रहने से 'सवजाति प्रजनन' का खतरा बना रहता है।

बिल्लियाँ इसे इस रूप मे लेती है कि कोइ अन्य (बिल्ली या मानव या अन्य जानवर) सिर्फ उनके साथ उस स्थान या जगह मे रह रहा हैं। बिल्लियों का आपस मे या मानव से संबंध पूर्णत: 'व्यवहार' पर निर्भर करता है। कुत्तों के विपरीत बिल्लियाँ व्यवहार के मामले मे न केवल संवेदनशील होती हैं बल्कि दुर्व्यहार इत्यादि को सहन नही करती हैं। बडी बिल्लियाँ -- जैसे शेर या बाघ -- जिस तरह से पूरे जंगल पर राजा की तरह राज्य करते हैं, यही राजसी पृवत्ति छोटी तथा घरेलू बिल्लियों मे भी होती है। वे आपका विश्वास जीतने या आपके आगे पीछे दुम नही हिलती बल्कि उल्टा आपको या अन्य जानवरो को उनका विश्वास जीतने के लिये कवायद करनी पडती हैं। एक बार विश्वास जीत लिया फिर वे आपको काफी अधिकार दे सकती हैं। हाँ एक बार विश्वास जीत लिया इसका यह अर्थ नही कि बस हो गया -- किसी भी गलत व्यवहार से 'विश्वास' मे दरार पड सकती है।


जहाँ कुत्ते प्रताडना तथा हिंसा को बर्दाश्त करके पिछल्ग्गू बने रहते है, बिल्लियाँ किसी भी प्रकार का दुर्व्यहार सहन नही करती है और पलट कर जवाब देती हैं। जहाँ कुत्ते यदि मुखिया या समूह के अन्य सदस्यों द्वारा प्रताडित किये जाने के बावजूद भी वापस आ जाते हैं। इसे कई बार 'वफादारी' मान लिया जाता है। सत्य यह है कि कुत्ते इस बात से भलीं भाँति परिचित होते हैं‌ कि अकेले शिकार करके भोजन जुटाने मे सफलता की संभावना बहुत कम होती है, अत: 'जीवित' रहने के लिये वे मार पीट सह कर भी झुंड मे बने रहते हैं। वही दूसरी तरह बिल्लियाँ आत्मनिर्भर होने की वजह से इस 'दुविधा' से मुक्त रहती हैं‌ और या तो प्रताडना का विरोध करती हैं‌ या वह इलाका छोड कर दूसरी जगह चली जाती हैं।

इन दोनो पशुओं‌ की यही पृवत्ति घरेलू माहौल मे इंसानों के प्रति भी रहती है और कुत्तो की इस बेबसी को हम वफादारी मान लेते हैं, और बिल्लियों‌ की 'अत्मनिर्भरता' को हम 'अहसानफरामोश' की संज्ञा दे देते हैं।

तथ्य यह भी है कि कुत्ते तथा बिल्लियाँ एक दूसरे के शत्रु नहीं है, जैसा आमतौर पर माना जाता है, वरन घर मे पाले जाने वाले कुत्तों को हम बिल्लियों पर हमला करने लिये उकसाते हैं। और आदतन वे बिल्ली को देखते ही भौंकना शुरू कर देते हैं।

वैसे हिदी विज्ञान साहित्य जगत मे भी कुत्ते और बिल्ली पाये जाते हैं। जो अपनी अपंगता की वजह से दुम हिलाते रहते है और झुंड बना लेते है वे वफादार कुत्ते कहलाते हैं, जो आत्मनिर्भर व 'नोच-खसोट' सहन नही करते उन्हे 'अहसानफरामोश' बिल्लियाँ कहा जाता है। खैर कुत्ते तो सेवक समूह से होते है और बिल्लियाँ राजा। यह राजा और रंक का क्या मुकाबला!

-- स्वप्निल भारतीय

चित्राभार:

१. किटि हमारे घर की मालकिन बिल्ली।
२. जूनियर: नया मेहमान, बेहद शरारती बिल्ला।
३. योडा: जूनियर का अग्रज। जिज्ञासू प्रवत्ति का बिल्ला।



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