बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी के बगलगीर (बगल में बैठे) बीरबल के वंशज के साथ आज बादशाह के साले साहब भी तशरीफ फरमा (बैठे) थे। यूं तो साले साहब पिछिले दो हफ्तों से शाही महल में कयाम किये हुये थे और अगले एक महीने तक पयाम (प्रस्थान) की कोई सूरत (स्थिति) नजर नहीं आ रही थी।
खैर आज वे दरबार में इस साल मक़सद से बैठाये गये थे कि वे भी तो देखें कि उनके बहनाई यानि कि बादशाह सलामत का कितना जल्वा है? किराये पर लाये गये लोग दरबार में आते बादशाह सलामत को कोर्निश (झुक कर सलाम करना) करते और हाथ बांध कर एक कोने में खड़े हो जाते। कुछ लोग बादशाह के खजाने से ही चुपचाप दिये गये लालो-जवाहर (मूल्यवान रत्न) थालियों में रखकर लाते और बादशाह ने हुजूर में बा-आवाजे बुलंद (तेज स्वर में) बताते कि फला जगह के बादशाह ने हुजूर की क़दमबोसी (पैर चूमने) के लिये ये नजराना भेजा है।
शानो-शौकत की इस नुमायश में तटस्थ बैठे साले साहब मन ही मन कुढ़ रहे थे, "बेवकूफ समझा है हमें, अरे अपने दरबार में अपनी ऊँची करने के लिये हम सालों से यहीं करते जा रहे हैं।"
दरबार में सबसें आखिर में आने वाला व्यक्ति खाली हाथ था। बादशाह की त्योरियों पर बल पड़े, शान-शौकत के प्रदशZन की योजना में ये "लूप होल" कैसे छूटा? उन्होंने प्रश्नवाचक निगाह से बीरबल के बंशज की ओर देखा पर अब किया क्या जा सकता था आने वाला तो आ चुका था।
"हुजूर ना चीज बादशाह सलामत के सामने कुछ अर्ज करना चाहता है", आखिरी आगंतुक ने कहा।
"इजाजत है", आने वाली सारी मुसीबत की आशंका से डरे बादशाह के मुँह से मुश्किल से इतना निकला।
"हमारे जागीरदार साहब ने अर्ज किया है कि अगर अगले हफ्ते बादशाह सलामत और उनके मेहमान हमारे इलाके में शिकार पर तशरीफ लायें तो उनकी इज्जत आफजाई (सम्मान में वृद्धि ) होगी।"
"शिकार," उन्होंने प्रश्नवाचक निगाहों से बजीरे-आला, बीरबल वंशज की ओर देखा। पशोपेश में थे वे अगर न्यौता ठुकराते है तो उस जागीदार को खुराफात करने का एक और मौका मिलेगा और न्यौता तो स्वीकार कैसे करें। पीढ़ियों से किसी ने हाथ में बन्दूक पकड़ी नहीं, गोली की आवाज सुनकर उन्हें पसीने आने लगते हैं। ये बात और है कि अपने कई विरोधियों का वे "सफाया" करा चुके है पर वहां तो "भाड़े के आदमी" मिल जाते हैं। काश कोई तरीका यहॉ भी होता कि यहां भी "भाड़े के शिकारी" इस्तेमाल किये जा सकते।
बादशाह का साला भी मुसीबत में था, नमाज माफ करवाने आये थे और रोजे गले पड़ गये। उनके पास बहादुरी कहॉ बची है। कुछ कबाब में, कुछ शबाब में, बाकी बची वह शराब में फना (नष्ट) हो गईं। अगर शिकार में दहाड़ता शेर सामने आ गया तो मुमकिन है कि पाजामा बदलना पड़े। साले साहब भी हडबडा कर बोले, "हम इसके हक में नहीं है। अरे शेरों की प्रजाति ही लुप्त होती जा रही है हम उनके शिकार के हामी नहीं हैं। वैसे भी तो...
"अरे हुजूर अब शेर कहा बचे हैं सल्तन में, अब तो जंगल में गीदड़, भेड़िये, और कुत्ते ही दिखते हैं या फिर बस्ती में ढोर-डंगर, सुअर और गधे, कह कर आखिरी आगंतुक ने बीरबल वंशज की ओर कदाक्ष पूर्ण द्रष्टि से देखा।
एक झटके में बीरबल वंशज की समझ में सारा माजरा आ गया। तो ये जोरावर का आदमी है, जोराबर जो बादशाह से इसलिये खफा है कि उन्होंने पांच साला स्वांग में उसको वजीर की कुर्सी है हथियाने में मदद नहीं की। तब से वह बादशाह की सल्तनत में रहते हुये भी बादशाह को और खास कर के बीरबल वंशज को नीचा दिखाने की कोशिश करता ही रहता है। जोरावर को ही तो पटखनी देकर बीरबल वंशज वह इस बार के "पंचसाला स्वांग" में अपनी गद्दी बचा पाये थे। अब उन्हें लगा कि जोरावर को इस खेल में परखनी देना जरूरी है। और आनन-फानन में उसने फैसला ले लिया।
"जागीदार साहब को कहो, खातिर जमा रखें, बादशाह सलामत मेहमान के साथ शिकार के लिये ज़रुर तशरीफ लायेंगे।"
बादशाह ने मौंचक्के होकर बीरबल वंशज की और देखा, दांत पीस कर बड़बडाये पर प्रकट में बोले" वजीरे आला आप जानते हैं कि किसी बेजुबान का शिकार इन्सानियत के खिलाफ है, फिर भी आपने ........."
"अरे हुजूर का हर लफ्ज कानून है..............आप कहें तो कल ही कानून में बहुमत से ये तब्दीली (परिवर्तन) करा दें कि सत्ता पर काबिज किसी भी व्यक्ति के लिये किसी का भी शिकार गैर कानूनी नहीं।"
अपना आखिरी वार भी खाली जाते देख बादशाह पस्त हो गये। उनके मुंह से बमुश्किलतमाम (बहुत मुश्किल से) निकला "तखलिया" और दरबार बरखास्त हो गया।
खैर शिकार का दिन भी आया। दोनों बादशाह (बादशाह और उनका साले साहब) अपने-अपने लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने मचानों पर विराजे। आज शिकार की बारी थी साले साहब की। धड़कता दिल और कांपते हाथों में बदूंक लिये मचान पर बैठे साले साहब उस दिन को कोस रहे थे जब उन्होने बहनोई के यहां मेहमान बनने के लिय अपने महल से पयाम (प्रस्थान) किया था। इधर बादशाह भी परेशान थे चलो आज तो ठीक है पर कल तो मेरी बारी है, तब क्या होगा, बकरे की मॉ आखिर कब तक खैर मनायेगी? अचानक उन्होने एक फैसला ले लिया और उनके दिल की धड़कनें काबू में आने लगीं।
जागीरदार के आदमियों ने ही हल्ला मचाते हुये पहले से ही पकड़ रखा हिरन साले साहब के मचान की तरफ दौड़ा दिया। हिरन घबरा कर भागा। साले साहब की बदूंक के ट्रिगर पर रखी उंगली दबी पर आगे दौडता हुआ हिरन और आगे दौड़ गया। जाहिर था उनका निशाना खाली गया था। दरबारी पीछे की ओर मुंह करके अपनी हंसी रोकने का असफल प्रयास करने लगे। साले साहब को लगा कि अगले ही क्षण बादशाह की हंसी भी सुनाई देने वाली है, सारा शरीर पसीने में नहा गया।
पर ये क्या बादशाह सलामत पूरी गम्भीरता से मचान पर से उतर कर वहॉ जा पहुंचे जहां पर से हिरन भागा था। वे वहां खडे हो कर आस-पास निगाहें दौड़ा कर कुछ खोज रहे थे। जैसे ही उन्हें उस जगह से कोई एक मीटर दूर खडे पेड़ में साले साहब की बन्दूक से निकली गोली पैबस्त (धंसी) मिली तो उन्होंने कुछ नापने का दिखावा किया...फिर जोर-जोर से तालियां बजाते हुये बोले,"वाह-वाह क्या निशाना लगाया है बरखुरदार, कमाल कर दिया।
सारे दरबारी हैरान से बादशाह की ओर देख रहे थे, पर हिरन तो...एक बाग़ी दरबारी ने कुछ कहना चाहा।
"बेवकूफ हो तुम...मैने ही उससे कहा था कि भले ही वज़ीरे आला ने कूटनीतिक कारणों से दावतनामा कुबूल कर लिया है पर तुम्हें तो इंसानियत पर क़ायम रहना है, खबरदार बेजुबान जानवर हलाक न होने पाये, ठीक कहा था न"?
"दरबारियों ने स्वी—ति में सिर हिलाया",
"... इसलिये मैने ही उन्हें समझाया था कि आप गोली ऐसे चलाना कि गोली हिरन से ठीक तीन हाथ एक बालिश्त और चार अंगुल दूर से गुजरे....और देख लीजिये कितना सटीक निशाना, यहां हिरन था और वह पेड़ के तने में गढ़ी गोली, ठीक तीन हाथ एक बालिश्त और चार अंगुल दूर...क्या बात है, क्या निशाना है? नीचे उतरो बरखुरदार साले साहब तुम्हारा सिर चूम लूं, क्या निशाना लगाया है? साले साहब के चाटुकार दरबारी उनकी जय-जय कार करने लगे, समझदारों ने सिर झुका लिये।
अब भी आपको कोई शक है कि अगले दिन क्या हुआ होगा? अगले दिन भी यहीं सब दोहराया गया पर नये संदर्भो मे। अन्तत: साले साहब ने भी बादशाह का निशाना पूरी तरह चूक जाने में वावजूद के बादशाह के अचूक निशाने की तरीफ के पुल बांध कर एक दिन पहले का बदला चुका दिया।
पुनश्च:- प्रिय पाठक, उपर्युक्त व्यंग कथा पढ़ कर क्या आपको हिन्दी विज्ञान कथा लेखको में फैली किसी दुश्पृवत्ति कीयाद आती है। यदि आपके आस-पास आपके कोई मित्र या परिचित लेखक प्रमादवश, स्वार्थवश या भ्रमवश इस प्रवत्ति को शिकार हों जो दूसरों की रचनाओं की समीक्षा करते समय रचनाओं के गुण दोश पर न जाकर आपसी सम्बन्धों के कारण या किसी प्रतिदान की आशा में उनकी किसी भी प्रकार की रचनाओं का गुणगान करने से न थकतें हो तो उन्हें समझाइये कि उनकी ये हरकत उनकी आत्मिक तुष्टि का साधन तो हो सकती है पर इससे हिन्दी विज्ञान कथा का नुकसान ही होगा।
-- डा अरविन्द दुबे