ये बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी थी। मान लेने में क्या हर्ज है कि बादशाहत कायम थी। बादशाहत तब भी खानदानी होती थी, विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती थी। बादशाहत अभी भी विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती है पर हर पांच साल पर सबसे स्वीकृति का ठप्पा लगवाने का स्वांग भर होता है जिसकी जरूरत पहले नहीं थी।
बादशाह की तरह खानदानी वजीर (चापलूस) के रुप में बीरबल की पाँचवी पीढ़ी भी बादशाह की बगलगीर थी। मजेदार बात ये थी कि दरबार में सवाल भी पुराना ही था। सामने कागज पर पडोसी देश के एक कलाकार द्वारा खीची गई एक रेखा थी। रेखा खीचने वाले की शर्त थी कि इस रेखा को छेडे बिना इसे छोटा करना है। आप सोचेंगे इसमें क्या खास बात है। वही घिसी-पिटी बात... इसके ऊपर एक दूसरी बडी रेखा खींच दो नीचे वाली अपने आप छोटी हो जायेगी। ये तो मियां बीरबल पीढ़ियों पहले कर गये थे। पर परेशानी ये थी कि इतनी पीढ़ियां गुजर जाने के बाद एक सीघी रेखा खीचने का सलीका ही किसमें बचा था।
सब हसरत से कागज पर खिंची उस एकदम सीधी लकीर को देख रहे थे और मन ही मन जल रहे थे कि काश हम भी ऐसी ही सीधी...एक दम सीधी रेखा खींच पाते। पर ये लोग तो बरसों से रेखाओं की वकालत करते आ रहे थे -- कभी नक्शे की पर खिंची रेखाओं की वकालत करते तो हजारों-हजार प्रजा के सम्बन्धों के बीच अलगाव की रेखायें खिंच जातीं, कूट नीति की रेखाओं पर बहस करते तो हजारों बेगुनाहों के खून की हजारों टेढ़ी-मेढ़ी, मोटी बदसूरत रेखायें सडकों गली कूचों में बनने लगतीं। उन्हें लगता था उनका काम है दूसरों को ऐसी ही रेखायें खींचना सिखाना, फिर कागज पर रेखायें खींचने का अम्यास करने का समय ही कहॉ था उनके पास? वे तो अब उस्ताद हो गये थे रेखायें-वेखायें खींचने का काम तो नौसिखियों का था। पर आज इस एक विदेशी रेखा ने उनके माथे की रेखाओं को गहरा दिया था।
वीरबल का वंशज क्रोध में था, "हम साले जो इतने पढ़े-लिखे माने जाते हैं...दुनिया हमें आलिम-फाजिल कहती है और हम इतनी सीधी एक रेखा नहीं खींच सकते...और ये दर-दर भटकने वाले ये फाकाक़श बेऔकात लोग एक दम इतनी सुडौल सीधी रेखा खींच कर हमारे लिये चुनौती बन गये हैं...कुछ करना पडेगा," बीरबल का वंशज गुस्से में फुंफकारा।
"हॉ तो क्या राय है आप सब की इस विषय पर?" तत्कालीन बादशाह ने अपने दरबारियों का आवाहन कर लिया।
जो समझदार थे वे मुंह लटका कर बैठ गये, उस दिन को मन ही मन कोसने लगे जब उन्होने खुद रेखायें खींचना छोड़कर उस्तादी ओढ़ ली थी। वे मन ही मन अफसोस कर रहे थे, "हम चाहे जो करते रहते पर एक सीधी व नायाब रेखा खींचने का अभ्यास जारी रखते तो आज ये दिन न देखना पड़ता।"
दरबारियों के एक और तबके ने सुझाया कि, "इस रेखा को चुपके से दोनों तरफ से थोडा-थोड़ा बिगाड़ दो, कौन जान पायेगा कि ये हमने ही किया है?"
"पर ये तो बईमानी होगी, सरासर बेईमानी, इस लाइन को तो छेड़ना ही नहीं है," बादशाह ने प्रतिवाद किया।
"राजनीति में क्या बेईमानी, क्या ईमानदारी, जिस तरह से देश की इज्जत बचे वही विधान है...अपना काम बने वही नियम है, वही ईमानदारी है," उन्होंने कहा।
वैसे मन ही मन वह हंस रहे थे और सोच रहे थे, "जिस साले को राजनीति का ये क,ख,ग नहीं आता उसे बादशाह बनने का हक क्या है...अगले पांच साला स्वांग पर इसे भी समझा जायेगा," पर प्रकटत: परिस्थिति देख कर वे खामोश हो गये।
दरबारियों का एक ओर वर्ग था उसने कहा, "असलियत तो यह है कि जो रेखा सामने खिंची हुई है वह एक नायाब रेखा है...किसी के अभ्यस्त हाथों का कमाल। क्यों न हम ईमानदारी की बात करें और मान लें कि ये रेखा सचमुच बहुत अच्छी बन पड़ी है..फिर रेखा खीचने वाला कोई इतना गैर भी नहीं है...अपना पडोसी ही तो है। क्यों न उसे बुला कर उसके कौशल की तारीफ करें, उसे शाबासी दे, आशीर्वाद देकर उसका उत्साहवर्धन करें।
"अरे तुम साले," बीरबल का वंशज गुस्से में चिल्लाया, "तुम साले उसके के ग्रुप के लगते हो...साले बंधुआ मजदूर, खाते इस देश का हो तारीफ उनकी...चमचे साले लगता है उसने तुम्हें हमारे दरबार में प्लांट किया है।"उसके मुंह से बेतहाशा थूक के छींटे निकल रहे थे। वह बादशाह की ओर मुडा और अर्ज किया, "जहांपनाह ये सब साले उसके (रेखा खीचने वाले के) ग्रुप के है इन्हें दरबार से निकाल दिया जाये।" हालांकि प्रकटत: वह अनुरोध कर रहा था पर स्वर धमकी भरा था।
बादशाह सलामत सोच में थे अगर इसकी मानते नहीं है तो अगले "पांच साला स्वांग" में लेने के देने पड़ जायेगे। वैसे जो वह करवा रहा है वह शायद ठीक नहीं है। हमें अगर सीधी रेखा खींचना आता होता तो कोई लफड़ा ही नहीं था एक इससे बड़ी सीधी रेखा ऊपर खींच देते और सारा मामला रफा-दफा हो जाता पर राजनीति में ये सब ऐसा छूटा कि कलम पकड़ते ही पसीना आने लगता है। अन्तत: बादशाह सलामत की उंगली उठी और देश के हित-चिन्तक, वे लोग जिन्हें बीरबल के वंशज ने उस दूसरे देश के कलाकार का बंधुआ या "प्लांट किया" करार दिया गया था, उन्हें सिपाहियों द्वारा धक्का देर बाहर निकाल दिया गया। वे दरबार के चारों ओर लगे सींखचों में से पहले तो बाहर से हल्ला मचाते रहे फिर थक कर खामोश होकर, दरबार को भगवान के भरोसे छोड़कर, दरबार की कार्यवाही देखने लगे।
"तो वजीरे आला इस गम्भीर समस्या का हल क्या है...इस वक्त इज्जत कैसे बचाई जाये?" बादशाह सलामत बीरबल के वंशज से मुखाबित हुये।
"एक नायाब तरीका समझ में आया है बादशाह सलामत," बीरबल के वंशज ने बोलना शुरू किया।
"जल्दी बोलो, पहेलियां मत बुझाओ।"
"बादशाह सलामत जिस कागज पर ये रेखा खिचीं है उस कागज को ही दोनों ओर से थोड़ा-थोड़ा फाड़ दें कागज के साथ रेखा भी छोटी हो जायेगी।"
दरबार में जो समझदार थे पर जिनके मुंह पर डर के और हिचक के ताले लगे थे वे उदास हो गये। सिर झुकाकर सोचने लगे "अब इस राज्य को मिटने से कोई नहीं बचा सकता।"
जो बेवकूफ थे, अवसरवादी थे, चापलूस थे उन दरबारियों ने तालियां बजाईं, "वाह क्या नायाब तरीका बताया है, ऐसा ऑरिजिनल आइडिया तो ऑरिजिनल बीरबल मियॉ भी न सोच पाते...लायक पूर्वजों की सुपर लायक औलाद।"
दरबार के बाहर बाहर निकाले गये और सीखचों के बाहर से ही दरबार की कार्यवाही देखते लोग चिल्लाये, "ये गलत है ऐसे तो इस कागज पर कभी भी इससे बडी रेखा खींची ही नहीं जा सकेगी...आप इस तरह रेखा खीचने की विधा के विकास और कौशल पर ही कुछ कुठाराघात कर रहे हैं।"
"पर इससे रेखा तो छोटी हुई...हमारे राज्य की नाक तो गिरते गिरते बची," बीरबल का वंशज चिल्लाया।
"पर किस कीमत पर...विधा के विकास के नाश की कीमत पर, ये तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है!"
"चूल्हे में गया तुम्हारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जीत आखिर जीत होती है," बीरबल का वशंज आगे बढ़ा उसने कागज को दोनों ओर से फाड़ कर छोटा कर दिया। रेखा अब छोटी लगने लगी थी।
बीरबल का वंशज मूछों पर ताव दे रहा था, बेवकूफ बादशाह अब राहत महसूस कर रहा था, सीखचों के बाहर खड़े बुद्धिमान दरबारी अपना सिर धुन रहे थे और चापलूस चाटुकार बीरबल के वंशज की जय जयकार कर रहे थे।
पुनश्च- प्रिय पाठक उपयुक्त व्यंग रचना क्या आपको विज्ञान कथा के क्षेत्र में व्याप्त किसी दुष्पृवत्ति की ओर इशारा करती प्रतीत होती है? यदि हां तो देखिये कि आपके आसपास, आपका कोई चहेता, परिचित व्यक्ति प्रमादवश या क्रोध में इस प्रकार की दृष्पृवत्ति में लिप्त तो नहीं है? यदि है तो उसे समझाइये कि उसके इन प्रयासों से विज्ञान कथा की क्षति हो रही है। आपके बार-बार समझाने पर भी हठ पूर्वक यदि वह कुछ भी सुनने को तैयार न हो तो साहस करके सामने आइये और सार्वजनिक रुप से उसकी भतर्सना करिये और विज्ञान कथा के संरक्षण एवं सम्वर्धन की इस पावन मुहिम में हमारा साथ दीजिये -- -- डा. अरविन्द दुबे